गुरुवार, 26 जनवरी 2017

जश्न किस बात का

आज ही के दिन हिंदुओं को बताया गया कि-
तुम सवर्ण हो ,
तुम OBC हो ,
तुम SC हो ,
तुम ST हो ,
तुम पिछड़ा वर्ग हो ,
तुम दलित हो ,
तुम अति पिछड़ा वर्ग हो ,
तुम आदिवासी हो ,
जबकि ये सब के सब हिन्दू थे,
पर मुसलमानो को बस एक शब्द बताया गया कि-
तुम सिर्फ अल्पसंख्यक हो ,
जबकि उनमे भी शिया , सुन्नी , अहमदिया, बरेलवी. अल हदीसी, हयाती , पठान , मुगल , धुनिया, कुरैशी, सैय्यद , सिद्दीकी , ममाती, देवबंदी , वहाबी जैसे तमाम थे ,
हिंदुस्थान बंटा था 15 अगस्त 1947 में ,
हिदू बंटा 26 जनवरी 1950 में ,,
फिर भी ज़रा हिंदुओं का जश्न तो देखो ,,, ना जाने किस बात का ???

संविधान गणतंत्र गुलामी

आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं परंतु हमें यह भी स्मरण रखना होगा कि आज भी यह संविधान विदेशी है...

हमें पूर्ण स्वराज्य नही मिला है जो कि भगत सिहं ने मांगा था... हम एक डोमिनियन स्टेट है जो कि चाचा नेहरू चाहते थे...

इसी संविधान कि आड में आज भी हमारी गाैमाता काटी जा रही है...

तो आज के दिवस हमारा एक प्रण पूर्ण स्वराज्य की प्राप्ति भी होना चाहिए...

धन्यवाद
जय हिन्दतंत्र गुलामी

आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं परंतु हमें यह भी स्मरण रखना होगा कि आज भी यह संविधान विदेशी है...

हमें पूर्ण स्वराज्य नही मिला है जो कि भगत सिहं ने मांगा था... हम एक डोमिनियन स्टेट है जो कि चाचा नेहरू चाहते थे...

इसी संविधान कि आड में आज भी हमारी गाैमाता काटी जा रही है...

तो आज के दिवस हमारा एक प्रण पूर्ण स्वराज्य की प्राप्ति भी होना चाहिए...

भारत स्वाभिमान स्वाभिमान

वन्दे मातरम्

भारत के नये संविधान की संकल्पना

*भारत के नये संविधान की संकल्पना*

स्वाभिमान दल द्वारा
भारतीय सिद्धांतों पर संकलित किये जा रहे भारत के नए संविधान का महत्वपूर्ण भाग *जन्मसिद्ध अधिकार*

भाग - ३
जन्मसिद्ध अधिकार

अनुच्छेद ३.१ :- इस भाग में सरकार का अर्थ केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार या कोई जनपद पंचायत या जनपद प्राधिकरण या नगर पालिका या खण्ड विकास पंचायत या न्याय पंचायत या कोई ग्राम प्राधिकरण या समिति जो उपरोक्त में से किसी के द्वारा गठित की गयी हो, इस भाग में प्रदत्त जन्मसिद्ध अधिकार का हरण या उसे किसी भी तरह नियंत्रित करने के लिए कोई विधि पारित नहीं कर सकती। ऐसी कोई भी विधि निर्थक और अवैध मानी जायेगी।

अनुच्छेद ३.२ :- अस्पृश्यता का अंत - "अस्पृश्यता" का अंत किया जाता हैं। और उसका किसी भी रूप में आचरण निसिद्ध किया जाता हैं। "अस्पृश्यता" से उपजी किसी निर्योगता को लागू करना अपराध होगा, जो विधि के अनुसार दण्डनीय होगा।

अनुच्छेद ३.४ :- बाल विवाह का अंत - 16 वर्ष से कम आयु की बालिका व 18 वर्ष से कम आयु के बालक का विवाह करना अपराध होगा, जो विधि के अनुसार दण्डनीय होगा।

अनुच्छेद ३.५ :- समगोत्रीय विवाह का अंत - समान गोत्र में विवाह का अंत किया जाता हैं। यह भारत की संस्कृति व वैज्ञानिक अवधारणाओं के विरूद्ध हैं। समगोत्र में विवाह करना अपराध होगा, जो विधि के अनुसार अवैध होगा।

अनुच्छेद ३.६ :- बहुविवाह का अंत - बहुविवाह का अंत किया जाता हैं। एक पुरूष एक स्त्री से और एक स्त्री एक पुरूष से ही विवाह कर सकती है। एक से अधिक विवाह करना अपराध होगा, जो विधि के अनुसार दण्डनीय होगा। निम्नलिखित स्थितियों में दूसरा विवाह किया जा सकता हैं :-

१. वैद्यकीय परिक्षण में पुरूष के सक्षमसिद्ध होने के पश्चात भी पत्नी 25 वर्ष की आयु तक माँ न बन सके तो पुरूष दूसरा विवाह कर सकता हैं।
२. पुरूष के नपुँसक होने पर स्त्री पहले पति का त्याग कर दूसरा विवाह कर सकती हैं।
३. युद्ध की विभिषिका में पुरूषों के अधिक मात्रा में मारे जाने से जनसंख्या अनुपात बिगडने पर बहुविवाह किया जा सकता हैं।

