सोमवार, 11 जुलाई 2016

आपको कौन सा रास्ता सही लगता है.. गांधी या सावरकर

गाँधी : भारतवासियों! शत्रु से प्यार करो और उस पर पूर्ण विश्वास रखो।
सावरकर : शत्रु पर प्यार या विश्वास भूल से भी मत करो।
गाँधी : अहिंसा का रास्ता अपनाओ। कोई एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल आगे करो।
सावरकर : आत्मरक्षा हिंसा नहीं कहलाता। मूर्ख हिन्दुओं! एक गला कटा तो आगे करने के लिए दूसरा गला बचेगा ही नहीं।
गाँधी : मैं एक हिन्दू हूँ और हिन्दुओं के सभी भगवान शांति का सन्देश देते हैं।
सावरकर : तुम खोखले हिन्दू हो। प्रभु श्रीराम के हाथ में धनुष है तो श्रीकृष्ण के हाथ में सुदर्शन चक्र है।सज्जनों की रक्षार्थ ईश्वर को भी शस्त्र धारण करने पड़ते हैं।
गाँधी : शस्त्र उठाना नितांत अनुचित है। शत्रु से लड़ने की बजाय उसके दुर्गुणों से लड़ो।
सावरकर : युद्ध में गुण-अवगुण नहीं तलवारें टिकी रहती हैं और जीतती भी हैं। सीमायें तलवारों से निर्धारित की जाती है गुणों-अवगुणों से नहीं।
गांधी : तलवारें तो होनी ही नहीं चाहिए। ह्रदय परिवर्तन पर विश्वास रखो और शत्रु का दिल जीत लो।
सावरकर : जो आपकी हत्या करने की ठान चुका हो उसका दिल जीता नहीं जा सकता। हे हिन्दुओं! अफज़ल खान का ह्रदय परिवर्तन संभव नहीं था तभी तो शिवाजी को उसका ह्रदय चीरना ही पड़ा।
अब आप ही चुनें कि इनमें से आपको कौन सा रास्ता सही लगता है..
गांधी
या फिर
सावरकर
आखिर आप स्वयं ही आपके जीवन के शिल्पकार हैं

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

एक मौलाना और मेरी बातचीत..

मैं - मौलाना साहब, जन्नत में कौन जायेंगे ?
मौलाना - मुसलमान....

मैं - जी कौन मुसलमान ? शिया या सुन्नी ?
मौलाना - बेशक सुन्नी जनाब....

मैं - जी सुन्नी में कौन ? मुकल्लिद या गैर-मुकल्लिद ?
मौलाना - मुकल्लिद और कौन....

मैं - जी मुकल्लिद में तो चार हैं उनमें से ?
मौलाना - हनफी और कौन ?

मैं - जी, पर हनफी में तो देवबंदी और बरेलवी दोनों हैं फिर उनमें..?
मौलाना - देवबंदी....

मैं - बहुत शुक्रिया, पर देवबंदी में भी तो हयाती और ममाती दोनों हैं, उनमें से कौन

इसके बाद मौलाना गायब हो गया वो दोबारा दिखा ही नहीं !
हमसे 10 गुना ज्यादा इनमें जातिगत बंटवारे हैं जो आपको जानना जरूरी है।

दोस्तों, निवेदन है आपसे इस पोस्ट को शेयर करो, ताकि हमारे धर्म में जबरन घुसा दिये गये जातिवाद का मजाक उड़ाने वालों को करारा जवाब मिले !

सोमवार, 4 जुलाई 2016

क्या हिन्दुओं द्वारा रोजा इफ्तार करना उचित है ?

मित्रों, हमने हिन्दू संगठनों द्वारा रामध्यान (रजमान) के अवसर पर रोजा इफ्तार को लेकर एक पोस्ट लिखी थी, जिसपर काफी लोग अनावश्यक तर्क दे रहे है, उन सभी के लिए इतिहास का एक दृष्टांत प्रस्तुत है :
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भगवान् कृष्ण के सखा भीष्म पितामह ने भी जब दुर्योधन का अन्न खाया तो धर्म से विमुख हो गए और द्रौपदी की रक्षा के लिए उद्यत नहीं हो सके. परिणाम स्वरुप शर शैय्या पर सोना पड़ा. भीष्म पितामह के आगे हम लोग किस गिनती में हैं? जब हम लोग किसी रामद्रोही, बाबर समर्थक, गोमांसभक्षक के घर का अन्न (और मांस) चाव से खाते हैं तो हम भी सेक्युलर बन जाते हैं और उनकी ही भाषा बोलने लगते हैं और अपने भविष्य के लिए जाने कौन कौन सी शय्या तैयार करते रहते हैं. अस्तु,
जो मन हो सो खाइए, क्योंकि भविष्य है आपका !!
विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल