मंगलवार, 31 मई 2016

महान साम्राज्ञी अहिल्याबाई होलकर

रानी अहिल्याबाई छोटे से राज्य इंदौर की रानी थी, लेकिन उन्होंने जिस तरह से अपने राज्य का कुशल संचालन किया तथा उसे सशक्त और सम्रद्ध बनाया, उसके लिए उनका नाम महान साम्राज्ञी के रूप में लिया जाता है. उन्होंने मुग़ल काल में तोड़े गए अनेको मंदिरों का पुनरुद्धार कराया था, इसके लिए उनको हिन्दू ह्रदय साम्राज्ञी भी कहा जाता है.
अहिल्याबाई का जन्म 31 मई सन् 1725 में एक साधारण परिवार में हुआ था, लेकिन उनकी विद्वता से प्रभावित होकर, इन्दौर के महाराजा "मल्हार राव होल्कर" ने अपने पुत्र "खंडेराव" का विवाह उनसे से करवा दिया. उनके एक पुत्र (मालेराव) और एक पुत्री (मुक्ताबाई) थी. राजा मल्हार राव ने अपनी पुत्रबधू को सैन्य प्रशिक्षण लेने को भी कहा.
जब वे मात्र 29 बर्ष की थीं और बच्चे भी बहुत छोटे थे, तब ही सन 1754 में उनके पति "खंडेराव" का देहांत हो गया. पति के देहांत के बाद उन्होंने राज्य का संचालन सम्हाला और अपने स्वसुर के मार्गदर्शन में, उन्होंने इतनी कुशलता से राज्य का प्रशासन चलाया कि - उनकी गणना आज दुनिया के आदर्श शासकों में की जाती हैं.
रानी अहिल्याबाई भगवान शिव की भक्त थीं. उन्होंने भगवान् शिव का राज्य का राजा घोषित किया था तथा स्वयं उनकी सेविका बनकर राज्य का संचालन किया. उनका रहन-सहन बिल्कुल सादा था. जितनी कुशकता से वे राज्य का संचालन करती थी उतनी ही निष्ठा से वे भगवान का पूजन और श्रेष्ठ धर्मग्रंथो का अध्ययन करती थीं.
उन्होंने अपने राज्य के प्रशासन को जिला, तहसील और पंचायत में बाँट दिया. जिलों का कार्य उनके मंत्री देखते थे लेकिन अंतिम निर्णय रानी अहिल्याबाई का ही होता था. उनके शासन में व्यवसाय का बहुत विस्तार हुआ. दूर दूर से आकर कारीगर वहां बसने लगे और देखते ही देखते मालवा बस्त्र निर्माण का केंद्र बन गया.
उस समय नियम था कि पति की म्रत्यु के बाद यदि पुत्र न हो तो सम्पति पर सरकार का कब्जा हो जाता था उन्होंने विधवा को सम्पत्ति का अधिकार दिलवाया. वे युद्ध के समय में हाथी पर बैठकर स्वयं युद्ध का नेत्रत्व करती थीं. वे भगवान शिव की भक्ते थीं और इसलिए उन्हों ने 1777 में विश्व प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण कराया.
इसके अलावा उन्होंने काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, द्वारिका, बद्रीनारायण, रामेश्वर, जगन्नाथ पुरी इत्यादि प्रसिद्ध तीर्थस्थानों पर मंदिर बनवाए और तीर्थयात्रियों के लिए धर्म शालाएं खुलवायीं. कलकत्ता से बनारस तक की सड़क, बनारस में अन्नपूर्णा का मन्दिर , गया में विष्णु मन्दिर उनके बनवाये हुए हैं.
इसके अतिरिक्त इन्होंने अनेको नदियों पर घाट बनवाए, कुओं औरबावड़ियों का निर्माण करवाया, मार्ग बनवाए, भूखों के लिए अन्नक्षेत्र (लंगर) खोले, प्यासों के लिए प्याऊ बिठलाईं, मंदिरों में विद्वानों की नियुक्ति की तथा शास्त्रों के मनन-चिंतन और प्रवचन की भी अनेकों व्यवस्थाएं कीं. 13 अगस्त सन् 1795 को उनका स्वर्गवास हो गया.

- विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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कोल्ड ड्रिंक्स से कैंसर

'कोल्ड ड्रिंक्स और बाकी चीजों में भूरा रंग लाने के लिए चीनी को अमोनिया और सल्फाइट के साथ उच्च दबाव और तापमान पर मिलाया जाता है। इस केमिकल रिऐक्शन में दो तत्व 2-एमआई और 4-एमआई बनते हैं। सरकारी स्टडी यह बात पता चली है कि ये तत्व चूहों के फेफड़े, लीवर और थायरॉइड कैंसर का कारण बने हैं।' अमेरिका के नैशनल टॉक्सिकोलॉजी प्रोग्राम ने कहा है कि इस बात के साफ सबूत हैं कि 2-एमआई और 4-एमआई, दोनों जानवरों में कैंसर पैदा करने वाले तत्व हैं इसलिए आदमियों को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। सीएसपीआई के एग्जेक्युटिव डायरेक्टर माइकल जैकबसन ने अमेरिका के फूड रेग्युलेटर के पास इस बारे में कार्रवाई करने के लिए एक याचिका दाखिल की है। उनका कहना है, ' कैंसर पैदा करने वाले तत्वों को खाने में कोई जगह नहीं मिलनी चाहिए, खासतौर पर तब जब उनका इस्तेमाल केवल रंग के लिए किया जाता हो।
अमेरिकी कानून में रंग के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले चार तरह के कैरेमल में अंतर किया गया है। इनमें से दो अमोनिया के साथ बनते हैं और दो अमोनिया के बिना। सीएसपीआई अमोनिया के साथ बनने वाले दो कैरेमल पर बैन चाहती है। सीएसपीआई की बात का पांच बड़े कैंसर एक्सपर्ट समर्थन करते हैं। कोल्ड ड्रिंक्स में इस्तेमाल किया जाने वाला तत्व कैरेमल 4 या अमोनिया सल्फाइट से प्रोसेस कैरेमल के नाम से जाना जाता है। सल्फाइट के बिना केवल अमोनिया के साथ बनाया जाने वाला कैरेमल 3 बियर, सोया सॉस और खाने की कई चीजों में इस्तेमाल किया जाता है। सीएसपीआई के मुताबिक जांच किए गए कोल्ड ड्रिंक्स में जितना 4एमआई पाया गया है, वह अमेरिका में हजारों लोगों में कैंसर फैला सकता है। सीएसपीआई की बात पर कोका-कोला और पेप्सी ने कुछ भी नहीं कहा है।

