बुधवार, 30 नवंबर 2016

क्या ईश्वर सिर्फ कल्पना हैं ?

​क्या ईश्वर सिर्फ कल्पना है ? 

पहले हमें समझना होगा , ईश्वर क्या है? कैसा है  ? यथार्थ में ईश्वर एक शक्ति हैं, pure life energy हैं, pure living energy है जिसे हम consciousness कहते हैं science की भाषा में, और वेदांत की भाषा नें उसको ब्रह्म कहते हैं।

ईश्वर एक infinite , अनंत consiousness energy का फील्ड है, जैसे की मॅग्नेटिक field होता है । ईश्वर एक शक्ति हैं, energy हैं, जिस energy से सारा अपने आप कार्य कारण भाव से , cause - effect से विश्व भासीत होता है, उस original life energy को ईश्वर, परमात्मा, देव, भगवान कहा गया है यह बात साफ साफ समझनी चाहिए।

एक infinite original living energy field के gradual consolidification के कारण प्रकृति का , पंचभूतों का, matter का, पदार्थ का निर्माण होना भासीत होता है , जैसे आकाश में वायु होती है , वायु में वाष्प होता है, वाष्प सघन हो जाय तो बादल बनते है, बादल थंडा हो जाये तो जल बन जाता है, जल अधिक ठंडा हो जाये तो बर्फ बन जाता है ठीक इसी तरह उस

Consciousness के सघन होनेसे

Gradually पंचभूत बनते है , universal consciousness से आकाश बनता है, आकाश से वायु बनती है, वायु से अग्नि बनती है, जल बनता है, लावा बनता है, लावा ठंडा होने से फिर पृथ्वी तत्व बनता है,

वाष्प से बर्फ बनने जैसी यह self sustaining self maintaining घटना है , कार्य कारण भाव है, यहां न कोई मनुष्य स्वरूप व्यक्ति स्वरूप ईश्वर है, न कोई नियंत्रक है, न कोई controller है, जो भी है वह सिर्फ और सिर्फ universal consciousness है, जो मन का सूक्ष्मतम स्वरूप है। जिसे कोई दुर्लभ ही जानता है , अनुभव करता है, जो स्वयं ही universal हो जाता है, अनंत हो जाता है । चिरंतन हो जाता है ।...

जो लोग ईश्वर को परंपरा से मानते है वे ईश्वर का खोज नहीं करते ,बस मानते है बिना जाने और जो ईश्वर को नकारते है वे भी बिना जाने ही नकारते है, ये दोनों तरह के लोगो को ईश्वर कभी समझ में आता ही नहीं है, वे अपनी अपनी मान्यता में, सम्मोहन में, परंपरा में, अंधश्रद्धा में, अंध विश्वास में अटके हुये कुपमण्डूक लोग है ।

धर्म के आधारभूत मूल ग्रंथों का सही आकलन हो जाय तो समझ में आता है की सभी एकही मिलती जुलती बात कह रहे है , गलती तो समझने वालो की होती है जो 

मान्यता के कारण कुछ का कुछ समझ बैठते है जो एक सम्मोहन है।
सबका कहना एक है , सब उस शक्तिको निर्गुण ,निराकार कहते है ,उसका कोई जन्म नहीं, कोई मृत्यु नहीं, उसकी कोई माँ नहीं, उसका कोई पिता नहीं, वह न पैदा होता है न मरता है। सामान्य बुद्धि में यह बात पकड में नहीं आती , यह तो अनुभव की बात है , सूनने से, पढ लेने से, मानने से, विश्वास से वह शक्ति समझ में नहीं आती, उसके लिये आत्मज्ञानी महापुरूष से भेट आवश्यक है जो वास्तविक तत्व को समझा सकता है, जो व्यक्ति उस तत्व से एकरूपता अनुभव कर चुका है वही सही मार्गदर्शन कर सकता है, आज विश्व भर में फैले कथाकथित लाखों गुरूओं में से कोई दो- चार ही आत्मज्ञानी गुरू होगे, वाचाल तो बहुत होगे, चमत्कारी बहुत होगे, पर सच्चे आत्मज्ञानी महापुरूष दो- चार ही मिलेगे। भारत वर्ष में ऐसे व्यक्ति को संत, मुनि, ज्ञानी, सद्गुरू कहा जाता हैं।

इनमे कोई मतभेद नहीं है, मतभेद तो हमारे मान्यताओं में है , जो एक तरह की अंधता है दुसरा कुछ नहीं।

सृष्टी एक cause -effect है , जो एक mind - matter phenomenon है, जिसे कृष्ण परमात्मा कहते है , सारा विश्व एक ही वस्तु से बना है जिसे ईश्वर कहा गया है , इसलिये कहा जाता है की कण कण में ईश्वर है, कण कण में ब्रह्म हैं।

ईश्वर को मनुष्य रूप में मानने से संप्रदाय निर्मित हुये है, जो एक दुसरे से झगडते रहते है अज्ञान के कारण, अन्यथा झगडा होने का कोई कारण नहीं है, राजनीति करने वाले, कराने वाले लोग जो कुछ नहीं जानते, जिन्हें सिर्फ सत्ता चाहिये वे ही यहां दंगे फसाद करवाते है, युद्ध, आतंकवाद, नपुंसकता फैलाते है, उनसे सबको दूर रहना चाहिये ।