अनुच्छेद ३.७ :- अवैध संबंधों का अंत - अवैध संबंधों का अंत किया जाता हैं। पुरूष का स्त्री से और स्त्री का पुरूष से किसी भी तरह से अवैध संबंध बनाना अपराध होगा, जो विधि के अनुसार दण्डनीय होगा।

अनुच्छेद ३.८ :- जातियों का अंत - जातियों का अंत किया जाता हैं। और शासकीय, प्रशासकीय या सामाजिक रूप में जातीय आधार पर किसी के साथ भेदभाव करना अपराध होगा, जो विधि के अनुसार दण्डनीय होगा।

अनुच्छेद ३.९ :- उपाधियों का अंत - (१) राज्य, सेना, विद्या या संस्कृति संबंधी सम्मान के अतिरिक्त कोई उपाधि प्रदान नहीं करेगा।
(२) भारत का कोई नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि राष्ट्राध्यक्ष की सहमती के बिना स्वीकार नहीं करेगा।
(३) कोई व्यक्ति जो भारत का नागरिक नहीं हैं, राज्य के अधीन लाभ या विश्वास के किसी पद को धारण करते हुये किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि राष्ट्राध्यक्ष की सहमति के बिना स्वीकार नहीं करेगा।
(४) राज्य के अधीन या विश्वास का पद धारण करने वाला कोई व्यक्ति किसी विदेशी राज्य से या उसके अधीन किसी रूप में कोई भेंट, उपाधि या पद राष्ट्राध्यक्ष की सहमति के बिना स्वीकार नहीं करेगा।

अनुच्छेद ३.१० :- गौवंश हत्या का पूर्ण अंत - गौवंश की हत्या को पूर्णत: प्रतिबंधित किया जाता है।
(१) गौवंश अर्थात गाय, बैल, बछडा- बछिया व सांड की हत्या को मानव हत्या के समान अपराध मानते हुए मृत्युदण्ड अथवा कठोरतम दण्ड दिया जायेगा।
(२) गौवंश तस्करों से गौवंश के रक्षार्थ हुए संघर्ष में यदि गौभक्तों/गौरक्षकों के हाथों गौवंश तस्कर मारे जाते हैं, अथवा उनके संसाधन वाहन इत्यादि नष्ट हो जाते हैं, तो गौभक्तों/गौवंश रक्षकों को किसी भी तरह से प्रताडित/दण्डित नहीं किया जायेगा और उन पर कोई अभियोग भी नहीं लगाया जागेगा।

अनुच्छेद ३.११ :- शासन, भारत के क्षेत्र में किसी भी भारतीय को विधि के समक्ष समता के अधिकार से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। प्रत्येक व्यक्ति को कुल, वंश, लिंग, भाषा या जन्मस्थान के आधार पर बिना भेद भाव प्रत्येक अधिकार और स्वतंत्रता प्राप्त होगी।

अनुच्छेद ३.१२ :- प्रत्येक मनुष्य को उसकी गरिमा के साथ व स्वतंत्र रूप से जीवन यापन करने का जन्मसिद्ध अधिकार हैं। अत: कोई भी किसी प्रकार की यातना, क्रुरता या अमानवीयता करने वाला विधि अनुसार दण्ड का भागी होगा।

अनुच्छेद ३.१३ :- प्रत्येक मनुष्य को देश के अन्दर रहने, बसने, व व्यापार करने का अधिकार हैं, तथा कहीं भी जाने की निर्द्वन्द स्वतंत्रता हैं। यद्यपि शासन सैन्य व सामरिक महत्व के क्षेत्रों में जन साधारण का प्रवेश वर्जित कर सकती हैं।

अनुच्छेद ३.१४ :- प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन, स्वतंत्रता तथा अपने परिवार जनों की सुरक्षा अक्षुण्ण रखने का जन्मसिद्ध अधिकार हैं। और हर किसी को अपने जीवन, स्वतंत्रता व सुरक्षा को अक्षुण्ण रखने के लिए शासकीय हस्तक्षेप के बिना किसी भी प्रकार के पारंपारिक शस्त्रों (भाला, धनुष- बाण, फरसा, त्रिशुल, कृपाण आदि) के स्वामित्व व उसके धारण करने का अधिकार होगा। आग्नेय अस्त्र (बंदुक, राइफल, रिवाल्वर, माऊजर आदि) शासन की स्वीकृति लेकर रखा जा सकेगें।

अनुच्छेद ३.१५ :- प्रत्येक व्यक्ति को अपनी संपत्ति के स्वामित्व का अधिकार हैं। कोई भी अपनी संपत्ति से मनमाने ढंग से वंचित नहीं किया जायेगा। यद्यपि शासन विषमता दूर करने के लिए अधिकतम् सीमा का निराधारण कर सकती हैं।

अनुच्छेद ३.१६ :- प्रत्येक किसान को, जो अपनी पैतृक कृषि योग्य भूमि का स्वामी हैं। या उसको पैतृक कृषि योग्य भूमि की आय द्वारा क्रय की गयी कृषि भूमि का स्वामित्व का जन्मसिद्ध अधिकार होगा। कोई शासन उस कृषक की स्वैच्छिक स्वीकृति के बिना उसकी कृषि योग्य भूमि का अधिग्रहण नहीं कर सकेगी। शासन केवल सामरिक व राष्ट्रीय महत्व के कार्यो हेतु उस कृषि भूमि के मूल्य से चार गुणा अधिक मूल्य देकर कृषक से उस भूमि को ले सकती हैं।

