सोमवार, 2 अक्टूबर 2017

प्राचीन परंपरा से निकला हमारा जल व्यवस्थापन

 इस समय देश के अनेक राज्यों में सूखा पड़ा हैं. नदियाँ सूख गई हैं. पानी के लिए त्राहि त्राहि मची हैं. अनेक राज्यों की सिंचन योजनाएं, बाँध और नहरों का नेटवर्क सब फेल हो रहे हैं. जलस्तर जमीन से बहुत नीचे जा चुका हैं….
यह सब देखकर लगता हैं, क्या वास्तव में हमारा देश पहले कभी ‘सुजलाम, सुफलाम…’ था..? और यदि ऐसे अनेक अकाल झेलने के बाद भी यदि यह देश ‘सुजलाम, सुफलाम…’ था, तो अब क्या हो गया हैं इस देश को..?
हजारों वर्षों तक हमारा यह देश वैश्विक अर्थव्यवस्था का सिरमौर बना रहा. हमने अनेक अकाल झेले. लेकिन हमारा जल प्रबंधन इतना सटीक एवं दुरुस्त था, कि हम पर अकाल का ज्यादा प्रतिकूल असर नहीं पड पाया.
हममें से कितने लोग जानते हैं कि दुनिया का सबसे पुराना, और आज भी उपयोग में हैं, ऐसा बाँध भारत में हैं..? ईसा बाद दूसरी शताब्दी में चोल राजा करिकलन ने बनाया हुआ ‘अनईकट्टू बाँध’ पिछले अठारह सौ साल से उपयोग में हैं.
आज कल के बनाये हुए बांधों में जहाँ तीस / पैंतीस वर्षों में ही दरारें पड़ने लगती हैं, या सिल्ट जमा हो जाता हैं, वहां अठारह सौ वर्ष किसी बाँध का काम करते रहना किसी आश्चर्य से कम नहीं हैं.
कावेरी नदी के मुख्य पात्र में बनाया हुआ यह बाँध 329 मीटर लंबा और 20 मीटर चौड़ा हैं. अंग्रेजों ने इसे ‘ग्रैंड अनिकट’ नाम दिया. स्थानिक भाषा में इसे ‘कलानाई बाँध’ भी कहा जाता हैं.
तमिलनाडु के त्रिचनापल्ली से मात्र 15 किलोमीटर दूर बना यह बाँध हमारे प्राचीन जल व्यवस्थापन की अद्भुत मिसाल हैं।अनुभवी वास्तुविदों द्वारा निर्मित यह बाँध देखकर ऐसा लगता हैं कि उस समय हमारा जल नियोजन / व्यवस्थापन अत्यंत उच्च स्तरीय तथा परिपक्व था.
इसका अर्थ स्पष्ट हैं।हमारे देश में जल व्यवस्थापन की तकनीकी अत्यंत प्रगत स्थिति में थी.

