शनिवार, 30 अप्रैल 2016

कोकाकोला से होने वाले सौलह बहुत बड़े लाभ

कोकाकोला हर घर में रखनी चाहिए| इससे होने वाले 16 बहुत बड़े लाभ हैं जो इसकी हर कमी को दूर कर देते हैं| यह पोस्ट खूब शेयर करें ताकि कोकाकोला के बारे में दुर्भावना दूर हो| इसकी एक बोतल हर समय घर में रहनी चाहिए|
(1) चीनी मिटटी के बर्तनों पर लगे हर धब्बे को दूर करता है|
(2) घर में गलीचे पर लगे हर धब्बे को दूर करता है|
(3) खाने के बर्तनों पर हुए जलने के हर निशान को दूर करता है|
(4) कपड़ों पर लगी चिकनाई जो साबुन से दूर नहीं होती को मिटा देता है|
(5) बालो पर लगे रंग को तुरंत उतार देता है|
(6) किसी भी धातु पर लगे पेंट के धब्बों को तुरंत मिटा देता है|
(7) कार बैटरी और इन्वर्टर की बैटरी के टर्मिनलों पर जरने यानि जंग को तुरंत दूर कर देता है|
(8) सबसे बढ़िया कीटनाशक का काम करता है|
(9) टाइलों पर लगे धब्बों को तुरंत दूर कर देता है|
(10) टॉयलेट की सफाई सबसे बढ़िया करता है|
(11) पुराने सिक्कों में चमक ला देता है|
(12) अल्युमिनियम फॉयल को साफ़ कर देता है|
(13) च्युइंग गम के निशानों को दूर कर देता है|
(14) कपड़ों पर लगे खून के धब्बों को तुरंत साफ़ कर देता है|
(15) गंदे बालों की सफाई बहुत अच्छी तरह कर देता है|
(16) घर में इसको पानी में मिलाकर पोचा बहुत अच्छा लगता है| घर को कीटाणु रहित कर देता है|
एक लाभ और है उनकेलिए जो शीघ्र मरना चाहते हैं, वे इसका नियमित सेवन करें| आंतें खराब हो जायेंगी और मृत्युदेव से शीघ्र भेंट हो जायेगी|
इससे लाभ ही लाभ है| अतः हर घर में यह अवश्य रखना चाहिए|
धन्यवाद|
-विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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वन्दे मातरम्

इस देश में सबसे आसान है हिन्दूओं का उत्पीड़न करना

हमें आशा थी कि प्रगतिशील जोशीली नायिका तृप्ती देसाई हाजी अली की दरगाह में महिलाओं के प्रवेश न होने देने की लड़ाई को जामा मस्जिद में अजान देने के लिए महिलाओं की नियुक्ति कराने तक लेकर जाएगी लेकिन यह तो मुम्बई में ही फूस्स हो गई। अब हिन्दू भावनाओं को आहत कर प्रचार पाने के लिए नया मंदिर तलाश रही है।
इस देश में सबसे आसान है हिन्दूओं का उत्पीड़न करना। उसके मंदिरों, देवी देवताओं के संबंध में आप जो चाहे कह सकते हैं। मोहम्मद और ईसा के संबंध में तथ्यात्मक बात करते हुए भी उन्हीं प्रगतिशील प्रोफेसरों की जुबान को लकवा मार जाता है, जो देवी देवताओं के काल्पनिक अश्लील प्रसंग की कहानी कॉलेज में अपने छात्र- छात्राओं को सुनाने में भी नहीं शर्माते।

-विश्वजीत सिंह अनन्त
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मजहब के नाम पर महिलाओं से भेदभाव करते है इस्लामिक देश

1.यहां लड़कियों को अंडर गारमेंट्स भी नहीं पहनने देती सरकार!
2.सऊदी अरब- सऊदी अरब में महिलाओं को ड्राइविंग की इजाजत नहीं मिली है। अगर ऐसा कोई भी मामला सामने आता है तो उनपर कड़ी कार्रवाई की जाती है।
3.यमन- यमन में लंबे वक्‍त से महिलाओं के साथ न्‍याय नहीं हो रहा है। इस्‍लामिक देश होने की वजह से यहां की महिलाओं को शरियत कानून का सख्‍ती से पालन करना पड़ता है। कोर्ट में भी महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले ज्‍यादा हक नहीं प्राप्‍त हैं।
4. इटली- इटली में भी महिलाओं के साथ नाइंसाफी की जाती है। किसी महिला के बीमार होने पर उसके पनीर फैक्‍ट्री में आने पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है। इसके साथ ही बदसुरत महिला को भी फैक्‍ट्री में आने नहीं दिया जाता है।
5. मिसौरी- संयुक्त राज्य अमेरिका का मध्‍य-पश्चिम राज्‍य मिसौरी में लड़कियों के अंडर गारमेंट्स पहनने पर रोक लगी है। यदि कोई भी महिला इसका उल्‍लंघन करती हुई पाई जाती है तो उसके खिलाफ सख्‍त कार्रवाई होती है।
6. उत्‍तर कैरोलिना- इस देश में महिलाओं को अपना शरीर ढक कर रखना आवश्‍यक होता है। यहां के शेर्लोट में दिनभर महिलाओं को 16 गज तक शरीर को ढक कर रखना ही होता है।
7. ईरान- ईरान भी महिलाओं के साथ ज्‍यादती करता है। यहां तो महिलाओं से खेल के क्षेत्र में भी भेदभाव होता है। उन्‍हें विश्‍व-कप के मैच देखने की भी इजाजत नहीं दी गई है।

-विश्वजीत सिंह अनन्त
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योग को लैब में वैज्ञानिक सिद्ध करने वाले स्वामी राम तीर्थ

साठ के दशक में योग के सामने तब तो और भी कठिन दौर था वैज्ञानिक साबित होने का. क्योंकि अमेरिका के लैब में योग सफल न हुआ तो उसका पश्चिम में प्रवेश निषेध हो जाता. इसी कठिन दौर में हिमालय के एक महान योगी स्वामी राम अमेरिका जाते हैं. मैलिन्जर फाउण्डेशन की लेबोरेटरी में उनके योग संबंधी दावों की लंबी जांच पड़ताल चलती है लेकिन स्वामी राम की शक्तियों के आगे विज्ञान असंभव को संभव मान लेता है. परीक्षण के दौरान उन्होंने16 सेकेण्ड के लिए हृदय गति रोक दी लेकिन वे जिन्दा रहे और सबसे बात करते रहे. उन्होंने अपने शरीर के अलग अलग हिस्से में 11 डिग्री का तापमान अंतर पैदा करके शरीर विज्ञान के असंभव को संभव कर दिखाया.
लेकिन योग का इससे भी बड़ा एक अचंभा उन्होंने कैमरे में कैद किया. और वह था चक्र की शक्ति. शरीर के भीतर षट्चक्रों को विज्ञान कल्पना ही मानता था. लेकिन स्वामी राम ने दावा किया कि वे हर चक्र पर आभामंडल (औरा) पैदा करेंगे जिसे कैमरे में कैद किया जा सकता है. उनके हृदय स्थल (अनाहत चक्र) पर उभरा आभामंडल न सिर्फ कैमरे में कैद हुआ बल्कि विज्ञान के सामने पहली बार योग का षट्चक्र सिद्धांत भी साबित हुआ जो अभी तक विज्ञान में कपोल कल्पना समझा जाता था.
स्वामी राम जैसे महान योगियों के कारण आधुनिक दुनिया में योग अपनी वैज्ञानिकता सिद्ध कर सका है।
-विश्वजीत सिंह अनन्त
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शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

संस्कृत के बारे में गौरवशाली बीस तथ्य

संस्कृत के बारे में ये 20 तथ्य जान कर आपको भारतीय होने पर गर्व होगा
संस्कृत भाषा के बारे में रोचक तथ्य
किसी मंदिर या गुरुकुल के पास से गुजरते हुए आपने संस्कृत के श्लोक या मंत्र तो अवश्य ही सुने होंगे. इन मन्त्रों और श्लोकों से बचपन में ही हमारा रिश्ता टूट चुका है पर फिर भी आज ये श्लोक कभी-कभी सुनाई दे ही जाते हैं. संस्कृत विश्व की सबसे प्राचीन भाषा है लेकिन वर्तमान में विलुप्त होने की कगार पर है..
2001 में संस्कृत बोलने वाले लोगो की संख्या सिर्फ14135 थी।
दुनिया जहाँ संस्कृत की महिमा समझकर संस्कृत सीखना चाह रही है स्कूल कॉलेज यूनिवर्सिटीज के पाठ्यक्रम में संस्कृत को जोड़ा जा रहा है वही भारत इस दिशा में कोई खास कदम नही उठा रहा है।
आज हम आपको संस्कृत के बारे में कुछ ऐसे तथ्य बता रहे हैं, जो किसी भी भारतीय का सर गर्व से ऊंचा कर देंगे
.1. संस्कृत को सभी भाषाओं की जननी माना जाता है।
2. संस्कृत उत्तराखंड की आधिकारिक भाषा है।
3. अरब लोगो की दखलंदाजी से पहले संस्कृत भारत की राष्ट्रीय भाषा थी।
4. NASA के मुताबिक, संस्कृत धरती पर बोली जाने वाली सबसे स्पष्ट भाषा है।
5. संस्कृत में दुनिया की किसी भी भाषा से ज्यादा शब्द है वर्तमान में संस्कृत के शब्दकोष में 102 अरब 78 करोड़ 50 लाख शब्द है।
6. संस्कृत किसी भी विषय के लिए एक अद्भुत खजाना है। जैसे हाथी के लिए ही संस्कृत में 100 से ज्यादा शब्द है।
7. NASA के पास संस्कृत में ताड़पत्रो पर लिखी 60,000 पांडुलिपियां है जिन पर नासा रिसर्च कर रहा है।
8. फ़ोबर्स मैगज़ीन ने जुलाई,1987 में संस्कृत को Computer Software के लिए सबसे बेहतर भाषा माना था।
9. किसी और भाषा के मुकाबले संस्कृत में सबसे कम शब्दो में वाक्य पूरा हो जाता है।
10. संस्कृत दुनिया की अकेली ऐसी भाषा है जिसे बोलने में जीभ की सभी मांसपेशियो का इस्तेमाल होता है।
11. अमेरिकन हिंदु युनिवर्सिटी के अनुसार संस्कृत में बात करने वाला मनुष्य बीपी, मधुमेह, कोलेस्ट्रॉल आदि रोग से मुक्त हो जाएगा. संस्कृत में बात करने से मानव शरीरका तंत्रिका तंत्र सक्रिय रहता है जिससे कि व्यक्ति का शरीर सकारात्मक आवेश(PositiveCharges) के साथ सक्रिय हो जाता है।
12. संस्कृत स्पीच थेरेपी में भी मददगार है यह एकाग्रता को बढ़ाती है।
13. कर्नाटक के मुत्तुर गांव के लोग केवल संस्कृत में ही बात करते है।
14. सुधर्मा संस्कृत का पहला अखबार था, जो 1970 में शुरू हुआ था। आज भी इसका ऑनलाइन संस्करण उपलब्ध है।
15. जर्मनी में बड़ी संख्या में संस्कृतभाषियो की मांग है। जर्मनी की 14 यूनिवर्सिटीज़ में संस्कृत पढ़ाई जाती है।
16. नासा के वैज्ञानिकों के अनुसार जब वो अंतरिक्ष ट्रैवलर्स को मैसेज भेजते थे तोउनके वाक्य उलट हो जाते थे. इस वजह से मैसेज का अर्थ ही बदल जाता था. उन्होंले कई भाषाओं का प्रयोग किया लेकिन हर बार यही समस्या आई. आखिर में उन्होंने संस्कृत में मैसेज भेजा क्योंकि संस्कृत के वाक्य उल्टे हो जाने पर भी अपना अर्थ नही बदलते हैं।
जैसे
अहम् विद्यालयं गच्छामि।
विद्यालयं गच्छामि अहम्।
गच्छामि अहम् विद्यालयं ।
उक्त तीनो के अर्थ में कोई अंतर नहीं है।
17. आपको जानकर हैरानी होगी कि Computer द्वारा गणित के सवालो को हल करने वाली विधि यानि Algorithms संस्कृत में बने है ना कि अंग्रेजी में।
18. नासा के वैज्ञानिको द्वारा बनाए जा रहे 6th और 7th जेनरेशन Super Computers संस्कृतभाषा पर आधारित होंगे जो 2034 तक बनकर तैयार हो जाएंगे।
19. संस्कृत सीखने से दिमाग तेज हो जाता है और याद करने की शक्ति बढ़ जाती है। इसलिए London और Ireland के कई स्कूलो में संस्कृत को Compulsory Subject बना दिया है।
20. इस समय दुनिया के 17 से ज्यादा देशो की कम से कम एक University में तकनीकी शिक्षा के कोर्सेस में संस्कृत पढ़ाई जाती है।

-विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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योगः कर्मसु कौशलम्

📗📖📕📖📘📖📗📖📕
भगवान श्रीकृष्ण, श्रीमद्भगवत गीता जी में कहते हैं की:-
📕📗📘नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥📖
📖📕'तू शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म कर क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर-निर्वाह भी नहीं सिध्द होगा।'
📖📕श्रीमद्भगवत गीता जी निष्काम कर्मों के द्वारा मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताती है।
📖📕जिस प्रकार कमल के पत्ते जल में रहते हुए भी जल को अपने ऊपर नहीं आने देते, ऐसे ही निष्काम कर्मयोगी संसार में रहते हुए भी कर्मों के बंधन तथा मोह में लिप्त नहीं होते।
📕📖श्रीमद्भगवत गीता जी संसार को कर्मशील व पुरुषार्थी होने का संदेश देती है और स्वार्थ, लोभ, आल्सय से ऊपर उठकर निष्काम व परोपकार के कर्मों की भावना जागृत करती है।
📕📖श्रीमद्भगवत गीता हम सभी को श्रेष्ठ कर्म करते हुए इहलोक तथा परलोक दोनों के लिए उन्नति करने के लिए प्रेरणा देती है।
📕📖गीता कह रही है:- 🍂' योगः कर्मसु कौशलम्'🍃
📘📗📕अर्थात् :- "जो भी कर्म करो, उसको पूर्णता, निपुणता, सुन्दरता और कुशलता से करो।
📕📖हे मनुष्यो, वर्तमान जीवन और जगत् को कर्मों की सुगंध से भरते चलो, कर्त्तव्य व दायित्व को ईमानदारी व कुशलता से निभाओ।"
📕📖जो इस तरह से जीवन को जीता है, गीता के अनुसार वह इस जीवन व जगत् को सफल कर लेता है और उसका अगला जन्म भी सुधर जाता है।
📗📖📕📖📘📖📗📖📕


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जेएनयू बनता जा रहा है सेक्स का अड्डा...