अनुच्छेद ३.१७ :- सभी नागरिकों को शान्ति पूर्वक और निरायुद्ध सम्मेलन का, संगम या संघ बनाने का अधिकार होगा। किसी को किसी संघ या परिषद् आदि में जुडने के लिए विवश नहीं किया जा सकता।

अनुच्छेद ३.१८ :- प्रत्येक नागरिक को वैचारिक स्वतंत्रता, अन्त:करण, धर्म व पूजा की स्वतंत्रता का अधिकार होगा। इस अधिकार का अर्थ यहीं नहीं होगा कि सांसारिक लालच या पारलौकिक भय के द्वारा मतांतरण करवाया जाये। लालच व भय द्वारा मतांतरण कराना दण्डनीय अपराध होगा।

अनुच्छेद ३.१९ :- प्रत्येक नागरिक को तथ्यों के आधार पर मत की वैचारिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होगी। इसमें किसी प्रकार के हस्तक्षेप के बिना मत (विचार) को धारण करने की स्वतंत्रता व किसी भी माध्यम से सूचना व विचारों की खोज, अनुसंधान व आदान प्रदान की स्वतंत्रता अन्तर्निहित हैं। इसका यह अर्थ नहीं है कि इस अधिकार का उपयोग जानते समझते हुयें गलत सूचनाओं के आधार पर लोगों को भ्रमित करने के लिए या किसी अनुचित व छलपूर्ण उद्देश्य के लिए किया जाये।

अनुच्छेद ३.२० :- प्रत्येक नागरिक को भारत की संस्कृति के प्रति निष्ठावान रहना अनिवार्य होगा। "वाल्मीकि रामायण" व "गीता" राष्ट्रीय ग्रंथ व भगवान श्रीराम व भगवान श्रीकृष्ण राष्ट्र के प्रेरणा पुरूष होगे, उनका अपमान राष्ट्र का अपमान माना जायेगा, जो दण्डनीय होगा। वाल्मिकी रामायण का शम्बूक वध प्रसंग व पुराणों के कृष्ण प्रसंग प्रक्षिप्त व अप्रमाणित हैं, यह प्रसंग भारतीय समाज की एकता को तोडने के लिए विदेशी आक्रांताओं द्वारा ग्रंथों में मिलाये गये हैं, इनका प्रचार- प्रसार विधि द्वारा अमान्य हैं।

अनुच्छेद ३.२१ :- प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता पूर्वक निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से देश की सरकार में भाग लेने का अधिकार हैं।

अनुच्छेद ३.२२ :- राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति को 'लोक सेवा' तक पहुँचने का समान अधिकार हैं।

अनुच्छेद ३.२३ :- जन इच्छा ही शासकीय सत्ता का आधार होगी, जोकि ज्वलंत व विशिष्ट विषयों पर, समय- समय पर किये गये प्रमाणित जनमत संग्रह द्वारा अभिव्यक्त होगी, जो समान सार्वदेशिक मतदान से होगा व यह गुप्त मतदान या उसके समतुल्य मत संग्रह विधि के आधार पर होगा।

अनुच्छेद ३.२४ :- किसी भी व्यक्ति की व्यैक्तिक गोपनीयता, परिवार, गृह या किसी भी प्रकार के पत्रकार व संवादिता पर मनमाना हस्तक्षेप नहीं होगा, न ही किसी की प्रतिष्ठा व सम्मान पर किसी भी प्रकार का अभिक्रमण किया जायेगा। प्रत्येक व्यक्ति को इस प्रकार के हस्तक्षेप या अभिक्रमण के विरूद्ध वैधानिक सुरक्षा प्राप्त हैं।

अनुच्छेद ३.२५ :- किसी को भी मनमाने ढंग से बंदी, निरूद्ध या निष्काशित नहीं किया जायेगा।

अनुच्छेद ३.२६ :- निरूद्ध किये गये किसी भी व्यक्ति को यथाशीघ्र उसको निरूद्ध करने का कारण बताये बिना बंदी नहीं बनाया जा सकेगा और न ही उसको उसको अपनी इच्छानुरूप किसी भी विधिवेत्ता के परामर्श लेने से वंचित नहीं किया जायेगा।

अनुच्छेद ३.२७ :- निरूद्ध व बंदी बनाये गये प्रत्येक व्यक्ति को निकटतम् दण्डाधिकारी के स्थान से दण्डाधिकारी के न्यायालय तक की यात्रा के समय को छोडकर १२ घण्टों के अन्दर प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा। और दण्डाधिकारी के आदेश के बिना किसी भी व्यक्ति को उपरोक्त अवधि से अधिक समय तक निरूद्ध नहीं किया जायेगा। देशद्रोह के आरोपी पर यह अनुच्छेद अमान्य होगा।

