एक नगर में एक बहुत कट्टर मुसलमान रहते हैं | सनातन धर्म के महापुरुषों से नाक भौं सिकोडने वाले तथा ओरंगजेब के प्रशंसक कहते हैं ओरंगजेब जैसा बादशाह होना मुश्किल है।
वहां रहने वाले एक सज्जन सनातन धर्मी संत उसके समीप मकान ले लेते हैं।
वहीं पर एक मुसलमान भी रहता था वह उन्हें नमस्ते करता तथा आदरपूर्वक अपने घर ले जाता है। उसकी पुत्री भी आयी हुई है।वह गर्भवती है। वह संत जी से अपनी पुत्री को आशिर्वाद देने के लिए कहता है कि भगवन् इसे अच्छा पुत्र दें।
संत जी पूछते हैं कि कैसे पुत्र के लिए आशिर्वाद दूं राम जैसा या ओरंगजेब जैसा।
वह कहता ह कि ओरंगजेब जैसा पुत्र कहकर क्या आप हमें शाप दे रहे हैं हमें तो राम जैसा देवता चाहिये।
यह सुनकर जहां प्रसन्नता हुई वहां मन में ये भी आया कि राम में वे कौन से गुण थे जिनसे सनातन आर्य संस्कृति का एक विरोधी भी राम सा बेटा चाहता है।
कारण स्पस्ट है कि भगवान श्री राम आदर्श पुरुष थे।
आइये राम के गुण देखें-
आदर्श विद्वान-राम में जहां अन्य अनेक गुण थे वहां वेद व वेदांगों के विद्वान भी थे। बालकाण्ड सर्ग १८ में उन्हें "सर्वे वेदविद: शूरा: सर्वे लोकहितेरता:।" कहा है।
आदर्श पुत्र-राम आदर्श पुत्र थे। वे अपनी तीनों माताओं को समान रुप से सम्मान देते थे। मन्थरा ने जब कैकेई को राम के राज्याभिषेक की सूचना दी तो वह अत्यन्त खुश होकर कह उठी-
यथा मे भरतो मान्यस्तथाभूयोअपिराघव:।
कौशल्यातोअतिरिक्तं च स तु शुश्रू षते हि माम् ।। अयोध्या काण्ड ८/१८
जैसा मेरे लिए भरत मान्य है,राम उससे भी अधिक है।क्योंकि वह मेरी सेवा कौशल्या से भी अधिक करता है।
जब मन्थरा के बहकाने से कैकेई दशरथ से १४ वर्ष का वनवास मांगती है तो दशरथ उसे कहते हैं कि राम तो तुझे सदा जननी तुल्य मानता है तू उसके अनर्थ के लिए क्यों उद्यत हुई है?
और जब चित्रकूट में राम को वापस लाने के लिए भरत जाते हैं तब राम
अन्य बातों के साथ कौशल्या,सुमित्रा तथा कैकेई की कुशलता पहले ही पूछते हैं-
तात कच्चिच्च कौशल्या सुमित्रा च प्रजावती।
सुखिनी कच्चिदार्या च देवी नन्दति कैकेयी ।।(अयो० १००)
राम कैसा आदर्श पुत्र है जो उस माता की भी कुशल पूछता है। जिसके कारण राज्याभिषेक के बदले उसे १४ वर्ष का वनवास भोगना पडा।
अपने पिता के प्रति भी उनकी अटूट भक्ति थी।जब वनवास का वचन लेकर उसे सुनाने के लिए कैकेयी ने राम को बुलाया और उनसे कहा कि राजा ने हमको जो वचन दिये थे जिसे वे आपके स्नेह से पूरा नहीं करते।यदि तुम उन्हें पालने का राजा को वचन दो तो मैं उनकी आज्ञा आपको सुनाऊं।तब राम ने जो शब्द कहे थे वे इस संस्कृति वालों के लिए गर्व की बात है।
बाल्मीकि के शब्दों में सुनिये-
अयोध्या कां० १८/२८-३०:-
हे देवी,मुझे धिक्कार है जो आप मुझ पर विश्वास न करके ऐसे वचन कह रही हैं।आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये।
क्योंकि मैं तो महाराज के कहने से जलती आग में कूद सकता हूं,तीक्ष्ण विष पी सकता हूं तथा समुद्र में छल़ांग लगा सकता हूं।फिर वे मेरे गुरु,पिता,राजा और हितैषी हैं।अत: आप बताएं राजा क्या चाहते हैं।मैं उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा करता हूं।
राम दो वचन नहीं बोलता,वह तो जो कह देता है उसे पूरा करके सी छोडता है।"
जब राम वन जाने के लिए माता कौशल्या से आज्ञा लेने आते हैं तब वे कहती हैं कि पुत्र जहां तू जायेगा वहीं तेरे साथ जाऊंगी।