ईश्वर एक है , एक ओंकार सतनाम , एकं ब्रह्मं , एकोदेव महेश्वर,

पुराने ज्ञानी यह जानते थे इसलिये 6

वैदिक दर्शनों के साथ 6 अवैदिक दर्शन भी दर्शन शास्त्र कि शोभा बढ़ाते है, इतना ही नही सांख्य और वेदांत जैसे वैदिक दर्शन भी ईश्वर को मनुष्य स्वरूप, व्यक्ति स्वरूप नही मानते ।
💐🙏सनातन संस्कृति संघ🙏💐

मंगलवार, 29 नवंबर 2016

राजीव भाई जीवन परिचय

श्री राजीव भाई दीक्षित
भारत स्वाभिमान दल

स्वदेशी के प्रखर प्रवक्ता, चिन्तक , जुझारू निर्भीक व सत्य को द्रढ़ता से रखने की लिए पहचाने जाने वाले भाई राजीव दीक्षित जी 30 नवम्बर 2010 को भिलाई (छत्तीसगढ़) में बलिदान कर दिये गये। वे भारत स्वाभिमान और आज के स्वदेशी आन्दोलन के बलिदानियों में प्रमुख हैं। राजीव भाई भारत स्वाभिमान यात्रा के अंतर्गत छत्तीसगढ़ प्रवास पर थे। वहीं पर उनकी संदेहस्पद हत्या कर दी गयी। 1 दिसंबर को पतंजलि योगपीठ में उनका अंतिम संस्कार किया गया।

राजीव भाई के बारे में
राजीव भाई पिछले बीस वर्षों से बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद के खिलाफ तथा स्वदेशी की स्थापना के लिए संघर्ष कर रहे थे। वे भारत को पुनर्गुलामी से बचाना चाहते थे। उनका जन्म उत्तरप्रदेश अतरौली जिले के नाह नाम के गाँव मे 30 नवम्बर 1967 को हुआ। उनकी प्रारंभिक व माध्यमिक शिक्षा फिरोजाबाद में हुयी उसके बाद 1984 में उच्च शिक्षा के लिए वे इलाहबाद गए। वे सैटेलाईट टेलीकम्युनिकेशन के क्षेत्र में उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे लेकिन अपनी B.Tech की शिक्षा बीच में ही छोड़कर देश को विदेशी कंपनियों की लूट से मुक्त कराने और भारत को स्वदेशी बनाने के आन्दोलन में कूद पड़े। इसी बीच उनकी प्रतिभा के कारण CSIR में कुछ परियोजनाओ पर काम करने और विदेशो में शोध पत्र पढने का मौका भी मिला। वे भगतसिंह, उधमसिंह, और चंद्रशेखर आजाद जैसे महान क्रांतिकारियों से प्रभावित रहे। बाद में वे गांधीवाद के षड़यंत्र में फँस गये।

राजीव भाई

भारत को स्वदेशी बनाने में उनका योगदान

पिछले २० वर्षों में राजीव भाई ने भारतीय इतिहास से जो कुछ सीखा उसके बारे में लोगों को जाग्रत किया | अँगरेज़ भारत क्यों आये थे, उन्होंने हमें गुलाम क्यों बनाया, अंग्रेजों ने भारतीय संस्कृति और सभ्यता, हमारी शिक्षा और उद्योगों को क्यों नष्ट किया, और किस तरह नष्ट किया। इस पर विस्तार से जानकारी दी ताकि हम पुनः गुलाम ना बन सकें। इन बीस वर्षों में राजीव भाई ने लगभग 12000 से अधिक व्याख्यान दिए जिनमें कुछ हमारे पास उपलब्ध हैं। आज भारत में लगभग 5000 से अधिक विदेशी कंपनियां व्यापार करके हमें लूट रही हैं। उनके खिलाफ स्वदेशी आन्दोलन की शुरुआत की। देश में सबसे पहली विस्तृत स्वदेशी-विदेशी वस्तुओं की सूची तैयार करके स्वदेशी अपनाने का आग्रह प्रस्तुत किया। 1991 में डंकल प्रस्तावों के खिलाफ घूम घूम कर जन जाग्रति की और रेलियाँ निकाली। कोका कोला और पेप्सी जैसे पेयों के खिलाफ अभियान चलाया और कानूनी कार्यवाही की।
1991-92 में राजस्थान के अलवर जिले में केडिया कंपनी के शराब कारखानों को बंद करवाने में भूमिका निभाई।

1995-96 में टिहरी बाँध के खिलाफ ऐतिहासिक मोर्चा और संघर्ष किया जहाँ भयंकर लाठीचार्ज में काफी चोटें आई। टिहरी पुलिस ने तो राजीव भाई को मारने की योजना भी बना ली थी।

