धर्म क्या हैं ?
महर्षि कणाद के शब्दों में जिस ज्ञान आदि साधनों को अपनाने
से हमारी भौतिक विज्ञान व आध्यात्मिक उन्नति एक समान हो, उसे धर्म कहते हैं।
जो मत विज्ञान की कसौटी पर खरे नहीं उतरते, वे धर्म भी नहीं हैं।
यतो धर्म: ततो जय:
(जहाँ धर्म है वहाँ विजय हैं।)
"धर्म सर्वोपरि
है" यह एक सार्वभौमिक सत्य है। जहाँ धर्म है वहाँ एक राष्ट्र है, जहां धर्म
नहीं है वहाँ कोई राष्ट्र नहीं होता। यदि होता है तो सिर्फ धोखा, कलह, अनेकों वाद-परिवाद (जातिवाद, सम्प्रदायवाद,
नक्सलवाद आदि) अत्याचार, अपराध, पाखंड, दंगे, फसाद और युद्ध।
राष्ट्र की पहचान हैं- सामाजिक एकता, सामाजिक समरसता, समान शैक्षणिक,
समान आर्थिक, समान सामाजिक व समान मानवीय मूल्यों की मजबूत स्थिति। जो
बिना धर्म के अनुपालन के किसी भी प्रकार संभव नहीं हैं।
अब बात करते है उस राष्ट्र की जिसके पक्षधर वह लोग है जिनके लिये धर्म का
राष्ट्रीय स्तर पर होना अनिवार्य नहीं हैं। इसका सीधा अर्थ है कि वह नहीं चाहते कि
समाज में एकता हो, समरसता हो,
समान शिक्षा हो, समान सामाजिक अधिकार हों। वह सब प्रकार से उन कारणों को
अविष्कृत कर लेगें जो समाज को नष्ट-भ्रष्ट करने में सक्षम हों। इन लोंगों का राष्ट्रवादी
प्रेम मात्र एक दिखावे से अधिक कुछ भी नहीं होता। सदैव दुखपूर्ण स्थितियों को
बनाये रखना व घड़याली आंसू बहाते रहना, देशभक्ति की आढ़ में अपने छदम् स्वार्थों की पूर्ति करते रहना ही एक मात्र
लक्ष्य होता है।
यदि राष्ट्र आगे है और धर्म पिछे है तो अर्थ सीधा है कि कोई ओर छिपा हुआ
सम्प्रदाय चोरी-चोरी पैर पसार रहा है। मुख्य राष्ट्र को चोर राष्ट्र निगल रहा है।
अत: स्पष्ट है कि राष्ट्र की रक्षा धर्म की रक्षा से होती है न कि
इंकलाब-जिन्दाबाद के नारों से। यदि राष्ट्र रक्षा करना चाहतें हैं तो धर्म की
रक्षा करो। धर्म की रक्षा से तात्पर्य मूलभूत धर्मग्रंथ (पवित्र वेद, उपनिषद, गीता)
की रक्षा से अर्थात् पढ़ने पढ़ाने प्रसार प्रचार व सम्प्रदायिक लोगों को सनातन
हिन्दू धर्म में दीक्षित करने से ही संभव है।
धर्म ही सर्वोच्च है। बिना धर्म के राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती। बिना
धर्म के किसी राष्ट्र का अस्तित्व नहीं होता। कोई भी राष्ट्र बिना धर्म के जीवित
नहीं रह सकता। देश तो बनते बिगड़ते रहते है पर राष्ट्र का निर्माण धर्म ही करता है।
धर्म राष्ट्र की धुरी है राष्ट्र की आत्मा है, प्राण है। बिना धर्म के राष्ट्र मृत प्राय है।
उदाहरण हमारे सामने है- भारत कभी ईरान तक था, आर्यावर्त भी कभी विस्तृत भूभाग
तक था, ईरान से इंडोनेशिया और मॉरिशस से मास्को तक आर्यावर्त था, पर धर्म सिकुड़ता
गया राष्ट्र बंटता गया। जहाँ धर्म रहा वो भाग आज भारत का भाग है। जहाँ धर्म लुप्त
जैसे कश्मीर व् पूर्वोत्तर भारत, उस भाग के भारत
से अलग होने के षड्यंत्र चलते रहते है। अर्थात धर्म व संस्कृति के कारण भारत का
अस्तित्व है।
देश सर्वोपरी नहीं है। देश मात्र एक भौगोलिक सीमा हैं, जहां रहने वाले लोग अपने स्वार्थों की पूर्ति
के लिए कुछ भी कर सकते हैं। स्वतंत्रता समर के दौरान राष्ट्रभक्त क्रांतिकारियों
पर गोली चलाने वाले सैनिक भी देशभक्त थे। आज भी अलगाववादी व देशद्रोही नेताओं की
सुरक्षा करने वाले पुलिस के जवान देशभक्त हैं, पर वे राष्ट्रभक्त नहीं हैं,
क्योंकि उन्हें सनातन धर्म की शिक्षा प्राप्त नहीं हैं। वह स्थान हमारे लिये हमारा