मुसलमानों से बच्चे पैदा करने की मशीन बनने की अपील

तुर्की के राष्ट्रपति रचेप तैय्यप एर्दोआन ने मुसलमानों से बच्चा पैदा करने मशीन बनने की अपील की है। एर्दोआन ने कहा है कि मुसलमानों को दुगने नहीं बल्कि चौगने बच्चे पैदा करने चाहिए ताकि हम दुनिया में इस्लाम का एकमेव झंडा लहरा सके। मुसलमान परिवार नियोजन और गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल नहीं करे। तुर्की की मुस्लिम आबादी 8 करोड़ की है। तुर्की ही क्यों भारत जैसे अनेकों देशों में मुस्लिम महिलाओं को बच्चे पैदा करने की मशीन बना दिया गया है। अगर ऐसी अपील किसी हिन्दू नेता ने की होती तो भारतीय मीडिया सिर आसमान पर ले लेती। ऐसी जनसंख्या बृद्धि की मानसिकता का दुष्परिणाम दुनिया ही झेलेगी। अधिक बच्चे पैदा कर खुद समस्या खडी करेंगे और कहेंगे कि मुस्लिम पिछड़े हैं। एक-दो बच्चों को पढ़ाना -लिखाना मुश्किल है पर दस-पन्द्रह बच्चे पैदा करोगे तो फिर कोई आतंकवादी बनेगा, कोई अपराधी बनेगा, कोई कूड़ा उठाने वाला बनेगा? दोष तो तुम्हारा ही है।

अगर हालात ऐसे ही निरन्तर बने रहे और मुस्लिम यू ही आबादी बढ़ाते रहे तो आने वाले वक्त में दुनिया सचमुच इस्लामिक प्रभाव में होगी और अपने आतंकवादी विचारों से दुनिया को ये लोग नर्क बना देगे

- विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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सोमवार, 30 मई 2016

महंगाई और खाद्यान की बर्बादी रोकने का सबसे उत्तम उपाय

हम जब छोटे थे तब हम देखते थे कि - कोई भी फसल आने पर हमारे यहाँ (सभी के यहाँ ) साल भर का गेहूं, धान, दालें, मसाले आदि एक साथ खरीद लिया जाता था. उसको साफ़ करके सुरक्षित तरीके से भर दिया जाता था. इसकी व्यवस्था इस तरह की जाती थी कि -अगले बर्ष की फसल आने के कम से कम तीन महीने बाद तक का स्टाक हो.
इसके अलावा अनेकों तरह के पापड़, बड़ियाँ और आचार भी बनाकर रख लिए जाते थे. एक साल तक उनको ताजा सब्जी के अलाबा और कुछ खरीदने की आवश्यकता ही नहीं होती थी. हर गली मोहल्ले में चक्कियां, स्पेलर, धान कुटाई मशीने लगी होती थी. लोगों को जितनी आवश्यकता होती थी उतना आटा, चावल, तेल, मशाले, पिसा लेते थे.
ऐसा करने से हिन्दुस्थान के अधिकाँश घर साल भर के लिए खाद्यान से भरपूर हो जाते थे. इसके अलाबा हर गली मोहल्ले में एक आध व्यक्ति चक्की लगाकर अपना कारोबार करता था. उसके बाद धीरे धीरे सरकारों द्वारा साजिश के तहत चक्कियों को बंद करवाया गया. आसपास चक्की न रहने पर लोगों ने दुकान से पिसा हुआ सामन खरीदना शुरू कर दिया.
उसके बाद लोगों को सालभर का अनाज एकसाथ खरीदने की आवश्यकता नहीं रही और महिलाओं को भी यह काफी आसान लगने लगा. इसने जन्म दिया मंहगाई और खाद्यान की बर्बादी को. बीस करोड़ परिवारों द्वारा 10 क्विंटल अनाज सम्हालना बहुत आसान था लेकिन सरकार द्वारा 200 करोड़ क्विंटल अनाज सम्हालना बहुत मुश्किल है.
इसके बाद, कारोबार में बड़ी कम्पनियां कूद पड़ीं. फसल से समय किसान से कम दाम में अनाज खरीदती हैं उसे अपने गोदामों में जमा करती हैं और उसके बाद दाम बढ़ाकर दोगुना /तीनगुना मुनाफ़ा बसुलती हैं. जब नई फसल आने वाली होती है तो कुछ दिन पहले एकबार फिर जमा अनाज की कीमत गिरा देती हैं, जिससे किसान को ज्यादा भाव न देना पड़े.
मेरा सरकार से निवेदन है कि - लोगों को कुटीर उद्योग के रूप में चक्कियां / स्पेलर आदि लगाने की इजाजत दी जाए तथा लोगों को फसल के समय एकसाथ अनाज खरीदने को प्रोत्साहित किया जाए. ऐसा करने से भंडारण समस्या और मंहगाई दोनों पर काबू पाया जा सकेगा और लाखों लोगों को रोजगार मिलेगा सो अलग.

- विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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भारत की हजार वर्ष की गुलामी का सच

भारत कभी गुलामी के जंजीरों में नहीं जकड़ा, ना ही कथित सल्तनत काल में (सल्तनत जैसा कोई काल ही नहीँ था, ये सुपारी इतिहासकारों का दिया हुआ शब्द है) और ना ही मुल्ले मुगलों के काल में और ना ही अंग्रेजों के काल में,
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वास्तविकता यह है कि, मुल्ले मुगलों के काल में भारत की सिर्फ कुछ दिल्ली, आगरा, हैदराबाद जैसी रियासतों पर उनका अधिकार था ना कि भारत पर, उस समय देश नहीं बल्कि राजसत्ता के आधार पर राज्य होते थे,
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विदेशी आक्रमणकारी सिर्फ राजसत्ता या फिर राजसत्ता के अधीन आने वाली रियासत जीतते था कि ना कि भारतवर्ष को, पूरे भारतवर्ष की बात छोड़ो आजतक कोई भी विदेशी आक्रमणकारी कभी एक दिशा नहीं जीत सका, .
मुल्ले मुगल भारत में कभी उन रियासतों पर भी राज नहीं कर पाये जहां उन्हें क्षणिक विजय मिली बल्कि सदा भारतीय योद्धाओं से संघर्षरत रहे,
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कभी आपने सोचा है आपको सन् 1000 से 1900 तक के मुल्ले मुगल राजाओं का भारत की इतिहास की किताबो में वर्णन तो मिलता है लेकिन उनसे संघर्ष करने वाले भारतीय योद्धाओं का कभी नहीं, क्यों ???
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सबसे जरूरी प्रश्न यह कि, अगर भारत पर मुस्लिमों ने 800 साल राज किया तो वर्तमान समय में भारतीय उपमहाद्वीप (भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार व अन्य हिस्से) के मुस्लिम इतने कंगाल फटेहाल क्यों ? 800 साल राज किया तो राज जैसा कुछ झलकना भी तो चाहिए,
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मुल्ले मुगलों ने भारतीय सभ्यता को ही उजाड़ने का प्रयास किया लेकिन उनसे भी खतरनाक ब्रिटिशों ने भारत का सारा मूल इतिहास ही गायब कर दिया, जो गायब किया, किया ही, इसके साथ ही फर्जी इतिहास भी प्लांट किया,
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हद तो तब हो गयी जब ब्रिटिशों ने लालकिला, ताजमहल, क़ुतुब मीनार, अढ़ाई दिन का झोपड़ा, भारतीयो के किलों को मुल्लों के नाम से Renew कर दिया, रिसर्च का विषय है, जो अरबी व तैमूरवंशी मुल्ले मुगल अपने यहां ढंग की मस्जिद व झोपड़ा तक ना बना सके भारत आके उनकी कला जाग गयी,
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इन कलाओं को एक जबरदस्ती का नाम भी दिया गया 'इस्लामिक स्थापत्य कला/इस्लामिक शैली' ये कला कहाँ से आई ? इसका जन्म कहाँ हुआ ? इस स्थापत्य कला या शैली पर आधारित कितनी बिल्डिंगे हैं अरब में ? वास्तविकता में इस्लामिक स्थापत्य कला या इस्लामिक शैली जैसा कोई शब्द नही है मुस्लिमो की डिक्शनरी में, ये सब एक पर्दे हैं जो झूठ को ढकने के लिए इतना ज्यादा चढ़ाये गए कि सत्य दब गया,
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जिस किसी को मुल्ले मुगलों द्वारा बनवाई गयी बिल्डिंगों पर रिसर्च करना है कर सकता है और खुद असलियत देख सकता है
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इसी तरह अंग्रेजों का भारत उपनिवेश रहा ना कि गुलाम, भारत ने कभी अंग्रेजो के सामने हथियार नहीं डाले, जितना हो सकता था भारतीयों ने अंग्रेजों से संघर्ष किया और जगह जगह उन्हें कुत्ते की तरह मारा था, इसी तरह अंग्रेजो के समय भारतीय राजाओं ने अंग्रेजो से सन्धि समझौते कर राज चलाया, "भारत में कुछ जगह अंग्रेजो के कानून चले ना कि पूरे भारत में,"
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कहने का निष्कर्ष यह है कि, मुस्लिमों की 800 साल वाली गुलामी, अंग्रेजो की 250 साल गुलामी सिवाय एक प्लांटेड बकवास से ज्यादा कुछ नहीं है, इस गुलामी वाले प्लांटेड अध्याय को प्लांट करने के लिए जितना ज्यादा ब्रिटिश दोषी हैं उतना ही ज्यादा इसे फैलाने के किये संघी और वामपंथी
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इस बकवास ने हमारा भारी नुक्सान किया, इसे भारतीयों को हीन भावना से ग्रसित बनाने के लिए प्लांट किया गया था और संघियों वामपंथियो ने ब्रिटिशों के इस काम को आगे बढ़ाया,
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आजकल किताबो में पढ़ाया जाता है और 15 अगस्त 26 जनवरी को हमे याद दिलाया जाता है कि, भारत पहले गुलाम था और अब आजाद हो गया है, लेकिन वास्तव में भारत गुलाम बना तो 1947 और 1950 में जब भारत विदेशी शक्तियों और बैंकर्स माफियाओं का पूर्णतया गुलाम बन गया,
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वर्तमान में हर भारतीय गुलाम है, विदेशियों द्वारा थोपे गए करेंसी व्यवस्था, लोकतंत्र, संविधान और कानून का,
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खुद ही सोचो क्या शैतान ब्रिटिश भारत के मित्र थे जो वो भारत के भले के लिए हमें लोकतंत्र देंगे, चुनावी व्यवस्था देंगे, संविधान देंगे, कानून देंगे, कागज के नोटों रुपयों वाली करेंसी व्यवस्था देंगे ?
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जिस तरह विश्वयुद्ध एक फाल्स फ्लेग ऑपरेशन था विश्व को गुमराह करने के लिए उसी तरह भारत में मुगलो और ब्रिटिश हुकूमत भी प्लांटेड है ताकि ब्रिटिश भारत में छोड़े मुग़लवंशियों ( बलात्कार अथवा जबरन हिन्दू से मुसलमान बने कटुओ ) से अलग अलग जातियों में बटे हिन्दू लड़ते मरते रहे |

- विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल
सनातन संस्कृति संघ का सहयोगी संगठन

इस्लामिक बैंक देश-धर्म को बर्बाद कर देगा

बैंकों के बारे में कहा जाता है कि, "अगर आपको बैंक लूटना हो तो एक बन्दूक खरीद लो और अगर पूरा शहर लूटना हो तो एक बैंक खोल लो"
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आजकल इस्लामिक बैंक की काफी चर्चा है, मोदी और उनके मित्र जफर सरशेवाला ने भारत में इस्लामिक बैंक तो खुलवा दिया लेकिन वो अभी ना ही इसकी असलियत और परिणामो से परिचित हैं और ना ही उसके साइड इफ़ेक्ट के बारे में, कोई भी ऐसा बैंक अगर वो बाहरी है या प्राइवेट तो देश के लिए खतरा ही है,
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उसमे भी शरिया कानून पर आधारित इस्लामी बैंक, शरिया का काम ही गैर मुस्लिम देशों में शरियत का प्रभाव जमाना है, इस तरह ये बैंक भारत में शरियत आधारित एक और संस्थान के रुप में खड़ा होगा,
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लोग आतंकवाद के लिए ख़ुफ़िया एजेंसियों, मुल्लों मौलवियों और आतंकी संगठनो का ही कनेक्शन जानते हैं पर कम ही लोग जानते हैं कि, सबसे बड़ा आतंकी संगठन इस्लामिक बैंक व HSBC जैसे बैंक ही हैं,
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आतंक और ड्रग्स का सारा पैसा इन्हीं बैंकों के जरिये आता जाता है और HSBC बैंक तो ड्रग्स के पैसे से ही बना था (ड्रग्स रैकेट और आतंकी हमलो को लेकर की गयी कई जांचों में इस बैंक का नाम सामने आया है)
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इसी तरह इस्लामिक बैंक है, इसका लक्ष्य इस्लामिक देशों का डेवलपमेंट कम आतंकवाद फैलाना और सऊदी अरब की इच्छाओ की पूर्ति करना ज्यादा है, आतंक की ज्यादातर फंडिंग सऊदी इसी के जरिये करता है, इस्लामिक डेवलॅपमेंट बैंक के 56 सदस्य देश हैं जिनसे जुटाए गए पैसों का प्रयोग दुनिया भर में फैले सऊदी मिशनों पर खर्च किया जाता है,
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इस बैंक पर ये भी आरोप हैं कि CAIR (Council on American–Islamic Relations) नामक संस्था को इसी ने फंड किया था, बता दें कि CAIR ही वह माध्यम है जिसके जरिये सऊदी जैसे इस्लामिक देशो के साथ मिलकर अमेरिका आतंकवाद फैलाता है,
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मोदी सरकार अनजाने में देश का बंटाधार कर ही रही है, अब इस्लामिक आतंकियों को फंड देने के लिए एक और माध्यम मिल जाएगा, ये किसी से छुपा नही है कि आतंकवाद का ज्यादातर फंड वाया सऊदी होकर ही आता है फिर सऊदी प्रभुत्व वाले इस्लामिक बैंक खोलना कहाँ की समझदारी हैं ?
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- विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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इस्लाम में हिन्दू काफिर है ?

हिन्दू का उल्लेख मैं काफिर केवल तब ही करता हूँ जब इस्लाम पर चर्चा करता हूँ। इसका ठोस कारण भी है । पहली बात तो यह है कि हिन्दू शायद ही इस्लाम के बारे में कुछ पढ़ते हैं । हिन्दू जब पढ़ते हैं और देखते हैं कि इस्लाम काफिरों के बारे में क्या कहता है, तो वे भयाकुल हो जाते हैं और अपने मुस्लिम दोस्तों से पूछते हैं कि यह सब क्या है ।

उनके मुस्लिम मित्र केवल तकिया - मुदरत करते हैं और जवाब देते हैं 'ओह यह तो काफिरों के बारे में है, लेकिन तुम तो हिन्दू हो । "

असलियत में हर गैर मुसलमान काफिर ही होता है । भाषा और शब्द हमेशा बिलकुल exact ही होने चाहिए अगर तकिया - मुदरत के कोहरे को काटना है क्योंकि झूठ इस्लाम का सब से बड़ा शस्त्र है ।

हिरनों के लिए अन्य हिरन, हिरन हैं, लेकिन भेड़ियों के लिए वे बस उसका खाना है । अगर भेड़िया कहे कि वो खाना खाने जा रहा है तो हिरन खुश होता है कि भेड़िया खाना खाने जा रहा है । लेकिन हम जो ठहरे हिरन, भेड़िये खाना खाये उसमें हमें कैसा खुश होना?

- विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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क्या हिन्दू समाज संजय लीला भंसाली के सेक्युलर हृदय को भय से भरेगा ?