उसके बाद 1997 में सेवाग्राम आश्रम, वर्धा में गाँधीवादी इतिहासकार धर्मपाल जी को अपना गुरू बना लिया, धर्मपाल जी ने उनको अंग्रेजों के समय के उन ऐतिहासिक दस्तावेजों का अध्ययन करवाया जो भारत दल के संस्थापक स्वर्गीय पंचम सिंह कमल ने खोजबीन कर सार्वजनिक कर दिये थे, लेकिन इन दस्तावेजों में भी धर्मपाल जी ने अपनी गांधीवादी प्रवृत्ति के चलते गांधी व गांधीवाद की सच्चाई को प्रकट न होने दिया। राजीव भाई ने देश को जागृत करने का काम किया। पिछले 10 वर्षों से स्वामी रामदेव जी महाराज के संपर्क में रहने के बाद जनवरी 2009 में स्वामीजी के नेतृत्व में भारत स्वाभिमान आन्दोलन का जिम्मा अपने कन्धों पर ले जाते हुए 30 नवम्बर 2010 को छत्तीसगढ़ के भिलाई शहर में भारत स्वाभिमान की रणभूमि में संदिग्ध परिस्थितियों में बलिदान हुए |

राजीव भाई

उनके अधूरे सपनो को पूरा करने का दायित्व अब श्री विश्वजीत सिंह अनंत जी के नेतृत्व में उनके अनुयायियों ने लिया है और देश भर में भारत स्वाभिमान दल के झंडे तले स्वदेशी के चिंतन, दर्शन और क्रान्ति को फैलाने का कार्य शुरू कर दिया हैं। भारत को स्वस्थ, समृद्ध, शक्तिशाली व संस्कारवान बनाने के इस सम्पूर्ण युद्ध को सतत जारी रखा जायेगा।

सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के इस आंदोलन में सहभागी होकर देश के अमर बलिदानियों के सपनों को पूरा करें। भारत स्वाभिमान दल के सदस्य बनने के लिए सम्पर्क करें
धर्म सिंह
राष्ट्रीय सचिव
भारत स्वाभिमान दल
85 35 004500, 90 84 955551

http://www.bharatswabhimandal.blogspot.com
http://www.facebook.com/bharatswabhimandalofficial

भाई राजीव दीक्षित स्वदेशी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ......

वन्दे मातरम्......

सोमवार, 28 नवंबर 2016

ईश्वर का वास

🌻 *ईश्वर का वास...*
एक सन्यासी घूमते-फिरते एक दुकान पर आये, दुकान मे अनेक छोटे-बड़े डिब्बे थे, एक डिब्बे की ओर इशारा करते हुए सन्यासी ने दुकानदार से पूछा, इसमे क्या है ? दुकानदारने कहा - इसमे नमक है ! सन्यासी ने फिर पूछा, इसके पास वाले मे क्या है ? दुकानदार ने कहा, इसमे हल्दी है !
इसी प्रकार सन्यासी पूछ्ते गए और दुकानदार बतलाता रहा, अंत मे पीछे रखे डिब्बे का नंबर आया, सन्यासी ने पूछा उस अंतिम डिब्बे मे क्या है?दुकानदार बोला, उसमे राम-राम है !
सन्यासी ने पूछा, यह राम-राम किस वस्तु का नाम है ! दुकानदार ने कहा - महात्मन ! और डिब्बों मे तो भिन्न-भिन्न वस्तुएं हैं, पर यह डिब्बा खाली है, हम खाली को खाली नही कहकर राम-राम कहते हैं !
संन्यासी की आंखें खुली की खुली रह गई ! ओह, तो खाली मे राम रहता है !
भरे हुए में राम को स्थान कहाँ ?
*लोभ, लालच, ईर्ष्या, द्वेष और भली-बुरी बातों से जब दिल-दिमाग भरा रहेगा तो उसमें ईश्वर का वास कैसे होगा ?*
*राम यानी ईश्वर तो खाली याने साफ-सुथरे मन मे ही निवास करता है !*
एक छोटी सी दुकान वाले ने सन्यासी को बहुत बड़ी बात समझा दी!
जो बोले सो अभय सनातन धर्म की जय।

सनातन संस्कृति संघ/भारत स्वाभिमान दल

काफिर इस्लाम

हिन्दू अगर गाय का मूत्र पीये तो हराम
मुसलमान अगर ऊँट का मूत्र पीये तो रसूल का फरमान ?
२-: हिन्दू अगर मूर्ति पूजे तो बुतपरस्ती
मुस्लिम अगर काले पत्थर ( संगे अस्वद्) को चूमे तो बोसा मुबारिक ?
३-: हिन्दू अगर अपनी इबादतगाह की सात फेरे लगाये तो हा हा हा खीखीखीखी
मुस्लिम अगर फेरे लगाये तो तवाफ शरीफ्
४-: हिन्दू यदि बलि दे तो जालिम बेरहम्
मुस्लिम कुर्बानी दे तो सुन्नते इब्राहिमी
५-: हनुमान जी हवा मे उड़े तो सवाल साथ में खीखीखी
पर इस्लामिक रसूल का खच्चर उड़े वो काल्पनिक सातवे आसमान में तो मेराज् शरीफ् ???
६-: हिन्दू पत्थर कि बनाई मूर्ति की पूजा करे तो अपनी ही बनाई मुर्ति की पूजा हराम
मुस्लिम पत्थर की कालकोठरी की तरफ मुँह करके सजदा करे सलवत शरीफ???
७-: हिन्दू रावण का पुतला जलाये तो जहालत
मुस्लिम शैतान को कंकर और पत्थर मारे तो मुनसिक हज् ?
८-: हिन्दू के यहॉ एक से अधिक पत्नियां हराम
एक से अधिक पत्नियां, जंग में जीती हुई लौंडियॉ ईमानवालो के लिये हलाल ?
क्यों अल्लाह के बन्दो है न अजीब बात
इस्लाम वालो ! तुम सब कुछ वही तो कर रहे हो जो काफिर करते है, बल्कि तुम उनसे भी ज्यादा कर रहो हो !