राष्ट्र नहीं है जहां हम अपने धर्म को सुरक्षित व प्रसारित नहीं कर सकते हैं।
यहूदियो का राज्य था इजराइल जहाँ से उन्हें ईसाइयो ने मार कर भगा दिया। रोमनों
ने भी उन पर अत्याचार किये। फिर इस्लाम आया और उसने भी यहूदियो पर अत्याचार किये
पर उन्होंने सब कुछ खोकर केवल धर्म बचाये रखा। यहूदियों ने धर्म की रक्षा करके
स्वयं को बचाये रखा और इजराइल की स्थापना की। उनका धर्म न बचता तो देश भी न बचता।
इसलिए धर्म सर्वोपरी है। धर्म ही राष्ट्र का निर्माण करता है न की राष्ट्र धर्म
का। सनातन धर्म जब तक है यह भारत वेदिक ज्ञान के प्रकाश में लीन रहने वाला राष्ट्र
रहेगा। ये राष्ट्र किसी राजा सम्राट के नाम से नहीं बल्कि ऋषियो मुनियो द्वारा
पालित पोषित वैदिक ज्ञान में लीन रहने वाले देश के स्वभाविक नाम पर रखा गया है।
उदयाचल से अस्ताचल तक भारत से अलग किये गए समस्त देशों का धर्म, सम्प्रदाय, सामाजिक, राजनीतिक और भौगोलिक इतिहास यही कहता है कि
धर्म सर्वोपरि है न की देश।
देशभक्त नहीं धर्मभक्त बने।
जिसका जैसा धर्म उसका वैसा देश॥
कोई भी राष्ट्र तब तक पराजित नही होता जब तक वह अपने धर्म
की रक्षा कर पाता हैं।
धर्म बढाओं, राष्ट्र बचाओं...!!
सनातन धर्म की प्रतिष्ठा धर्म और विद्या के केंद्रों के
द्वारा ही होगी ।
जब मुसलमान और ईसाई अपने मज़हब के अनुसार आचरण कर भारत में सभी दायित्वों पर
कार्यरत रह सकते हैं तो हिंदू बनकर अपना दायित्व निभाने से आपको किसने रोका है।
सनातन धर्म को सर्वोपरि महत्व दीजिए। गर्व से कहिए आप सनातन वैदिक हिन्दू हैं।
छोड़िए लज्जा, आत्मसात कीजिए
अपनी गौरवशाली परंपरा को। धर्म शून्य मत रहिए। धर्म का ज्ञान प्राप्त कीजिए दूसरों
को प्रेरित कीजिए।
अपने धर्म को संवैधानिक संरक्षण दिलाने के लिए न्यायसम्मत आवाज उठाइए। यह भारत
नहीं इंडिया हैं। यहां तुम्हारे पक्ष में कुछ भी नहीं है हिंदुओं। प्रार्थना से
कुछ उपलब्ध नहीं होगा, छीनना पड़ेगा।
वर्तमान में यह भूभाग जिसे जिसे शासन इंडिया कहता हैं, सनातन सिद्धान्तों वाले
तन्त्र व्यवस्था से शासित नहीं हो रहा हैं। बल्कि हमारे सनातन धर्म संस्कृति के
घोर शत्रु मलेक्षों के तन्त्र से हम सनातनी हिन्दू शासित हो रहे हैं, जो हमारे
पराधीन होने का स्पष्ट परिचायक है। यही व्यवस्था धीरे धीरे हम हिन्दुओं के मूल
धर्म, संस्कृति, इत्यादि का दीमक
की तरह शमूल नाश कर देगी।
देशभक्त नहीं, राष्ट्रभक्त बनों
देश कहते है किसी शासक के द्वारा शासित होने वाले भूभाग को, जबकि राष्ट्र कहते हैं संस्कृति द्वारा शाषित
होने वाले भूभाग को। हम राष्ट्रभक्त लोग देश की भक्ति हम तभी कर सकते हैं जब हमारे देश
में सनातन वैदिक मानवता का सिद्धान्त लागू हो न कि म्लेक्षों के सिद्धान्त लागू
होने पर देश की भक्ति करेंगे। जैसा कि आज है।
यदि आज हम राष्ट्र भक्ति से अधिक महत्व देश भक्ति को देगे तो इस सनातन धर्म
विरोधी इंडियन व्यवस्था की भक्ति करेंगे, हिन्दूद्रोही न्यायाधीशों के भेदभावपूर्ण निर्णयों की भक्ति
करेंगे, नौकरशाही की भक्ति करेंगे,
सनातनी हिन्दुओं के राष्ट्र को खोखला कर सनातन धर्म को समाप्त करने का प्रयास करने
वाले नेताओं की भक्ति करेंगे, जैसा कि आज हो भी रहा हैं किसी को सिद्धान्तो से
मतलब नहीं, बस नेताओं की चाटुकारिता को ही परम कर्तव्य मान लिए हैं।
जबकि राष्ट्र की भक्ति करने से तात्पर्य है कि धर्म सत्ता की भक्ति करना
अर्थात अपने सनातन धर्म, सनातन संस्कृति
और परम्पराओं के प्रति निष्ठावान होकर पूर्ण समर्पित रहना। हम मनुष्य हैं अतः हमारा परम
