मंगलवार, 31 दिसंबर 2019

राष्ट्र धर्म रक्षक हिन्दू वीर शिरोमणि गोकुल सिंह

राष्ट्र धर्म रक्षक हिन्दू वीर शिरोमणि गोकुल सिंह


वीर गोकुल सिंह एक साधारण सनातन क्षत्रीय जाट परिवार में पैदा हुए थे। उन्हें बचपन से ही शस्त्र अस्त्र की विद्या सिखाई गयी। वेदों व शास्त्रों का ज्ञान दिया गया था।

उन्होंने इस्लाम मजहब व इस्लामिक पिशाच औरँगेजेब के अत्याचारों के बारे में बचपन से ही सुना था इसलिए उन्होंने युवावस्था में ही क्रांतिकारियों की सेना तैयार करनी शुरू कर दी थी।
वीर गोकुल सिंह ने तिलपत में अपनी गढ़ी स्थापित की और मथुरा व ब्रिज के अन्य हिस्सों में भी अपने छोटे छोटे किले बना लिया। उसके बाद वे पूरे उत्तर भारत में घूमे।हिन्दुओं को इस्लाम व औरंगजेब के अत्याचारों के खिलाफ जाग्रत किया।

उनका भाषण इतना तेजस्वी था कि हिन्दू माताओं ने अपने बेटो को गोकुल सिंह के अभियान के लिए समर्पित कर दिया था।

उन्होंने हिन्दू युवकों के हाथों में हथियार दिए व 20000 युवकों की सेना तैयार की।
वे औरंगजेब के विरूद्ध योजनाबद्ध सशस्त्र क्रांति करने वाले पहले वीर यौद्धा थे। उन्होंने हिन्दू किसानों को औरंगजेब के खिलाफ असहयोग नीति अपनाने को कहा व उनके एक आह्वान पर किसानों ने लगान बन्द कर दिया व बाकी हिन्दुओं ने जजिया कर देना बंद कर दिया।
उन्होंने मंदिरों, गुरूकुलों, महिलाओं, किसानों की रक्षा की। धर्म व देश की भक्ति उनकी रग रग में बसी हुई थी।

उन्होंने इस्लामी राक्षस औरंगजेब के सबसे कट्टर अब्दुन्नबी खान का वध किया व हिन्दू युवाओ के मन से मुगलिया कर्मचारियों का खौफ निकाला। उन्होंने औरँगेजेब के सेनापतियों को हरा दिया।


इसके बाद हर जगह मुगलिया सरकार के कर्मचारियों को मार भगाना शुरू हुआ। औरंगजेब की सत्ता हिल गयी पूरे उत्तर भारत में हिन्दू क्रांति की लहर दौड़ पड़ी।

औरंगजेब ने उसे सन्धि का प्रस्ताव भेजा व जागीर का लालच दिया। लेकिन गोकुल सिंह ने साफ मना कर दिया और उस पर तंज कसते हुए कहा कि जो धर्म के पथ से हट जाए व असली यौद्धा नहीं होता।और तुझे हिन्दुओ पर इतनी ही दया है तो अपनी बेटी किसी हिन्दू को ब्याह दे।
बिना किसी राजा महाराजा के सहयोग से एक छोटे से किसान के बेटे गोकुल सिंह ने यह सब कर दिखाया।

अंत में जो औरंगजेब बड़े बड़े राजा महाराजाओं से लड़ने नहीं आता था उसे एक साधारण युवक से लड़ने आना पड़ा।
उसने पूरी ताकत गोकुल सिंह के आन्दोलन को दबाने में लगा दी।
औरंगजेब और गोकुल के बीच तिलपत में सीधा युद्ध शुरू हो गया।

गोकुल सिंह अंतिम युद्ध 6 दिनों तक लड़ते रहे । हजारो हिन्दू बलिदान हुए। औरँगेजेब की शाही तोपो के आगे तलवारों से लड़ते रहे। आखिर तोपो के आगे बंदूक तलवार कब तक चलती अंत में औरँगेजेब का पलड़ा भारी होने लगा।हार देखकर माताओं ने अपनी बेटी के सीने में खंजर उतार दिया। पतियों ने पत्नियों के सीने में गोली उतार दी व रण में कूद पड़े थे।
इस तरह जौहर करके वीरांगनाओं ने अपना स्वाभिमान बचाया।

गोकुल सिंह व उनकी सेना ने हार देखकर मैदान नहीं त्यागा। हजारो युवा रण में बलिदान हो गए। बाकियो को औरंगजेब ने बंदी बना लिया।
औरंगजेब से अंतिम तिलपत युद्ध 6 दिन तक लगातार चला। गोकुल व उनके साथियों को बंदी बनाकर आगरा दरबार में ले जाया गया।