रविवार, 27 नवंबर 2016

क्यूंकि धड़कन झूठ नहीं बोलती ...

नाड़ी परीक्षण................
किसी भी व्यक्ति का शरीर का तापमान की जानकारी लेना हो बिना किसी भी थर्मामीटर या किसी भी अन्य यंत्र के तो नीचे लिखे तरीके से जानकारी ले सकते है ।
पुरुष की नाड़ी परीक्षण हमेशा दाहिनी हाथ से किया जाता है और महिला की बायी हाथ से।
अगर किस भी व्यक्ति का शरीर का
60-65 पल्स है तो शरीर का तापमान 98 डिग्री फ़रेनहाएट
70 पल्स है तो 99 डिग्री फ़रेनहाएट तापमान
80 पल्स है तो 100 डिग्री तापमान
90 पल्स = 101 डिग्री फ़रेनहाएट
100 पल्स = 102 डिग्री फ़रेनहाएट
110 पल्स = 103 डिग्री फ़रेनहाएट
120 पल्स = 104 डिग्री फ़रेनहाएट
130 पल्स = 105 डिग्री फ़रेनहाएट
140 पल्स = 106 डिग्री फ़रेनहाएट
यानि हर 10 स्पंदन बढ़ने पर 10 डिग्री तापमान शरीर का बढ़ेगा
गर्भ में बच्चा का पल्स 140 से 150 होगा
सबसे अच्छा पल्स 70 से 74 के बीच होना चाहिए ।
उम्र के हिसाब से ब्लड प्रेसर नापने का अद्भुत तरीका । बिना किसी भी यंत्र के ।
गर्भ में बच्चा का बी पी माँ के बी पी के बराबर होगा
जन्म से 5 साल तक बी पी का हाईयर लिमिट 81 और लोअर लिमिट 45
5 साल से 10 साल तक बी पी का हाईयर लिमिट 90 और लोअर 50
10 साल से 15 साल तक हाई 100 और लोअर 62
15 साल से 20 साल तक हाई बी पी 110 और लोअर बी पी 71
20 साल से 30 साल तक हाई बी पी 120 और लोअर बी पी 80
30 साल से 35 साल तक हाई बी पी 124 और लोअर बी पी 82
35 साल से 40 साल तक हाई बी पी 126 और लोअर बी पी 83
40 साल से 50 साल तक हाई बी पी 128 और लोअर बी पी 84
50 साल से 60 साल तक हाई बी पी 132 और लोअर बी पी 86
60 साल से 65 साल तक हाई बी पी 136 और लोअर बी पी 88
65 साल से 80 साल तक हाई बी पी 140 और लोअर बी पी 90
80 साल से ऊपर तक हाई बी पी 145 और लोअर बी पी 92
किसी किसी का बी पी में + 5 या – 5 का अंतर हो सकता है तो किसी भी प्रकार की समस्या नहीं होगी । उस से अधिक अंतर आने पर व्यक्ति बीमार कहलाएगा ।

भारत स्वाभिमान दल/सनातन संस्कृति संघ

क्यूंकि धड़कन झूठ नहीं बोलती ...

नाड़ी परीक्षण................
किसी भी व्यक्ति का शरीर का तापमान की जानकारी लेना हो बिना किसी भी थर्मामीटर या किसी भी अन्य यंत्र के तो नीचे लिखे तरीके से जानकारी ले सकते है ।
पुरुष की नाड़ी परीक्षण हमेशा दाहिनी हाथ से किया जाता है और महिला की बायी हाथ से।
अगर किस भी व्यक्ति का शरीर का
60-65 पल्स है तो शरीर का तापमान 98 डिग्री फ़रेनहाएट
70 पल्स है तो 99 डिग्री फ़रेनहाएट तापमान
80 पल्स है तो 100 डिग्री तापमान
90 पल्स = 101 डिग्री फ़रेनहाएट
100 पल्स = 102 डिग्री फ़रेनहाएट
110 पल्स = 103 डिग्री फ़रेनहाएट
120 पल्स = 104 डिग्री फ़रेनहाएट
130 पल्स = 105 डिग्री फ़रेनहाएट
140 पल्स = 106 डिग्री फ़रेनहाएट
यानि हर 10 स्पंदन बढ़ने पर 10 डिग्री तापमान शरीर का बढ़ेगा
गर्भ में बच्चा का पल्स 140 से 150 होगा
सबसे अच्छा पल्स 70 से 74 के बीच होना चाहिए ।
उम्र के हिसाब से ब्लड प्रेसर नापने का अद्भुत तरीका । बिना किसी भी यंत्र के ।
गर्भ में बच्चा का बी पी माँ के बी पी के बराबर होगा
जन्म से 5 साल तक बी पी का हाईयर लिमिट 81 और लोअर लिमिट 45
5 साल से 10 साल तक बी पी का हाईयर लिमिट 90 और लोअर 50
10 साल से 15 साल तक हाई 100 और लोअर 62
15 साल से 20 साल तक हाई बी पी 110 और लोअर बी पी 71
20 साल से 30 साल तक हाई बी पी 120 और लोअर बी पी 80
30 साल से 35 साल तक हाई बी पी 124 और लोअर बी पी 82
35 साल से 40 साल तक हाई बी पी 126 और लोअर बी पी 83
40 साल से 50 साल तक हाई बी पी 128 और लोअर बी पी 84
50 साल से 60 साल तक हाई बी पी 132 और लोअर बी पी 86
60 साल से 65 साल तक हाई बी पी 136 और लोअर बी पी 88
65 साल से 80 साल तक हाई बी पी 140 और लोअर बी पी 90
80 साल से ऊपर तक हाई बी पी 145 और लोअर बी पी 92
किसी किसी का बी पी में + 5 या – 5 का अंतर हो सकता है तो किसी भी प्रकार की समस्या नहीं होगी । उस से अधिक अंतर आने पर व्यक्ति बीमार कहलाएगा ।

