बुधवार, 24 जून 2020

परमात्मा के मुख्य और निज नाम ओ३म् की महिमा




*परमात्मा के मुख्य और निज नाम "ओ३म्" की महिमा-*
वेद, उपनिषद्, ब्राह्मण ग्रंथ, महाभारत गीता, योगदर्शन, मनुस्मृति में एक "ओंकार का ही स्मरण और जप" करने का उपदेश दिया गया है। ओ३म् का जाप स्मरण शक्ति को तीव्र करता है,इसलिए वेदाध्ययन में मन्त्रों के आदि तथा अन्त में "ओ३म् "शब्द का प्रयोग किया जाता है।
*ओ३म् क्रतो स्मर ।।-(यजु० ४०/१५)* "हे कर्मशील ! 'ओ३म् का स्मरण कर।"
*ओ३म् प्रतिष्ठ ।।-(यजु० २/१३)* " ओ३म्' में विश्वास-आस्था रख !"
*ओ३म् खं ब्रह्म*-(यजु० ४०/१७) अर्थात् "मैं आकाश की तरह सर्वत्र व्यापक और महान् हूं मेरा नाम ओम् है।"
*ओम् स परि अगात् शुक्रं अकायम् अवर्णं अस्नाविरम्- यजुर्वेद ४०.०८* आत्मा में विराजमान इस परमात्मा को धीर पुरुष परा विद्या से साक्षात्कार किया करते हैं;क्योंकि यह ओ३म् इन्द्रियातीत है।वह नित्य, विभु, सर्वव्यापक, सूक्ष्म,अव्य तथा सब प्राणियों का कारण है। वह गोत्र, वंश, आंख, कान,हाथ,पांव से रहित है। वह संसार की बीज शक्ति है।वह अशरीर है।वह नाड़ी आदि बन्धनों से जकड़ा नहीं है।वह मलरहित है। पाप उसको बांध नहीं सकते।कोई स्थान उससे रिक्त नहीं। उसका कोई उत्पादक नहीं है। वह सवयं अपना स्वामी है।उसने अपनी सनातन प्रजाओं के लिए पदार्थों का ठीक ठीक रीति से विधान बनाया है।
*प्रश्नोपनिषद् में*:-पिप्पलाद ऋषि सत्यकाम को कहते हैं- हे सत्यकाम ! ओंकार जो सचमुच पर और अपर ब्रह्म है (अर्थात्) उसकी प्राप्ति का साधन है जो उपासक उस सर्वव्यापक परमेश्वर का ओ३म् शब्द द्वारा ध्यान करता है,वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।जो कृपासिन्धु,परमात्मा,अजर अमर अविनाशी सर्वश्रेष्ठ है,उस सर्वज्ञ अन्तर्यामी परमात्मा को सर्वसाधारण ओंकार के द्वारा प्राप्त होते हैं।
*कठोपनिषद -* सभी वेद जिस परमपद का बारंबार प्रतिपादन करते हैं सभी तप जिस पद का लक्ष्य करते हैं , जिसकी इच्छा से ब्रह्मचर्य का पालन होता है - उस परमपद को संक्षेप में "ओ३म्" कहा जा रहा है । अर्थात् यह अक्षर ही ब्रह्म तथा परब्रह्म है । क्षर अर्थात् नाशवान तथा अक्षर या शाश्वत सनातन ) ओंकार ही परब्रह्म प्राप्ति का श्रेष्ठ आलंबन है। इसके अवलंबन से महान ब्रह्म लोक की प्राप्ति होती है ।
*माण्डूक्योपनिषद्*:-ओंकार धनुष है,आत्मा तीर है और ब्रह्म उसका लक्ष्य कहलाता है।इसको अप्रमत्त(पूरा सावधान) पुरुष ही बींध सकता है,जब वह तीर के समान तन्मय हो जाता है।
*श्वेताश्वतर उपनिषद्*:-अपने देह को अरनी(नीचे की लकड़ी) बनाकर ओ३म् को ऊपर की अरनी बनाओ और ध्यान रुपी रगड़ के अभ्यास से अपने इष्टदेव परमात्मा के दर्शन कर लो।जैसे छिपी हुई अग्नि के रगड़ से दर्शन होते हैं वैसे ही "ओ३म्" द्वारा इस देह में आत्मा का दर्शन किया जा सकता है।
