जब गांधी की भ्रामक राजनीतिक सोच के कारण भगवा ध्वज राष्ट्रध्वज न बन सका
सन 1924 में कलकत्ता में सम्पन्न अखिल भारतीय संस्कृत सम्मेलन ने भारत के राष्ट्रीय ध्वज में सनातन संस्कृति का भगवा रंग और भगवान विष्णु की गदा सम्मिलित करने का सुझाव दिया था । उसी वर्ष कांग्रेस के बेलगाँव अधिवेशन में श्री द्विजेन्द्रनाथ ठाकुर और श्री सी. एफ. एण्ड्रृज ने भी राष्ट्रीय झण्डे में भगवा रंग सम्मिलित करने का परामर्श दिया था, क्योंकि इस रंग से त्याग - भावना की अभिव्यक्ति होती है । इसके अतिरिक्त यह रंग हिन्दू योगियों, संन्यासियों तथा मुसलमान फकीरों, दरवेशों को भी समान रूप से प्रिय रंग है ।
सन 1928 में कुछ सिक्खों ने लाहौर अधिवेशन के समय गांधी से मिलकर राष्ट्रीय झण्डे में अपने धर्म का प्रिय पीला रंग भी सम्मिलित करने की मांग की । इस विचार - वैषम्य की पृष्ठभूमि में 2 अप्रैल, 1931 को कराची में आयोजित कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में राष्ट्रीय ध्वज के निर्धारण के लिए सात सदस्यों की एक झण्डा समिति नियुक्त की गयी । डॉ. पट्टाभि सीतारमैय्या को इस समिति का संयोजक बनाया गया । अन्य छह सदस्यों में जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मास्टर तारा सिंह, मौलाना आजाद , डॉ. एन. एस. हार्डिकर और डी. बी. कालेलकर को शामिल किया गया । इस झण्डा समिति ने सर्वसम्मति से अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए संस्तुति की थी, कि
" राष्ट्रीय ध्वज एक ही रंग का रहे, इस पर हम सभी सहमत हैं । सब हिन्दी लोगों का एक साथ उल्लेख करना हो, तो सबके लिए सर्वाधिक मान्य केसरिया भगवा रंग है । अन्य रंगों से यह अधिक स्वतंत्र स्वरूप का है और इस देश की पूर्व - परम्परा से अपना - सा लगता हैं । "
किन्तु यह भारतीयों का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि झण्डा समिति के इस निर्णय को भ्रामक राजनीतिक सोच रखने वाले मोहनदास गांधी ने अस्वीकृत कर दिया और इस संस्तुति को कार्यान्वित नहीं होने दिया । कांग्रेस कार्यसमिति ने यद्यपि केसरिया रंग के नये राष्ट्रीय ध्वज की रूपरेखा की प्रशंसा की, किन्तु गांधी के मार्गदर्शन में मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर आगे बढ़ते हुए उसने 5 - 6 अगस्त 1931 को भगवे के स्थान पर तिरंगे को ही भारत का राष्ट्रीय ध्वज घोषित कर दिया ।
- विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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