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

'इन्द्र' और 'हिन्द'

'हिन्द' शब्द की उत्पत्ति वेदों में वर्णित 'इन्द्र' शब्द से हुई हैं। भारतीय वेदों में इन्द्र शब्द सैकड़ों बार प्रयुक्त हुआ हैं। जिसे ब्रह्माण्ड की शक्ति सूर्य, वायु, मेघ, प्रकाश तथा ईश्वर के रूप में दर्शाया गया हैं। इस इन्द्र का ही मानवीयकरण भारत में तथा यूरोप में किया गया हैं। आधुनिक भारत नाम भी लगभग 17 लाख वर्ष पूर्व पड़ा था। 'भारत' शब्द भी इन्द्र का पर्याय है। भा+रत, भा(भानु) चमक, अग्नि, प्रकाश + संलग्न, लगातार = निर्वाध प्रकाश देने वाला अर्थात सूर्य या इन्द्र। प्रचलित व्याख्या 'भरत से भारत नाम पड़ा' आधारहीन कल्पित कहानी हैं। उससे लाखों वर्ष पहले तक भारतीय सभ्यता इन्देय या इन्द्र के नाम से जानी जाती थी। कालांतरण में इन्द्र का इन्द के रूप में प्रचलन हुआ, इन्द = इन + द, इन = सूर्य, द = से उत्पन्न अर्थात सूर्य पुत्र, सूर्यवंशी। आधुनिक भारत जिसका प्राचीन नाम 'इन्द' था। यहीं संस्कृत शब्द इन, सूर्य आज भी समस्त अफ्रीका, यूरोप, अमेरिका, एशिया एवं आस्ट्रेलिया महाद्वीपों की संस्कृति में सूर्य (अग्नि) उपासकों के लिए प्रयुक्त किया जाता हैं, क्यों प्रयुक्त किया जाता है, इससे उन देशों के विद्वान भी परिचित नहीं हैं। 'सिन्धु' शब्द से इसका कोई सामंजस्य नहीं है। इस 'इन्द्र' शब्द का प्रयोग इटली वासी स्वयं के लिए करते है, जबकि उनको पता ही नहीं कि वो भारतीय मूल के आर्य है।
इसी प्रकार समस्त यूरोप एवं रोमवासी आज तक अपने को 'इन्दीजन' जिसका अर्थ ' मातृभूमि का पुत्र' कहते है। यदि उनसे कोई पूछे कि 'इन्दी' या 'इन्दू' शब्द का अर्थ क्या है ? तो उन्हें उत्तर का ज्ञान ही नहीं हैं, क्योंकि वो विभिन्न पंथों के भ्रमजाल में फंसकर अपनी मूल आर्य जड़ों से कट चुके हैं। यूरोपवासियों के आदि पूर्वज जो इन्द्र देश भारत से अनजान स्थानों पर बसने के लिए गये थे, भारत को इन्द्र देश के नाम से ही याद करते थे। लाखों वर्ष व्यतीत होने के पश्चात प्राचीन आर्यो के वंशज रोमनों ने भारत को Indicus (इन्दीकस), Indae (इन्देय), ग्रीकवासियों ने Indica (इन्दिका) तथा जर्मनवासियों ने Inder (भारतीय) व ब्रिटेनवासियों ने India (इंडिया) नाम दिया, जो पारस (ईरान) में लिपि उच्चारण की अशुद्धता के कारण 'हिन्द' हो गया। अपभ्रंश शब्द 'हिन्द' होने के बाद भी प्राचीन आर्यों के वंशजों ने सिन्धू नदी को Indus (इन्डस) ही कहा।
विश्वजीत सिंह अनंत
भारत स्वाभिमान दल

गुरुवार, 24 नवंबर 2016

'इन्द्र' और 'हिन्द'