तब राम कहते हैं कि माता जी जब तक अयोध्या के राजा मेरे पिता जी जीते हैं तब तक आप उनकी सेवा करो,यही प्राचीन(वैदिक धर्म) है।
वाह रे पुत्र!तुझे अपनी चिन्ता नहीं,१४ वर्षों के वनवास के समय अयोध्या में मेरे पिता सुखी रहें।
यह चिन्ता है।
दूसरे माता जी कहीं मेरे वनवास से रुष्ट होकर पिताजी की सेवा करना न छोड दें,अत: उन्हें धर्म की याद दिलाकर पिता की सेवा के लिए प्रेरित करते हैं।
आदर्श भ्राता:-राम आदर्श पुत्र तो थे ही वे आदर्श भाई भी थे।
लक्ष्मण के शक्ति लगने सुषेण से कहा था कि मुझे इनको इस दशा में देखकर महान कष्ट हो रहा है।इसके बिना मुझे भूमि का राज्य तथा सीता का प्राप्त करना सब वयर्थ है।
आप इन्हें शीघ्र स्वस्थ कीजिये।
मैने पूर्व जन्म में न जाने क्या दुष्कर्म किया था जिसके फलस्वरुप मेरा धार्मिक भाई मेरे सामने मर रहा है-
कि मया दुष्कृतं कर्म कृतमन्यत्र जन्मनि।
येन मे धार्मिको भ्राता निहतश्चाग्रत: स्थित:।।
(युद्ध० १०१/१९)
आदर्श पति:-
जब सीता राम से वन जाने के लिए कहती है तो राम कहते हैं-
न देवि तव दु:खेन स्वर्गमप्यभिरोचये ।। वही० ३०/२७ ।।
नेदानीं त्वदृते सीते स्वर्गोsपि मम रोचते ।। ३०-४२ ।।
हे देवि सीते! यदि तू वन की अपेक्षा यहां अधिक दु:ख मानती है तो तुझे दु:खी करके तो मुझे। कवर्ग भी अच्छा नहीं लगेगा।हे सीते तेरे बिना तो मुझे स्वर्ग भी अच्छा नहीं लगता है।
कर्तव्यपालक:-विश्वामित्र मुनि के समझाने पर ताडका-वध का मन बनाते समय राम कहते हैं-
गोब्राह्मण हितार्थाय देशस्य च हिताय च।
तव चैवाप्रमेयस्य वचनं कर्तुमुद्यत: ।। सर्ग २५
अर्थात् गो,ब्राह्मण तथा देश के हित के लिए मैं आपके वचन का पालन करने को उद्यत हूं।
वहां रहने वाले एक सज्जन सनातन धर्मी संत उसके समीप मकान ले लेते हैं।
वहीं पर एक मुसलमान भी रहता था वह उन्हें नमस्ते करता तथा आदरपूर्वक अपने घर ले जाता है। उसकी पुत्री भी आयी हुई है।वह गर्भवती है। वह संत जी से अपनी पुत्री को आशिर्वाद देने के लिए कहता है कि भगवन् इसे अच्छा पुत्र दें।
संत जी पूछते हैं कि कैसे पुत्र के लिए आशिर्वाद दूं राम जैसा या ओरंगजेब जैसा।
वह कहता ह कि ओरंगजेब जैसा पुत्र कहकर क्या आप हमें शाप दे रहे हैं हमें तो राम जैसा देवता चाहिये।
यह सुनकर जहां प्रसन्नता हुई वहां मन में ये भी आया कि राम में वे कौन से गुण थे जिनसे सनातन आर्य संस्कृति का एक विरोधी भी राम सा बेटा चाहता है।
कारण स्पस्ट है कि भगवान श्री राम आदर्श पुरुष थे।
आइये राम के गुण देखें-
आदर्श विद्वान-राम में जहां अन्य अनेक गुण थे वहां वेद व वेदांगों के विद्वान भी थे। बालकाण्ड सर्ग १८ में उन्हें "सर्वे वेदविद: शूरा: सर्वे लोकहितेरता:।" कहा है।
आदर्श पुत्र-राम आदर्श पुत्र थे। वे अपनी तीनों माताओं को समान रुप से सम्मान देते थे। मन्थरा ने जब कैकेई को राम के राज्याभिषेक की सूचना दी तो वह अत्यन्त खुश होकर कह उठी-
यथा मे भरतो मान्यस्तथाभूयोअपिराघव:।
कौशल्यातोअतिरिक्तं च स तु शुश्रू षते हि माम् ।। अयोध्या काण्ड ८/१८
जैसा मेरे लिए भरत मान्य है,राम उससे भी अधिक है।क्योंकि वह मेरी सेवा कौशल्या से भी अधिक करता है।
जब मन्थरा के बहकाने से कैकेई दशरथ से १४ वर्ष का वनवास मांगती है तो दशरथ उसे कहते हैं कि राम तो तुझे सदा जननी तुल्य मानता है तू उसके अनर्थ के लिए क्यों उद्यत हुई है?