सनातन हिन्दू संस्कृति से घृणा करने वाले कांग्रेसी नेता जवाहर लाल नेहरू के नाम पर दिल्ली में स्थापित विश्वविद्यालय JNU में खुर्शीद अनवर तथा अरशद आलम जैसे कथित "प्रगतिशील" बुद्धिजीवी प्रोफेसरों तथा छात्र- छात्रोओं के बीच "अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता", " मानव अधिकार", "नारी विमर्श" और "महिला सशक्तिकरण" जैसे मुद्दे बहुत चलते है...
पैंतीस-चालीस साल के अनुभवी छात्र- छात्राएँ इन विशिष्ट वामपंथी विमर्श में खासे माहिर हैं... JNU में आए नए लड़के-लड़कियों को ट्रेनिंग भी वही देते हैं, वे उन्हें प्रगतिशीलता के नाम पर उन्मुक्त यौन सम्बन्ध बनाने तथा नशा करने में विशेषज्ञ बना देते है और उसके बाद उन्हें ब्लैकमेल करके अपने भारत विरोधी आंदोलन में शामिल कर लेते हैं...
यह आश्चर्य ही नहीं है, जेएनयू सिर्फ राष्टविरोधी तत्वों, पाकिस्तान के गुर्गो का ही नहीं बल्कि मैकाले-नेहरू की प्रेतछाया तले सैक्स रैकेटियों का भी अड्डा बन गया है। सैक्स वर्कर न केवल बाहर से आते हैं बल्कि सैक्स रैकेट में जेएनयू में पढ़ने वाले छात्र- छात्राएँ भी शामिल है। जेएनयू के 11 प्रोफेसरों की एक टीम ने सैक्स रैकेट और दूसरी अन्य अमान्य गतिविधियों पर 200 पेज की रिपोर्ट तैयार की है, रिपोर्ट जेएनयू प्रशासन को सौंप दी गयी है। रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि सैक्स धंधे में शामिल होने, शराब पीने, अश्लीलता को बढ़ावा देने जैसे अनैतिक कार्यो के लिए एक हजार से अधिक छात्र-छात्राओं को जुर्माना की भी सजा दी गयी है। सैक्स रैकेड को चलाने में जेएनयू की सुरक्षाकर्मियों की भी बड़ी भूमिका होती है, जेएनयू परिसर में रात में दिल्ली के रईसजादों की बड़ी-बडी गाड़ियां घूमती-फिरती रहती है। शराब की बोतलें और निरोध की उपयोग वाली प्लास्टिक की चर्चा तो जेएनयू में आम है।
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इसीलिए तो इन्हें खुलेआम सड़कों पर "किस ऑफ लव" या "गे-सेक्स" जैसा विरोध प्रदर्शन करने में कतई-कतई शर्म नहीं आती... मानना पड़ेगा इन्हें नेहरू के अनुयायी है तो प्रगतिशील तो होगे ही ये लोग...
-विश्वजीत सिंह अनन्त
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गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

संस्कृत की अनिवार्यता

संस्कृत वैज्ञानिक भाषा है। यह सभी भाषाओँ की जननी है। विश्व की समस्त भाषाएँ इसी के गर्भ से उद्भूत हुई है। वेदों की रचना इसी भाषा में होने के कारण इसे “ वैदिक भाषा ” भी कहते हैं।
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संस्कृत भाषा का प्रथम काव्य-ग्रन्थ “ ऋग्वेद ” को माना जाता है। ऋग्वेद को आदिग्रन्थ भी कहा जाता है। किसी भी भाषा के उद्भव के बाद इतनी दिव्या एवं अलौकिक कृति का सृजन कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता है।
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ऋग्वेद की ऋचाओं में संस्कृत भाषा का लालित्य, व्याकरण, छंद, सौंदर्य, अलंकार अद्भुत एवं आश्चर्यजनक है। दिव्य ज्ञान का यह विश्वकोश संस्कृत की समृद्धि का परिणाम है। यह भाषा अपनी दिव्य एवं दैवीय विशेषताओं के कारण आज भी उतनी ही प्रासंगिक एवं जीवंत है।
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संस्कृत का तात्पर्य परिष्कृत, परिमार्जित, पूर्ण, एवं अलंकृत है। यह भाषा इन सभी विशेषताओं से पूर्ण है। यह भाषा अति परिष्कृत एवं परिमार्जित है। इस भाषा में भाषागत त्रुटियाँ नहीं मिलती हैं जबकि अन्य भाषाओँ के साथ ऐसा नहीं है। यह परिष्कृत होने के साथ-साथ अलंकृत भी है। अलंकर इसका सौंदर्य है।
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अतः संस्कृत को पूर्ण भाषा का दर्जा दिया गया है। यह अतिप्राचीन एवं आदि भाषा है। भाषा विज्ञानी इसे इंडो-इरानियन परिवार का सदस्य मानते है। इसकी प्राचीनता को ऋग्वेद के साथ जोड़ा जाता है। अन्य मूल भारतीय ग्रन्थ भी संस्कृत में ही लिखित है।
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संस्कृत का प्राचीन व्याकरण “ पाणिनि ” का “ अष्टाध्यायी ” है। संस्कृत को वैदिक एवं क्लासिक संस्कृत के रूप में प्रमुखतः विभाजित किया जाता है। वैदिक संस्कृत में वेदों से लेकर उपनिषद तक की यात्रा सन्निहित है, जबकि क्लासिक संस्कृत में पौराणिक ग्रन्थ, जैसे रामायण, महाभारत आदि हैं। भाषा विज्ञानी श्री भोलानाथ तिवारी जी के अनुसार इसके चार भाग किये गए हैं — पश्चिमोत्तरी, मध्यदेशी, पूर्वी, एवं दक्षिणी।
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संस्कृत की इस समृद्धि ने पाश्चात्य विद्वानों को अपनी ओर आकर्षित किया हैं । इस भाषा से प्रभावित होकर सर विलियम जोन्स ने २ फरवरी, १७८६ को एशियाटिक सोसायटी, कोलकता में कहा- “ संस्कृत ” एक अद्भुत भाषा है।
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यह ग्रीक से अधिक पूर्ण है, लैटिन से अधिक समृद्ध और अन्य किसी भाषा से अधिक परिष्कृत है। इसी कारण संस्कृत को सभी भाषाओँ की जननी कहा जाता है। संस्कृत को इंडो-इरानियन भाषा वर्ग के अंतर्गत रखा जाता है और सभी भाषाओँ की उत्पत्ति का सूत्रधार इसे माना जाता है।
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भाषाविद मानते हैं कि इन सभी भाषाओँ की उत्पत्ति का तार कहीं-न-कहीं से संस्कृत से जुड़ा हुआ है; क्योंकि यह सबसे पुरानी एवं समृद्ध भाषा है। किसी भी भाषा की विकासयात्रा में उसकी यह विशेषता जुडी होती है कि वह विकसित होने की कितनी क्षमता रखती है। जिस भाषा में यह क्षमता विद्यमान होती है, वह दीर्घकाल तक अपना अस्तित्व बनाये रखती है, परन्तु जिसमें इस क्षमता का आभाव होता है उनकी विकासयात्रा थम जाती है।
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यह सत्य है कि संस्कृत भाषा आज प्रचालन में नहीं है परन्तु इसमें अगणित विशेषताएं मौजूद हैं। इन्हीं विशेषताओं को लेकर इसपर कम्युलनटर के क्षेत्र में भी प्रयोग चल रहा है। कम्प्युटर विशेषज्ञ इस तथ्य से सहमत है कि यदि संस्कृत को कम्प्युटर की डिजिटल भाषा में प्रयोग करने की तकनीक खोजी जा सके तो भाषा जगत के साथ-साथ कम्प्युटर क्षेत्र में भी अभूतपूर्व परिवर्तन देखें जा सकते हैं। जिस दिन यह परिकल्पना साकार एवं मूर्तरूप लेगी, एक नए युग का उदय होगा। संस्कृत उदीयमान भविष्य की एक महत्वपूर्ण धरोहर है।
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>>> अपने देश में संस्कृत भाषा वैदिक भाषा बनकर सिमट गयी है। इसे विद्वानों एवं विशेषज्ञों कि भाषा मानकर इससे परहेज किया जाता है। किसी अन्य भाषा कि तुलना में इस भाषा को महत्त्व ही नहीं दिया गया, क्योंकि वर्तमान व्यावसायिक युग में उस भाषा को ही महत्वता दी जाती है जिसका व्यासायिक मूल्य सर्वोपरि होता है। कर्मकांड के क्षेत्र में इसे महत्त्व तो मिला है, परन्तु कर्मकांड कि वैज्ञानिकता का लोप हो जाने से इसे अन्धविश्वास मानकर संतोष कर लिया जाता है और इसका दुष्प्रभाव संस्कृत पर पड़ता है। यदि इसके महत्त्व को समझकर इसका प्रयोग किया जाये तो इसके अगणित लाभ हो सकते हैं।
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संस्कृत की भाषा विशिष्टता को समझकर लन्दन के बीच बनी एक पाठशाला ने अपने जूनियर डिविजन में इसकी शिक्षा को अनिवार्य बना दिया है। श्री आदित्य घोष ने सन्डे हिंदुस्तान टाइम्स ( १० फरवरी, २००८ ) में इससे सम्बंधित एक लेख प्रकाशित किया था।
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उनके अनुसार लन्दन की उपर्युक्त पाठशाला के अधिकारीयों की यह मान्यता है कि संस्कृत का ज्ञान होने से अन्य भाषाओँ को सिखने व समझने की शक्ति में अभिवृद्धि होती है। इसको सिखने से गणित व विज्ञान को समझने में आसानी होती है।
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Saint James Independent school नामक यह विद्यालय लन्डन के कैनिंगस्टन ओलंपिया क्षेत्र की डेसर्स स्ट्रीट में अवस्थित है। पाँच से दस वर्ष तक की आयु के इसके अधिकांश छात्र काकेशियन है। इस विद्यालय की आरंभिक कक्षाओं में संस्कृत अनिवार्य विषय के रूप में सम्मिलित है।
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इस विद्यालय के बच्चे अपनी पाठ्य पुस्तक के रुप में रामायण को पढ़ते हैं। बोर्ड पर सुन्दर देवनागरी लिपि के अक्षर शोभायमान होते हैं। बच्चे अपने शिक्षकों से संस्कृत में प्रश्नोत्तरी करते हैं और अधिकतर समय संस्कृत में ही वार्तालाप करते हैं। कक्षा के उपरांत समवेत स्वर में श्लोकों का पाठ भी करते हैं। दृश्य ऐसा होता है मानो यह पाठशाला वाराणसी एवं हरिद्वार के किसी स्थान पर हो और वहाँ पर किसी कर्मकांड का पाठ चल रहा हो।
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इस पाठशाला के शिक्षकों ने अनेक शोध-परीक्षण करने के पश्चात् अपने निष्कर्ष में पाया कि संस्कृत का ज्ञान बच्चों के सर्वांगीण विकास में सहायक होता है। संस्कृत जानने वाला छात्र अन्य भाषाओँ के साथ अन्य विषय भी शीघ्रता से सीख जाता है। यह निष्कर्ष उस विद्यालय के विगत बारह वर्ष के अनुभव से प्राप्त हुआ है।
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Oxford University से संस्कृत में Ph. D. करने वाले डॉक्टर वारविक जोसफ उपर्युक्त विद्यालय के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष हैं। उनके अथक लगन ने संस्कृत भाषा को इस विद्यालय के ८०० विद्यार्थियों के जीवन का अंग बना दिया है। डॉक्टर जोसफ के अनुसार संस्कृत विश्व की सर्वाधिक पूर्ण, परिमार्जित एवं तर्कसंगत भाषा है।
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यह एकमात्र ऐसी भासा है जिसका नाम उसे बोलने वालों के नाम पर आधारित नहीं है। वरन संस्कृत शब्द का अर्थ ही है “ पूर्ण भाषा ”। इस विद्यालय के प्रधानाध्यापक पॉल मौस का कहना है कि संस्कृत अधिकांश यूरोपीय और भारतीय भाषाओँ की जननी है। वे संस्कृत से अत्यधिक प्रभावित है। प्रधानाचार्य ने बताया कि प्रारंभ में संस्कृत को अपने पाठ्यक्रम का अंग बनाने के लिए बड़ी चुनौती झेलनी पड़ी थी।
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प्रधानाचार्य मौस ने अपने दीर्घकाल के अनुभव के आधार पर बताया कि संस्कृत सिखने से अन्य लाभ भी हैं। देवनागरी लिपि लिखने से तथा संस्कृत बोलने से बच्चों की जिह्वा तथा उँगलियों का कडापन समाप्त हो जाता है और उनमें लचीलापन आ जाता है। यूरोपीय भाषाएँ बोलने से और लिखने से जिह्वा एवं उँगलियों के कुछ भाग सक्रिय नहीं होते है। जबकि संस्कृत के प्रयोग से इन अंगों के अधिक भाग सक्रिय होते हैं।
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संस्कृत अपनी विशिष्ट ध्वन्यात्मकता के कारण प्रमस्तिष्कीय (Cerebral) क्षमता में वृद्धि करती है। इससे सिखने की क्षमता, स्मरंशक्ति, निर्णयक्षमता में आश्चर्यजनक अभिवृद्धि होती है। संभवतः यही कारण है कि पहले बच्चों का विद्यारम्भ संस्कार कराया जाता था और उसमें मंत्र लेखन के साथ बच्चे को जप करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता था। संस्कृत से छात्रों की गतिदायक कुशलता (Motor Skills) भी विकसित होती है।
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आज आवश्यकता है संस्कृत के विभिन्न आयामों पर फिर से नवीन ढंग से अनुसन्धान करने की, इसके प्रति जनमानस में जागृति लाने की; क्योंकि संस्कृत हमारी संस्कृति का प्रतीक है। संस्कृति की रक्षा एवं विकास के लिए संस्कृत को महत्त्व प्रदान करना आवश्यक है। इस विरासत को हमें पुनः शिरोधार्य करना होगा तभी इसका विकास एवं उत्थान संभव है।

-विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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वन्दे मातरम्

बुधवार, 27 अप्रैल 2016

ध्यान रहे, चिल्लाना नहीं

☀ ध्यान रहे, चिल्लाना नहीं
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 एक बार एक सन्त अपने शिष्यों के साथ बैठे थे । अचानक उन्होंने सभी शिष्यों से एक सवाल पूछा कि "हम गुस्से में चिल्लाते क्यों हैं ? जब दो लोग एक-दूसरे पर गुस्सा करते हैं तो जोर-जोर से चिल्लाते क्यों हैं ?
 शिष्यों ने कुछ देर सोचा और एक शिष्य ने उत्तर दिया - "गुरु जी, उस समय हम अपनी शान्ति खो चुके होते हैं । इसलिए चिल्लाने लगते हैं ।"
 सन्त ने मुस्कुराते हुए कहा - "दोनों लोग एक-दूसरे के काफी करीब होते हैं तो फिर धीरे-धीरे भी तो बात कर सकते हैं । आखिर वे चिल्लाते क्यों हैं ?"
 कुछ और शिष्यों ने भी जवाब दिया । लेकिन सन्त सन्तुष्ट नहीं हुए और उन्होंने खुद उत्तर देना शुरु किया । सन्त बोले - "जब दो लोग एक-दूसरे से नाराज होते हैं तो उनके दिलों में दूरियाँ बहुत बढ़ जाती हैं । जब दूरियाँ बढ़ जायें तो आवाज को पहुँचाने के लिए उसका तेज होना जरुरी है । दूरियाँ जितनी ज्यादा होंगी, उतनी तेज चिल्लाना पड़ेगा । दिलों की ये दूरियाँ ही दो गुस्साए लोगों को चिल्लाने पर मजबूर कर देती हैं ।"
 सन्त ने आगे कहा - "जब दो लोगों में प्रेम होता है तो वे एक-दूसरे से बड़े आराम से और धीरे-धीरे बातें करते हैं । प्रेम दिलों को करीब लाता है और करीब तक आवाज पहुँचाने के लिए चिल्लाने की जरुरत नहीं होती ।
 जब दो लोगों में प्रेम और भी प्रगाढ़ हो जाता है तो वह फुसफुसा कर भी एक-दूसरे तक अपनी बात पहुँचा लेते हैं । इसके बाद प्रेम की एक अवस्था यह भी आती है कि फुसफुसाने की जरुरत भी नहीं पड़ती । एक-दूसरे की आँख में देखकर ही समझ आ जाता है कि क्या कहा जा रहा है ।"
 शिष्यों की तरफ देखते हुए सन्त बोले - "अब, जब भी कभी बहस करें तो दिलों की दूरियों को न बढ़ने दें । शान्त चित्त और धीमी आवाज में ही बात करें । ध्यान रखें कि कहीं दूरियाँ इतनी न बढ़ जायें कि वापिस आना ही मुश्किल हो जाये ।"

-विश्वजीत सिंह अनन्त
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वन्दे मातरम्

जीवन निर्माण

जीवन निर्माण ☀
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♦ एक थका-माँदा शिल्पकार लम्बी यात्रा के बाद किसी छायादार वृक्ष के नीचे विश्राम के लिये बैठ गया । अचानक उसे अपने सामने एक पत्थर का टुकड़ा पड़ा दिखाई दिया । उस शिल्पकार ने उस सुन्दर पत्थर के टुकड़े को उठा लिया । साथ रखे थैले से छैनी-हथौड़ी निकाली और उसे तराशने की ग़रज़ से जैसे ही पहली चोट की, पत्थर जोर से चिल्ला पड़ा - “अरे, मुझे मत मारो ।”
♦ शिल्पकार ने उस पत्थर को छोड़ दिया और पास ही पड़ा अपनी पसन्द का एक अन्य पत्थर का टुकड़ा उठाया और उसे छैनी-हथौड़ी से तराशने लगा । वह पत्थर का टुकड़ा चुपचाप वार सहता गया और देखते ही देखते उस पत्थर के टुकड़े में से एक सुन्दर भगवान नटराज शिव की प्रतिमा उभर आयी । उस प्रतिमा को वहीं पेड़ के नीचे रखकर वह शिल्पकार अपनी राह पकड़ आगे चला गया ।
♦ कुछ वर्षों बाद वो शिल्पकार फिर उसी रास्ते से गुजरा तो देखा कि उसकी बनाई उस मूर्ती की पूजा-अर्चना हो रही है और जिस पत्थर के टुकड़े को उसने उसके रोने चिल्लाने पर फैंक दिया था, लोग उसके सिर पर नारियल फोड़कर मूर्ती पर चढ़ा रहे हैं ।
♦ यह छोटी-सी कहानी हमें बताती है कि -- "जीवन में कुछ बनने के लिए जो व्यक्ति शुरु में अपने जीवन के शिल्पकार (माता-पिता और गुरुजनों) का सत्कार करते हुए, उनके द्वारा नेक इरादे से दिए गए क्षणिक कष्ट झेल लेता है तो इस तरह जो जीवन निर्मित होता है, बाद में समाज और देश ही नहीं, बल्कि पूरा विश्व युगों तक उसका सत्कार करता है और जो जीवन निर्माण के क्षणिक कष्ट से बचकर भागना चाहते हैं, वे बाद में जीवन भर कष्ट झेलते हैं ।

-विश्वजीत सिंह अनन्त
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वन्दे मातरम्

गौहत्या पर प्रतिबंध के विरूद्ध गांधी - नेहरू परिवार

मोहनदास कर्मचन्द गांधी कहा करते थे कि गौरक्षा करने से मोक्ष मिलता हैं । सन 1921 में गोपाष्टमी के अवसर पर पटौदी हाउस में एक सभा के अन्दर , जिसमें हकीम अजमल खान , डॉ. अन्सारी , लाला लाजपतराय , पं. मदन मोहन मालवीय आदि उपस्थित थे , तभी इन सभी लोगों के समझ एक प्रस्ताव पास कराया गया कि -
" गौहत्या को अंग्रेजी सरकार कानूनी दृष्टि से बन्द करे , नहीँ तो देशव्यापी असहयोग आन्दोलन आरम्भ किया जायेगा । "
इसके बाद कांग्रेस के कार्यक्रमों में ' गौरक्षा ' सम्मेलनों का आयोजन होने लगा । ( आर्गनाइजर 26 फरवरी 1995 द्वारा रमाशंकर अग्निहोत्री )
परन्तु गांधी ने यह पाखण्ड केवल हिन्दुओं को अपना अनुयायी बनाने के लिए किया था ।
15 अगस्त 1947 को भारत के आजाद होने पर देश के कोने - कोने से लाखों पत्र और तार प्रायः सभी जागरूक व्यक्तियों तथा सार्वजनिक संस्थाओं द्वारा भारतीय संविधान परिषद के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के माध्यम से गांधी को भेजे गये जिसमें उन्होंने मांग की थी कि अब देश स्वतन्त्र हो गया हैं अतः गौहत्या को बन्द करा दो । तब गांधी ने कहा कि -
" राजेन्द्र बाबू ने मुझको बताया कि उनके यहाँ करीब 50 हजार पोस्ट कार्ड , 25 - 30 हजार पत्र और कई हजार तार आ गये हैं । हिन्दुस्तान में गौ - हत्या रोकने का कोई कानून बन ही नहीं सकता । इसका मतलब तो जो हिन्दू नहीं हैं , उनके साथ जबरदस्ती करना होगा . . . . . . जो आदमी अपने आप गौकुशी नहीं रोकना चाहते , उनके साथ मैं कैसे जबरदस्ती करूँ कि वह ऐसा करें । इसलिए मैं तो यह कहूँगा कि तार और पत्र भेजने का सिलसिला बन्द होना चाहिये इतना पैसा इन पर फैंक देना मुनासिब नहीं हैं । मैं तो अपनी मार्फत सारे हिन्दुस्तान को यह सुनाना चाहता हूँ कि वे सब तार और पत्र भेजना बन्द कर दें । भारतीय यूनियन कांग्रेस में मुसलमान , ईसाई आदि सभी लोग रहते हैं । अतः मैं तो यही सलाह दूँगा कि विधान - परिषद् पर इसके लिये जोर न डाला जाये । " ( पुस्तक - ' धर्मपालन ' भाग - दो , प्रकाशक - सस्ता साहित्य मंडल , नई दिल्ली , पृष्ठ - 135 )
गौहत्या पर कानूनी प्रतिबन्ध को अनुचित बताते हुए इसी आशय के विचार गांधी ने प्रार्थना सभा में दिये -
" हिन्दुस्तान में गौ-हत्या रोकने का कोई कानून बन ही नहीं सकता । इसका मतलब तो जो हिन्दू नहीं हैं उनके साथ जबरदस्ती करना होगा । " - ' प्रार्थना सभा ' ( 25 जुलाई 1947 )
हिन्दुस्तान ( 26 जुलाई 1947 ) , हरिजन एवं हरिजन सेवक ( 26 जुलाई 1947 )
अपनी 4 नवम्बर 1947 की प्रार्थना सभा में गांधी ने फिर कहा कि -
" भारत कोई हिन्दू धार्मिक राज्य नहीं हैं , इसलिए हिन्दुओं के धर्म को दूसरों पर जबरदस्ती नहीं थोपा जा सकता । मैं गौ सेवा में पूरा विश्वास रखता हूँ , परन्तु उसे कानून द्वारा बन्द नहीं किया जा सकता । "
( दिल्ली डायरी , पृष्ठ 134 से 140 तक )
इससे स्पष्ट हैं कि गांधी की गौरक्षा के प्रति कोई आस्था नहीं थी । वह केवल हिन्दुओं की भावनाओं का शौषण करने के लिए बनावटी तौर पर ही गौरक्षा की बात किया करते थे , इसलिए उपयुक्त समय आने पर देश की सनातन आस्थाओं के साथ विश्वासघात कर गये ।
7 नवम्बर 1966 को गोपाष्टमी के दिन गौरक्षा से सम्बन्धित संस्थाओं ने संयुक्त रूप से संसद भवन के सामने एक विशाल प्रदर्शन का आयोजन किया जिसमें तत्कालीन सरकार से गौहत्या बन्दी का कानून बनाने की मांग की गई । इस प्रदर्शन में भारत के प्रत्येक राज्य से करीब 10 - 12 लाख गौभक्त नर - नारी , साधु - संत और छोटे - छोटे बालक - बालिकाएं भी गौमाता की हत्या बन्द कराने इस धर्मयुद्ध में आये थे ।
उस समय इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री पद पर थी और गुलजारिलाल नन्दा गृहमंत्री थे । श्री नन्दा जी ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को परामर्श दिया कि इतनी बडी संख्या में देशभर के सर्व विचारों के जनता की मांग गौहत्या बन्दी का कानून स्वीकार करें । तब इंदिरा गांधी ने कठोरता से कहा " गौहत्या बन्दी का कानून बनाने से मुसलमान और ईसाई समाज कांग्रेस से नाराज हो जायेंगे । गौहत्या बन्दी का कानून नहीं बन सकता । " इंदिरा के न मानने पर गुलजारिलाल नन्दा ने अपने गृहमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया और गौभक्त भारतीयों के इतिहास में अमर हो गये ।
उधर इंदिरा गांधी ने प्रदर्शन खत्म कराने के लिए निहत्थे अहिंसक गौभक्तों प्रदर्शनकारियों पर गोली चलवा दी जिसमें अनेकों साधुओं व गौभक्तों की हत्याएँ हुई । इंदिरा गांधी ने यह नृशंश हत्याकाण्ड गौपाष्टमी के पर्व पर कराया था अतः विधि का विधान देखिये कि - इंदिरा गांधी की हत्या भी गौपाष्टमी को हुई थी , संजय गांधी की दुर्घटना में मृत्यु भी अष्टमी को हुई , राजीव गांधी की हत्या भी अष्टमी को हुई , गौहत्या के महापाप से गांधी - नेहरू परिवार का नाश हो गया ।
स्वतन्त्रता प्राप्ति के इतने दिन बाद भी राष्ट्रीय स्तर पर गौहत्या बन्दी का कानून न बन पाना भारतीयों के लिए बडे ही दुःख और अपमान की बात हैं । हे परमात्मा , नेहरू के वंशजों और गांधी के अनुयायी इन राजनेताओं को सद्बुद्धि दो । भारत की प्राणाधार गौमाता की हत्या बन्दी का कानून सम्प्रदायवाद की भावना से उठकर शीघ्र बने यहीं प्रार्थना हैं ।
-विश्वजीत सिंह अनन्त
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वन्दे मातरम्