*छान्दोग्योपनिषद्*:-छान्दोग्योपनिषद् का भी जो सामवेद के महाब्राह्मण का एक भाग है,यही कथन है कि- "वह साधक जब उसे ब्रह्मलोक को जाना होता है,जिसे उसने उपासना द्वारा जाना है, ओ३म् पर ध्यान जमाता हुआ वहां जाता है" अतः प्रत्येक व्यक्ति को उचित है कि उस अविनाशी स्तुत्य "ओ३म्" नामक ब्रह्म की उपासना करे।
*तैत्तिरीयोपनिषद्*:-ओ३म् ब्रह्म का नाम है। ओ३म् ही सार वस्तु है।यज्ञ में इसी को सुनते सुनाते हैं। सामवेदी ओ३म् को ही पाते हैं। ऋग्वेदी भी इसी ओ३म् की ही स्तुति करते हैं। यजुर्वेदी अध्वर्यु भी अपने प्रत्येक वचन में ओंकार का ही बखान करते हैं।ब्रह्मा नामक ऋत्विक् ओंकार द्वारा ही आज्ञा देता है।अग्निहोत्र के लिए ओंकार के द्वारा ही आज्ञा दी जाती है।ब्रह्मवादी ओ३म् के द्वारा ही ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
*महर्षि पतञ्जलि योगदर्शन-1/27* "ओ३म्" को ही प्रणव कहा गया है ।इसके विधि पूर्वक जप से सभी अभीष्ट सिद्धिया प्राप्त होती हैं तथा चारों पुरुषार्थ संपन्न किया जाता है ।
*योगी याज्ञवल्क्य*:- जो ब्रह्म दिखाई नहीं देता और जो मन के द्वारा अनुभव नहीं होता,जिसका अस्तित्व सिद्ध है,केवल मनन द्वारा ही पहचाना जाता है।उसी का ओंकार नाम है।उसी के नाम पर आहुति देने से वह प्रसन्न होता है।
*महाभारत में -* महर्षि वेदव्यास कहते हैं कि जिज्ञासु वेद पढ़ते हुए और ओ३म् का जप करते हुए योग में मग्न और योग समाधि में भी ओ३म् का ध्यान करें। इस जप और योग के द्वारा ही परमात्मा का ज्ञान होता है।
*गीता-८.१३*:- हे अर्जुन ! जो मनुष्य इस एकाक्षर ब्रह्म 'ओ३म्' को कहते हुए और उसके द्वारा अन्त समय ब्रह्म को याद करते हुए इस शरीर को त्याग देते हैं,वह परमगति को प्राप्त होते हैं। ओ३म् तत् सत् इन तीनों पदों से ब्रह्म का निरुपण होता है,अतः ब्रह्मवादियों के यज्ञ,दान,तप आदि समस्त शुभ कर्मों का आरम्भ ओ३म् से होता है।
*यजुर्वेद का शतपथ ब्राह्मण*:- सर्वव्यापक सर्वज्ञ सर्वान्तर्यामी सर्वरक्षक 'ओ३म्' ब्रह्म सबसे महान् है।यह सबसे बड़ा है।सबसे प्राचीन तथा सनातन है.वही सबका प्राणदाता है।ओंकार शब्द ही वेदस्वरुप है।इसी ओ३म् के द्वारा समस्त ज्ञेय (जानने योग्य) पदार्थ जाने जा सकते हैं।
*सामवेद का ताण्डय् महाब्राह्मण*:-जो कोई यथार्थ रुप से ओंकार को नहीं जानता वह वेद के आश्रित नहीं रहता अर्थात् धर्म के अधीन न रहकर संसार में अधर्म तथा उपद्रव फैलाने वाला हो जाता है,परन्तु जो ओंकार को इस प्रकार से जानता है वह वेद के आश्रित रहकर संसार का उपकार करता है। इसी ब्राह्मण में अलंकार रुप से ओ३म् की महिमा का वर्णन करते हुए यह दर्शाया है कि किस प्रकार ओ३म् के आश्रय में आने और उसके द्वारा ब्रह्म को जानने से दैनिक देवासुर संग्राम में मनुष्य को विजय तथा सफलता प्राप्त होती है।