और जब चित्रकूट में राम को वापस लाने के लिए भरत जाते हैं तब राम
अन्य बातों के साथ कौशल्या,सुमित्रा तथा कैकेई की कुशलता पहले ही पूछते हैं-
तात कच्चिच्च कौशल्या सुमित्रा च प्रजावती।
सुखिनी कच्चिदार्या च देवी नन्दति कैकेयी ।।(अयो० १००)
राम कैसा आदर्श पुत्र है जो उस माता की भी कुशल पूछता है। जिसके कारण राज्याभिषेक के बदले उसे १४ वर्ष का वनवास भोगना पडा।
अपने पिता के प्रति भी उनकी अटूट भक्ति थी।जब वनवास का वचन लेकर उसे सुनाने के लिए कैकेयी ने राम को बुलाया और उनसे कहा कि राजा ने हमको जो वचन दिये थे जिसे वे आपके स्नेह से पूरा नहीं करते।यदि तुम उन्हें पालने का राजा को वचन दो तो मैं उनकी आज्ञा आपको सुनाऊं।तब राम ने जो शब्द कहे थे वे इस संस्कृति वालों के लिए गर्व की बात है।
बाल्मीकि के शब्दों में सुनिये-
अयोध्या कां० १८/२८-३०:-
हे देवी,मुझे धिक्कार है जो आप मुझ पर विश्वास न करके ऐसे वचन कह रही हैं।आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये।
क्योंकि मैं तो महाराज के कहने से जलती आग में कूद सकता हूं,तीक्ष्ण विष पी सकता हूं तथा समुद्र में छल़ांग लगा सकता हूं।फिर वे मेरे गुरु,पिता,राजा और हितैषी हैं।अत: आप बताएं राजा क्या चाहते हैं।मैं उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा करता हूं।
राम दो वचन नहीं बोलता,वह तो जो कह देता है उसे पूरा करके सी छोडता है।"
जब राम वन जाने के लिए माता कौशल्या से आज्ञा लेने आते हैं तब वे कहती हैं कि पुत्र जहां तू जायेगा वहीं तेरे साथ जाऊंगी।
तब राम कहते हैं कि माता जी जब तक अयोध्या के राजा मेरे पिता जी जीते हैं तब तक आप उनकी सेवा करो,यही प्राचीन(वैदिक धर्म) है।
वाह रे पुत्र!तुझे अपनी चिन्ता नहीं,१४ वर्षों के वनवास के समय अयोध्या में मेरे पिता सुखी रहें।
यह चिन्ता है।
दूसरे माता जी कहीं मेरे वनवास से रुष्ट होकर पिताजी की सेवा करना न छोड दें,अत: उन्हें धर्म की याद दिलाकर पिता की सेवा के लिए प्रेरित करते हैं।
आदर्श भ्राता:-राम आदर्श पुत्र तो थे ही वे आदर्श भाई भी थे।
लक्ष्मण के शक्ति लगने सुषेण से कहा था कि मुझे इनको इस दशा में देखकर महान कष्ट हो रहा है।इसके बिना मुझे भूमि का राज्य तथा सीता का प्राप्त करना सब वयर्थ है।
आप इन्हें शीघ्र स्वस्थ कीजिये।
मैने पूर्व जन्म में न जाने क्या दुष्कर्म किया था जिसके फलस्वरुप मेरा धार्मिक भाई मेरे सामने मर रहा है-
कि मया दुष्कृतं कर्म कृतमन्यत्र जन्मनि।
येन मे धार्मिको भ्राता निहतश्चाग्रत: स्थित:।।
(युद्ध० १०१/१९)
आदर्श पति:-
जब सीता राम से वन जाने के लिए कहती है तो राम कहते हैं-
न देवि तव दु:खेन स्वर्गमप्यभिरोचये ।। वही० ३०/२७ ।।
नेदानीं त्वदृते सीते स्वर्गोsपि मम रोचते ।। ३०-४२ ।।
हे देवि सीते! यदि तू वन की अपेक्षा यहां अधिक दु:ख मानती है तो तुझे दु:खी करके तो मुझे। कवर्ग भी अच्छा नहीं लगेगा।हे सीते तेरे बिना तो मुझे स्वर्ग भी अच्छा नहीं लगता है।
कर्तव्यपालक:-विश्वामित्र मुनि के समझाने पर ताडका-वध का मन बनाते समय राम कहते हैं-
गोब्राह्मण हितार्थाय देशस्य च हिताय च।