अनुच्छेद ३.२८ :- प्रत्येक व्यक्ति को भारत की सांस्कृतिक जीवनचर्या में स्वतंत्रता पूर्वक भाग लेने का, सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने का, इसकी कलाओं का आनंद उठाने का व इसकी वैज्ञानिक उपलब्धियों में भाग लेने का तथा इसके लाभों के उपभोग का अधिकार हैं।

अनुच्छेद ३.२९ :- प्रत्येक व्यक्ति को किसी प्रकार के शासकीय हस्तक्षेप के बिना स्वतंत्र चुनाव का, व्यपार, उद्योग, उत्पादन, भण्डारण, रोजगार, न्याय संगत व अनुकूल कार्य परिस्थितियों का अधिकार हैं।

अनुच्छेद ३.३० :- कार्य करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उचित व अनुकूल पारिश्रमिक पाने का अधिकार हैं। जिससे वह अपनी व अपने परिवार का मानव गरिमा के योग्य जीवन अस्तित्व सुरक्षित कर सकें।

अनुच्छेद ३.३१ :- संविधान द्वारा प्रदत्त जन्मसिद्ध अधिकारों के उल्लंघन होने पर प्रत्येक व्यक्ति को क्षेत्रीय स्तर पर प्रभावी व सक्षम न्याय पालिका (व्यवस्था) द्वारा प्रभावी समाधान या प्रतिकार प्राप्त करने का अधिकार होगा।

अनुच्छेद ३.३२ :- किसी भी निहित स्वार्थ की सिद्धि के लिए जन्मसिद्ध अधिकारों का दुरूपयोग नहीं किया जा सकेगा।

*सामर्थ्य में अभिवृद्धि होने पर वैधानिक तरीके से इंडियन संविधान के स्थान पर भारतीय संविधान प्रतिस्थापित किया जायेगा।*
सृष्टि संवत् व विक्रम संवत् भी उसी समय के लिखे जायेगे, जिस समय यह संविधान भारत के नागरिको पर लागू होगा।

स्मरणीय:- *यदि आप लोग सच में इंडिया को भारत बनाना चाहते हैं, इंडियन संविधान के स्थान पर भारतीय संविधान लागू कराना चाहते हैं, तो केवल समर्थन न करें, भारत स्वाभिमान दल की औपचारिक सदस्यता प्राप्त करें तथा तन- मन- धन से भारत स्वाभिमान दल को सशक्त बनायें। भारत स्वाभिमान दल सशक्त बनेगा तो इंडिया भारत बनेगा।*
- विश्वजीत सिंह अनंत
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल

वन्दे मातरम्

गुलाम सोच वालो ने भारत पर इंडिया थोपकर भारतीयों को भी गुलाम बना दिया

आज 26 जनवरी के अवसर पर प्रात:काल से लगभग 250- 300 शुभचिन्तकों ने गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ भेजी, जिनका मैं हृदय से आभारी हूँ, साथ ही आश्चर्यचकित भी हूँ कि गुलाम सोच वालों ने भारत पर इंडियन संविधान थोप कर भारतीयों को भी गुलाम बना दिया हैं।
अब इस गुलामी से मुक्त होने का समय आ गया है, बस मिलकर आवाज उठाने की आवश्यकता हैं।
भारत स्वाभिमान दल ने भारत के संविधान का लेखन कार्य लगभग पूरा कर लिया हैं, जिसे संसद पर दबाव बनाकर लागू कराया जायेगा, उस संविधान का एक महत्वपूर्ण अध्याय आपको पीडीएफ में भेज रहा हूँ, कृपया ध्यानपूर्वक पढ़े, समझे और इस अभियान में अपनी सक्रीय भूमिका निभायें🙏🏻
-विश्वजीत सिंह अनंत
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल

हम कैसे मान ले कि देश स्वाधीन हो गया !

हम कैसे मान ले कि देश स्वाधीन हो गया, देश में,गणतंत्र हैं ! शिक्षा, चिकित्सा, न्याय, रोजगार, राजनीति सभी व्यवस्थाएँ तो विदेशी हैं !

जिस दिन भारत की व्यवस्थाएँ भारत के लोगों द्वारा भारत के नागरिकों के लिए संचालित की जायेगी, सभी के साथ समानता का व्यवहार होगा, उस दिन हम मान लेगे देश स्वतंत्र हो गया हैं, देश में गणतंत्र आ गया हैं।
अन्यथा मानवता विरोधी व्यवस्थाओं को चलाये रखकर गणतंत्र मनाया जाना केवल पाखण्ड कहा जायेगा।
विश्वजीत सिंह अनंत
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

सत्ता में पूर्ण बहुमत से होने पर भी हिन्दू नेताओं की प्रवृत्ति नपुंसकता की क्यों ?