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

वेदों में है गौ हत्यारों के लिए मृत्युदंड का विधान

बहुत से लोग पूछते हैं कि वेद में गौहत्या करने वाले के लिए क्या आदेश है? इसलिए हमने वेदों को खंगाला की वेद में गौहत्या करने
वाले के लिए क्या आदेश है? गौहत्यारे के लिए मृत्युदण्ड का विधान वेदों में है हमें इसके कई प्रमाण मिले| समस्त वेद गौमाता की
महिमा गाते हैं, और कुछ गौमांस खाने वाले और कम्युनिस्ट वेदों में गौमांस खाने की बात कहते हैं, ऐसे धूर्तों ने वेद का एक भी मन्त्र नहीं पढ़ा ….
वेद सनातन धर्म का आधार हैं, देखिये वेद गौहत्या पर क्या कह रहे
हैं, ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिए :-
यः पौरुषेयेण क्रविषा समङ्क्ते यो अश्व्येन पशुना यातुधानः|
यो अघ्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च||
~अथर्ववेद 8.3.15/ ऋग्वेद 10.87.16
अर्थात जो मनुष्य, घोड़े या अन्य पशुओं जैसे गाय के मांस को खाता है तथा दूध देने वाली कभी न मारने योग्य अघ्न्या गायों के दूध को हर लेता है और प्राणियों को उसके दूध से वंचित करता है, राजा तलवार के तेज प्रहार से उनके सरों को काट दे|
यदि नो गां हंसि यद्यश्वं यदि पुरुषम्|
त्वं त्वा सीसेन विध्यामो यथा नो असो अवीरहा||
~अथर्ववेद 1.16.4
हे शत्रु! जो तू हमारी गाय को मारेगा, घोड़े को मारेगा और मनुष्य को मारेगा तो हम तुझे सीसे की गोलियों से ही बेध देंगे ताकि तू हमारे वीरों को न मार पाए|
अक्षराजाय कितवं कृतायादिनवदर्शं त्रेतायै कल्पिनं
द्वापरायाधिकल्पिनमास्कन्दाय स्भास्थाणुम् मृत्यवे गोव्यच्छमन्तकाय गोघातं
क्षुधे यो गां विकृन्तन्तं भिक्षमाणउप तिष्ठति दुष्कृताय चरकाचार्यं पाप्मने सैलगम||
~यजुर्वेद 30.18
पासों से खेलने वाले जुआरियों के बीच राजा चतुर पुरुष को नियुक्त करे| राष्ट्र के रसों (करों) को कार्य व्यवस्था के लिए लेने के लिए मुख्य
पदाधिकारी को नियुक्त करे | गौ आदि कल्याणकारी पशुओं पर कष्टदायी चेष्टा करने वाले को मृत्युदंड दे दो| गौ को मारने वाले पुरुष को अंत कर देने वाले जल्लाद के हाथ सौंप दो| जो अन्न की भीख मांगता हुआ प्रजाजन उपस्थित हो तो उसकी भूख की निवृत्ति के लिए कृषक को नियुक्त करो| भोज्य पदार्थों के उपर आचार्य को नियुक्त करो जो पुष्टिकारक भोजन का उपदेश करे और बुरे भोजन की हानियाँ बताता रहे, इससे लोग बुरे आचार-व्यवहार को छोडकर उत्तम आहार-विहार करना सीख जाएँगे| पाप कार्य को रोकने के लिए दुष्ट पुरुषों के संतानों, शिष्यों तथा साथियों को भी दण्डित करो|
देखिये सिद्ध हुआ की वेद में गौहत्यारे के लिए मृत्युदंड का प्रावधान है……
यह महत्वपूर्ण जानकारी ज्यादा से ज्यादा शेयर करें…..
पंडित, पुजारी बनने के ब्राह्मण होना जरूरी है: पंडित और पुजारी तो ब्राह्मण ही बनेगा, लेकिन उसका जन्मगत ब्राह्मण होना जरूरी नहीं है। यहां ब्राह्मण से मतलब श्रेष्ठ व्यक्ति से है न कि जातिगत व्यक्ति से। आज भी मनु की व्यवस्था अनुसार सेना में धर्मगुरु पद के लिए जातिगत रूप से ब्राह्मण होना जरूरी नहीं है बल्कि योग्य होना आवश्यक है। ऋषि दयानंद की संस्था आर्यसमाज में हजारों विद्वान हैं जो जन्म से ब्राह्मण नहीं हैं। इनमें सैकड़ों पूरोहित जन्म से दलित वर्ग से आते हैं।
शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम।
क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च।
(10/65) महर्षि मनु कहते हैं कि कर्म के अनुसार ब्राह्मण शूद्रता को प्राप्त हो जाता है और शूद्र ब्राह्मणत्व को। इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य से उत्पन्न संतान भी अन्य वर्णों को प्राप्त हो जाया करती हैं। विद्या और योग्यता के अनुसार सभी वर्णों की संतानें अन्य वर्ण में जा सकती हैं, आज भी संसार के सभी लोकतांत्रिक देश मनु के इसी आदेश का पालन कर रहे है। 

-विश्वजीत सिंह अनन्त
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सर्वदेवमयी कल्याणकारी है गौ माता

1.जो व्यक्ति प्रतिदिन प्रातः उठकर गौमाताजी को सर्वदेवमयी मानकर श्रद्धा से प्रणाम करे।
2.प्रतिदिन गौमूत्र में श्री गंगा जी की उपस्थिति जानकर प्रातः गौमूत्र का पान करें।
3.दूध देती गोमाताजी के दो थन का दूध गोवत्स को पिलाकर शेष दो थन का दूध ही दुहे।
4.प्रतिदिन भोजन से पूर्व उत्तम् रोटी पात्र में रखकर घी गुड़ से युक्त कर श्रद्धा से गोमाताजी को जिमावें।
5.गोमाताजी को सदा स्वच्छ जल पिलावें। भैंस इत्यादि पशुओं का झूठा जल या बासी जल नहीं पिलावें।
6.उत्तम चारे और दाने से गोमाताजी को तृप्त करें।
7.प्रतिदिन गोमाताजी को सहलावें और उनसे वार्तालाप करें।
8.गौ माताजी को जंगल में या गोचर क्षेत्र में साथ जाकर चरावें ।उन्हें अकेला चरने को नहीं भेजें ।
9.गौ माताजी के वृद्ध होने पर भी उनकी पूर्व की भांति ही उत्तम सेवा करें । वृद्ध गोमाताजी को घर से निकालें नहीं या गोमाताजी को बेचें नहीं ।
10.गोमाताजी से प्राप्त दूध,दही एवम् घी का उपयोग करें, भैंस का नहीं ।
जय गोमाता
जय गोपाल
-विश्वजीत सिंह अनन्त
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वन्दे मातरम्

ईसाई, बौद्ध और इस्लामिक देशों का धर्म परिवर्तन द्वारा इस देश पर कब्जा करने का षड़यन्त्र

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दोस्तों आपको यह जानकर हैरानी होगा कि ईसाई, बौद्ध और इस्लामिक देश अपनी संस्थाओं के माध्यम से कितना धन भारत में भेज रहे है केवल इसलिए कि इस देश में अनेकों जाति और धर्मो में बटे लोगों का धर्म परिवर्तन कराकर इस देश पर कब्जा किया जाय ।
यहाँ के भोले भाले लोग अब भी इस षड्यंत्र को समझ नही पा रहे है कि उनको शर्बत में मिलाकर स्लो प्वाईजन दिया जा रहा है।
इस्लाम में कोई फिलासफी या आकर्षण तो है नहीं तो वह छल बल के द्वारा लोगो को भडका कर मार काट कर धौस के बल पर लोगो को मुसलमान बनाना चाहते है और इसमें सफल नहीं होने पा रहे है तो शरियत का हवाला देकर अधिक बच्चे पैदाकर अपनी आबादी बढाने में लगे है बंगलादेश से घुसपैठ कराने में और कालनेमिवादी धर्मनिरपेक्ष नेताओं को रिश्वत देकर अपनी योजना में सफल हो रहे है ।
अब मै आपको सबसे बडे षड्यंत्र की बात बताने जा रहा हूँ
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इसाई मिसनीरिज धन का और सेक्स का लोभ देकर किस कदर लोगो के धर्म परिवर्तन में लगी है आप खुद ही नमूना देखिए ।
राष्ट्र उत्थान समिति के कुछ कार्यकर्ताओं ने इसका भंडाफोड करने के लिए चर्च और मिशनरीज के कुछ पादरीयों व ननो से सम्पर्क किया उनके बातों का प्रमाण मैं नीचे दे रहा हूॅ आप खुद देखिए ।
सबसे ज्यादा पैसा करीब पाँच लाख मिलेगा अगर एक पन्डित को इसाई बना देते है उसके अलावा अगर उनके एजेन्ट बन जाते है तो 20000 रू0 महीना खाना पीना रहना सब मुफ्त और सेक्स करने के लिए जिस भी नन को चाहे तैयार है इसके अलावा यदि किसी अनुसूचित जाति के परिवार को इसाई बनाते है तो उसे एक लाख मिलेगा और चर्च परिसर मे घर बनाने की जगह तथा कमीशन के तौर पर प्रति परिवार बीस हजार आपको मिलेगा ।
अब इस षड्यंत्र में कानूनी दाव पेच से बचने का पूरा प्रबन्ध है पहले जो नवयुवक इसमें शामिल होगा उसको सबसे पहले गाय और सूवर का पका हुआ माँस खाना पडेगा और धार्मिक किताबो यानी गीता, रामायण, वेद पर पेशाब करके पादरी या पास्टर के सामने जलाना पडेगा । फिर वह पादरी वकील के द्वारा तैयार किया हुआ स्टाम्प पेपर पर 10% ब्याज पर पाँच लाख रूपया उधार देगा ।
यह कागज यदि आप ईसाई धर्म छोडकर मन्दिर जाना शुरू कर दें तब काम आएगा और वह पादरी मय ब्याज के कोर्ट के द्वारा वसूल कर लेगा अगर सब ठीक रहता है आप ईसाई धर्म का काम करते रहते हैं तो उस स्टाम्प पेपर का कोई मतलब नही है । इसके लिए विदेशो से करीब 20 हजार करोड रूपया NGOS के द्वारा प्रतिवर्ष भारत आता है।
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राष्ट्र वंदनीय सम्राट चन्द्रगुप्त का पौत्र चंड अशोक जो बड़ा ही क्रुर था, उसने अपनी क्रुर छवि बदलकर उदार छवि प्रचारित करने के लिए बौद्ध धर्म अपनाया, साथ ही शक्ति के बल पर अपनी प्रजा को भी बौद्ध बनने के लिए विवश किया, उसने मौर्य वंश के यश को अपयश में बदल दिया, उसने अपने शासन काल के दौरान सनातन धर्म के शास्त्रों को विकृत कराया, नकली शास्त्रों की रचना करवाई, आज बौद्ध व नास्तिक लोग उन्हीं शास्त्रों को आधार बनाकर सनातन हिन्दुओं को जातिवाद में बाटकर सनातन धर्म को नष्ट करने का भयानक षड़यन्त्र रच रहे है, हिन्दुओं को रंग के आधार पर बांटा जा रहा है, गोरे रंग वालों को विदेशी व सावले रंग वालों को मूलनिवासी प्रचारित जा रहा है, जबकि राक्षस संस्कृति के प्रसारक बौद्ध नेता भीमराव अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक में स्वीकार किया है कि शुद्र भी आर्य ही थे, लेकिन फिर भी विद्वेष की भावना के वशीभूत होकर उसने अंग्रेजों के साथ मिलकर इस देश के राष्ट्रपुरूषों को अत्याचारी सिद्ध कर राष्ट्र की अस्मिता से खिलवाड़ करने का पूर्ण प्रयास किया, जातिवाद समाप्त करने के स्थान पर संविधानिक रूप से हिन्दुओं को जातिवाद में बाट दिया, भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृृष्ण व माँ दुर्गा आदि को अपमानित करके राक्षस संस्कृति को बढ़ावा दिया, आज भी अम्बेडकर के अनुयायी नवबौद्ध उसके पथ पर चल रहे है, विदेशी धन के बल पर गरीब हिन्दुओं के मनों में अन्य हिन्दुओं के प्रति घृणा के भाव उत्पन्न कर उन्हें बौद्ध बनाया जा रहा है |
मनु ने तो कर्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था बनायी थी, जो कर्म के अनुसार बदल जाती थी, लेकिन अम्बेडकर ने तो अंग्रेजों का सहयोग लेकर जन्म के आधार पर जाती व्यवस्था बना दी, जो कर्म के बदल जाने पर भी नहीं बदलती, इसी अम्बेडकर की जन्मना जाती व्यवस्था को मानने वाले राक्षस मूलनिवासी के नाम पर राष्ट्रीय एकता को तोड़ रहे है,
और इन सब कार्यो में उनकी सहायता कर रहे है भारत के गद्दार धर्मनिरपेक्ष व गांधीवादी नेता तथा बिकाऊ मिडिया वाले, जिसके मालिक विदेशों मे बैठकर सौदा कर रहे है और अपने लोगो से यह काम करा रहे हैं
अब तो आपके समझ में आ गया होगा कि यह धर्मनिरपेक्ष नेता व बिकाऊ मीडिया वाले क्या कर रहे है और क्यों कर रहे है।
आप लोगो को गुस्सा आता है इन नेताओं ने हिन्दू विरोधी निर्णय क्यों लिया, अथवा पंथनिरपेक्ष देश भारत में ईसाई, बौद्ध व मुस्लिम आदि गैर हिन्दुओं को सरकारी धन क्यों दिया जा रहा है, क्यों हिन्दुओं द्वारा दिये जाने वाले टैक्स से बौद्ध स्मारक बनवाये जा रहे है, क्यों हज सब्सिडी दी जा रही है ? मीडिया राष्ट्रवादी समाचार क्यों नहीं दिखाता ? मित्रों यह सब तो इनके इनके सुनियोजित सनातन धर्म विरोधी एजेन्डे का एक पार्ट है।
मेरी यह हाथ जोड़कर प्रार्थना है,कृपया इसे समय देकर पढते रहें और शेयर अवश्य करें।
जय श्रीराम
भारत माता की जय
भारत स्वाभिमान दल
हर हाथ में भगवा हो...
जय हिन्दू राष्ट्र ।।

-विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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वन्दे मातरम्

सत्य सनातन धर्म (हिन्दू धर्म) के बारे में पाश्चात्य विचारकों के मत

1. लियो टॉल्स्टॉय (1828 -1910):
“हिन्दू और हिन्दुत्व ही एक दिन पूरी दुनिया पर राज करेगा क्योंकि इसी में ज्ञान और बुद्धि का संयोजन है”।
2. हर्बर्ट वेल्स (1846 – 1946):
” हिन्दुत्व का प्रभावीकरण फिर होने तक अनगिणत पीढ़ियां अत्याचार सहेंगी । तभी एक दिन पूरी दुनिया इसकी ओर आकर्षित हो जाएगी और उसी दिन ही दिल शाद होंगे और उसी दिन दुनिया आबाद होगी सलाम हो उस दिन को ” ।
3. अल्बर्ट आइंस्टीन (1879 – 1955):
“मैं समझता हूँ कि हिंदुओं ने अपनी बुद्धि और जागरूकता के माध्यम से वह किया है जो यहूदी न कर सकें, हिन्दुत्व में ही वह शक्ति है जिससे शांति स्थापित हो सकती है”।
4. हसटन स्मिथ (1919):
“जो विश्वास हम पर है और हम से बेहतर कुछ भी दुनिया में है तो वो हिन्दुत्व है । अगर हम अपना दिल और दिमाग इसके लिए खोलें तो उसमें हमारी ही भलाई होगी”।
5. माइकल नोस्टरीडाम (1503 – 1566):
” हिन्दुत्व ही यूरोप में शासक धर्म बन जाएगा बल्कि यूरोप का प्रसिद्ध शहर हिन्दू राजधानी बन जाएगा”।
6. बर्टरांड रोसल (1872 – 1970):
“मैंने हिन्दुत्व को पढ़ा और जान लिया कि यह सारी दुनिया और सारी मानवता का धर्म बनने के लिए है, हिन्दुत्व पूरे यूरोप में फैल जाएगा और यूरोप में हिन्दुत्व के बड़े विचारक सामने आएंगे । एक दिन ऐसा आएगा कि हिन्दू ही दुनिया की वास्तविक उत्तेजना होगा “।
7. गोस्टा लोबोन (1841 – 1931):
” हिन्दू ही सुलह और सुधार की बात करता है । सुधार ही के विश्वास की सराहना में ईसाइयों को आमंत्रित करता हूँ”।
8.बरनार्डशा (1856 – 1950):
“सारी दुनिया एक दिन हिन्दू धर्म स्वीकार कर लेगी, अगर यह वास्तविक नाम स्वीकार नहीं भी कर सकी तो रूपक नाम से ही स्वीकार कर लेगी।
पश्चिम एक दिन हिन्दुत्व स्वीकार कर लेगा और हिन्दू ही दुनिया में पढ़े लिखे लोगों का धर्म होगा “।
9. जोहान गीथ (1749 – 1832):
“हम सभी को अभी या बाद में हिन्दू धर्म स्वीकार करना ही होगा । यही असली धर्म है, मुझे कोई हिन्दू कहे तो मुझे बुरा नहीं लगेगा ।
मैं इस सही बात को स्वीकार करती हूँ ।
वाह!!! कितनी ऊँची समझ के धनी है ये विचारक!!!
अगर यही बात धर्मांतरण करने वाली ईसाई, बौद्ध व मुस्लिम मिशनरियाँ भी समझ ले तो देश में सुख-शांति अमन-चमन का वातारण बन जाये।
हिन्दू धर्म की स्थापना किसी व्यक्ति, देवता या महापुरुष की देन नहीं है। बल्कि सभी इसी धर्म में अवतरित हुए है।
ईसाई, बौद्ध व मुस्लिम धर्म कब से शुरू हुआ और किसने शुरू किया हम बता सकते है लेकिन सनातन हिन्दू धर्म कब से और किसके द्वारा शुरू हुआ ये कोई नही बता सकता।
हिन्दू धर्म पुरातन नही सनातन है। भगवान ने भी जितने अवतार लिए वो हिन्दू धर्म में ही लिए ।
हमारा सौभाग्य है क़ि ऐसी महान संस्कृति में हमारा जन्म हुआ।
आओ अपने महान सनातन धर्म…अपनी महान संस्कृति पर गर्व करें जिसने हर व्यक्ति हर प्राणी को अपनाना सिखाकर आपसी भाईचारे व सदाचार का पाठ पढ़ाया।

-विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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वन्दे मातरम्

एक संस्कारी माँ की महान संस्कारी सन्तान

ये है पूर्व राष्ट्रपति ए. पी. जी. अब्दुल कलाम की माता जी और बगल में बैठे है अपने महामहिम जी । कलाम साहब की माता जी माथे पर बिंदी लगाती थी और हिन्दू वेशभूषा में रहती थी। वे हिन्दुस्थानी रीति रिवाजों का पूरा ख्याल रखती थी और कलाम को रामायण महाभारत की कहानियाँ सुनाया करती थी। एक संस्कारी माँ की महान संस्कारी सन्तान.......

-विश्वजीत सिंह अनन्त
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वन्दे मातरम्