*अथर्ववेद का गोपथ ब्राह्मण* :- गोपथ ब्राह्मण में ओ३म् की महिमा विशेष ध्यान देने योग्य है। यथा श्लोक (गो० 1/22) जिसके अर्थ इस प्रकार हैं- जो ब्रह्मोपासक इस अक्षर 'ओम्' की जिस किसी कामना पूर्ति की इच्छा से तीन रात्रि उपवास रखकर तेज-प्रधान पूर्व दिशा की ओर मुख करके, कुशासन पर बैठकर सहस्र बार जाप करता है उसके सब शुभ मनोरथ सिद्ध होते हैं।इस कथन में जप करने के विधान का उपदेश भी किया गया है आजकल प्रायः सभी जिज्ञासु जप करने की विधि जानना चाहते हैं,उनके लिए यह सुगम विधि है।
*मनुस्मृति (अध्याय १२, श्लोक- १२२,१२३)-* जो सबको शिक्षा देने हारा, सूक्ष्म से सूक्ष्म, स्वप्रकाशस्वरूप, समाधिस्थ, वृध्दि से जानने योग्य है, उसको परम पुरूष अर्थात परमात्मा जानना चाहिए। और स्वप्रकाश होने से "अग्नि" , विज्ञानस्वरूप होने से "मनु", और सबका पालन करने से "प्रजापति", और परमैश्वर्यवान होने से "इंद्र", सबका जीवनमूल होने से "प्राण" और निरंतर व्यापक होने से परमेश्वर का नाम "ब्रह्मा" है ।
*गोपथ ब्राह्मण में ओ३म् की महिमा यथा श्लोक (गो० 1/22)* जिसके अर्थ इस प्रकार हैं, कि जो ब्रह्मोपासक इस अक्षर 'ओम्' की जिस किसी कामना पूर्ति की इच्छा से तीन रात्रि उपवास रखकर तेज-प्रधान पूर्व दिशा की ओर मुख करके, कुशासन पर बैठकर सहस्र बार जाप करता है उसके सब शुभ मनोरथ सिद्ध होते हैं ।
*प्रश्नोपनिषद में ओंकार की महिमा*:- एक समय शिवि के पुत्र सत्यकाम ने पिप्पलाद ऋषि से पूछा-हे भगवन् । मनुष्यो़ में वह व्यक्ति जो प्राण के अन्त तक ओंकार का ध्यान करता है,उसकी क्या गति होती है?पिप्पलाद ऋषि ने उत्तर दिया कि जो उपासक उस सर्वव्यापक परमेश्वर का 'ओ३म्' शब्द द्वारा ध्यान करता है,वह ब्रह्म को प्राप्त करता है।उस सर्वज्ञ अन्तर्यामी परमात्मा को सर्वसाधारण ओंकार के द्वारा प्राप्त होते हैं। जो साधक त्रिमात्र ओम् का ध्यान करे,वह तेज में सूर्यलोक से सम्पन्न हो जाता है।
.............
ब्रह्माण्ड में ओ३म् शब्द की महिमा है। विपत्ति में,मृत्यु में,ध्यान के अन्तिम क्षणों में बस ओ३म् ही शेष रह जाता है,शेष सब मन्त्र, ज्ञान-विज्ञान धूमिल हो जाता है।पौराणिकों की मूर्तियों व मन्दिरों के ऊपर ओ३म्, आरती में ओ३म्, नवजात शिशु के मुख में ओ३म्, सब स्थानों में ओ३म् ही ओ३म् है।
.............
*य ईं चिकेत गुहा भवन्तमा यः ससाद धारामृतस्य। वि ये चृतन्त्यृता सपन्त आदिद्वसूनि प्र ववाचास्मै॥*
।। ऋग्वेद १-६७-४।।
जो मनुष्य हृदय की गुहा में स्थित परमेश्वर ओम् को जानते हैं, जो अपने आपको उसे समर्पित करते हैं, जो सत्य मार्ग का अनुसरण करते हैं, जो उस प्रभु का दिव्य प्रकाश पाने के लिए उससे अपने आप को संयुक्त करते हैं...उन्हें परमेश्वर जीवन के चरम लक्ष्य मुक्ति को पाने के लिए मार्गदर्शन करते हैं ।