भारत के लगभग आधे राज्यों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सरकारे हैं,
केन्द्र में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पूर्ण बहुमत की सरकार हैं।
(यह मत कहने लगना कि संघ का राजनीति से कोई लेना देना नहीं हैं, देश का प्रधानमन्त्री, गृहमन्त्री व अनेक राज्यों के मुख्यमन्त्री भी संघी ही हैं। वैसे भी भारतीय जनता पार्टी संघ का एक अनुसांगिक संगठन मात्र हैं।)
इतना सब होते हुए भी देश का एक मुसलमान धर्मगुरू जिसे देश की गांधीवादी सरकारे साम्प्रदायिकता को बढ़ाने के लिए सरकारी धन देती हैं (क्योंकि हिन्दू विरोधियों द्वारा संकलित वर्तमान भारतीय संविधान में गैर हिन्दुओं को विशेषाधिकार दिया गया है।) देश के प्रधानमंत्री का सर मूँड़ कर लाने वाले को २५ लाख का इनाम देने की घोषणा कर देता हैं। कथित रूप से अल्पसंख्यक होते हुए मुसलमान धर्मगुरू जब इतना दुष्साहस कर रहा है, तो सोचो जब मुसलमान बहुसंख्यक हो जायेगा तो प्रधानमंत्री का सर लाने पर इनाम की घोषणा नहीं बल्कि हिन्दुओं को इस्लाम स्वीकार करने की घोषणा करेगा।
केन्द्र और राज्य सरकारे नपुंसकता की चूडी पहनकर चुपचाप बैठी हैं ?

संविधान बदलों, धर्म बचाओं।
-विश्वजीत सिंह अनंत
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल

शनिवार, 7 जनवरी 2017

देह शिवा बर मोहे ईहे, शुभ कर्मन ते कभुं न टरूं

अद्भुत है इनकी कहानी,
राष्ट्र-धर्म की खातिर बेटों की दे दी कुर्बानी

🍁 कच्छा, कड़ा, केश, कंघा और कृपाण.....खालसा पंथ की स्थापना करने के बाद गुरू गोविंद सिंह जी ने बड़ा सा कड़ाह मंगवाया। इसमें स्वच्छ जल भरा गया। उनकी पत्नी सुंदरी ने इसमें बताशे डाले। पंच प्यारों ने कड़ाह में दूध डाला और गुरूजी ने गुरवाणी का पाठ करते हुए उसमें खंडा चलाया। इसके बाद गुरुजी ने कड़ाहे से शरबत निकालकर पाँचों शिष्यों को अमृत रूप में दिया और कहा, तुम सब आज से सिंह कहलाओगे और अपने केश तथा दाढी बढ़ाओगे।

🌰 *गुरू जी ने कहा कि केशों को संवारने के लिए तुम्हे एक कंघा रखना होगा। आत्मरक्षा के लिए एक कृपाण लेनी होगी। सैनिकों की तरह तुम्हें कच्छा धारण करना पड़ेगा और अपनी पहचान के लिए हाथों में कड़ा धारण करना होगा। इसके बाद गुरू जी ने सख्त हिदायत दी कि कभी किसी निर्बल व्यक्ति पर हाथ मत उठाना।*

🏵 इसके बाद से सभी सिख खालसा पंथ के प्रतीक के रूप में केश, कंघा, कृपाण, कच्छा और कड़ा ये पांचों चिन्ह धारण करने लगे। नाम के साथ सिंह शब्द का प्रयोग किया जाने लगा। इस घटना के बाद से ही गुरू गोविंद राय गोविंद सिंह कहलाने लगे। उन्होंने अंतिम साँस महाराष्ट्र के नांदेड शहर में स्थित हजूर साहिब सचखंड गुरूद्वारे में ली जो विश्व भर में प्रसिद्ध है।

🏹 *गुरू गोविंद सिंह जी ने अपने प्रिय घोड़े दिलबाग के साथ यहाँ अंतिम साँस ली थी। गुरू गोविंद सिंह जी ने धर्म प्रचार के लिए यहाँ अपने कुछ अनुयायियों के साथ पड़ाव डाला था, इसी दौरान सरहिंद के नवाब वजीर शाह ने अपने दो आदमी भेजकर उनकी हत्या करवा दी थी।*

😳 ऐसा कहा जाता है कि यह हत्या धार्मिक तथा राजनैतिक कारणों से कराई गई थी। पवित्र ग्रंथ को उत्तराधिकारी मानने का आदेश अपनी मृत्यु को समीप देखकर गुरू गोबिन्द सिंह जी ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में किसी अन्य को गुरू चुनने के बजाय सभी सिखों को आदेश दिया कि मेरे बाद आप सभी पवित्र ग्रन्थ को ही गुरू मानें। इस आदेश के बाद से ही पवित्र ग्रन्थ को *गुरू ग्रन्थ साहिब* कहा जाता है।

गुरू गोविंद सिंह जी, भारत स्वाभिमान दल के आदर्श प्रेरकों में से एक हैं, उनका जीवन प्रत्येक स्वाभिमानी भारतीय को कर्मशील बनने की व धर्मरक्षा करने की प्रेरणा देता हैं। भारत स्वाभिमान दल गुरू गोविन्द सिंह जी के श्रीचरणों में नमन करता हैं।

देश बड़ा या धर्म ?