'हिन्द' शब्द की उत्पत्ति वेदों में वर्णित 'इन्द्र' शब्द से हुई हैं। भारतीय वेदों में इन्द्र शब्द सैकड़ों बार प्रयुक्त हुआ हैं। जिसे ब्रह्माण्ड की शक्ति सूर्य, वायु, मेघ, प्रकाश तथा ईश्वर के रूप में दर्शाया गया हैं। इस इन्द्र का ही मानवीयकरण भारत में तथा यूरोप में किया गया हैं। आधुनिक भारत नाम भी लगभग 17 लाख वर्ष पूर्व पड़ा था। 'भारत' शब्द भी इन्द्र का पर्याय है। भा+रत, भा(भानु) चमक, अग्नि, प्रकाश + संलग्न, लगातार = निर्वाध प्रकाश देने वाला अर्थात सूर्य या इन्द्र। प्रचलित व्याख्या 'भरत से भारत नाम पड़ा' आधारहीन कल्पित कहानी हैं। उससे लाखों वर्ष पहले तक भारतीय सभ्यता इन्देय या इन्द्र के नाम से जानी जाती थी। कालांतरण में इन्द्र का इन्द के रूप में प्रचलन हुआ, इन्द = इन + द, इन = सूर्य, द = से उत्पन्न अर्थात सूर्य पुत्र, सूर्यवंशी। आधुनिक भारत जिसका प्राचीन नाम 'इन्द' था। यहीं संस्कृत शब्द इन, सूर्य आज भी समस्त अफ्रीका, यूरोप, अमेरिका, एशिया एवं आस्ट्रेलिया महाद्वीपों की संस्कृति में सूर्य (अग्नि) उपासकों के लिए प्रयुक्त किया जाता हैं, क्यों प्रयुक्त किया जाता है, इससे उन देशों के विद्वान भी परिचित नहीं हैं। 'सिन्धु' शब्द से इसका कोई सामंजस्य नहीं है। इस 'इन्द्र' शब्द का प्रयोग इटली वासी स्वयं के लिए करते है, जबकि उनको पता ही नहीं कि वो भारतीय मूल के आर्य है।
इसी प्रकार समस्त यूरोप एवं रोमवासी आज तक अपने को 'इन्दीजन' जिसका अर्थ ' मातृभूमि का पुत्र' कहते है। यदि उनसे कोई पूछे कि 'इन्दी' या 'इन्दू' शब्द का अर्थ क्या है ? तो उन्हें उत्तर का ज्ञान ही नहीं हैं, क्योंकि वो विभिन्न पंथों के भ्रमजाल में फंसकर अपनी मूल आर्य जड़ों से कट चुके हैं। यूरोपवासियों के आदि पूर्वज जो इन्द्र देश भारत से अनजान स्थानों पर बसने के लिए गये थे, भारत को इन्द्र देश के नाम से ही याद करते थे। लाखों वर्ष व्यतीत होने के पश्चात प्राचीन आर्यो के वंशज रोमनों ने भारत को Indicus (इन्दीकस), Indae (इन्देय), ग्रीकवासियों ने Indica (इन्दिका) तथा जर्मनवासियों ने Inder (भारतीय) व ब्रिटेनवासियों ने India (इंडिया) नाम दिया, जो पारस (ईरान) में लिपि उच्चारण की अशुद्धता के कारण 'हिन्द' हो गया। अपभ्रंश शब्द 'हिन्द' होने के बाद भी प्राचीन आर्यों के वंशजों ने सिन्धू नदी को Indus (इन्डस) ही कहा।
विश्वजीत सिंह अनंत
भारत स्वाभिमान दल

गुरु तेग बहादुर जी के अमर बलिदान को नमन

श्री गुरु तेगबहादुर जी ने सनातन धर्म और मानवता की रक्षा करते हुए हंसते-हंसते अपने प्राणों की कुर्बानी दी। गुरुओं के उपकार को आज हम सम्मानपूर्वक नमन करते है। महान गुरु ने शीश दे दिया मगर वैदिक धर्म का त्याग कर इस्लाम स्वीकार नहीं किया। हमारे देश  की बलिदान परंपरा महापुरुषों की गाथाओं से सुशोभित है। छत्रपति शिवाजी, धर्मरक्षक गोकुल सिंह, महाराणा प्रताप, सुहेलदेव पासी, वीर हकीकत राय, बंदा बहादुर, गुरु गोविन्द सिंह, पंडित लेखराम, स्वामी श्रद्धानंद, महाशय राजपाल सभी का जीवन अत्याचार एवं दमन के विरुद्ध संघर्ष करने का सन्देश हमें दे रहा है।

एक काल में पंजाब में हर परिवार के ज्येष्ठ पुत्र को अमृत चखा कर सिख अर्थात गुरुओं का शिष्य बनाया जाता था जिससे की यह देश, धर्म और जाति की रक्षा का संकल्प ले। यह धर्म परिवर्तन नहीं अपितु कर्त्तव्य पालन का व्रत ग्रहण करना था। खेद हैं हम जानते हुए भी न केवल अपने इतिहास के प्रति अनजान बन जाते हैं अपितु अपने गुरुओं की सीख को भी भूल जाते है।

गुरु साहिबान बड़े श्रद्धा भाव से सिखों को हिन्दू धर्म रक्षा का सन्देश देते है। गुरु नानक जी से लेकर गुरु गोविन्द सिंह जी सब हिन्दू धर्म को मानने वाले थे एवं उसी की रक्षा हेतु उन्होंने अपने प्राणों की आहुति तक दे दी। उदाहरण के लिए देखिये पंथ प्रकाश संस्करण 5 वें पृष्ठ 25 में गुरुनानक देव जी के विषय में लिखा हैं-

पालन हेत सनातन नेतै, वैदिक धर्म रखन के हेतै।
आप प्रभु गुरु नानक रूप, प्रगट भये जग मे सुख भूपम्।।
अर्थात सनातन सनातन वैदिक धर्म की रक्षा के लिए भगवान गुरु नानक जी के रूप में प्रकट हुए।