मैं मुसलमान जन्मा नहीं था मुझे बनाया गया था

पंडित महेंद्र पाल आर्य जी का जवाब एक मुस्लिम को।
सभी भाई पूरा पढ़े और शेयर करें ।
|| मैं मुसलमान जन्मा नहीं था मुझे बनाया गया था ||
कल मझे कई लोगों ने फोन पर पूछा, आप पहले मुसलमान थे ? फिर हिन्दू किसलिए बने, क्या कारण व मज़बूरी रही आप के साथ, जिस के चलते आप को हिन्दू बनना पड़ा ? यह बात आज पहली बार नहीं है, आज 32 वर्षों में ना मालूम मुझे इस प्रकार की बातें हजारों बार सुनने को मिली है |
इन्ही लोगों के धमकियां भी मझे निरन्तर मिलती रहती हैं, आप लोगों को भी मैं फेसबुक पर सूचना दे चूका हूँ | और कुछ लोग तो मझे इस्लाम में वापस आने के लिए भी दबाव डाला | ईसाइयों लोगों के रवैये को तो आप लोगों नें भली प्रकार पढ़ी होगी, मुझे क्या क्या लिखा गया फोन पर बोला गया आदि |
इन सभी लोगों को जवाब मैंने क्या दिया है वह भी आप लोगों ने बीच बीच में देखा होगा, पर कल का जो मेरा उत्तर उन लोगों के लिए था उसे मैं आज आप लोगों को बताना चाहता हूँ |
मुझे पूछा की आप पहले मुस्लमान थे, तो आप इस्लाम छोड़ कर हिन्दू किस लिए बने ? मैंने इसी बात को पलट कर उसी मियां जी से पूछा, आप कौन हैं जवाब मिला मैं मुसलमान हूँ | फिर मैंने पूछा कब से जवाब मिला जन्म से | मैंने कहा यही गलती आप इस्लाम वालों की है, और आप को जानकारी नही है इस्लाम के बारे में ? उसने कहा कैसे, मैंने कहा जन्म से कोई मुसलमान नही होता, और ना कोई ईसाई, जैनी, या फिर बौधिष्ट |
मैंने फिर पूछा की अगर आप जन्मसे मुस्लमान हैं, तो आप के जन्म लेते ही आप के कान में आजान व तकबीर किस लिए सुनाया गया था ? कहा क्या मतलब, मैंने कहा यही मतलब की आप के जन्म लेते ही आप को महज़ सुनाया गया की आप एक मुस्लमान परिवार में आये ? ना की मुस्लमान आये, इस का मूल कारण यही है की भेजने वाले ने आप को मुस्लमान बनाकर नही भेजा ? और ना किसी को ईसाई बनाकर भेजा ? उस भेजने वाले ने धरती पर हर इन्सान कहलाने वालों को एक ही प्रकासर से भेजा है |  हर कोई धरती पर आने वाला जिसे हम मानव कहते हैं, वह सब एक ही प्रकार से धरती पर आये, इसमें कोई मुस्लमान नही आया, और ना कोई ईसाई, या जैनी, बौधी | बड़ी बात इसमें और भी है, यह आने वालों में ना तो कोई आलिम आया, ना कोई पादरी, ना कोई पण्डित आया ना कोई क्षत्री, ना कोई वैश्य | हर आने वाला शुद्र आया, समान प्रस्वत्मिका सह जाति | अर्थात प्रसव करने का तरीका जिनका एक है वह सभी एक ही जाति के हैं |
अब इन्ही आने वालों को इसी दुनिया में बनाये जाते हैं, कोई मुसलमान बना रहे हैं, कोई ईसाई, कोई जैनी और बौधिष्ट, जन्म से कोई आलिम {मौलवी} जानकर नही बनते यह एक पढाई है, उसके पूरा करने पर कोई हाफिज, कोई कारी, कोई मौलवी, कोई मुफ़्ती, कोई काजी यह सब पढाई है कोर्स है इसके करने पर सनद मिलती है | इसमें भी कुछ लोग हैं जो अपने पिता या वालिद के डिगरी को लिए फिर रहे हैं | प्रमाण के तौर पर, मुफ़्ती महबूबा, जी अभी कश्मीर की मुख्यमंत्री हैं, उनके पिता भी इस काम को किया, मुफ़्ती किसी के जाति गत टाइटेल नहीं है यह एक सनद है इस्लामिक कोर्स है जिसे हम शरीयती कानून का जानने वाला, जिसे फिका कहा जाता है | जो शरीयती कानून के पढाई हैं उसके सनद याफ्ता का नाम मुफ़्ती है | अब इन्होंने बिना सनद लिए ही अपने कोमुफ़्ती कहलाये यह गलत है |
जरुर आप लोगों को पता होगा पिछले दिन राजस्थान में कुछ मुस्लिम महिलाओं ने काजी बनने पर इस्लाम के जानकार आलिमों ने उसका विरोध किया था दूरदर्शन में देख कर उस पर मैंने अपना विचार अप लोगों तक पहुंचाया था | जिन आलिमों ने उन महिलाओं के काजी बनने का विरोध किया, वह आलिम गण इस पर मौन किस लिए हैं, की महबूबा अपने नाम से मुफ़्ती किसलिए लिखती, और बताती है ? जब कोई महिला काजी नहीं बन सकती तो महबूबा महिला है अपने को मुफ़्ती कहने, लिखने बताने का विरोध इस्लाम के आलिमों ने क्यों नहीं किया ?
हमारे यहाँ भी कुछ लोग हैं जो शास्त्री के कोर्स किये बिना ही अपने पिता के डिगरी को ढो रहे हैं, जैसे लालबहादुर शास्त्री जी के पुत्र गण, लक्ष्मण कुमार शास्त्री जी के पुत्र गण और भी अनेक नाम हैं जिन्हें मैं जनता हूँ आदि |
जैसा मुसलमान का लड़का कोई मुसलमान नहीं बनते, मुस्लमान दुनिया में आने के बाद ही बनाया जाता है | ईसाई भी दुनिया में बनाये गये, हाफिज, कारी, मौलवी, मुफ़्ती, पादरी यह सब दुनिया में आने के बाद ही बनते और बनाये जाते हैं|  यहाँ भी यही बात है जन्म से कोई पण्डित नही बनते, ना कोई यादव बनते ना कोई पाठक ना कोई बनर्जी, ना कोई जाति बनते हैं | धरती पर आते हैं सभी कोरा, अनजान, जिसे शुद्र कहा जाता है |
मैंने उन मुझसे पूछने वाले से कहा आप कब मुसलमान बने ? जवाब मिला, आपने जो हवाला दिया वह सभी सत्य हैं मुझे भी जन्म लेने के बाद ही मुसलमान बनाया गया | मेरे जन्म लेते जो किया वह तो मैं नहीं देखा, पर मेरे होश सँभालते मेरे नाम रखे गये, जो नाम भारतीय लोगों जैसा नहीं है | वह नाम अरब देश वालों जैसा है | मेरी खतना कराई गयी, बहुत कष्ट हुवा मैं चीखता, पुकारता रहा, मुझे देख कर मेरी माँ भी रोती रही और भी कई लोग रोते रहे | जब मैं बोलने लगा मुझे घर पर ही इस्लाम के बारे में जानकारी कराई गयी | इस्लाम की बुनियाद सिखाया गया, इस्लाम ही एक मात्र सच्चा दीन{मजहब } है यह बताया गया सिखाया गया आदि |
मैंने पूछा की आप जब धरती पर आये, तो क्या आये, यह जितने भी हैं सब आने के बाद बने या बनाये गये है ? कहा जी हाँ मैंने फिर कहा, मेरे भाई आप ने तो मुझसे कहा मैं मुसलमान से हिन्दू बना, पर यह जानकारी आप को नहीं है की हम सब जब धरती पर आये, उस समय तो हम मुसलमान थे ही नहीं, फिर हम मुसलमान से हिन्दू कैसे बने ? बल्कि हमें अनजान में धोखे से मुसलमान बनाया गया, उस समय हम नादान थे, अनभिज्ञ थे, बच्चे थे, होश भी नहीं थी, हमारे उन बेहोशी का फायदा इन सभी मतवादियों ने उठाया जो बिलकुल मानवता पर कुठाराघात है |
आज धरती पर इन सत्य को लोग जानना नहीं चाहते की विधाता ने जब हमें धरती पर भेजा अथवा हम जब इस धरती पर आये उस समय हम क्या थे ? यह जानकारी अगर किसी ने लेनी चाही और उसे जान कर ही किसी ने उसे अपनाया फिर आप लोगों को यह दुःख और तकलीफ किस लिए है ? कि किसी मुस्लमान ने इस्लाम को छोड़कर हिन्दू बन गया ?
क्या यह ना समझी और दुराग्रह नहीं है अथवा यह दुषप्रचार नहीं है जो मेरे साथ आप लोग कर रहे हैं कोई तो मुझे गाली दे रहा है, कोई मुझे जान से मारने की धमकियाँ दे रहा हैं, कोई मुझे इस्लाम में वापस जाने की बातें कर रहा हैं | कोई मुझे धन धान्य, और अप्सरा तक देने को आतुर हैं आदि, आज मैं उन्हीं लोगों से यही कह रहा हूँ की हम धरती पर आते समय मात्र हाथ, पॉव, धड़ सर यही शारीर ले कर आये थे उसी अवस्था का फायदा हमारे घरवालों ने उठाया की मैं उस वक्त विरोध भी नहीं कर सका, और विरोध किसी के लिए करना संभव भी नही होता उसी मज़बूरी का फायदा इन सभी मत पन्थ वालों ने लेकर हमें मानव बनाने के बजाय, किसी ने मुसलमान बनाया, किसी ने ईसाई बनाया, किसी ने जैनी बनाया, किसी ने बौधिष्ट बनाया, किसी ने सिख बनाया, और किसी ने वहाई, पर वेद का उपदेश है कि मानव बनो मनुर्भव |
यही कारण बना, मैं इस्लाम को छोड़ सिर्फ और सिर्फ मानव बना हूँ इसपर किसी को क्या आपत्ति हैं ? आप लोगों से भी मेरी प्रार्थना यही है, इन मुस्लिम, ईसाई की चंगुल से निकलें और मानव बनने और बनाने का काम करें, इस में अपने जीवन को अच्छा बना सकते हैं, इन दुकानदारों के चंगुल से छुट सकते हैं जैसा की मैंने इन मुसलमान कहलाने वाले दुकानदारों से खुद को मुक्ति दिलाई है |
जन्म ,से कोई मुस्लिम नहीं, कोई पण्डित नहीं, कोई ईसाई नही, कोई जाति नहीं, किन्तु सब एक ही प्रकार से दुनिया में आए हैं | और सब को एक ही मानव बनकर दुनिया से जाना चाहिए, जिसे हमें देख कर मानव और कोई भी बन सकें जो परम दायित्व हैं आज की दुनिया में | परमात्मा ने धरती, जल, आकाश,वायु चाँद, सूरज मिट्टी किसी भी मुसलमान, और ईसाइयों के लिए नहीं बनाये वह सबको समान रूप से वरतने को दिया है, किसी के साथ भेद नहीं किया, तो हम दुनियामें मुसलमान, ईसाई बन कर एक दुसरे को डराते धमकाते किस लिए ?
परमात्मा की दी हुई सामान अथवा बनाई सामान अगर किसी को कुछ और किसी को कुछ देते उसपर पक्षपात का दोष लगता, तो हमें भी बिना पक्षपाती बनकर धरती से मानव बनकर एक मिसाल कायम करके जाना चाहिए जो आने वाले भी देख कर  उसी का अनुसरण करें |
सवाल करने वाले ने मुझे बहुत धन्यवाद दिया और मेरी तारीफ की, जो आज़ मैं आप लोगों तक इन बातों को सुनाना उचित समझ कर लिखा हूँ |
धन्यवाद
महेन्द्रपाल आर्य वैदिक प्रवक्ता

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सोमवार, 25 अप्रैल 2016

प्रसिद्ध मलयाली गायक श्री येशुदास जी ने सनातन धर्म अपनाया

केरल के प्रसिद्ध मलयाली गायक श्री येशुदास जी ने सनातन धर्म अपना लिया है
येशुदास जी पहले ईसाई थे तथा ताउम्र ईसाई रहे
परंतु इतिहास जानने के बाद इनके अंतरात्मा ने इनको झंकझोरा जिसके बाद इन्होंने अपने मूल धर्म यानि सनातन धर्म में घर वापसी की
आपको बता दें की भारत में जितने भी ईसाई या मुसलमान है उनके पूर्वजो को अंग्रेजों और बाहरी मुस्लिम हमलावरों ने सनातन धर्म से लोभ लालच/अत्याचार कर डिगा दिया था
पर जो लोग इतिहास जान लेते है और उनकी अंतरात्मा जागती है वो वापस अपने मूल धर्म में लौट जाते है।
श्री येशुदास जी का सनातन धर्म में स्वागत है |
-विश्वजीत सिंह अनन्त
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अति उदारता अति घातक

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने कहा था - ' समृद्धि की अधिकता किसी भी सभ्यता के पतन का कारण बनती है । ' इसी बात को टायनबी ने कुछ इस प्रकार कहा है - ' सभ्यता जब अति सभ्य हो जाती है , तब कोई न कोई बर्बरता आकर उसे निगल जाती है । ' और अरब साम्राज्यवादी जेहादी विचारधारा के इसी अडियलपन , अनुदारता और असहिष्णुता की भावनाओं को देखते हुए जार्ज बर्नाड शा ने लिखा था - It is too bad to be too good . ( बहुत बुरा होता है बहुत भला भी होना । ) प्रख्यात साहित्यकार गुरूदत्त अक्सर कहा करते थे - ' हिन्दू समाज के पतन के दो कारण मुख्य है । एक तो ' भाग्यवाद ' और दूसरा ' वसुधैव कुटुम्बकम् ' की भावना ।
इतिहास साक्षी है कि विश्व विजेता रहे भारत का पराधीन होने का एक मूल कारण अति उदारता है जो अहिंसा के सच्चे अर्थ को न जानने के कारण उपजी । पिछले 2500 वर्षो से अत्याधिक उदारता ही हमारे राष्ट्र नायकों की विजयों को पराजयों में परिणत करती रही है । पृथ्वीराज चौहान की आँखें न जाती , भारत परतंत्र न होता , यदि उसने तरावडी के मैदान के पहले युद्ध में मोहम्मद गोरी को क्षमा करने के स्थान पर उसका सिर उडा दिया होता , और अरब साम्राज्यवादी मुस्लिम आक्रांताओं के समान ही उस सिर को भाले पर रख वह अपनी सेनाओं को गजनी तक ले गया होता ।
इतिहास इस बात को चीख - चीख कर कह रहा है कि तथाकथित अहिंसावादियों की कायरता अथवा उदारता के कारण ही साम्प्रदायिक आधार पर भारत का विभाजन होकर पाकिस्तान बना , और यही पाकिस्तान भारत के नपुंसक नेताओं की उदारता के कारण आज भी भारत का सबसे बडा सिर दर्द बना है । पाकिस्तान के विषैले दन्त आज हमें इस प्रकार न डस रहे होते यदि हमने ताशकन्द में उन टूटे दान्तों को फिर से उसी के मुँह में न लगा दिया होता , और फिर दोबारा शिमला में उस पराजित , हतगौरव मेमने को फिर से भेडिया बनने का अवसर न दिया होता । उदारता के इस अतिरेक को चेतावनी देते हुए ही राष्ट्रकवि दिनकर ने कहा था -
विष खींचना है तो उखाड विषदन्त फेंको ,
वृक-व्याघ्र-भीति से मही को मुक्त कर दो ।
अथवा अजा के छागलों को ही बनाओं व्याघ्र ,
दान्तों में कराल कालकूट विष भर दो ।।
-विश्वजीत सिंह अनन्त
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वन्दे मातरम्

वीर मदन लाल ढींगरा का भारतवासियों के नाम ऐतिहासिक पत्र

प्यारे देशवासियों ,
मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मैंने एक अंग्रेज का खून बहाया है और वह इसलिये बहाया है कि मैं भारतीय देशभक्त नौजवानों को अमानवीय रूप से फाँसी के फंदों पर लटकाए जाने और उन्हें आजन्म कालेपानी की सजा दिये जाने का बदला ले सकूँ । इस प्रयत्न में अपनी अन्तरात्मा के अतिरिक्त मैंने किसी और से परामर्श नहीं लिया और अपने कर्तव्य के अतिरिक्त किसी अन्य से सांठ - गांठ नहीं की । मेरा विश्वास है कि जिस देश को संगीनों के बल पर दबाकर रखा जाता हो , वह हमेशा ही आजादी की लडाई लडता रहता है । जिस देश के हथियार छीन लिये गए हों , वह खुली लडाई लडने की स्थिति में नहीं होता । मैं खुली लडाई नहीं लड सकता था , इस कारण मैंने आकस्मिक रूप से आक्रमण किया । मुझे बंदूक रखने की मनाही थी , इस कारण मैंने पिस्तौल चला कर आक्रमण किया ।
हिन्दू होने के नाते मैं यह विश्वास करता हूँ कि मेरे देश के प्रति किया गया अपराध ईश्वर का अपमान है । मेरे मातृभूमि का कार्य ही भगवान राम का कार्य है । मातृभूमि की सेवा ही भगवान श्रीकृष्ण की सेवा है । मुझ जैसे धनहीन और बुद्धिहीन व्यक्ति के पास अपने रक्त के अतिरिक्त मातृभूमि को समर्पित करने के लिये और क्या था , इसी कारण मैं मातृ - देवी पर अपनी रक्ताञ्जली अर्पित कर रहा हूँ । भारतवर्ष के लोगों को सीखने के लिये इस समय एक ही सबक है और वह यह है कि मृत्यु का आलिंगन किस प्रकार किया जाए और यह सबक सिखाने का एक ही तरीका है कि स्वयं ही मर कर दिखाया जाए , इसीलिये मैं मर कर दिखा रहा हूँ और अपनी शहादत पर मुझे गर्व है । यह पद्धति उस समय तक चलती रहेगी जब तक पृथ्वी के धरातल पर हिन्दू और अंग्रेज जातियों का अस्तित्व है । ( पराधीनता का यह अस्वाभाविक सम्बन्ध समाप्त हो जाए तो अलग बात है । )
ईश्वर से मेरी एक ही प्रार्थना है कि वह मुझे नया जीवन भी भारत - माता की गोद में ही प्रदान करे और मेरा वह जीवन भी भारत - माता की आजादी के पवित्र कार्य के लिये समर्पित हो । मेरे जन्म और बलिदान का यह क्रम उस समय तक चलता रहे जब तक भारत - माता आजाद न हो जाए । मेरी मातृभूमि की आजादी मानवता के हित - चिंतन और परम - पिता परमेश्वर के गौरव - संवर्द्धन के लिये होगी ।
वन्दे मातरम्
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न्यायालय में वीर मदनलाल ढींगरा का वक्तव्य