आज एक भाई ने सवाल कर दिया कि देश बड़ा है या धर्म ? इस पर बहुत लोग उलझन में पड़ गए। किसी ने देश कहा और किसी ने धर्म। यदि किसी साधारण हिन्दू से ये सवाल पूछा गया होता तो वो देश बोलने में 1 सेकण्ड नहीं लगाता हैं, पर आज मैं 'धर्म' बोलने में देर नहीं करूँगा।
देश.... क्या है देश ? ? जब तक आप इस देश में है, जबतक आप इस देश में सुरक्षित हैं, तभी तक तो है ये आपका देश। देश तो ये तब भी कहलायेगा जब कोई इस देश पर कब्ज़ा कर ले और आपको भगा दे....... लेकिन तब ये देश उस आक्रमणकारी का होगा, आपका नहीं। मतलब साफ है जब तक देश में आपका राज है तभी तक देश आपका है।
देश बचता है धर्म से। जिस मजहब के लोगों के पास एक भी देश नहीं था उसने सिर्फ धर्म पर अडिग रहकर 52 देश बना लिए (सवाल ये नहीं कि उनका मजहब ख़राब था या अच्छा)। जिसने धर्म से ज्यादा राष्ट्रीयता को महत्त्व दिया उसके हाथ से देश निकल गया। हमारे हाथों से पाकिस्तान के रूप में, अफगानिस्तान के रूप में देश का बड़ा भाग क्यों निकला ? क्योंकि हम धार्मिक कम सेक्युलर ज्यादा हो गए। अगर हिन्दु कट्टर होते, अड़ जाते ... लड़ जाते कि जान जायेगी लेकिन दूसरे धर्म के लोगों को नहीं देंगे अपनी जगह तब पाकिस्तान नहीं बनता।
कैराना, कांधला, अलीगढ, आसाम, कश्मीर आदि क्यों हिंदुओं के हाथ से निकला, क्योंकि उनके लिए देश पहले था धर्म नहीं, नतीजा धर्म भी गया और देश(स्थान) भी गया। अब दो सवाल है....
1. क्या पाकिस्तान में "हिन्दू धर्म" है.... ? ?
2. क्या पाकिस्तान हमारा देश रहा ? ?
याने देश भी गया और धर्म भी गया...
क्यों गया ? क्योंकि भारत की तरफ से गांधी नेहरू जैसे पथभ्रष्ट नेताओं के समूह ने धर्म छोड़कर सेकुलरिज्म अपनाया। जबकि जिन्ना ने सिर्फ अपने धर्म का बात कहा, देश भी माँगा धर्म के आधार पर माँगा, खून किया सब धर्म के लिए। नतीजा उनका धर्म बचा ही नहीं बल्कि बढ़ा और साथ में देश भी पाया।
हिन्दू उल्टा करते हैं, देश के नाम पर धर्म छोड़ देते हैं, धर्म छोड़ते ही कमजोर हो जाते हैं और इनके हाथ से धर्म तो जाता ही है, देश भी निकल जाता है।
🙏🌺जय श्री राम 🌺🙏🚩
भारत स्वाभिमान दल

सोमवार, 2 जनवरी 2017

भारतीय संस्कृति अपनाओं, भारतीय बनों।

पश्चिम से इंडियनों ने सार्वजनिक चुम्बन लिया, समलैंगिकता ली, लिव-इन-रिलेशनशिप लिया, नंगी-पुंगी लड़कियाँ भी पाई, नाबालिग कन्याओं के गर्भपात भी बस दहलीज पर खड़े ही हैंं...
लेकिन इंडियनों ने पश्चिम से अनुशासन, समय की पाबन्दी, राष्ट्र व धर्म के दुश्मनों को मार गिराने की प्रतिबद्धता, अपने राष्ट्र हित के लिए "किसी भी हद" तक जाने की "सटीकता" नहीं सीखी...। धिक्कार है इंडियनों को...
दूसरों को दोष क्यों दें ???
हे इंडियनों ! मूर्खता त्यागकर पश्चिम की गिनी चुनी अच्छाइयों व भारतीय संस्कृति के मूलभूत तत्वों को अपने अन्दर धारण करों, और सिद्ध कर दो कि तुम राम, कृष्ण,
शिवा, प्रताप, गोकुल, सुहेलदेव, गोविन्द सिंह की सन्ताने हो।
भारतीय संस्कृति अपनाओं, भारतीय बनों।
-विश्वजीत सिंह अनंत
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल

शिक्षा का भारतीय करण करो, धर्म बचाओं।

टीपू सुलतान पूरे दक्षिण भारत को इस्लामिक राज्य बनाने वाला पिशाच था; परंतु अंग्रेज-ईसाईयों के विरोध के कारण उसका यह सपना विफल हो गया। अंग्रेजों द्वारा जीता, स्वयं के (नहीं, हिन्दू राजाओं से छीन कर लिया हुआ) राज्य को मुक्त करने हेतु उसने अंग्रेजों से युद्ध किया। उसने देश की स्वतंत्रता के लिए कभी लडाई नहीं की। ऐसी स्थिति में उसे राजनेताओं व इतिहासकारों द्वारा ‘स्वतंत्रता सेनानी’ कहना, कैसे उचित होगा ? यदि वो स्वतंत्रता सेनानी होता, तो बाबर, औरंगजेब, अफजल खान तथा गजनी का मुहम्मद समान आक्रमक कौन थे ? क्या वे भी स्वतंत्रता सेनानी थे ?
क्या टीपू सुल्तान को स्वतंत्रता सेनानी बताया जाना देश के उन अमर बलिदानियों का अपमान नहीं हैं, जो क्रुर अरब साम्राज्यवादी टीपू सुल्तान से अपने धर्म व राष्ट्र की रक्षा करते हुए बलिदान हुए ??