गुरु तेगबहादुर जी के वचन बलिदान देते समय पंथ प्रकाश में लिखे है-

हो हिन्दू धर्म के काज आज मम देह लटेगी।
अर्थात हिन्दू धर्म के लिए आज मेरे शरीर होगा।

औरंगज़ेब ने जब गुरु तेगबहादुर से पूछा की आप किस धर्म के लिए अपने प्राणों की बलि देने के लिए तैयार हो रहे है तो उन्होंने यह उत्तर दिया की-

आज्ञा जो करतार की, वेद चार उचार,धर्म तास को खास लख,हम तिह करत प्रचार।
वेद विरुद्ध अधर्म जो, हम नहीं करत पसंद,वेदोक्त गुरुधर्म सो, तीन लोक में चंद।।
(सन्दर्भ- श्री गुरुधर्म धुजा पृष्ठ 48, अंक 3 कवि सुचेत सिंह रचित)

अर्थात ईश्वर की आज्ञा रूप में जो चार वेद हैं उनमें जिस धर्म का प्रतिपादन हैं उसका ही हम प्रचार करते हैं। वेद विरुद्ध अधर्म होता है उसे हम पसंद नहीं करते। वेदोक्त गुरुधर्म ही तीनों लोकों में चन्द्र के समान आनंददायक है।

गुरु गोविन्द सिंह के दोनों पुत्रों जोरावर सिंह और फतेह सिंह जी को जब मुसलमान होने को कहा गया तो उन्होंने जो उत्तर दिया उनके अंतिम शब्द पंथ प्रकाश में इस प्रकार से दिए गए हैं-

गिरी से गिरावो काली नाग से डसावो हा हा प्रीत नां छुड़ावों इक हिन्दू धर्म पालसों अर्थात तुम हमें पहाड़ से गिरावो चाहे साप से कटवाओ पर एक हिन्दू धर्म से प्रेम न छुड़वाओं।

आदि ग्रन्थ में वेदों की महिमा बताते हुए कहा गया हैं

वाणी ब्रह्मा वेद धर्म दृढ़हु पाप तजाया ।
अर्थात वेद ईश्वर की वाणी हैं उसके धर्म पर दृढ़ रहो ऐसा गुरुओं ने कहा है और पाप छुड़ाया है( सन्दर्भ- आदि ग्रन्थ साहिब राग सुहई मुहल्ला 4 बावा छंद 2 तुक 2)

दिया बले अँधेरा जाये वेद पाठ मति पापा खाय
वेद पाठ संसार की कार पढ़ पढ़ पंडित करहि बिचार
बिन बूझे सभ होहि खुआर ,नानक गुरुमुख उतरसि पार

अर्थात जैसे दीपक जलाने से अँधेरा दूर हो जाता है ऐसे ही वेद का पाठ करके मनन करने से पाप खाये जाते है। वेदों का पाठ संसार का एक मुख्य कर्तव्य है। जो पंडित लोग उनका विचार करते है वे संसार से पार हो जाते है।वेदों को बिना जाने मनुष्य नष्ट हो जाते है। ( सन्दर्भ- आदि ग्रन्थ साहिब राग सुहई मुहल्ला 1 शब्द 17)

गुरुनानक देव जी की यह प्रसिद्द उक्ति कि वेद कतेब कहो मत झूठे, झूठा जो ना विचारे अर्थात वेदों को जूठा मत कहो जूठा वो हैं जो वेदों पर विचार नहीं करता सिख पंथ को हिन्दू सिद्ध करता है।

जहाँ तक इस्लाम का सम्बन्ध है गुरु ग्रन्थ साहिब इस्लाम के मान्यताओं से न केवल भारी भेद रखता हैं अपितु उसका स्पष्ट रूप से खंडन भी करता है।

1. सुन्नत का खंडन

काजी तै कवन कतेब बखानी ॥
पदत गुनत ऐसे सभ मारे किनहूं खबरि न जानी ॥१॥ रहाउ ॥
सकति सनेहु करि सुंनति करीऐ मै न बदउगा भाई ॥
जउ रे खुदाइ मोहि तुरकु करैगा आपन ही कटि जाई ॥२॥
सुंनति कीए तुरकु जे होइगा अउरत का किआ करीऐ ॥
अरध सरीरी नारि न छोडै ता ते हिंदू ही रहीऐ ॥३॥
छाडि कतेब रामु भजु बउरे जुलम करत है भारी ॥
कबीरै पकरी टेक राम की तुरक रहे पचिहारी ॥४॥८॥
सन्दर्भ- राग आसा कबीर पृष्ठ 477

अर्थात कबीर जी कहते हैं ओ काजी तो कौनसी किताब का बखान करता है। पढ़ते हुऐ, विचरते हुऐ सब को ऐसे मार दिया जिनको पता ही नहीं चला। जो धर्म के प्रेम में सख्ती के साथ मेरी सुन्नत करेगा सो मैं नहीं कराऊँगा। यदि खुदा सुन्नत करने ही से ही मुसलमान करेगा तो अपने आप लिंग नहीं कट जायेगा। यदि सुन्नत करने से ही मुस्लमान होगा तो औरत का क्या करोगे? अर्थात कुछ नहीं और अर्धांगि नारी को छोड़ते नहीं इसलिए हिन्दू ही रहना अच्छा है। ओ काजी! क़ुरान को छोड़! राम भज१ तू बड़ा भारी अत्याचार कर रहा है, मैंने तो राम की टेक पकड़ ली हैं, मुस्लमान सभी हार कर पछता रहे है।