इस कलानाई बाँध के बाद बनाए गए अनेक बाँध आज भी उपयोग में हैं।सन 500 से 1300 के बीच, दक्षिण के पल्लव राजाओं के बनाए अनेक मिट्टी के बाँध वहां की सिंचाई परियोजनाओं के आधारस्तंभ हैं।सन 1011 से 1037 के बीच बना तमिलनाडु का ‘वीरनाम बाँध’ यह इसका उदाहरण हैं.
और केवल बाँध ही क्यूँ, पानी को रोकने की अनेक तकनीक प्राचीन काल से हमें अवगत हैं।‘पाटन’, यह पहले गुजरात की राजधानी हुआ करती थी।इस पाटन में, जमीन के अन्दर, सात मंजिला कुआं बनाया गया हैं.
सन 1022 से 1063 के बीच बना यह कुआं (जिसे हम ‘बावड़ी’ कहते हैं), ‘रानी का वाव’ कहलाता हैं।सोलंकी राजवंश की महारानी उदयमती ने अपने पति भीमदेव की याद में यह बावड़ी बनवाई थी।आज यह बावड़ी, यूनेस्को द्वारा संरक्षित स्मारक है.
जल व्यवस्थापन यह हमारा प्राचीन शास्त्र रहा हैं।अनेक शास्त्रीय ग्रन्थ इस विषय पर लिखे गए हैं।वेदों में भी पानी के व्यवस्थापन संबंधी अनेक ऋचाएं हैं.
ऋग्वेद में पानी को संग्रहीत करने के विधि संबंधी उल्लेख हैं।अथर्ववेद में भी इस संबंध में अनेक स्थानों पर उल्लेख हुआ हैं।‘स्थापत्यवेद’ यह अथर्ववेद का ही उपवेद समझा जाता हैं। दुर्भाग्य से इस की एक भी प्रति भारत में उपलब्ध नहीं हैं.
यूरोप के ग्रंथालयों में इसकी हस्तलिखित प्रतियाँ हैं। इसमें ‘तडाग
विधि’ (अर्थात जलाशय निर्मिती) के बारे में विस्तार से लिखा हैं। नारद शिल्प शास्त्र और भृगु शिल्प शास्त्र में पानी का वितरण तथा संग्रहण करने संबंधी सूचनाएं हैं।
जल व्यवस्थापन के बारे में, हमारे अति प्राचीन ज्ञान को समेटता एक सिद्ध ग्रन्थ लिखा ‘वराहमिहिर’ ने. आज से डेढ़ हजार वर्ष पूर्व लिखा गया यह ग्रन्थ, जल व्यवस्थापन के क्षेत्र में आज भी महत्वपूर्ण सन्दर्भ माना जाता हैं।
वराहमिहिर का मुख्य कार्य हैं, ‘बृहत्संहिता’ नामक ज्ञानकोश. सन 550 से 580 के बीच लिखे हुये इस ज्ञानकोश मे जानकारियों का अद्भुत भण्डार हैं. स्वतः वराहमिहिर ने इसके लिए कठिन परिश्रम किये थे।
इस ‘बृहत्संहिता’ में ‘उदकार्गल’ (पानी का संग्रहण) नाम का 54 वे क्रमांक का अध्याय हैं। इस 125 श्लोकों के अध्याय में वराहमिहिर ने जल नियोजन के जो सूत्र बताये हैं, वह महत्वपूर्ण तो हैं ही, आज भी प्रासंगिक हैं।
इन श्लोकों में जमीन के अन्दर छिपे हुए जल स्त्रोतों का पता कैसे लगाया जाता हैं इसका विस्तृत विवरण हैं. वराहमिहिर ने, उनके किये गए अध्ययन के अनुसार, पेड़, पौधे, पेड़ की शाखाएं, पेड़ के पास की मिट्टी, उस मिट्टी का गंध, रंग और स्वाद आदि सब के आधार पर पानी के जमीन में छिपे स्त्रोतों का पता लगाने की विधि दी हैं।
मजेदार बात यह, कि इस विधि के अनुसार पानी मिलने की संभावना कितनी हैं, यह जानने के लिए, आंध्र प्रदेश के तिरुपति स्थित ‘श्री व्यंकटेश विश्वविद्यालय’ (एस. व्ही. यूनिवर्सिटी) ने लगभग 14-15 वर्ष पहले वराहमिहिर ने बताये हुए संकेतों के आधार पर जमीन ढूंढी और वहां पर 300 बोरवेल की खुदाई की. आश्चर्य इस बात का था, कि लगभग 95 फीसदी बोरवेल में पानी निकला..!
अर्थात भूगर्भ स्त्रोंतो से पानी खोजने की हमारी प्राचीन विधि कारगर थी. लेकिन यह प्रयोग सरकारी लालफीताशाही में दबकर रह गया..!
पूर्व मध्यप्रदेश (जिसे महाकोशल कहा जाता हैं), और महाराष्ट्र के विदर्भ में बड़ी संख्या में गोंड राजाओं ने अनेकों वर्ष राज किया। सर्वसामान्य रूप से माना जाता हैं कि गोंड अर्थात वनवासी समुदाय, तकनीकी में, राज्यतंत्र में पिछड़ा रहा होगा. किन्तु वास्तविक परिस्थिति इसके ठीक विपरीत हैं।
महाराष्ट्र के चंद्रपुर से लेकर तो मध्यप्रदेश के गढ़ा-मंडला (जबलपुर संभाग) तक, गोंड शासित प्रदेश में जल व्यवस्थापन अत्यंत उच्च श्रेणी का था. एक बहुत अच्छी पुस्तक हैं, ‘गोंड कालीन जल व्यवस्थापन’. इसमें आज से 500-700 वर्ष पहले, गोंड राजाओं के समय किस प्रकार से पानी के संग्रहण की एवं वितरण की व्यवस्था थी, यह देखकर आश्चर्य होता हैं ।
संक्षेप में हम यह कह सकते हैं, कि हमारा देश किसी समय ‘सुजलाम, सुफलाम..’ था, विश्व के अर्थतंत्र का सिरमौर था, क्योंकि हमारा जल व्यवस्थापन अत्यंत ऊँचे दर्जे का था. इसकी प्रगत तकनीक हमें अवगत थी ।
काश हम भारतीय अपनी पुरातन व्यवस्थाओं को संजो कर रख पाये होते ।।
वंदे मातरम
जय सनातन ।।
लेख साभार - मनीषा सिंह

