सोमवार, 27 अप्रैल 2020

वैशाख शुक्ल पंचमी आदिगुरू शंकराचार्य जी की जयंती



 

श्रुति स्मृति पुराणानां आलयं करुणालयम् ।
नमामि भगवद्पाद शंकरं लोकशंकरम् ।।
********वैशाख शुक्ल पंचमी *********
******आदिगुरू शंकराचार्य जी********
********** की जयंती पर ************
*******उन्हें कोटिशः नमन *************

आज से लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व कलियुग प्रारम्भ हुआ , तब से लेकर आज तक सनातन हिन्दू समाज के सामने अनेक विकट परिस्थितियाँ आई हैं ...सब संकटों को पार करके भी अगर हमारी चिरंतर धारा निरंतर बह रही है तो इसके पीछे अनेक महापुरुषों की तपस्या है ....हिन्दू समाज को अपने धर्म की सनातन परम्परा के लिए अगर किसी के प्रति सर्वाधिक कृतज्ञ होना चाहिए तो वो हैं ****आदिगुरू शंकराचार्य****


...... कलियुग के प्रारम्भ में धर्म का पतन आरम्भ हुआ ...अनेक मत पंथों ने जन्म लिया, जिसके कारण वैदिक परम्पराएं भी लुप्त होने लगी .... हिन्दू धर्म की लौ मद्धिम पड़ने लगी ....ऐसे में लगभग २५०० वर्ष पूर्व ..सुदूर दक्षिण में केरल के एक छोटे से ग्राम ......कालडी ...से १२ वर्ष का बालक शंकर वैदिक अद्वैत ज्ञान की ज्योति लिए घर से निकला ...पूरे भारत भर में घूम घूम कर नास्तिक पन्थो को परास्त किया सनातन वैदिक हिन्दू धर्म की पताका दिग्दिगांत में फहरा दी....

....उनकी अद्भुत रचनाएं और कार्य देख कर एक बार विश्वास करना असंभव लगता है की कोई मनुष्य इतनी छोटी आयु में इतना सब कर सकता है ...देश के चार कोनो में चार मठों की स्थापना ....,, चार पीठों पर चार शंकराचार्यों की परम्परा स्थापित करके हर पीठ के माध्यम से एक एक वेद और अलग अलग तीर्थों की मर्यादा सुरक्षित करना ..........बोद्ध आदि अन्य नास्तिक पंथों को परास्त करना ....... पञ्च देवों की पूजा की परम्परा स्थापित करना .....महान अद्वैत मत के ज्ञान को प्रगट करना ..ऐसे कार्य हैं जिनके लिए हजारों जन्म भी कम हैं .........आदि शंकर की जन्म जयंती पर अपने ह्रदय के उच्चतम भावों से हम उनके चरणों में अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं *********

भारतीय संस्कृति के विकास में आद्य शंकराचार्य का विशेष योगदान रहा है। आचार्य शंकर का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी को स्वीकार किया जाता है। शंकर दिग्विजय, शंकरविजयविलास, शंकरजय आदि ग्रन्थों में उनके जीवन से सम्बन्धित तथ्य उद्घाटित होते हैं। दक्षिण भारत के केरल राज्य (तत्कालीन मालाबारप्रांत) में आद्य शंकराचार्य जी का जन्म हुआ था। उनके पिता शिव गुरु तैत्तिरीय शाखा के यजुर्वेदी ब्राह्मण थे। 


आठ वर्ष की अवस्था में गोविन्दपाद के शिष्यत्व को ग्रहण कर संन्यासी हो जाना, पुन: वाराणसी से होते हुए बद्रिकाश्रम तक की पैदल यात्रा करना, सोलह वर्ष की अवस्था में बद्रीकाश्रम पहुंच कर ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखना, सम्पूर्ण भारत वर्ष में भ्रमण कर अद्वैत वेदान्त का प्रचार करना, दरभंगा में जाकर मण्डनमिश्र से शास्त्रार्थ कर वेदान्त की दीक्षा देना तथा मण्डन मिश्र को संन्यास धारण कराना, भारतवर्ष में प्रचलित तत्कालीन कुरीतियों को दूर कर समभावदर्शी धर्म की स्थापना करना, ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदारण्यकऔर छान्दोग्योपनिषद् पर भाष्य लिखना भारत वर्ष में राष्ट्रीय एकता अखण्डता तथा सांस्कृतिक अखण्डता की स्थापना करना उनके अलौकिक व्यक्तित्व का परिचायक है। 