दुष्ट सेक्युलर भाड़ निर्देशिका द्वारा इतिहास को विकृत कर जोधा अकबर नाटक बनाये जाने के बाद अब दूसरे एक और सेक्युलर संजय लीला भंसाली द्वारा मुस्लिम आक्रान्ता अल्लाउदीन खिलजी पर फ़िल्म बनाने की घोषणा की गई है। इस फ़िल्म में भंसाली आक्रान्ता खिलजी द्वारा रानी पद्मावती पर बुरी नियत रखने वाले खिलजी को अथाह प्रेमी के रूप में दिखाने की योजना है। यह प्रयास न केवल खिलजी का प्रतिरोध करने वाले वीर हिन्दू पूर्वजों का अपमान है अपितु इतिहास के सत्य तथ्यों की अनदेखी करना भी है।

खिलजी सुल्तान के कारनामों को ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ पढ़िए-

जब जलालुद्‌दीन खिलजी ने रणथम्भौर पर चढ़ाई की तो रास्ते में झौन नामक स्थान पर उसने वहाँ के हिन्दू मंदिरों को नष्ट कर दिया। उनकी खंडित मूर्तियों को जामा मस्जिद, दिल्ली, की सीढ़ियों पर डालने के लिए भेज दिया गया जिससे वह मुसलमानों द्वारा सदैव पददलित होती रहें।(बदायुनी : सीताराम गोयल स्टोरी ऑफ इस्लामिक इम्पीरियलिज्म इन इंडिया में उद्धत, पृ. 46 )

किन्तु इसी जलालुद्‌दीन ने, मलिक छज्जू मुस्लिम विद्रोही को कत्ल करने से, यह कहकर इंकार कर दिया कि 'वह एक मुसलमान का वध करने से अपनी सिहांसन छोड़ना बेहतर समझता है।'(ईलियट एंड डाउसन, खंड-3, पृ. 140) दया और भातृभाव केवल मुसलमानों के लिये है। काफिर के लिये नहीं।(एम. आर. बेग मुस्लिम, डिलेमा इन इंडिया, पृ. 13)

अलाउद्‌दीन खिलजी जो जलालुद्‌दीन का भतीजा और दामाद भी था, और जिसका पालन पोण भी जलालुद्‌दीन ने पुत्रवत किया था, धोखे से, वृद्ध सुल्तान का वध कर दिल्ली की गद्‌दी पर बैठा। हिन्दुओं से लूटे हुए धन को दोनों हाथों से लुटा कर उसने जलालुद्‌दीन के विश्वस्त सरदारों को खरीद लिया अथवा कत्ल कर, दिया। जब उसकी गद्‌दी सुरक्षित हो गई तो उसका काफिरों (हिन्दुओं) के दमन और मूर्तियों को खंडित करने का धार्मिक उन्माद जोर मारने लगा। 1217 ई. में उसने अपने भ्राता मलिक मुइजुद्‌दीन और राज्य के मुखय आधार नसरत खाँ को, जो एक उदार और बुद्धिमान योद्धा था, गुजरात में कैम्बे (खम्भात) पर, जो आबादी और संपत्ति में भारत का विखयात नगर था, आक्रमण के लिये भेजा। चौदह हजार (14,000) घुड़सवार और बीस हजार (20,000) पैदल सैनिक उनके साथ थे।(अब्दुल्लाह वसाफ : तारीखे वसाफ, खण्ड-3, पृ. 42 (सीताराम गोयल : द कलकत्ता कुरान पेटीद्गान में उद्धत)

मंजिल पर मंजिल पार करते उन्होंने खम्भात पहुँच कर प्रातःकाल ही उसे घेर लिया, जब वहाँ के काफिर निवासी सोये हुए थे। उनीदे नागरिकों की समझ में नहीं आया कि क्या हुआ। भगदड़ में माताओं की गोद से बच्चे गिर पड़े। मुसलमान सैनिकों ने इस्लाम की खातिर उस अपवित्र भूमि में क्रूरतापूर्वक चारों ओर मारना काटना प्रारंभ कर दिया। रक्त की नदियाँ बह गई। उन्होंने इतना सोना और चाँदी लूटा जो कल्पना के बाहर है और अनगिनत हीरे, जवाहरात, सच्चे मोती, लाल औरपन्ने इत्यादि। अनेक प्रकार के छपे, रंगीन, जरीदार रेशमी और सूती कपड़े।(अब्दुल्लाह वसाफ : पूर्वोद्धत, पृ. 43)

'उन्होंने बीस हजार (20,000) सुंदर युवतियों को और अनगिनत अल्पायु लड़के-लड़कियों को पकड़ लिया। संक्षेप में कहें तो उन्होंने उस प्रदेश में भीषण तबाही मचा दी। वहाँ के निवासियों का वध कर दिया उनके बच्चों को पकड़ ले गये। मंदिर वीरान हो गये। सहस्त्रों मूर्तियाँ तोड़ डाली गयीं। इनमें सबसे बड़ी और महत्त्वपूर्ण सोमनाथ की मूर्ति थी। उसके टुकड़े दिल्ली लाकर जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बिछा दिये गये जिससे प्रजा इस शानदार विजय के परिणामों को देखे और याद करे। (उपरोक्त, पृ. 44)

रणथम्भौर पर आक्रमण के लिये अलाउद्‌दीन ने स्वयं प्रस्थान किया। जुलाई 1301 ई. में विजय प्राप्त हुई। किले के अंदर तमाम स्त्रियाँ जौहर कर चिता में प्रवेश कर गईं। उसके बाद पुरुष तलवार लेकर मुस्लिम सेना पर टूट पड़े और कत्ल कर दिये गये। सभी देवी देवताओं के मंदिर ध्वस्त कर दिये गये। (ईलियट एंड डाउसन, खण्ड-3, पृ.76 (अमीर खुसरो : तारीखे अलाई))

अलाउद्‌दीन खिलजी ने दिल्ली में कुतुबमीनार से भी बड़ी मीनार बनाने का इरादा किया तो पत्थरों के लिए हिन्दुओं के मंदिरों को तुड़वा दिया गया। उस स्थान पर उन मंदिरों के पत्थरों से ही'कव्बतुल इस्लाम मस्जिद' का निर्माण भी किया जो आज भी शासन द्वारा सुरक्षित राष्ट्रीय स्मारकों के रूप में मौजूद है।

उज्जैन में भी सभी मंदिर और मूर्तियों का यही हाल हुआ। मालवा की विजय पर हर्ष प्रकट करते हुए खुसरो लिखता है कि 'वहाँ की भूमि हिन्दुओं के खून से तर हो गई।' (ईलियट एंड डाउसन, खण्ड-3, पृ.76 (अमीर खुसरो : तारीखे अलाई))