2. रोजा, नमाज़, कलमा, काबा का खंडन
रोजा धरै निवाज गुजारै कलमा भिसति न होई ॥
सतरि काबा घट ही भीतरि जे करि जानै कोई ॥२॥

सन्दर्भ- राग आसा कबीर पृष्ठ 480
अर्थात मुसलमान रोजा रखते हैं और नमाज़ गुजारते है। कलमा पढ़ते है। और कबीर जी कहते हैं इन किसी से बहिश्त न होगी। इस घट (शरीर) के अंदर ही 70 काबा के अगर कोई विचार कर देखे तो।

कबीर हज काबे हउ जाइ था आगै मिलिआ खुदाइ ॥
सांई मुझ सिउ लरि परिआ तुझै किन्हि फुरमाई गाइ ॥१९७॥

सन्दर्भ- राग आसा कबीर पृष्ठ 1375
अर्थात कबीर जी कहते हैं मैं हज करने काबे जा रहा था आगे खुदा मिल गया , वह खुदा मुझसे लड़ पड़ा और बोला ओ कबीर तुझे किसने बहका दिया।

3. बांग का खंडन

कबीर मुलां मुनारे किआ चढहि सांई न बहरा होइ ॥
जा कारनि तूं बांग देहि दिल ही भीतरि जोइ ॥१८४॥

सन्दर्भ- राग आसा कबीर पृष्ठ 1374

अर्थात कबीर जी कहते हैं की ओ मुल्ला। खुदा बहरा नहीं जो ऊपर चढ़ कर बांग दे रहा है। जिस कारण तू बांग दे रहा हैं उसको दिल ही में तलाश कर।

4. हिंसा (क़ुरबानी) का खंडन

जउ सभ महि एकु खुदाइ कहत हउ तउ किउ मुरगी मारै ॥१॥
मुलां कहहु निआउ खुदाई ॥ तेरे मन का भरमु न जाई ॥१॥ रहाउ ॥
पकरि जीउ आनिआ देह बिनासी माटी कउ बिसमिलि कीआ ॥
जोति सरूप अनाहत लागी कहु हलालु किआ कीआ ॥२॥
किआ उजू पाकु कीआ मुहु धोइआ किआ मसीति सिरु लाइआ ॥
जउ दिल महि कपटु निवाज गुजारहु किआ हज काबै जाइआ ॥३॥

सन्दर्भ विलास प्रभाती कबीर पृष्ठ 1350

अर्थात कबीर जी कहते है ओ मुसलमानों। जब तुम सब में एक ही खुद बताते हो तो तुम मुर्गी को क्यों मारते हो। ओ मुल्ला! खुदा का न्याय विचार कर कह। तेरे मन का भ्रम नहीं गया है। पकड़ करके जीव ले आया, उसकी देह को नाश कर दिया, कहो मिटटी को ही तो बिस्मिल किया। तेरा ऐसा करने से तेरा पाक उजू क्या, मुह धोना क्या, मस्जिद में सिजदा करने से क्या, अर्थात हिंसा करने से तेरे सभी काम बेकार हैं।

कबीर भांग माछुली सुरा पानि जो जो प्रानी खांहि ॥
तीरथ बरत नेम कीए ते सभै रसातलि जांहि ॥२३३॥

सन्दर्भ विलास प्रभाती कबीर पृष्ठ 1377

अर्थात कबीर जी कहते हैं जो प्राणी भांग, मछली और शराब पीते हैं, उनके तीर्थ व्रत नेम करने पर भी सभी रसातल को जायेंगे।

रोजा धरै मनावै अलहु सुआदति जीअ संघारै ॥
आपा देखि अवर नही देखै काहे कउ झख मारै ॥१॥
काजी साहिबु एकु तोही महि तेरा सोचि बिचारि न देखै ॥
खबरि न करहि दीन के बउरे ता ते जनमु अलेखै ॥१॥ रहाउ ॥

सन्दर्भ रास आगा कबीर पृष्ठ 483

अर्थात ओ काजी साहिब तू रोजा रखता हैं अल्लाह को याद करता है, स्वाद के कारण जीवों को मारता है। अपना देखता हैं दूसरों को नहीं देखता हैं। क्यों समय बर्बाद कर रहा हैं। तेरे ही अंदर तेरा एक खुदा हैं। सोच विचार के नहीं देखता हैं। ओ दिन के पागल खबर नहीं करता हैं इसलिए तेरा यह जन्म व्यर्थ है।

वेद की मान्यताओं का मंडन एवं इस्लाम की मान्यताओं का खंडन गुरु ग्रन्थ साहिब स्पष्ट रूप से करते है। इस पर भी अब हठ रूप में कोई सिख भाई अलगाववाद की बात करता हैं तो वह न केवल अपने आपको अँधेरे में रख रहा हैं अपितु गुरु ग्रन्थ साहिब के सन्देश की अवमानना भी कर रहा हैं।

सनातन संस्कृति संघ/भारत स्वाभिमान दल