-विश्वजीत सिंह अनंत
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल

रविवार, 1 जनवरी 2017

ईसाई नव वर्ष याद रहा, गोकुल सिंह को भूल गये ?

🚩महाआश्चर्य!

🚩भारतवासी,1 जनवरी को #देश की आजादी के लिए #शहीद होने वाले अमर वीर गोकुल सिंह को भूल गए..!!!

पर #गुलाम बनाने वाले #अंगेजों के #नववर्ष को याद रखे..!

🚩1669 की क्रान्ति के जननायक, परतंत्र #भारत में असहयोग आन्दोलन के जन्मदाता, #राष्ट्रधर्म रक्षक #वीर #गोकुल सिंह जी और उनके सात हजार क्रान्तिकारी साथियों के #बलिदान दिवस पर {1जनवरी} उनको शत-शत नमन।

🚩कैसे वीर थे वो अलबेले,कैसी अमर है उनकी कहानी।

सरदार गोकुल सिंह जी की, आओ याद करें कुर्बानी।।

🚩सन् 1666 के समय में #इस्लामिक राक्षस #औरंगजेब के अत्याचारों से हिन्दू जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। मंदिरों को तोड़ा जा रहा था, #हिन्दू स्त्रियों की इज्जत लूटकर उन्हें मुस्लिम बनाया जा रहा था।

औरंगजेब और उसके सैनिक पागल हाथी की तरह हिन्दू जनता को मथते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे।

🚩हिंदुओं को दबाने के लिए औरंगजेब ने अब्दुन्नवी नामक एक कट्टर मुसलमान को मथुरा का फौजदार नियुक्त किया। अब्दुन्नवी के सैनिकों का एक दस्ता मथुरा जनपद में चारों ओर लगान वसूली करने निकला। 

🚩सिनसिनी गाँव के #सरदार #गोकुल सिंह के आह्वान पर #किसानों ने लगान देने से इंकार कर दिया, परतन्त्र भारत के इतिहास में वह "पहला #असहयोग आन्दोलन" था ।

🚩दिल्ली के सिंहासन के नाक तले समरवीर धर्मपरायण #हिन्दू वीर योद्धा गोकुल सिंह और उनकी किसान सेना ने आतताई औरंगजेब को हिंदुत्व की ताकत का एहसास दिलाया। 

🚩मई 1669 में अब्दुन्नवी ने सिहोरा गाँव पर हमला किया। उस समय वीर गोकुल सिंह गाँव में ही थे। भयंकर #युद्ध हुआ लेकिन इस्लामी शैतान अब्दुन्नवी और उसकी सेना सिहोरा के वीर हिन्दुओं के सामने टिक ना पाई और सारे इस्लामिक पिशाच गाजर-मूली की तरह काट दिए गए।

🚩गोकुल सिंह की #सेना में जाट, राजपूत, गुर्जर, यादव, मेव, मीणा इत्यादि सभी जातियों के हिन्दू थे। इस #विजय ने मृतप्राय हिन्दू समाज में नए प्राण फूँक दिए थे।

🚩इसके बाद #पाँच माह (5 महीनों )तक भयंकर युद्ध होते रहे । मुगलों की सभी तैयारियां और चुने हुए सेनापति प्रभावहीन और असफल सिद्ध हुए । क्या सैनिक और क्या सेनापति सभी के ऊपर गोकुलसिंह का वीरता और युद्ध संचालन का आतंक बैठ गया। अंत में सितंबर मास में, बिल्कुल निराश होकर, शफ शिकन खाँ ने गोकुलसिंह के पास संधि-प्रस्ताव भेजा । #गोकुल सिंह ने औरंगेजब का प्रस्ताव अस्वीकार करते हुए  कहा कि "औरंगजेब कौन होता है हमें माफ करने वाला, माफी तो उसे हम हिन्दुओं से मांगनी चाहिए उसने अकारण ही हिन्दू धर्म का बहुत अपमान किया है।

🚩अब औरंगजेब 28 नवम्बर 1669 को दिल्ली से चलकर खुद मथुरा आया गोकुल सिंह से लड़ने के लिए। #औरंगजेब ने मथुरा में अपनी छावनी बनाई और अपने सेनापति होशयार खाँ को एक मजबूत एवं विशाल सेना के साथ युद्ध के लिए भेजा।

🚩आगरा शहर का फौजदार होशयार खाँ 1669 सितंबर के अंतिम सप्ताह में अपनी-अपनी सेनाओं के साथ आ पहुंचे । यह विशाल सेना चारों ओर से गोकुलसिंह को घेरा लगाते हुए आगे बढ़ने लगी । #गोकुलसिंह के विरुद्ध किया गया यह अभियान, उन आक्रमणों से विशाल स्तर का था, जो बड़े-बड़े राज्यों और वहां के राजाओं के विरुद्ध होते आए थे। #इस वीर के पास न तो बड़े-बड़े दुर्ग थे, न अरावली की पहाड़ियाँ और न ही महाराष्ट्र जैसा विविधतापूर्ण भौगोलिक प्रदेश । इन अलाभकारी स्थितियों के बावजूद, उन्होंने जिस धैर्य और रण-चातुर्य के साथ, एक शक्तिशाली साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति का सामना करके, बराबरी के परिणाम प्राप्त किए, वह सब अभूतपूर्व है।