गोकुल सिंह व उनके चाचा उदय सिंह पर इस्लाम स्वीकारने के लिए दबाव बनाया गया। लेकिन उन्होंने आंखों में आंखे डालकर कहा कि जो तू कर रहा है यही इस्लाम है तो इसे धर्म कहना पाप है और हिन्दू धर्म उनके शरीर के कतरे कतरे में बसा हुआ है।

यदि गोकुल सिंह इस्लाम स्वीकार लेते तो उस दिन उनके हजारो वीर सैनिक व उत्तर भारत के हजारो हिन्दू अपना धर्म त्याग देते। गोकुल सिंह यह जानते थे उन्होंने अपने प्राणों की तनिक भी चिंता न की और अपने धर्म के स्वाभिमान को नहीं झुकने दिया।

इसके बाद औरंगजेब ने 1 जनवरी 1670 को गोकुल सिंह व उनके चाचा के शरीर के टुकड़े टुकड़े करवा दिए। उनके साथियों व करीबियों का भी यही हाल हुआ। वहां देखने वाले हर इंसान के मुख से हे राम की ध्वनि निकल रही थी।लेकिन बलिदान होने वाले वीरों का सिर गर्व से तना हुआ था व उनके चित पर प्रसन्नता ही दिखाई दे रही थी।
उनके मासूम छोटे छोटे बच्चों की भी इस्लामिक पिशाच औरँगेजेब ने निर्मम तरीके से हत्या करवा दी थी।

इस बलिदान के बाद हिंदूओ में साहस भर गया उन्होंने औरंगजेब के अत्याचारों के विरुद्ध क्रांति शुरू कर दी। उसके बाद अनेकों यौद्धाओं ने इस्लामिक पिशाचों के विरूद्ध समय समय और क्रांति की। गोकुल सिंह का बलिदान इस्लामिक सत्ता के खात्मे में मील का पत्थर साबित हुआ।
ऐसे महान यौद्धा के बलिदान दिवस पर कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से भारत स्वाभिमान दल उन्हें कोटि कोटि नमन करता हैं।


आगरा स्थित फुब्बारा चौक 1 जनवरी 2014 आधुनिक भारतीय इतिहास का पहला कार्यक्रम, जिसमें 1669 की क्रांति के जननायक, राष्ट्र-धर्म रक्षक वीर गोकुल सिंह जी को उनके बलिदान दिवस पर श्रद्धांजलि देकर उनके अधूरे सपनों को पूर्ण करने का संकल्प लेते हुए ठाकुर हरीओम सिंह जी, विश्वजीत सिंह अनंत जी व भाई प्रमोद यादव जी

1 जनवरी "क्रान्ति संकल्प दिवस"

1 जनवरी क्रान्ति संकल्प दिवस 

ईसाई मिशनरीयों के हाथों अपना स्वाभिमान गवाँ चुका हिन्दू समाज अपना इतिहास जाने, और 1 जनवरी को 1669 के स्वतंत्रता समर के जननायक गोकुल सिंह जी व उनके 20 हजार यौद्धाओं की स्मृति में "क्रान्ति संकल्प दिवस" मनाकर अपने पूर्वजों पर गर्व करें।

निवेदक:
विश्वजीत सिंह अनंत
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल


हमारा नवबर्ष #चैत्रशुक्लपक्षप्रतिपदा से प्रारम्भ होता हैं, 1 जनवरी को हम धर्मरक्षक वीर गोकुल सिंह जी व उनके साथियों के बलिदान को क्रान्ति संकल्प दिवस के रूप में स्मरण करते हैं ~~~~~~~~~~


 महाआश्चर्य! भारतवासी,1 जनवरी को देश की स्वतंत्रता के लिए बलिदान होने वाले अमर वीरगोकुलसिंह को भूल गए..!!! पर गुलाम बनाने वाले अंगेजों का नववर्ष याद है.. 1669 की क्रान्ति के जननायक, परतंत्र भारत में असहयोग आन्दोलन के जन्मदाता, राष्ट्रधर्म रक्षक वीर गोकुल सिंह जी और उनके सात हजार क्रान्तिकारी साथियों के बलिदान दिवस पर (1जनवरी 1670) उनको शत-शत नमन। कैसे वीर थे वो अलबेले, कैसी अमर है उनकी कहानी। धर्मरक्षक वीर गोकुल सिंह जी की, आओ याद करें बलिदान।। 


