रविवार, 8 मई 2016

इरविन - गांधी समझौता और भगतसिंह की फाँसी

मार्च 1931 में मोहनदास गांधी ने ब्रिटिस सरकार के प्रतिनिधि लार्ड एडवर्ड इरविन के साथ समझौता किया । इस समझौते के अन्तर्गत ब्रिटिस सरकार द्वारा कांग्रेसी आन्दोलन के सभी बंदी छोड दिये गये , परन्तु क्रान्तिकारी आन्दोलन गदर पार्टी के बंदी , लोदियों मार्शल ला के बंदी , अकाली बंदी , देवगढ , काकोरी , महुआ बाजार और लाहौर षडयन्त्र केश आदि के बंदियों को छोडने से इन्कार कर दिया । गांधी ने भी इस समझौते के अनुपालन में अपना आन्दोलन वापस ले लिया और अन्य आन्दोलन कर्ता क्रान्तिकारियों से भी अपना आन्दोलन वापस लेने की अपील की ।

गांधी की अपील के प्रत्युत्तर में लाहौर षडयन्त्र केस के क्रान्तिकारी सुखदेव ने गांधी के नाम खुला पत्र लिखकर गांधी पर क्रान्तिकारियों को कुचलने के लिए ब्रिटिस सरकार का साथ देने का आरोप लगाया था और पत्र में दो विचार धाराओं के बीच मतभेदों पर प्रकाश डाला था । उन्होंने इस समझोते पर सवाल खडे किये थे तथा गांधी से अपनी शंका का समाधान करने का आग्रह किया था । लेकिन गांधी ने सुखदेव के पत्र का कोई उत्तर नहीं दिया था । सुखदेव के पत्र का संक्षिप्त सार यह हैं -

"अत्यन्त सम्मानीय महात्मा जी आपने क्रान्तिकारियों से अपना आन्दोलन रोक देने की अपील निकाली हैं । कांग्रेस लाहौर के प्रस्तावानुसार स्वतन्त्रता का युद्ध तब तक जारी रखने के लिए बाध्य हैं जब तक पूर्ण स्वाधीनता ना प्राप्त हो जाये । बीच की संधिया और समझौते विराम मात्र हैं । यद्यपि लाहौर के पूर्ण स्वतन्त्रता वाले प्रस्ताव के होते हुए भी आपने अपना आन्दोलन स्थगित पर दिया हैं , जिसके फलस्वरूप आपके आन्दोलन के बन्दी छुट गए हैँ । परन्तु क्रान्तिकारी बंदियों के बारे में आप क्या कहते हो । सन 1915 के गदर पार्टी वाले राजबंदी अब भी जेलों में सड रहे हैं , यद्यपि उनकी सजाऐ पूरी हो चुकी है । लोदियों मार्शल ला के बंदी जीवित ही कब्रो में गडे हुए है , इसी प्रकार दर्जनों बब्बर अकाली कैदी जेल में यातना पा रहे है । देवगढ , काकोरी , महुआ बाजार और लाहौर षडयन्त्र केस , दिल्ली , चटगॉव , बम्बई , कलकत्ता आदि स्थानों में चल रहे क्रान्तिकारी फरार , जिनमें बहुत सी तो स्त्रियाँ है । आधा दर्जन से अधिक कैदी तो अपनी फाँसियों की बाट जोह रहे हैं । इस विषय में आप क्या कहते हैं । लाहौर षडयन्त्र के हम तीन राजबंदी जिन्हें फाँसी का हुक्म हुआ है और जिन्होंने संयोगवश बहुत बडी ख्याति प्राप्त कर ली है , क्रान्तिकारी दल के सब कुछ नहीं हैं । देश के सामने केवल इन्ही के भाग्य का प्रश्न नहीं हैं । वास्तव में इनकी सजाओं के बदलने से देश का उतना कल्याण न होगा जितना की इन्हें फाँसी पर चढा देने से होगा ।

परन्तु इन सब बातोँ के होते हुए भी आप इनसे अपना आन्दोलन खींच लेने की सार्वजनिक अपील कर रहे है । अपना आन्दोलन क्यों रोक ले , इसका कोई निश्चित कारण नहीं बतलाया । ऐसी स्थिति में आपकी इन अपीलों के निकालने का मतलब तो यहीँ हैं कि आप क्रान्तिकारियों के आन्दोलन को कुचलने में नौकरशाही का साथ दे रहेँ हों । इन अपीलों द्वारा स्वयं क्रान्तिकारी दल मेँ विश्वासघात और फूट की शिक्षा दे रहे हों ।