सोमवार, 27 अप्रैल 2020

वैशाख शुक्ल पंचमी आदिगुरू शंकराचार्य जी की जयंती



 

श्रुति स्मृति पुराणानां आलयं करुणालयम् ।
नमामि भगवद्पाद शंकरं लोकशंकरम् ।।
********वैशाख शुक्ल पंचमी *********
******आदिगुरू शंकराचार्य जी********
********** की जयंती पर ************
*******उन्हें कोटिशः नमन *************

आज से लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व कलियुग प्रारम्भ हुआ , तब से लेकर आज तक सनातन हिन्दू समाज के सामने अनेक विकट परिस्थितियाँ आई हैं ...सब संकटों को पार करके भी अगर हमारी चिरंतर धारा निरंतर बह रही है तो इसके पीछे अनेक महापुरुषों की तपस्या है ....हिन्दू समाज को अपने धर्म की सनातन परम्परा के लिए अगर किसी के प्रति सर्वाधिक कृतज्ञ होना चाहिए तो वो हैं ****आदिगुरू शंकराचार्य****


...... कलियुग के प्रारम्भ में धर्म का पतन आरम्भ हुआ ...अनेक मत पंथों ने जन्म लिया, जिसके कारण वैदिक परम्पराएं भी लुप्त होने लगी .... हिन्दू धर्म की लौ मद्धिम पड़ने लगी ....ऐसे में लगभग २५०० वर्ष पूर्व ..सुदूर दक्षिण में केरल के एक छोटे से ग्राम ......कालडी ...से १२ वर्ष का बालक शंकर वैदिक अद्वैत ज्ञान की ज्योति लिए घर से निकला ...पूरे भारत भर में घूम घूम कर नास्तिक पन्थो को परास्त किया सनातन वैदिक हिन्दू धर्म की पताका दिग्दिगांत में फहरा दी....

....उनकी अद्भुत रचनाएं और कार्य देख कर एक बार विश्वास करना असंभव लगता है की कोई मनुष्य इतनी छोटी आयु में इतना सब कर सकता है ...देश के चार कोनो में चार मठों की स्थापना ....,, चार पीठों पर चार शंकराचार्यों की परम्परा स्थापित करके हर पीठ के माध्यम से एक एक वेद और अलग अलग तीर्थों की मर्यादा सुरक्षित करना ..........बोद्ध आदि अन्य नास्तिक पंथों को परास्त करना ....... पञ्च देवों की पूजा की परम्परा स्थापित करना .....महान अद्वैत मत के ज्ञान को प्रगट करना ..ऐसे कार्य हैं जिनके लिए हजारों जन्म भी कम हैं .........आदि शंकर की जन्म जयंती पर अपने ह्रदय के उच्चतम भावों से हम उनके चरणों में अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं *********

भारतीय संस्कृति के विकास में आद्य शंकराचार्य का विशेष योगदान रहा है। आचार्य शंकर का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी को स्वीकार किया जाता है। शंकर दिग्विजय, शंकरविजयविलास, शंकरजय आदि ग्रन्थों में उनके जीवन से सम्बन्धित तथ्य उद्घाटित होते हैं। दक्षिण भारत के केरल राज्य (तत्कालीन मालाबारप्रांत) में आद्य शंकराचार्य जी का जन्म हुआ था। उनके पिता शिव गुरु तैत्तिरीय शाखा के यजुर्वेदी ब्राह्मण थे। 


आठ वर्ष की अवस्था में गोविन्दपाद के शिष्यत्व को ग्रहण कर संन्यासी हो जाना, पुन: वाराणसी से होते हुए बद्रिकाश्रम तक की पैदल यात्रा करना, सोलह वर्ष की अवस्था में बद्रीकाश्रम पहुंच कर ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखना, सम्पूर्ण भारत वर्ष में भ्रमण कर अद्वैत वेदान्त का प्रचार करना, दरभंगा में जाकर मण्डनमिश्र से शास्त्रार्थ कर वेदान्त की दीक्षा देना तथा मण्डन मिश्र को संन्यास धारण कराना, भारतवर्ष में प्रचलित तत्कालीन कुरीतियों को दूर कर समभावदर्शी धर्म की स्थापना करना, ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदारण्यकऔर छान्दोग्योपनिषद् पर भाष्य लिखना भारत वर्ष में राष्ट्रीय एकता अखण्डता तथा सांस्कृतिक अखण्डता की स्थापना करना उनके अलौकिक व्यक्तित्व का परिचायक है। 