कर्तव्य है कि हम उसी के सिद्धान्तों को माने जिसने हमें उत्पन्न किया है, न कि किसी मनुष्य के कल्पना से उपजे हुए नियम
या सिद्धान्तो को माने।
किन्ही इंडियन न्यायाधीश ने यह कह दिया कि हिंदू कोई धर्म नहीं, जीवन शैली है और कई नेता लोग तथा अन्य संगठन भी
इसी में लटक गए। वह कोई न्यायिक निर्णय नहीँ था क्योंकि हिन्दू धर्म है या नहीं,
यह विषय न्यायालय के समक्ष कभी गया ही नहीं था
और वस्तुतः सर्वोच्च न्यायालय को इस विषय में निर्णय का कोई अधिकार संविधान के
अंतर्गत प्राप्त ही नहीं है। यह सुप्रीम कोर्ट का विषय है ही नहीं।
वस्तुतः यह कहना कि हिंदू धर्म कोई धर्म नहीं है केवल जीवन शैली है, यह महापाप है। क्योंकि विश्व में सर्वत्र धर्म
ही मानव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है और अभी के जो नेशन स्टेट हैं, उन सबका सर्वोपरि लक्ष्य अपने नेशन स्टेट के
बहुसंख्यकों के रिलिजन को राज्य की सुरक्षा देना और विधि तथा न्याय एवं शिक्षा का
निर्धारण उसी रिलिजन के आधार पर करना है ।।यह नेशन स्टेट का विश्व भर में सर्वोपरि
कार्य है सिवाय कम्युनिस्ट राज्योंके।
अतः जैसे ही कोई यह कहता है कि हिंदू धर्म नहीं है ,जीवन शैली है ,वैसे ही वह समस्त हिंदू धर्म और हिंदू समाज को, हिंदू राष्ट्र को उस स्वाभाविक अधिकार से वंचित कर देता है।
जो विश्व में प्रत्येक समाज और प्रत्येक धर्म को प्राप्त है। हम इस स्वाभाविक
अधिकार से वंचित हो जाते हैं जोकि विश्वभर में प्रत्येक समाज के नेशन स्टेट के मुख्य
समाज को प्राप्त है। जबकि उसी समय इस्लाम ईसाइयत आदि सबको रिलीजन के वे सभी अधिकार
भारत में भी प्राप्त है। उन्हें अल्पसंख्यक होने के नाते उनके रिलिजन को विशेष
संरक्षण प्राप्त है। इस प्रकार हिंदू धर्म को धर्म नहीं मानना, केवल जीवन शैली कह देना महापाप है और हिंदुओं
के साथ बहुत बड़ी धोखाधड़ी तथा जालसाजी है और हिंदू धर्म को नष्ट कर डालने का
भयंकर कुचक्र है।
ईसाईं, बौद्ध व मुस्लिम मिशनरी के हाथों बिके हुये कुछ छद्म हिन्दुत्ववादी
संगठन सनातन हिन्दू धर्म के मूल स्वरूप व महापुरुषों को नष्ट करके उसके जगह पर एक कृतिम
सिद्धान्तों व राक्षसी लोगों को सनातन हिन्दू समाज में स्थापित कर रहे है और वो
इसमे काफी हद तक सफल भी हो गए हैं। उनके द्वारा इस राष्ट्र के मूल धर्म, संस्कृति को नष्ट
करने का कोई प्रयास नहीं छोड़ा गया और आज भी जारी है। पर अब ऐसा नहीं होगा। अब सच्चे सनातनियों
को निराश होने की आवश्यकता नहीं हैं।
राष्ट्रभक्त हिन्दुओं का संगठन धर्मराज्यम् अब समाज में जाकर लोगों को असली
धर्म बताएगा। अब इस राष्ट्र के प्रत्येक क्षेत्र में शुद्ध सनातन धर्म को केंद्र
में रख कर कार्य किये जाएंगे। चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो चाहे, राजनीति का क्षेत्र हो, चाहे सूचनातंत्र का क्षेत्र हो या अन्य चाहे कोई भी क्षेत्र
हो सभी क्षेत्रों में अब शुद्ध रूप से सनातन वैदिक हिन्दू धर्म को जानने व मानने
वाले लोग ही आगे आएंगे और इन कालनेमियों का सम्पूर्ण विनाश कर देंगे। जो लोग धर्म
को जानते हैं और जिनकी दृष्टि इस भौतिक संसार और हाड़ मास के नष्ट हो जाने वाले निज
देह पर नही है बल्कि ईश्वर पर है वो अवश्य एकजुट हो कर इस भटके हुए मानव जाति को
राह दिखाएंगे।
धर्मराज्यम् से जुड़ने के लिए हमारे सूचना केंद्र पर संपर्क
करें 8535004500
||जो बोले सो अभय, सनातन धर्म की जय ||