भारत माँ के गुदड़ी के लाल

भारत के गौरव ,द्वितीय प्रधान मंत्री, भारत माँ के गुदड़ी के लाल, लाल बहादूर शास्त्री के जन्म दिवस पर ...हुतात्मा को भारत स्वाभिमान दल का कोटि कोटि नमन ... !

भारत के थे अनमोल रत्न ,
तेरा यश अब भी भारत गाता ।
हुए धन्य तुम्हे पुत्ररत्न पाकर ,
पिता शारदा , रामदुलारी माता ।।
तुम दृढ़ प्रतिज्ञ थे सत्यनिष्ठ,
शिक्षा के थे अभ्यर्थी कठोर ।
जो पैसे नहीं पास में नाव के,
पढ़ने जाते थे तुम गंगानदी तैर ।।
तुम निडर साहसी अगुआ थे
भारत को गौरव और मान दिया।
जब किया पाक ने नापाक युद्ध ,
तुमने उसका मुँहतोड़ जबाब दिया ।।
की सीमा चौकस ,सैनिक तत्पर
विजयी बन भारतध्वज लहराया ।
नारा जयजवान जयकिसान का दे
भारत ने आत्मशक्ति वापस पाया ।।
तुमको पा भारत माँ धन्य हुई
हे लाल बहादुर हे लाल रतन ।
तुम अद्भुत भारत के गौरव थे ,
हम करते तुमको कोटि नमन ।।

भारत के गौरव लाल बहादुर शास्त्री

देश का लाल लाल बहादुर शास्त्री
शास्त्री जी को कोटि कोटि नमन
न ही भारी कद काठी थी
न ही 56 इंची से जाना गया ।
न ही किसी रैली में रोया ,
न ही घर छोडा , न ही गृहस्थी से भागा ।
न ही कभी फ़क़ीर होने का दावा किया ।
न ही महंगे वस्त्र पहने ,
न ही अमेरिका में जाकर भीख मॉन्गी ,
न ही किसी अन्य देश के आगे पाकिस्तान को गलत या सही सिद्ध करने का रोना रोया ।
अब किया क्या इस बहादुर जी ने ।
अपनी सैलरी जरुरत से ज्यादा होने पर वापिस मंत्रालय को देदी ।
अन्न की कमी हुयी तो खुद सप्ताह में एक दिन का उपवास आरम्भ किया और जनता ने भी ।
पाकिस्तान को उसके घर में घुसकर खत्म किया ।
लाहोर तक भारत के कब्जे में पाकिस्तान को कर लिया ।
फिर भी पाकिस्तानियों की हवा टाइट कर दी थी।
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शास्त्री जी ने 1965 के युद्ध के समय फटी धोती तक पहनी थी, अपने बच्चों का ट्यूशन तक बंद करवा दिया था
और औने गार्डन में फूलों की जगह सब्जिया खुद उगाई थी
शास्त्री जी जैसा प्रधानमंत्री अबतक कोई न हुआ , और शायद भविष्य में इतना ईमानदार प्रधानमंत्री न हो सकेगा ।
भारत स्वाभिमान दल

गाँधी के साधारण जीवन की पोल खोलता एक किस्सा

गाँधी के साधारण जीवन की पोल खोलता एक किस्सा बताता हूँ ... उन्हें जब पता चला की लखनऊ के कैसरबाग़ में चश्मे की एक बहुत प्रसिद्ध दूकान बीएन बैजल ऑप्टिकल है ..जिसके यहाँ से घनश्याम दास बिरला से लेकर बड़े बड़े लोग चश्मा बनवाते है तो गाँधी जी ने ख़ास अहमदाबाद से एक आदमी को लखनऊ रवाना किया और बीएन बैजल की दुकान से अपना फेमश गोल फ्रेम वाला चश्मा बनवाये ... जबकि उस समय अहमदाबाद में चश्मे की सैकड़ो दुकाने थी ..
जिन्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं हो रहा हो वो आज भी लखनउ के कैसरबाग में बीएन बैजल ऑप्टिकल की दुकान पर जाकर पता कर सकते है और उस दुकान में आज भी गाँधी के चश्में का एक नमूना रखा हुआ हैं।