चार धार्मिक मठों में दक्षिण के श्रृंगेरीशंकराचार्यपीठ, पूर्व (उडीसा) जगन्नाथपुरीमें गोवर्धनपीठ, पश्चिम द्वारिका में शारदामठ तथा बद्रिकाश्रम में ज्योतिर्पीठ भारत की एकात्मकता को आज भी दिग्दर्शित कर रहा है। कुछ लोग श्रृंगेरी को शारदापीठ तथा गुजरात के द्वारिका में मठ को काली मठ कहते र्है। उक्त सभी कार्य को सम्पादित कर 32वर्ष की आयु में मोक्ष प्राप्त करना, अलौकिकता की ही पहचान है। शंकराचार्य के विषय में कहा गया है
अष्टवर्षेचतुर्वेदी, द्वादशेसर्वशास्त्रवित्
षोडशेकृतवान्भाष्यम्द्वात्रिंशेमुनिरभ्यगात्


अर्थात् आठ वर्ष की आयु में चारों वेदों में निष्णात हो गए, बारह वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों में पारंगत, सोलह वर्ष की आयु में शांकरभाष्यतथा बत्तीस वर्ष की आयु में शरीर त्याग दिया। ब्रह्मसूत्र के ऊपर शांकरभाष्यकी रचना कर विश्व को एक सूत्र में बांधने का प्रयास भी शंकराचार्य के द्वारा किया गया है, जो कि सामान्य मानव से सम्भव नहीं है। 

शंकराचार्य के दर्शन में सगुण ब्रह्म तथा निर्गुण ब्रह्म दोनों का हम दर्शन, कर सकते हैं। निर्गुण ब्रह्म उनका निराकार ईश्वर है तथा सगुण ब्रह्म साकार ईश्वर है। जीव अज्ञान व्यष्टि की उपाधि से युक्त है। 'तत्त्‍‌वमसि' तुम ही ब्रह्म हो; 'अहं ब्रह्मास्मि' मै ही ब्रह्म हूं; 'अयामात्मा ब्रह्म' यह आत्मा ही ब्रह्म है; इन बृहदारण्यकोपनिषद् तथा छान्दोग्योपनिषद वाक्यों के द्वारा इस जीवात्मा को निराकार ब्रह्म से अभिन्न स्थापित करने का प्रयत्‍‌न शंकराचार्य जी ने किया है। ब्रह्म को जगत् के उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय का निमित्त कारण बताए हैं। ब्रह्म सत् (त्रिकालाबाधित) नित्य, चैतन्यस्वरूप तथा आनंद स्वरूप है। ऐसा उन्होंने स्वीकार किया है। जीवात्मा को भी सत् स्वरूप, चैतन्य स्वरूप तथा आनंद स्वरूप स्वीकार किया है। जगत् के स्वरूप को बताते हुए कहते हैं कि -

नामरूपाभ्यां व्याकृतस्य अनेककर्तृभोक्तृसंयुक्तस्य प्रतिनियत देशकालनिमित्त 
क्रियाफलाश्रयस्य मनसापि अचिन्त्यरचनारूपस्य जन्मस्थितिभंगंयत:


अर्थात् नाम एवं रूप से व्याकृत, अनेक कत्र्ता, अनेक भोक्ता से संयुक्त, जिसमें देश, काल, निमित्त और क्रियाफल भी नियत हैं। जिस जगत् की सृष्टि को मन से भी कल्पना नहीं कर सकते, उस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति तथा लय जिससे होता है, उसको ब्रह्म कहते है। सम्पूर्ण जगत् के जीवों को ब्रह्म के रूप में स्वीकार करना, तथा तर्क आदि के द्वारा उसके सिद्ध कर देना, आदि शंकराचार्य की विशेषता रही है। इस प्रकार शंकराचार्य के व्यक्तित्व तथा कृतित्वके मूल्यांकन से हम कह सकते है कि राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का कार्य शंकराचार्य जी ने सर्वतोभावेनकिया था। भारतीय संस्कृति के विस्तार में भी इनका अमूल्य योगदान रहा है।