सन् 1666 के समय में इस्लामिक राक्षस औरंगजेब के अत्याचारों से हिन्दू जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। मंदिरों को तोड़ा जा रहा था, हिन्दूस्त्रियों की इज्जत लूटकर उन्हें मुस्लिम बनाया जा रहा था। औरंगजेब और उसके सैनिक पागल हाथी की तरह हिन्दू जनता को मथते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे। हिंदुओं को दबाने के लिए इस्लामिक पिशाच औरंगजेब ने अब्दुन्नवी नामक एक कट्टर मुसलमान को मथुरा का फौजदार नियुक्त किया।

अब्दुन्नवी के सैनिकों का एक दस्ता मथुरा जनपद में चारों ओर लगान वसूली करने निकला। सिनसिनी गाँव के सरदार गोकुल सिंह के आह्वान पर किसानों ने लगान देने से इंकार कर दिया, परतन्त्र भारत के इतिहास में वह पहला असहयोग आन्दोलनथा । दिल्ली के सिंहासन के नाक तले समरवीर धर्मपरायण हिन्दू वीर योद्धा गोकुल सिंह और उनकी किसान सेना ने आतताई औरंगजेब को हिंदुत्व की ताकत का एहसास दिलाया।

मई 1669 में अब्दुन्नवी ने सिहोरा गाँव पर हमला किया। उस समय वीर गोकुल सिंह गाँव में ही थे। भयंकर युद्ध हुआ लेकिन इस्लामी शैतान अब्दुन्नवी और उसकी सेना सिहोरा के वीर हिन्दुओं के सामने टिक ना पाई और सारे इस्लामिक पिशाच गाजर-मूली की तरह काट दिए गए। गोकुल सिंह की सेना में जाट, राजपूत, गुर्जर, यादव, मीणा इत्यादि सभी जातियों के हिन्दू थे। इस विजय ने मृतप्राय हिन्दू समाज में नए प्राण फूँक दिए थे।






इसके बाद पाँच माह तक भयंकर युद्ध होते रहे । मुगलों की सभी तैयारियां और चुने हुए सेनापति प्रभावहीन और असफल सिद्ध हुए । क्या सैनिक और क्या सेनापति सभी के ऊपर गोकुलसिंह का वीरता और युद्ध संचालन का आतंक बैठ गया। अंत में सितंबर मास मेंबिल्कुल निराश होकरशिकनखाँ ने गोकुलसिंह के पास संधिप्रस्ताव भेजा । गोकुल सिंह ने औरंगेजब का प्रस्ताव अस्वीकार करते हुए कहा कि औरंगजेब कौन होता है हमें माफ करने वालामाफी तो उसे हम हिन्दुओं से मांगनी चाहिए उसने अकारण ही हिन्दू धर्म का बहुत अपमान किया है।

अब औरंगजेब 28 नवम्बर 1669 को दिल्ली से चलकर खुद मथुरा आया गोकुल सिंह से लड़ने के लिए। औरंगजेब ने मथुरा में अपनी छावनी बनाई और अपने सेनापति होशयार खाँ को एक मजबूत एवं विशाल सेना के साथ युद्ध के लिए भेजा। आगरा शहर का फौजदार होशयार खाँ 1669 सितंबर के अंतिम सप्ताह में अपनी-अपनी सेनाओं के साथ आ पहुंचे । यह विशाल सेना चारों ओर से गोकुलसिंह को घेरा लगाते हुए आगे बढ़ने लगी ।






गोकुलसिंह के विरुद्ध किया गया यह अभियानउन आक्रमणों से विशाल स्तर का थाजो बड़े-बड़े राज्यों और वहां के राजाओं के विरुद्ध होते आए थे। इस वीर के पास न तो बड़े-बड़े दुर्ग थेन अरावली की पहाड़ियाँ और न ही महाराष्ट्र जैसा विविधतापूर्ण भौगोलिक प्रदेश । इन अलाभकारी स्थितियों के बावजूदउन्होंने जिस धैर्य और रण-चातुर्य के साथएक शक्तिशाली साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति का सामना करकेबराबरी के परिणाम प्राप्त किएवह सब अभूतपूर्व है।

औरंगजेब की तोपो,धर्नुधरोंहाथियों से सुसज्जित तीन लाख की विशाल सेना और गोकुल सिंह की किसानों की 20000 हजार की सेना में भयंकर युद्ध छिड़ गया। चार दिन तक भयंकर युद्ध चलता रहा और गोकुल सिंह की छोटी सी अवैतनिक सेना अपने बेढंगे व घरेलू हथियारों के बल पर ही अत्याधुनिक हथियारों से सुसज्जित और प्रशिक्षित मुगल सेना पर भारी पड़ रही थी। भारत के इतिहास में ऐसे युद्ध कम हुए हैं जहाँ कई प्रकार से बाधित और कमजोर पक्षइतने शांत निश्चय और अडिग धैर्य के साथ लड़ा हो । हल्दी घाटी के युद्ध का निर्णय कुछ ही घंटों में हो गया था। पानीपत के तीनों युद्ध एक-एक दिन में ही समाप्त हो गए थेपरन्तु वीरवर गोकुलसिंह का युद्ध तीसरे दिन भी चला । 
इस लड़ाई में सिर्फ पुरुषों ने ही नही बल्कि उनकी स्त्रियों ने भी पराक्रम दिखाया। चार दिन के युद्ध के बाद जब गोकुल की सेना युद्ध जीतती हुई प्रतीत हो रही थी तभी हसन अली खान के नेतृत्व में एक नई विशाल मुगलिया टुकड़ी आ गई और इस टुकड़ी के आते ही गोकुल की सेना हारने लगी। युद्ध में अपनी सेना को हारता देख हजारों नारियाँ जौहर की पवित्र अग्नि में खाक हो गई। गोकुल सिंह और उनके ताऊ उदय सिंह को सात हजार साथियों सहित बंदी बनाकर आगरा में औरंगजेब के सामने पेश किया गया। 






औरंगजेब ने कहा जान की खैर चाहते हो तो इस्लाम कबूल कर लो और रसूल के बताए रास्ते पर चलो। बोलो क्या इरादा है इस्लाम या मौत? अधिसंख्य धर्म-परायण हिन्दुओं ने एक सुर में कहा – “औरंगजेब, अगर तेरे खुदा और रसूल मोहम्मद का रास्ता वही है जिस पर तू चल रहा है तो धिक्कार है तुझे और तेरे रसूल को, हमें तेरे रास्ते पर नहीं चलना l” इतना सुनते ही औरंगजेब के संकेत से गोकुल सिंह की बलशाली भुजा पर जल्लाद का बरछा चला। गोकुल सिंह ने एक नजर अपने भुजाविहीन रक्तरंजित कंधे पर डाली और फिर बड़े ही घमण्ड के साथ जल्लाद की ओर देखा और कहा दूसरा वार करो। दूसरा बरछा चलते ही वहाँ खड़ी जनता आंर्तनाद कर उठी और फिर गोकुल सिंह के शरीर के एक-एक जोड़ काटे गए। गोकुल सिंह का सिर जब कटकर धरती माता की गोद में गिरा तो मथुरा में केशवराय जी का मंदिर भी भरभराकर गिर गया। यही हाल उदयसिंह और बाकि साथियों का भी किया गया। उनके एक साथी माडुसिंह जाट की जीवित ही चमड़ी उधेड़ दी, उनके छोटे- छोटे बच्चों को जबरन मुसलमान बना दिया गया। 




ये एक जनवरी 1670 का दिन था। ऐसे अप्रतिम वीर का कोई भी इतिहास नही पढ़ाया गया और न ही कहीं कोई सम्मान दिया गया। न ही उनके नाम पर न कोई विश्वविद्यालय है और न कोई केन्द्रीय या राजकीय परियोजना। कितना एहसान फरामोश, कृतघ्न है हिंदू समाज!! कैसे वीर हुए इस धरा पर,जिन्होंने धर्म के लिए प्राण न्यौछावर कर दिये पर इस्लाम नही अपनाया। गोकुलसिंह सिर्फ #जाटों के लिए शहीद नहीं हुए थे न उनका राज्य ही किसी ने छीन लिया था, न कोई पेंशन बंद कर दी थी, बल्कि उनके सामने तो अपूर्व शक्तिशाली मुगल-सत्ता, दीनतापूर्वक, सन्धि करने की तमन्ना लेकर गिड़-गिड़ाई थी। शर्म आती है हमें कि हम ऐसे अप्रतिम वीर को कागज के ऊपर भी सम्मान नहीं दे सके। शाही इतिहासकारों ने उनका उल्लेख तक नही किया। केवल जाट पुरूष ही नही बल्कि उनकी वीरांगनायें भी अपनी ऐतिहासिक दृढ़ता और पारंपरिक शौर्य के साथ उन सेनाओं का सामना करती रही। दुर्भाग्य की बात है कि भारत की इन वीरांगनाओं और सच्चे सपूतों का कोई उल्लेख शाही टुकड़ों पर पलने वाले तथाकथित इतिहासकारों ने नहीं किया। जागो भारतवासियों!!! भारत स्वाभिमान दल वीर गोकुल सिंह व उनके अमर बलिदानी साथियों को कोटि-कोटि नमन करता हैं।