कृपया गाँधी को राष्ट्रपिता कहकर राष्ट्र और संविधान का अपमान न करें


भारत सरकार के अनुसार किसी को राष्ट्रपिता कहना सम्विधान का अपमान है क्योंकि हमारा सम्विधान किसी को राष्ट्रपिता कहने की अनुमति नहीं देता ...
और गाँधी को कभी भी भारत सरकार ने राष्ट्रपिता का दर्जा नहीं दिया .. ये स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा झूठ हमें बताया और पढ़ाया जाता है ... आरटीआई के जबाब में भारत सरकार ने कहा है की गाँधी को भारत सरकार ने कभी भी राष्ट्रपिता नहीं माना और न ही मान सकती है क्योकि हमारा संविधान इसकी आज्ञा नहीं देता ...
 

क्या गांधी राष्ट्रपिता हैं ?


गांधी के कट्टर समर्थक, भारत के दिग्भ्रमित राजनेता और कुछ हमारे अपने भारतवासी जो भारत की संस्कृति और इतिहास से अनभिज्ञ हैं गांधी को राष्ट्रपिता कहते हैं। गांधी भी अपने आपको राष्ट्रपिता कहलाने में गर्व का अनुभव करते थे।

भारत एक सनातन राष्ट्र हैं और यहाँ की संस्कृति अरबों वर्ष पुरानी हैं । इससे पुराना राष्ट्र विश्व में कोई दूसरा नहीं हैं, तो फिर इसका पिता उन्नीसवीं ईसाई सदी में कैसे पैदा हो सकता हैं ! यह महान आश्चर्य की बात है कि अरबों वर्षो से यह राष्ट्र बिना पिता के कैसे चल रहा था ?

राष्ट्रपिता की अवधारणा पाश्चात्य मैकालेवाद की देन हैं । भारत की संस्कृति तो "माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या" कहकर पृथ्वी को, जन्म भूमि को माता के रूप में देखती हैं और अपने आपकों उसका पुत्र मानती हैं।

यदि हम पाश्चात्य अवधारणा पर ही विचार करें, तो जो अन्न, विद्या और सुशिक्षा आदि का दान देकर पालन - पोषण और रक्षण करता हैं, वहीं पिता कहलाता हैँ । तो क्या गांधी ने शास्त्र की आज्ञानुसार इस राष्ट्र का पोषण और रक्षण किया था जो वह राष्ट्रपिता हुये ?

जबकि वास्तव में गांधी एक ऐसे अहिंसक मसीहा थे जिन्होंने जाने- अनजाने स्वतंत्र अखण्ड भारत के उपासक सच्चे देशभक्तों को नष्ट कराया और बाद में भारत माता को भी टुकडों में विभाजित करा दिया । यदि गांधी चाहते तो पाकिस्तान नहीं बनता ।

गांधी इस राष्ट्र के पिता हैं, तो यह राष्ट्र उनका पुत्र हुआ और जो अपने पुत्र के टुकडे करा दें, वह पुत्र का रक्षक हुआ या भक्षक ? वास्तव में गांधी इस राष्ट्र के पिता तो क्या पुत्र कहलाने के लायक भी नहीं थे, क्योँकि पुत्र वह होता हैं जो अपने पिता को दुर्गति से बचाता हैं। आधुनिक भारत राष्ट्र की दुर्गति करने वाले ही सिर्फ गांधी व उनके सहयोगी थे, इसलिए वे इस राष्ट्र के पिता तो क्या, पुत्र भी कहलाने के अधिकारी नहीं हैं।

* मैं जानता हूँ कि करोड़ों भारतवासी जो गांधी में आस्था रखते है मेरे इस एक लेख से मेरे विरूद्ध हो जायेगे , मुझे उनके आक्रोश का शिकार भी होना पड सकता है , पर क्या करूँ , सच को झुठलाने का सामर्थ्य मुझमें नहीं है । मैं मानता हूँ कि देवता भी गलती कर सकते है तो इसमें गांधी या गोडसे अपवाद कैसे हो सकते है , थे तो आखिर वे मनुष्य ही ।विस्तृत जानकारी के लिए "मुझे गाँधी क्यों पसंद नहीं हैं ?" पुस्तक का अध्ययन करें ।

- विश्वजीत सिंह अभिनव अनंत
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल
कृपया गाँधी को राष्ट्रपिता कहकर राष्ट्र और संविधान का अपमान न करें