चित्तौड़ के आक्रमण में अमीर खुसरो के अनुसार इस सुल्तान ने 3,000 (तीन हजार) हिन्दुओं को कत्ल करवाया। (उपरोक्त पृ. 77)

'जो वयस्क पुरुष इस्लाम स्वीकार करने से इंकार करते थे, उनको कत्ल कर देना और द्गोष सबको, स्त्रियों और बच्चों समेत, गुलाम बना लेना साधारण नियम था। अलाउद्‌दीन खिलजी के 50,000 (पचास हजार) गुलाम थे जिनमें अधिकांद्गा बच्चे थे। फीरोज तुगलक के एक लाख अस्सी हजार (1,80,000) गुलाम थे।' ( के. एस. लाल : इंडियन मुस्लिम व्हू आर दे, पृ. 24)

अलाउद्‌दीन खिलजी के समय, जियाउद्‌दीन बर्नी की दिल्ली का गुलाम मंडली के विषय में की गई टिप्पणी है कि आये दिन मंडी में नये-नये गुलामों की टोलियाँ बिकने आती थीं। (उपरोक्त) दिल्ली अकेली ऐसी मंडी नहीं थी। भारत और विदेशों में ऐसी गुलाम मंडियों की भरमार थी, जहाँ गुलाम स्त्री, पुरुष और बच्चे भेड़ बकरियों की भाँति बेचे और खरीदे जाते थे।

अलाउद्‌दीन खिलजी ही क्यों, अकबर को छोड़कर, सम्पूर्ण मुस्लिम काल में, जो हिन्दू कैदी पकड़ लिये जाते थे, उनमें से जो मुसलमान बनने से इन्कार करते थे, उन्हें वध कर दिया जाता था अथवा गुलाम बनाकर निम्न कोटि के कामों (पाखाना साफ करना इत्यादि) पर लगा दिया जाता था। शेष गुलामों को सेना ओर शासकों के बीच बाँट दिया जाता था। फालतू गुलाम मंडियों में बेंच दिये जाते थे।

संजय लीला भंसाली द्वारा ऐसे धर्मांध, मतान्ध, जिहादी, लालची, अत्याचारी, चरित्रहीन तानाशाह पर फ़िल्म बनाकर उसका महिमामंडन करना निश्चित रूप से निंदनीय है।

अब देखते है हिन्दू हिन्दू चिल्लाने वाला हिन्दू समाज अब केवल संजय लीला भंसाली के खिलाफ भाषण देकर, पुतले फूंककर, या धरना देकर इतिश्री कर लेगा जैसा उसने एकता कपूर के साथ किया अथवा वीरोचित मार्ग अपनाकर इन सेक्युलर भाड़ों के हृदय को भय से भरेगा !

- विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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आज के अलबरुनी ?

अलबरुनी अर्थात गणित , विज्ञान , ज्योतिष , अरबी , फारसी ....संस्कृत का ज्ञाता , इतिहास के पन्नों में दर्ज महान विद्वान ...सायद कम ही लोगों को ज्ञात होगा कि अलबरूनी इस्लामिक आक्रांता मोहम्मद गजनवी के दरबार में प्रमुख ज्योतिष और सलाहकार की भूमिका में नियुक्त था | मोहम्मद गजनवी को सोमनाथ का मंदिर लूटने की सलाह अलबरूनी ने ही दी थी | कारण था , अपार धन का लालच और उनका विश्वास कि मंदिर विध्वंस के पश्चात भारत में सनातन धर्म मर जायेगा और अरब साम्राज्यवादी पंथ इस्लाम की जड़ें हमेशा के लिए पुख्ता हो जाएँगी | गजनवी के लिए यह काम अत्यंत कठिन था क्योंकि सोमनाथ कोई सीमावर्ती इलाके में नहीं सुदूर गुजरात में था .... , तो इस काम के लिए अलबरूनी को भारत भेजा गया | यहाँ रहकर उसने संस्कृत का ज्ञान अर्जित किया , अपने तमाम शिष्य भी बनाये जिसमे पंजाब नरेश जयपाल प्रमुख थे , कारण था उनको संतान प्राप्ति के लिए अलबरूनी ने कोई ख़ास जड़ी – बूटी दी थी | अलबरूनी पूरे दो सालों तक अन्य तमाम लोगों को छोटे- छोटे कार्यो से उपकृत करता रहा , सोमनाथ के मंदिर प्रवंधन के सारे राज अर्थात उनके बीच के मन- मुटाव अच्छे से समझ लिए | मंदिर के आस – पास अपने चहेतों का जाल बुन दिया | इस प्रकार गजनवी के प्रमुख ज्योतिष सलाहकार ने उपयुक्त माहौल बनाकर , उचित समय पर सन्देश भेज दिया | गजनवी को सिंध और पंजाब ने सीधा रास्ता दिया ...यानी कोई प्रतिकार नहीं ; कारण था दोनों अलबरूनी के एहसानों तले दबे थे ....फिर उसने सीधा मार्ग ना चुनकर रेगिस्तानी मार्ग चुना ताकी बिना किसी युद्ध के रास्ता अबाध्य रहे | इस प्रकार गजनवी आसानी से बिना किसी बड़े नुकसान के सोमनाथ पहुँच गया ...आगे जो हुवा वह सर्वबिदित है | सोमनाथ तोडा गया , वहां की अकूत सम्पदा गजनी लूट ले गया , भेड़ों – बकरीयों की तरह तमाम हिन्दुओं को गुलाम बना लिया और भारतीय औरतें दो – दो दीनारों में गजनी के बाजारों में बिकती रहीं ...| उसका सपना सच हो गया जो लोग अरबों तथा तुर्की लुटेरों से अपनी औरतों और बेटियों की सुरक्षा न कर सके...? वो आज हमारे देश में अल्पसंख्यक मुसलमान बन गए..!! आज वो मुसलमान बनकर अपने ही हिन्दू पूर्वजों को आँखें दिखा रहे हैं....!!
तो मित्रों ..ये जो विद्वान दार्शनिक टाइप मुसलमान शायर , फिल्ममेकर , अभिनेता , बुद्धिजीवी .....कहानीकार ; हमारे आप के बीच दिखते हैं ना ....वो कोई कलंदर – फकीर नहीं हैं......बल्कि आज के अलबरूनी हैं ...ये सब किसी ना किसी तरह से अलबरूनी की भूमिका अदा कर रहे हैं ... कोई लव – जिहाद का माहौल तैयार करवा रहा है तो कोई इस्लाम को शान्ति का मजहब बताता फिरता है तो कोई सांस्कृतिक अधपतन को गंगा – जमुनी तहजीब बताता फिरता है | अब फैंसला हमारे – आप के हांथों में है कि हम इनके जाल में फंसकर , मीठी – मीठी बातें सुनकर , इनकी दोस्ती के झांसे में आकर सोमनाथ जैसे या उससे भी बड़े बिध्वंश करवायेंगे या अपनी संस्कृति को सुरक्षित रखेंगे ......