मैं अपने बचाव के पक्ष में कुछ नहीं कहना चाहता , सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ अंग्रेजों की कोई भी न्याय - व्यवस्था मुझे सजा देने का हक नहीं रखती है । इसी वजह से मैंने कोई वकील मुकर्रर करना मुनासिब नहीं समझा । जैसे जर्मनी के खिलाप लडना अंग्रेजों की देशभक्ति है , वैसे ही अंग्रेजों के खिलाप आजादी की लडाई हमारी देशभक्ति है । मैं अंग्रेजों को 8 करोड भारतीयों का हत्यारा मानता हूँ , जिनको गत 50 वर्षो में बेरहमी से मौत के घाट उतारा गया है ।
अंग्रेज प्रति वर्ष दस करोड रूपया भारत से इंग्लैंड लाते है और भारत को चूस कर मौज उडाते हैं । अंग्रेजी हुकूमत ने मेरे देशवासियों को फाँसी की सजा और आजीवन कारावास दिया है । इंग्लैंड से एक अंग्रेज 100 रूपया पौंड की नौकरी पर भारत इसलिये भेजा जाता है कि वहा जाकर 1000 भारतीयों को मौत का निशाना बनाए क्योंकि 100 में 1000 भारतीय गुजर बसर करते है । अंग्रेजों की यह हवस साम्राज्य विस्तार के साथ - साथ भारतीयों के शोषण की दास्तान कहती है । जैसे जर्मनी को इंग्लैंड पर कब्जा जमा कर उसे गुलाम बनाने का कोई अधिकार नहीं है , वैसे ही अंग्रेजों को भारत को पराधीनता की बेडियों में रखने का कोई अधिकार नहीं है ।
मुझे अंग्रेजों के उस न्याय और कानून पर हंसी आती है जो पीडित मानवता की हमदर्दी पर घडियाली आंसू बहाता है और ढोंग - पाखण्ड का नाटक करता है । जब जर्मन को मार कर अंग्रेज अपने को देशभक्त कहता है तो निश्चित रूप से मैं भी देशभक्त हूँ । मातृभूमि का अपमान करने वालों की हत्या करना एक देशभक्त का पवित्र कर्तव्य है । मैंने वही किया है जो सच्चे देशप्रेमी को करना चाहिए । मुझे मृत्यु की जरा भी परवाह नहीं है । अंग्रेजों का काला कानून मुझे फाँसी की सजा दे सकता है , पर वह देशभक्ति की भावना को दफन नहीं कर सकता है । मेरी फाँसी के बाद देश में अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की जंग ओर तेज होगी ।
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वन्दे मातरम्

भारत की दत्तक आध्यात्मिक पुत्री श्रीमाँ मीरा अल्फाँसा

महान व्यक्तियों के जीवन व विचार अनादि काल से विपरीत परिस्थितियों में हमारी राष्ट्रीय चेतना को जीवन्त रखते रहे है । उसी कडी में श्रीमाँ मीरा अल्फाँसा भी है जिनका जन्म फ्रांस में हुआ था पर भारत की सनातन आध्यात्मिक परम्परा से प्रभावित होकर वे भारत आई और यहीं की होकर रह गयी । महर्षि अरविन्द घोष के सान्निध्य में साधना के उच्चतम सोपानों का अनुभव कर एक माँ के रूप में उन्होंने भारत की सन्तानों को उनकी सनातन आध्यात्मिक चेतना के प्रति जागृत किया तथा भारत विश्व में अपनी मार्गदर्शक भूमिका निभा सके इस हेतु सक्रिय होने का उन्होंने आवाहन किया । उन्होंने कहा था कि - ' भारत एक जीवन्त सत्ता है । यह सत्ता उतनी ही जीवित जागृत है जितने शिव आदि देवता । '
श्री माँ का जन्म फ्रांस की राजधानी पेरिस में 21 फरवरी 1878 को हुआ था । नाम रखा गया मीरा अल्फाँसा , जिसके आद्याक्षर है एम. ए. ( अर्थात माँ ) । शैशव से ही ' माँ ' थी वे । चिन्तनशील , अध्ययनशील और अत्यन्त मेधावी । चार वर्ष की आयु में वह ध्यानस्थ हो जाती थीं और एक अलौकिक सी ज्योति मुखमंडल पर छा जाती थी । इसी स्थिति में 1904 में उन्हें एक भारतीय आध्यात्मिक संत का सूक्ष्म दर्शन प्राप्त हुआ । श्री माँ ने नारद भक्ति सूत्र एवं ईशादि उपनिषदों का अनुवाद फ्रेंच भाषा में किया । परमात्मा की पूर्ण प्राप्ति के लिए वह सदैव व्याकुल रहती थी । इसी खोज में उनके मन में भारत आने की तीव्र इच्छा उत्पन्न हुई और 7 मार्च 1914 को वे अपने पति के साथ भारत के लिए रवाना हो गई जहाँ वह फ्रांस की राज्यसभा के लिए पांडिचेरी से चुनाव लडने वाले थे ।
29 मार्च 1914 को सायंकाल उन्होंने श्री अरविन्द के दर्शन किए तो पहली ही दृष्टी में पहचान लिया कि यह वही दिव्य अध्यात्म पुरूष हैं जो उनकी साधना में उनकी सहायता किया करते थे । अलौकिक शिष्या के अलौकिक गुरू ।
15 अगस्त 1914 को महर्षि अरविन्द के जन्मदिन पर श्रीमाँ ने अंग्रेजी और फ्रेंच भाषाओं में ' आर्य ' मासिक शुरू किया । सनातन हिन्दू विचार के प्रचार - प्रसार के लिए यह मासिक समर्पित था । कुछ समय बाद उन्हें फ्रांस वापस लौटना पडा , पर हृदय भारत में ही अटका रह गया । 1916 में वे फ्रांस से जापान गयी , जहां भगवद्गीता पर उनके भाषण हुए । जापानी स्त्रियों की एक सभा में उन्होंने कहा - ' केवल एक जीव को जन्म देना मातृत्व नहीं है । अपनी संतानों में दिव्यत्व प्रकट हो - इस हेतु जागरूकता से प्रयास करने का नाम ही मातृत्व है । '
24 अप्रैल 1920 में मीरा सदा के लिए भारत में रहने के लिए पांडिचेरी चली आयीं । यहाँ रहकर भारत के सनातन आदर्शो के अनुसार जीवन पद्धति अपनाकर साधनारत हो गयी । उन्होंने महर्षि अरविन्द के आश्रम की सम्पूर्ण व्यवस्था का भार संभाल लिया । धीरे - धीरे वे ' मीरा ' से ' श्रीमाँ ' बन गयी । आध्यात्मिक साधना और अनुभूतियों से आश्रम में देवत्व भरा वातावरण बनाने में वे महर्षि अरविन्द की सहायिका थी । महर्षि ने लिखा है - ' चार महाशक्तियाँ श्री माता जी के माध्यम से कार्यरत है । महालक्ष्मी , महासरस्वती , महाकाली और महेश्वरी । '
15 अगस्त 1947 में भारत को खण्डित स्वतंत्रता मिली । श्री माँ ने कहा - ' हिन्दुस्थान की स्वाधीनता का प्रश्न हल नहीं हुआ है । हिन्दुस्थान के पुनः अखण्ड होने तक हमें प्रतिक्षा करनी होगी । तब तक हमारी एक ही घोषणा होगी - ' हिन्दू चैतन्य अमर है । " उन्होंने आश्रम पर भारत का ध्वज फहराया । इस पर श्रीलंका और ब्रह्मदेश सहित अखण्ड भारत का मानचित्र था । सम्पूर्ण वंदे मातरम् का सामूहिक गान किया । " भारत विभाजन असत्य है , उसको मिटाना चाहिये और यह मिट कर रहेगा । " यह उनकी दृढ धारणा थी । आश्रम के खेल के मैदान में अखण्ड भारत का मानचित्र यही सोचकर बनवाया । प्रतिदिन मैदान में गणप्रचलन के समय उसे प्रणाम किया जाने लगा ।
5 दिसम्बर 1950 को महर्षि अरविन्द ने यह देह त्यागी । उनकी दिव्य शक्तियाँ श्री माँ के शरीर में चली गयीं । 6 जनवरी 1952 को श्री माँ ने अन्तर्राष्ट्रीय विद्या केन्द्र की नीव आश्रम में रखी । बालकों में दिव्यत्व का प्रकटीकरण हो - ऐसी शिक्षा का कार्यक्रम संचालित किया ।
1965 में श्री माँ की कल्पना के अनुरूप ' उषानगरी ' ( औरोविले ) का निर्माण शुरू हुआ , जिसके केन्द्र में था मातृमन्दिर । 28 फरवरी 1968 को इसका उद्घाटन उन्होंने किया । 121 देशों के बच्चे उपस्थित थे । भारत के 23 राज्यों - केन्द्र शासित प्रदेशों से बच्चे आये थे । संस्कृत थी यहाँ कि सम्पूर्ण भाषा ।
भारत के भविष्य का वर्णन करते हुए उनका कथन था कि ' भारत की सच्ची नियति है विश्व गुरू बनना , विश्व की भावी व्यवस्था भारत पर निर्भर है । भारत आध्यात्मिक ज्ञान को विश्व में मूर्तिमान कर रहा है । भारत सरकार को इस क्षेत्र में भारत के महत्व को स्वीकार करना चाहिये और अपने को इसी के अनुसार सुयोजित करना चाहिये । '
इस प्रकार भारतीय जीवन को भविष्योन्मुखी और आध्यात्मिक और अध्यात्मकेन्द्रित करके तथा विश्व में दिव्य जीवन की चेतना का केन्द्र भारत को बनाकर श्री माँ ने 17 नवम्बर 1973 को अपना भौतिक शरीर त्याग दिया और भारत की आत्मा में ही अपनी आत्मा को लीन कर लिया । उनके ये शब्द हमें सदा झकझोरेंगे - ' विश्व की भलाई के लिए भारत की रक्षा करनी होगी , क्योंकि एकमात्र भारत ही विश्व को शांति और एक नवीन व्यवस्था प्राप्त कर सकता है । भारत का भविष्य एकदम स्पष्ट है । भारत जगद्गुरू है । विश्व का भावी संगठन भारत पर निर्भर है । भारत एक जीवन्त आत्मा है । भारत आध्यात्मिक ज्ञान को विश्व में मूर्तिमान कर रहा है । '
पूज्य श्री माँ मीरा अल्फाँसा के श्रीचरणों में अनन्त नमन ।'
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-विश्वजीत सिंह अनन्त
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शनिवार, 23 अप्रैल 2016

ईसाईयत के गाल पर हिंदुत्व का थपेड़ा...