चार धार्मिक मठों में दक्षिण के श्रृंगेरीशंकराचार्यपीठ, पूर्व (उडीसा) जगन्नाथपुरीमें गोवर्धनपीठ, पश्चिम द्वारिका में शारदामठ तथा बद्रिकाश्रम में ज्योतिर्पीठ भारत की एकात्मकता को आज भी दिग्दर्शित कर रहा है। कुछ लोग श्रृंगेरी को शारदापीठ तथा गुजरात के द्वारिका में मठ को काली मठ कहते र्है। उक्त सभी कार्य को सम्पादित कर 32वर्ष की आयु में मोक्ष प्राप्त करना, अलौकिकता की ही पहचान है। शंकराचार्य के विषय में कहा गया है
अष्टवर्षेचतुर्वेदी, द्वादशेसर्वशास्त्रवित्
षोडशेकृतवान्भाष्यम्द्वात्रिंशेमुनिरभ्यगात्


अर्थात् आठ वर्ष की आयु में चारों वेदों में निष्णात हो गए, बारह वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों में पारंगत, सोलह वर्ष की आयु में शांकरभाष्यतथा बत्तीस वर्ष की आयु में शरीर त्याग दिया। ब्रह्मसूत्र के ऊपर शांकरभाष्यकी रचना कर विश्व को एक सूत्र में बांधने का प्रयास भी शंकराचार्य के द्वारा किया गया है, जो कि सामान्य मानव से सम्भव नहीं है। 

शंकराचार्य के दर्शन में सगुण ब्रह्म तथा निर्गुण ब्रह्म दोनों का हम दर्शन, कर सकते हैं। निर्गुण ब्रह्म उनका निराकार ईश्वर है तथा सगुण ब्रह्म साकार ईश्वर है। जीव अज्ञान व्यष्टि की उपाधि से युक्त है। 'तत्त्‍‌वमसि' तुम ही ब्रह्म हो; 'अहं ब्रह्मास्मि' मै ही ब्रह्म हूं; 'अयामात्मा ब्रह्म' यह आत्मा ही ब्रह्म है; इन बृहदारण्यकोपनिषद् तथा छान्दोग्योपनिषद वाक्यों के द्वारा इस जीवात्मा को निराकार ब्रह्म से अभिन्न स्थापित करने का प्रयत्‍‌न शंकराचार्य जी ने किया है। ब्रह्म को जगत् के उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय का निमित्त कारण बताए हैं। ब्रह्म सत् (त्रिकालाबाधित) नित्य, चैतन्यस्वरूप तथा आनंद स्वरूप है। ऐसा उन्होंने स्वीकार किया है। जीवात्मा को भी सत् स्वरूप, चैतन्य स्वरूप तथा आनंद स्वरूप स्वीकार किया है। जगत् के स्वरूप को बताते हुए कहते हैं कि -

नामरूपाभ्यां व्याकृतस्य अनेककर्तृभोक्तृसंयुक्तस्य प्रतिनियत देशकालनिमित्त 
क्रियाफलाश्रयस्य मनसापि अचिन्त्यरचनारूपस्य जन्मस्थितिभंगंयत:


अर्थात् नाम एवं रूप से व्याकृत, अनेक कत्र्ता, अनेक भोक्ता से संयुक्त, जिसमें देश, काल, निमित्त और क्रियाफल भी नियत हैं। जिस जगत् की सृष्टि को मन से भी कल्पना नहीं कर सकते, उस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति तथा लय जिससे होता है, उसको ब्रह्म कहते है। सम्पूर्ण जगत् के जीवों को ब्रह्म के रूप में स्वीकार करना, तथा तर्क आदि के द्वारा उसके सिद्ध कर देना, आदि शंकराचार्य की विशेषता रही है। इस प्रकार शंकराचार्य के व्यक्तित्व तथा कृतित्वके मूल्यांकन से हम कह सकते है कि राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का कार्य शंकराचार्य जी ने सर्वतोभावेनकिया था। भारतीय संस्कृति के विस्तार में भी इनका अमूल्य योगदान रहा है।


जगद्गुरू आदिशंकराचार्य जी को भारत स्वाभिमान दल कोटि कोटि नमन करता हैं।