- विश्वजीत सिंह अनन्त
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मनुष्यों के प्रकार

सौ में से निन्यानबे लोगों को चार श्रेणियों में बांटा जा सकता है |

१. नाई : जो लोग किसी से मिलते ही बालों को देखें - बालों के बारे में बात करें - हेयर स्टाइल - तेल - शैपू - डाई - इत्यादि की बातें करें - वो नाई प्रवृत्ति के लोग होते हैं |

२. दर्जी : जो लोग किसी से मिलते ही कपड़ों को देखें - कपड़ों की स्टाइल - डिजाईन - प्रिंट - फैशन - इत्यादि की बातें करें - वो दर्जी प्रवृत्ति के लोग होते हैं |

३. मोची : जो लोग किसी से मिलते ही जूतों को देखें - जूतों की स्टाइल - डिजाईन - इत्यादि की बातें करें - वो मोची प्रवृत्ति के लोग होते हैं |

४. चर्मकार : जो लोग किसी से मिलते ही उसके चर्म सौन्दर्य अर्थात Strategically Placed Meat को निहारें - मांसल सौन्दर्य की बातें करें - वो कसाई प्रवृत्ति के लोग होते हैं |

मानो या न मानो - सौ में से निन्यानवे लोग उपरोक्त चार प्रकार की श्रेणियों में आते हैं |
बाकी के बचे एक प्रतिशत लोग ही केवल दिमाग वाले होते हैं और वे ही दूसरों में दिमाग की खोज में रहते हैं |

यह संसार केवल एक प्रतिशत अथवा उससे भी कम लोगों के दिमाग की बदौलत चल रहा है |

- विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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शनिवार, 28 मई 2016

क्रान्ति से शान्ति

मोहनदास गाँधी का कहना था-शांति- शांति-शांति

जबकि वीर सावरकर का नारा था -क्रांति-करांति-क्रांति।

लेकिन अफ़सोस आज हम उस मुकाम पर खड़े है जहाँ से इतिहास हमें चुनोती दे रहा है। आज कि पीढी वीर सावरकर के बारे मैं कुछ ज्यादा नहीं जानती है क्योंकि धर्मनिरपेक्षता का रोना रोने वालो ने देश मैं क्रांति का उदघोष करने वालो से अन्याय किया, उनका पूरा इतिहास सामने ही नहीं आने दिया। लाल रंग मैं रंगे बिके हुए इतिहासकारों ने क्रांतिकारिओं के इतिहास को विकृत किया । पाठ्य पुस्तकों से उनके जीवन सम्बन्धी लेख हटाये गए।

वीर सावरकर एक महान राष्ट्रवादी थे। भारतीय स्वंत्रता संग्राम मैं उनकी भूमिका अतुलनीय है। वीर सावरकर भारत के पहले क्रन्तिकारी थे जिन्होंने विदेशी धरती से भारत कि स्वाधीनता के लिए शंखनाद किया। वो पहले स्वाधीनता सेनानी थे जिन्होंने भारत कि पूर्ण स्वतंत्रता कि मांग की। वो पहले भारतीय थे जिनकी पुस्तके प्रकाशित होने से पहले ही जब्त कर ली गई और वो पहले छात्र थे जिनकी डिग्री ब्रिटिश सरकार ने वापिस ले ली थी। वस्तुत: वह भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अमर सेनानी, क्रांतिकारिओं के प्रेरणास्त्रोत, अद्वितीय लेखक, राष्ट्रवाद के प्रवर्तक थे, जिन्होंने अखंड हिंदुस्तान के निर्माण का संकल्प लिया।

उनका सारा जीवन हिंदुत्व को समर्पित था। उन्होंने अपनी पुस्तक 'हिंदुत्व' मैं हिन्दू कोण है की परिभाषा मैं यह श्लोक लिखा--

"आसिंधू सिन्धुपर्यन्तास्य भारतभूमिका ।

पितृभू: पुन्याभूश्चैवा स वै हिन्दूरीति स्मृत:।। "

जिसका अर्थ है कि भारत भूमि के तीनो ओर के सिन्धुओं से लेकर हिमालय के शिखर से जहाँ से सिन्धु नदी निकलती है, वहां तक कि भूमि हिंदुस्तान है एवं जिनके पूर्वज इसी भूमि पर पैदा हुए है ओर जिनकी पुण्य भूमि यही है वोही हिन्दू है। " सावरकर का हिन्दू धर्मं से नहीं एक व्यवस्था, आस्था, निष्ठा, त्याग का परिचायक है, जो सामाजिक समरसता को बढ़ने मैं अग्रसर हो।