ईसाईयत के गाल पर हिंदुत्व का थपेड़ा... (पूरा मेटर पढ़ने से आपको ईसाई मिशनरियों का सच पता चल जायेगा )
कहा! अब नहीं बना सकोगे किसी हिन्दू को क्रिश्चन...
गोवा के एक सच्चे हिन्दू की आपबीती..
अभी कुछ महीने पहले ही नई यूनिट में ट्रान्सफर होकर आया हूँ चूँकि पिछली यूनिट में कई लोगों ने मेरी छवि एक सांप्रदायिक कट्टर हिन्दू की बना दी थी और कुछ लोगों ने मुझे इस्लाम और ईसाईयत विरोधी बता दिया था ।
इसलिए इस यूनिट में मैं काफ़ी शाँत रहता था किसी भी धर्म पर मैं कोई भी बात नही करता था ।
मेरे साथ एक सीनियर हैं जो 4 साल पहले हिंदू से क्रिस्चियन में कन्वर्ट हुए हैं, वो दिन रात ईसाईयत की प्रशंसा करते और हिंदुत्व को गालियाँ देते रहते, चूँकि उन्हें मेरे बारे में कोई जानकारी नही थी और ना ही उन्होंने मेरी हिस्ट्री पढ़ी थी ।
एक दिन बातों ही बातों में उन्होंने मुझे क्रिश्चियनिटी में कन्वर्ट होने का ऑफ़र दे दिया और क्रिश्चियनिटी के फ़ायदे बताने लगे ।
मैं कई दिनों से ऐसे मौके की तलाश में था क्योंकि मेरे दिमाग में क्रिस्चियन कन्वर्शन वाले मुद्दे को लेकर बड़ा फ़ितूर चल रहा था, मैं उसके ज्ञान का लेवल जानता था । इसलिए मैं बाइबिल को लेकर बड़े क्रिस्चियन फादर से बहस करना चाहता था इसलिए मैंने उनका ऑफ़र स्वीकार कर लिया ।
कल शाम को मैं अपने आठ जूनियर और उस सीनियर के साथ चर्च पहुँच गया, वहाँ कुछ परिवार भी हिन्दू से क्रिस्चियन कन्वर्शन के लिए आये हुए थे, और धर्म परिवर्तन कराने के लिए गोवा से किसी चर्च के फादर बुलाये गए थे ।
चर्च में प्रार्थना हुई , फिर उन्होंने क्रिश्चियनिटी और परमेश्वर पर लेक्चर दिया और होली वाटर के साथ धर्मान्तरण का कार्यक्रम शुरू किया । सबसे पहले मुझे कन्वर्ट होने के लिए आगे बुलाया गया ।
मैंने फ़ादर से कहा कि मुझे कन्वर्ट करने से पहले क्रिस्चियन और हिन्दू धर्म के बीच का फर्क बताये ।
मैं कन्वर्ट होने से पहले बाइबिल पर आपके साथ चर्चा करना चाहता हूँ ।
कृपया मुझे आधा घण्टे का समय दें और मेरे कुछ प्रश्नों का उत्तर दें ।
उस फ़ादर को इस बात का अंदेशा भी नही था कि आज वो कितनी बड़ी आफ़त में फ़ंसने वाले हैं, सो फ़ादर बाइबिल पर चर्चा करने के लिए तैयार हो गए ।
मैंने पूछा  - फ़ादर! क्रिश्चियनिटी हिंदुत्व से किस तरह बेहतर है, परमेश्वर और बाइबिल में से कौन सत्य है,अगर बाइबिल और यीशु में से एक चुनना हो तो किसको चुनें ?
अब फ़ादर ने क्रिश्चियनिटी की प्रशंसा और हिंदुत्व की बुराइयाँ शुरू करते हुए कहा क़ि...
यीशु ही एक मात्र परमेश्वर है और होली बाइबिल ही दुनियाँ में मात्र एक पवित्र क़िताब है । बाइबिल में लिखा एक एक वाक्य सत्य है वह परमेश्वर का आदेश है । परमेश्वर ने ही पृथ्वी बनाई है ।
क्रिश्चियनिटी में ज्ञान है जबकि हिन्दुओँ की किताबों में केवल अंध विश्वास है ।
क्रिश्चियनिटी में समानता है जातिगत भेदभाव नही है जबकि हिंदुओं में जातिप्रथा है ।
क्रिश्चियनिटी में महिलाओं को पुरुषों के बराबर सम्मान हैं जबकि हिन्दुओँ में नारी का आदर नही उसे भोग की पुतली समझा जाता है ।
क्रिस्चियन कभी भी किसी को धर्म के नाम पर नही मारते जबकि हिन्दू धर्म के नाम् पर लोगों को मारते हैं बलात्कार करते हैं हिंदुओ में नागे बाबा घूमते हैं । हिन्दू बहुत अत्याचारी है ।
अब मैंने बोलना शुरू किया  क़ि फ़ादर मैं आपको बताना चाहता हूँ क़ि..
जैसा आपने कहा क़ि परमेश्वर ने पृथ्वी बनाई है और बाईबल में एक-एक वाक्य सत्य लिखा है और वह पवित्र है ।
तो बाईबल के अनुसार पृथ्वी की उत्त्पति ईशा के जन्म से 4004 वर्ष पहले हुई अर्थात बाइबिल के अनुसार अभी तक पृथ्वी की उम्र 6020 वर्ष हुई जबकि साइंस के अनुसार(कॉस्मोलॉजि) पृथ्वी की उम्र लगभग 4.8 ±10%बिलियन वर्ष की है जो बाइबिल में बतायी हुई वर्ष के बहुत ज़्यादा है
आप भी जानते हो साइंस ही सत्य है
अर्थात बाइबिल का पहला अध्याय ही बाइबिल को झूँठा घोषित कर रहा है । मात्र झूँठी कहानियों का संकलन है बाइबल में ।
जब बाइबिल ही असत्य है तो आपके परमेश्वर का कोई अस्तित्व ही नही बचता ।
आपने कहा कि क्रिश्चियनिटी में ज्ञान है तो आपको बता दूँ कि क्रिश्चियनिटी में ज्ञान नाम का कोई शब्द नही है , याद करो जब "ब्रूनो" ने कहा था क़ि पृथ्वी सूरज की परिक्रमा लगाती है तो चर्च ने ब्रूनो को 'बाइबिल' झूठा साबित करने के आरोप में जिन्दा जला दिया था और गैलीलियो को इसलिए अँधा कर दिया गया क्योंकि उसने कहा था कि 'पृथ्वी के अलावा और भी ग्रह हैं' ।
अब हिंदुत्व की बारी....
फ़ादर हिंदुत्व के अनुसार पृथ्वी की उम्र ब्रह्मा के एक दिन और एक रात के बराबर है जो लगभग 1.97 बिलियन वर्ष है जो साइंस के बताये हुए समय के लगभग समान है और साइंस के अनुसार ग्रह नक्षत्र तारे और उनका परिभ्रमण हिन्दुओँ के ज्योतिष विज्ञान पर आधारित है ।
हिन्दू ग्रंथो के अनुसार ग्रहों की जीवनगाथा वैदिक काल में ही बता दी गयी थी ।ऐसे ज्ञान देने वाले संतो को हिन्दुओँ ने भगवान के समान पूजा है ना कि जिन्दा जलाया या अँधा किया ।
केवल हिन्दू धर्म ही ऐसा है जो ज्ञान और गुरु को भगवान से भी ज़्यादा पूज्य मानता है जैसे
"गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवोमहेश्वरः
गुरुर्साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्रीगुरूवे नमः..
और फ़ादर दुनियाँ में केवल हिन्दू ही ऐसा है जो कण कण में ईश्वर देखता है और ख़ुद को "अह्म ब्रह्मस्मि" बोल सकता है इतनी आज़ादी केवल हिन्दू धर्म में ही हैं ।
आपने कहा क़ि 'क्रिश्चियनिटी में समानता है जातिगत भेदभाव नही है तो आपको बता दूँ क़ि
क्रिश्चियनिटी पहली शताब्दी में तीन भागों में बटी हुई थी जैसे
Jewish Christianity
Pauline Christianity
Gnostic Christianity.
जो एक दूसरे के घोर विरोधी थे उनके मत भी अलग अलग थे ।
फिर क्रिश्चियनिटी Protestant, Catholic Eastern Orthodoxy, Lutherans और भी कई समुदायों में विभाजित हुई जो एक दूसरे के दुश्मन थे ।
आज ईसाईयत हज़ार से ज़्यादा भागों में बटी हुई है, जो पूर्णतः रँग भेद (श्वेत, अश्वेत ) और जातिगत आधारित है ।
आज भी अश्वेत क्रिस्चियन को ग़ुलाम समझा जाता है ।
फ़ादर भेदभाव में ईसाई सबसे आगे हैं हैम के वँशज के नाम पर अश्वेतों को ग़ुलाम बना रखा है ।
आपने कहा कि क्रिश्चियनिटी में महिलाओं को पुरुष के बराबर अधिकार है, तो बाईबल के प्रथम अध्याय में एक ही अपराध के लिये परमेश्वर ने ईव को आदम से ज्यादा दण्ड क्यों दिया ?
ईव के पेट को दर्द और बच्चे जनने का श्राप क्यों दिया ?
आदम को ये दर्द क्यों नही दिया ?
अर्थात आपका परमेश्वर भी महिलाओं को पुरुषों के समान नही समझता ।
आपके ही बाइबिल में "लूत" ने अपनी ही दोनों बेटियों का बलात्कार किया और इब्राहिम ने अपनी पत्नी को अपनी बहन बनाकर मिस्र के फिरौन (राजा) को भोग भोगने के लिए दिया ।
फ़ादर क्रिश्चियनिटी के इतिहास में देखो आजतक किसी भी महिला को पॉप ( धर्म गुरु) नही बनाया गया, दुनियाँ के सारे चर्च पुरुष प्रधान है ।
आपकी ही क्रिश्चियनिटी ने पोप के कहने पर अब तक 50 लाख से ज़्यादा बेक़सूर महिलाओं को जिन्दा जला दिया । ये सारी रिपोर्ट आपकी ही बीबीसी न्यूज़ में दी हुईं हैं ।
आपकी ही ईसाईयत में 17वीं शताब्दी तक महिलाओं को चर्च में बोलने का अधिकार नही था ।
BBC के सर्वे के अनुसार सभी धर्मों के धार्मिक गुरुओं में सेक्सुअल केस में सबसे ज़्यादा "पोप और नन" ही एड्स से मरे हैं जो ईसाई ही हैं ।
दुनियाँ में केवल हिन्दू ही है जो कहता है
 " यत्र नारियन्ति पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता" अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है वहीँ देवताओं का निवास होता है ।
फ़ादर आपने कहा कि क्रिस्चियन धर्म के नाम पर किसी को नही मारते तो आपको बता दूँ 'एक लड़का हिटलर जो कैथोलिक परिवार में जन्मा उसने जीवनभर चर्च को फॉलो किया उसने अपनी आत्मकथा "MEIN KAMPF" में लिखा ' वो परमेश्वर को मानता है और परमेश्वर के आदेश से ही उसने 10 लाख यहूदियों को मारा है' ।
धर्म के नाम पर क़त्लेआम करने में क्रिस्चियन मुसलमानों के समान ही हैं, वहीँ आपने हिन्दुओँ को बदनाम किया तो आपको बता दूँ कि "हिन्दू ने कभी भी दूसरे धर्म वालों को मारने के लिए पहले हथियार नही उठाया है, बल्कि अपनी रक्षा के लिए हथियार उठाया है ।
फ़ादर ईसाईयत में सबसे बड़ी प्रथा Bapistism है, जो बाइबिल के अनुसार येरूसलम की यरदन नदी में नग्न होकर ली जाती है ।
फ़ादर! यीशु ने कहा है " मेरे प्रेरितों मेरा प्रचार प्रसार करो" अब जब आप यीशु का प्रचार करोगे तो आपसे प्रश्न भी पूछे जाएँगे आपको ज़बाब देना होगा।
मैंने फिर कहा फ़ादर आप यीशु के साथ गद्दारी नही कर सकते " आप यहाँ सिद्ध करके दिखाओ कि ईसाईयत हिंदुत्व से बेहतर कैसे है"
फ़ादर अभी शाँत था, मैंने कहा फ़ादर अभी तो मैंने शास्त्र खोले भी नही है शास्त्रों के ज्ञान के सामने आपकी बाइबिल टिक भी नही सकती।
अब फ़ादर ने काफ़ी सोच समझकर रविश स्टाइल में मुझसे पूछा 'आप किस जाति से हो'
मैंने भी चाणक्य स्टाइल में ज़वाब दिया ,
"मैं सेवार्थ शुद्र, आर्थिक वैश्य, रक्षण में क्षत्रिय, और ज्ञान में ब्राह्मण हूँ ।
अब मैंने उन परिवारों को जो कन्वर्ट होने के लिए आये थे उनको कहा " क्या आप लोगों को पता है कि वेटिकन सिटी एक हिन्दू से क्रिस्चियन कन्वर्ट करने के लिए मिनिमम 2 लाख रुपये देती है जिसमें से आपको 1लाख या 50 हज़ार दिया जाता है बाकि में 20 से 30 हज़ार तक आपको कन्वर्ट करने के लिए चर्च लेकर आने वाले आदमी को दिया जाता है
बाकि का 1 लाख चर्च रखता है ।
जब आप कन्वर्ट हो जाते हो तब आपको परमेश्वर के नाम से डराया जाता है फिर आपको हर सन्डे चर्च आना पड़ता है और हर महीने अपने जेबखर्च या फिक्स डिपाजिट चर्च को डिपॉजिट करना पड़ता है, आपको 1 लाख देकर चर्च आपसे कम से कम दस लाख वसूल करता है, अगर आपके पास पैसा नही होता तो आपको परमेश्वर के नाम से डराकर आपकी जमीन किसी क्रिस्चियन ट्रस्ट के नाम पर डोनेट(दान) करा ली जाती है ।
आप सभी को बता दूँ कि एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार भारत में धार्मिक आधार पर सबसे ज़्यादा जमीन क्रिस्चियन ट्रस्टों के पास हैं, जिन्हें आप जैसे मासूम कन्वर्ट होने वालो से परमेश्वर के नाम पर डरा कर हड़प कर लिया गया है ।
और अंत में मैंने कहा क़ि "मेरे क्रिस्चियन भाइयों! अपने वेटिकन वाले चचाओं को बता दो कि भारत से ईसाईयत का बोरी #बिस्तर उठाने का समय आ गया है उन्हें बोल दो अब भारत में हिन्दू जाग चुका है । अब हिन्दू ने भी शस्त्र के साथ शास्त्र उठा लिया है जितना जल्दी हो यहाँ से निकल लो"।
जय हिन्द!!!
जय भारत!!!

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