गवर्नमेंट क्रान्तिकारियों के प्रति पैदा हो गयी सहानुभूति तथा सहायता को नष्ट करके किसी तरह से उन्हेँ कुचल डालना चाहती है । अकेले में वे सहज ही कुचले जा सकते है , ऐसी हालत में किसी प्रकार की भावुक अपील निकाल कर उनमें विश्वासघात और फूट पैदा करना बहुत ही अनुचित और क्रान्ति विरोधी कार्य होगा । इसके द्वारा गवर्नर को , उन्हेँ कुचल डालने में प्रत्यक्ष सहायता मिलती हैं । इसलिए आपसे हमारी प्रार्थना है कि या तो आप क्रान्तिकारी नेताओं से जो कि जेलों में हैं , इस विषय पर सम्पूर्ण बातचीत कर निर्णय लीजिये या फिर अपनी अपील बन्द कर दीजिये । कृपा करके उपरोक्त दो मार्गो में से किसी एक का अनुसरण कीजिये । अगर आप उनकी सहायता नहीं कर सकते तो कृपा करके उन पर रहम कीजिये और उन्हें अकेला छोड दीजिये । वे अपनी रक्षा आप कर लेगे ।

आशा है आप अपरोक्त प्रार्थना पर कृपया विचार करेंगे और अपनी राय सर्व साधारण के सामने प्रकट कर देगे ।

आपका
अनेकों में से एक "

भगतसिंह व उनके साथियों को मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश आक्रोषित था व गांधी की ओर इस आशा से देख रहा था कि वह अनशन कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचाएगे ।

राष्ट्रवादियों ने गांधी से राजगुरू , सुखदेव और भगतसिंह के पक्ष में हस्तक्षेप कर ब्रिटिस सरकार से उनकी फाँसी माफ कराने की प्रार्थना की । परन्तु जनता की प्रार्थना को गांधी ने इस तर्क के साथ ठुकरा दिया कि मैं हिंसा का पक्ष नहीं ले सकता । जब प्रथम विश्वयुद्ध ( 1914 - 1918 ) के दौरान भारतीय सैनिकों ने हजारों जर्मनों को मौत के घाट उतारा तो क्या गांधी ने हिंसा का पक्ष नहीं लिया था ? परन्तु शायद वह हिंसा इसलिए नहीं थी , क्योंकि वे सैनिक अंग्रेजों की सेना में जर्मनों को मारने के लिए उन्होंने भर्ती कराये थे । विश्वयुद्ध के दौरान मोहनदास गांधी ने वायसराय चेम्स फोर्ड को एक पत्र भी लिखा था । पत्र में उन्होंने लिखा था -

" मैं इस निर्णायक क्षण पर भारत द्वारा उसके शारीरिक रूप से स्वस्थ पुत्रों को अंग्रेजी साम्राज्य पर बलिदान होने के रूप में प्रस्तुत किये जाने के लिए कहूँगा । "

प्रथम विश्वयुद्ध मेँ गांधी को ब्रिटिस साम्राज्य के प्रति उनकी सेवाओँ के लिए 'केसर-ए-हिन्द' स्वर्ण पदक से अलंकृत किया गया था ।

अगर गांधी हस्तक्षेप करते तो भगतसिंह और उसके साथियों को बचाया जा सकता था , क्योंकि ब्रिटिस सरकार ने ऐसे संकेत दिये थे । गांधीजी ने भगतसिंह व उसके साथियों की फाँसी माफ कराने के लिए लार्ड इरविन से वार्ता तो की लेकिन कोई दृढ इच्छा शक्ति प्रकट न की जिसके कारण राजगुरू , सुखदेव व भगतसिंह को नियम भंग कर 24 मार्च 1931 को प्रातःकाल दी जाने वाली फाँसी 23 मार्च को शाम में ही दे दी गई । सारा देश इस अन्याय के विरूद्ध उठ खडा हुआ , लेकिन गांधी शांत रहें ।

-विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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वन्दे मातरम्

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