वह तो फिरंगियों की चल से उद्वेलित थे जो जो की हिंदुस्तान मैं अपनी सत्ता को कायम रखने की लिए साम्प्रदायिकता को बढावा दे रहे थे। अंग्रेजो द्वारा देश के किसानों मजदूरों पर जुल्म ढहाने वाले उनके कतई बर्दाश्त नहीं थे। उन्होंने हिंदुत्व के नाम पर देश को संगठित करने का प्रयत्न किया। वीर सावरकर के क्रन्तिकारी विचारो और राष्ट्रवादी चिंतन से अंग्रेजो की नींद हरम हो गई थी और भयभीत अंग्रेजी सत्ता ने उन्हें कालापानी की सजा दी ताकि भारतीय जनता इनसे प्रभावित होकर अंग्रेजी सत्ता को न उखाड़ फैंके। वीर सावरकर ने अपनी निष्ठां और आत्मसम्मान पर कभी भी आंच नहीं आने दी। मदन लाल ढींगरा ने १ जुलाई ,१९०९ को कर्जन वायले की हत्या कर दी तब इंडिया हॉउस मैं इस हत्या की निंदा करने के लिए एक सभा हुई जिसमें सर आगा खान ने कहा की यह सभा सर्वसम्मति से इस हत्या की निंदा करती है। इतने मैं वीर सावरकर ने निर्भय होकर कहा "केवल मुझे छोड़कर"।

वीर सावरकर पर यह भी आरोप भी लगाया गया की उन्होंने मदन लाल ढींगरा को उकसाकर कर्जन वायले की हत्या करवाई है। १३ मार्च १९१० को उन्हें लन्दन के विक्टोरिया स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया गया। उससे पूर्व उनके दोनों भाइयों को भी क्रन्तिकारी गतिविधियों के लिए जेल मैं बंद कर दिया गया था। वीर सावरकर को जब इस बात का पता चला तो वे गर्व के साथ बोले "इससे बड़ी और क्या बात होगी की हम तीनो भाई ही भारत माता की आजादी के लिए तत्पर है।" इतिहास साक्षी है की १ जुलाई १९१० के ब्रिटेन से भारत ले जाने वाले समुद्री जहाज मैं सावरकर को बैठाया गया और वो ८ जुलाई १९१० को "स्वतंत्र भारत की जय" बोल कर समुद्र मैं कूद पड़े। अंग्रेजो ने खूब गोलियां चलाई पर निर्भय सावरकर लगातार कई घंटे तैरकर फ्रांस की सीमा मैं पहुँच गए जहाँ उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग मैं मुकदमा चलाया गया और उन्हें दो आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। जज ने जब उनसे कहा की अंग्रेज सरकार आपको ५० साल बाद रिहा कर देगी तो उन्होंने मजाक उड़ते हुए कहा की क्या अंग्रेज ५० वर्षो तक भारत मैं टिके रहेंगे। सजा सुनते ही उन्होंने व्यंग्य किया- चलो इसाई सत्ता ने हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म के सिधांत को मन लिया है।

वीर सावरकर को कला पानी की सजा के दोरान भयानक सैल्यूलर जेल मैं रखा गया। उन्हें दूसरी मंजिल की कोठी नंबर २३४ मैं रखा गया और उनके कपड़ो पर भयानक कैदी लिखा गया। कोठरी मैं सोने और खड़े होने पर दीवार छू जाती थी। उन्हें नारियल की रस्सी बनाने और ३० पोंड तेल प्रतिदिन निकलने के लिए बैल की तरह कोल्हू मैं जोता जाता था। इतना कष्ट सहने के बावजूद भी वह रत को दिवार पर कविता लिखते, उसे याद करते और मिटा देते। १३ मार्च १९१० से लेकर १० मई १९३७ तक २७ वर्षो की अमानवीय पीडा भोग कर उच्च मनोबल, ज्ञान और शक्ति साथ वह जेल से बाहर निकले जैसे अँधेरा चीर कर सूर्य निकलता है।

आजादी के बाद भी पंडित जवाहर लाल नेहरू और कांग्रेस ने उनसे न्याय नहीं किया। देश का हिन्दू कहीं उन्हें न अपना नेता मन बैठे इसलिए उन पर महात्मा गाँधी की हत्या का आरोप लगा कर लाल किले मैं बंद कर दिया गया। बाद मैं न्यायालय ने उन्हें ससम्मान रिहा कर दिया। पूर्वाग्रह से ग्रसित कांग्रेसी नेताओं ने उन्हें इतिहास मैं यथोचित स्थान नहीं दिया। स्वाधीनता संग्राम मैं केवल गाँधी और गांधीवादी नेताओं की भूमिका का बढा-चढ़ाकर उल्लेख किया गया।

वीर सावरकर की मृत्यु के बाद भी कांग्रेस ने उन्हें नहीं छोडा। सन २००३ मैं वीर सावरकर का चित्र संसद के केंद्रीय कक्ष मैं लगाने पर कांग्रेस ने विवाद खडा कर दिया था। २००७ मैं कांग्रेसी नेता मणि शंकर अय्यर ने अंडमान के कीर्ति स्तम्भ से वीर सावरकर के नाम का शिलालेख हटाकर महात्मा गाँधी के नाम का पत्थर लगा दिया। जिन कांग्रेसी नेताओ ने राष्ट्र को झूठे आश्वासन दिए, देश का विभाजन स्वीकार किया, जिन्होंने शेख से मिलकर कश्मीर का सोदा किया, वो भले ही आज पूजे जाये पर क्या वीर सावरकर को याद रखना इस राष्ट्र का कर्तव्य नहीं है???आजादी केवल गांधीवादियों की देन नहीं है बल्कि भगत सिंह, चन्द्र शेखर आजाद,राजगुरु,सुखदेव,नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और वीर सावरकर जैसे कर्न्तिकारियों के बलिदानों के चलते ही मिली है।। राष्ट्र इन सभी के बलिदानों को याद रखे और इन्हें सम्मान दे।

- विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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