तव चैवाप्रमेयस्य वचनं कर्तुमुद्यत: ।। सर्ग २५
अर्थात् गो,ब्राह्मण तथा देश के हित के लिए मैं आपके वचन का पालन करने को उद्यत हूं।
कर्तव्य पालन के लिए ही उस नरश्रेष्ठ ने परिवार तथा राज्य को छोडकर वन के कष्टों को अंगीकार किया था।
वे कहा करते थे-
क्षत्रियैर्धायते चापो नार्त शब्दो भवेदिति ।। अरण्य का० १०-२
जब क्षत्रिय ने धनुष ले लिया तो दु:खी की चीत्कार हो ही नहीं सकती।
आजीवन इस व्रत को निभाया।
वे कहा करते थे-
क्षत्रियैर्धायते चापो नार्त शब्दो भवेदिति ।। अरण्य का० १०-२
जब क्षत्रिय ने धनुष ले लिया तो दु:खी की चीत्कार हो ही नहीं सकती।
आजीवन इस व्रत को निभाया।
सदाचारी:-राम का सदाचार भी अनुकरणीय है।ननिहाल से बुलाये भरत ने जब राम लक्ष्मण तथा सीता के विषय में पूछा तथा कैकेयी ने बताया की वे तो तपस्वियों की भांति चीर वल्कल धारण कर दण्डक वन में निवास कर रहे हैं।
तब भरत ने पूछा कि क्या राम ने किसी ब्राह्मण का धन हर लिया था अथवा किसी निरधराध पुरुष को मार दिया था अथवा किसी स्त्री पर दुष्ट संकल्प किया था जिसके कारण राजा तथा राजसभा ने न्यायानुसार सर्वगुण सम्पन्न राम को कठोर वनवास दिया हो?
तब भरत ने पूछा कि क्या राम ने किसी ब्राह्मण का धन हर लिया था अथवा किसी निरधराध पुरुष को मार दिया था अथवा किसी स्त्री पर दुष्ट संकल्प किया था जिसके कारण राजा तथा राजसभा ने न्यायानुसार सर्वगुण सम्पन्न राम को कठोर वनवास दिया हो?
इसके उत्तर में कैकेयी ने कहा है वह राम के उज्जवल चरित्र का परिचायक है।
उसने कहा पुत्र,राम ने न तो किसी ब्राह्मण का धन हरा,न किसी निरपराध की हिंसा की।
परस्त्री को तो राम आंख उठाकर भी नहीं देख सकता
उसने कहा पुत्र,राम ने न तो किसी ब्राह्मण का धन हरा,न किसी निरपराध की हिंसा की।
परस्त्री को तो राम आंख उठाकर भी नहीं देख सकता
ऐसे थे हमारे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम चंद्र जी
सभी को रामनवमी की बहुत बहुत शुभकामनायें
सभी को रामनवमी की बहुत बहुत शुभकामनायें
जय श्री राम
🚩सनातन संस्कृति संघ ट्रस्ट, सनातन धर्म- संस्कृति व स्वदेशी के प्रचार- प्रसार के लिए कार्यरत संगठन |
स्वदेशी स्वाभिमान, राष्ट्र- धर्म, संस्कृति की रक्षा व सम्वर्धन, गौ आधारित अर्थव्यवस्था एवं गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था की पुनर्स्थापना के लिए सनातन संस्कृति संघ के सदस्य बने |
🚩भारत स्वाभिमान दल, स्वस्थ, समृद्ध, शक्तिशाली एवं संस्कारवान भारत के पुनर्निर्माण के लिए तथा देश के अमर बलिदानियों के सपनों को पूरा करने के लिए भारत स्वाभिमान दल से जुड़े |
भारत स्वाभिमान दल के बारे में अधिक जानने के लिए तथा सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन, राजनैतिक शुचिता व राष्ट्र- धर्म रक्षा के आन्दोलन में तन मन धन से सक्रिय भूमिका निभाने के लिए भारत स्वाभिमान दल की वेबसाइट पर जाये
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आप संगठनो से जुड़ने हेतु हमसे 08126396457 पर वाट्सएप्प व हाईक द्वारा भी सम्पर्क कर सकते है |
वन्दे मातरम्
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