🚩औरंगजेब की तोपो,धर्नुधरों, हाथियों से सुसज्जित तीन लाख (3लाख)की विशाल सेना और #गोकुल सिंह की किसानों की बीस हजार (20 हजार)की सेना में भयंकर #युद्ध छिड़ गया। 

चार दिन तक भयंकर युद्ध चलता रहा और #गोकुल सिंह की छोटी सी अवैतनिक सेना अपने बेढंगे व घरेलू हथियारों के बल पर ही अत्याधुनिक हथियारों से सुसज्जित और प्रशिक्षित मुगल सेना पर भारी पड़ रही थी। 

🚩भारत के #इतिहास में ऐसे युद्ध कम हुए हैं जहाँ कई प्रकार से बाधित और कमजोर पक्ष, इतने शांत निश्चय और अडिग धैर्य के साथ लड़ा हो । #हल्दी घाटी के युद्ध का निर्णय कुछ ही घंटों में हो गया था। पानीपत के तीनों युद्ध एक-एक दिन में ही समाप्त हो गए थे, परन्तु #वीरवर #गोकुलसिंह का युद्ध तीसरे दिन भी चला ।

🚩इस लड़ाई में सिर्फ पुरुषों ने ही नही बल्कि उनकी #स्त्रियों ने भी पराक्रम दिखाया। 

🚩चार दिन के युद्ध के बाद जब #गोकुल की सेना युद्ध जीतती हुई प्रतीत हो रही थी तभी हसन अली खान के नेतृत्व में एक नई विशाल मुगलिया टुकड़ी आ गई और इस टुकड़ी के आते ही गोकुल की सेना हारने लगी। युद्ध में अपनी सेना को हारता देख हजारों नारियाँ जौहर की पवित्र अग्नि में खाक हो गई।

🚩गोकुल सिंह और उनके ताऊ उदय सिंह को #सात हजार साथियों सहित बंदी बनाकर आगरा में औरंगजेब के सामने पेश किया गया। औरंगजेब ने कहा "जान की खैर चाहते हो तो इस्लाम कबूल कर लो और रसूल के बताए रास्ते पर चलो। बोलो क्या इरादा है इस्लाम या मौत?

🚩अधिसंख्य धर्म-परायण #हिन्दुओं ने एक सुर में कहा - "औरंगजेब, अगर तेरे खुदा और रसूल मोहम्मद का रास्ता वही है जिस पर तू चल रहा है तो धिक्कार है तुझे,

हमें तेरे रास्ते पर नहीं चलना l"

🚩इतना सुनते ही औरंगजेब के संकेत से गोकुल सिंह की बलशाली भुजा पर जल्लाद का बरछा चला।

🚩गोकुल सिंह ने एक नजर अपने भुजाविहीन रक्तरंजित कंधे पर डाली और फिर बड़े ही घमण्ड के साथ जल्लाद की ओर देखा और कहा दूसरा वार करो। 

🚩दूसरा बरछा चलते ही वहाँ खड़ी जनता आंर्तनाद कर उठी और फिर #गोकुल सिंह के शरीर के #एक-एक जोड़ काटे गए। गोकुल सिंह का सिर जब कटकर धरती माता की गोद में गिरा तो मथुरा में केशवराय जी का मंदिर भी भरभराकर गिर गया। यही हाल उदय सिंह और बाकि साथियों का भी किया गया। उनके छोटे- छोटे बच्चों को #जबरन #मुसलमान बना दिया गया ।

*1 जनवरी 1670 ईसवी का दिन था वह।*

🚩ऐसे अप्रतिम #वीर का कोई भी इतिहास नही पढ़ाया गया और न ही कहीं कोई सम्मान दिया गया। न ही उनके नाम पर न कोई विश्वविद्यालय है और न कोई केन्द्रीय या राजकीय परियोजना। 

*कितना एहसान फरामोश, कृतघ्न है हिंदू समाज!!*

🚩कैसे वीर हुए इस धरा पर,जिन्होंने #धर्म के लिए प्राण न्यौछावर कर दिये पर इस्लाम नही अपनाया।

🚩गोकुलसिंह सिर्फ जाटों के लिए शहीद नहीं हुए थे न उनका राज्य ही किसी ने छीन लिया था, न कोई पेंशन बंद कर दी थी, बल्कि उनके सामने तो अपूर्व शक्तिशाली मुगल-सत्ता, दीनतापूर्वक, सन्धि करने की तमन्ना लेकर गिड़-गिड़ाई थी।

 🚩शर्म आती है हमें कि हम ऐसे अप्रतिम वीर को कागज के ऊपर भी सम्मान नहीं दे सके।

🚩शाही इतिहासकारों ने उनका उल्लेख तक नही किया। केवल जाट पुरूष ही नही बल्कि उनकी #वीरांगनायें भी अपनी ऐतिहासिक दृढ़ता और पारंपरिक शौर्य के साथ उन सेनाओं का सामना करती रही।

 🚩दुर्भाग्य की बात है कि #भारत की इन #वीरांगनाओं और सच्चे सपूतों का कोई उल्लेख शाही टुकड़ों पर पलने वाले तथाकथित इतिहासकारों ने नहीं किया। 

🚩जागो भारतवासियों!!!