जगद्गुरू आदिशंकराचार्य जी को भारत स्वाभिमान दल कोटि कोटि नमन करता हैं।

मंगलवार, 31 दिसंबर 2019

राष्ट्र धर्म रक्षक हिन्दू वीर शिरोमणि गोकुल सिंह

राष्ट्र धर्म रक्षक हिन्दू वीर शिरोमणि गोकुल सिंह


वीर गोकुल सिंह एक साधारण सनातन क्षत्रीय जाट परिवार में पैदा हुए थे। उन्हें बचपन से ही शस्त्र अस्त्र की विद्या सिखाई गयी। वेदों व शास्त्रों का ज्ञान दिया गया था।

उन्होंने इस्लाम मजहब व इस्लामिक पिशाच औरँगेजेब के अत्याचारों के बारे में बचपन से ही सुना था इसलिए उन्होंने युवावस्था में ही क्रांतिकारियों की सेना तैयार करनी शुरू कर दी थी।
वीर गोकुल सिंह ने तिलपत में अपनी गढ़ी स्थापित की और मथुरा व ब्रिज के अन्य हिस्सों में भी अपने छोटे छोटे किले बना लिया। उसके बाद वे पूरे उत्तर भारत में घूमे।हिन्दुओं को इस्लाम व औरंगजेब के अत्याचारों के खिलाफ जाग्रत किया।

उनका भाषण इतना तेजस्वी था कि हिन्दू माताओं ने अपने बेटो को गोकुल सिंह के अभियान के लिए समर्पित कर दिया था।

उन्होंने हिन्दू युवकों के हाथों में हथियार दिए व 20000 युवकों की सेना तैयार की।
वे औरंगजेब के विरूद्ध योजनाबद्ध सशस्त्र क्रांति करने वाले पहले वीर यौद्धा थे। उन्होंने हिन्दू किसानों को औरंगजेब के खिलाफ असहयोग नीति अपनाने को कहा व उनके एक आह्वान पर किसानों ने लगान बन्द कर दिया व बाकी हिन्दुओं ने जजिया कर देना बंद कर दिया।
उन्होंने मंदिरों, गुरूकुलों, महिलाओं, किसानों की रक्षा की। धर्म व देश की भक्ति उनकी रग रग में बसी हुई थी।

उन्होंने इस्लामी राक्षस औरंगजेब के सबसे कट्टर अब्दुन्नबी खान का वध किया व हिन्दू युवाओ के मन से मुगलिया कर्मचारियों का खौफ निकाला। उन्होंने औरँगेजेब के सेनापतियों को हरा दिया।


इसके बाद हर जगह मुगलिया सरकार के कर्मचारियों को मार भगाना शुरू हुआ। औरंगजेब की सत्ता हिल गयी पूरे उत्तर भारत में हिन्दू क्रांति की लहर दौड़ पड़ी।

औरंगजेब ने उसे सन्धि का प्रस्ताव भेजा व जागीर का लालच दिया। लेकिन गोकुल सिंह ने साफ मना कर दिया और उस पर तंज कसते हुए कहा कि जो धर्म के पथ से हट जाए व असली यौद्धा नहीं होता।और तुझे हिन्दुओ पर इतनी ही दया है तो अपनी बेटी किसी हिन्दू को ब्याह दे।
बिना किसी राजा महाराजा के सहयोग से एक छोटे से किसान के बेटे गोकुल सिंह ने यह सब कर दिखाया।

अंत में जो औरंगजेब बड़े बड़े राजा महाराजाओं से लड़ने नहीं आता था उसे एक साधारण युवक से लड़ने आना पड़ा।
उसने पूरी ताकत गोकुल सिंह के आन्दोलन को दबाने में लगा दी।
औरंगजेब और गोकुल के बीच तिलपत में सीधा युद्ध शुरू हो गया।

गोकुल सिंह अंतिम युद्ध 6 दिनों तक लड़ते रहे । हजारो हिन्दू बलिदान हुए। औरँगेजेब की शाही तोपो के आगे तलवारों से लड़ते रहे। आखिर तोपो के आगे बंदूक तलवार कब तक चलती अंत में औरँगेजेब का पलड़ा भारी होने लगा।हार देखकर माताओं ने अपनी बेटी के सीने में खंजर उतार दिया। पतियों ने पत्नियों के सीने में गोली उतार दी व रण में कूद पड़े थे।
इस तरह जौहर करके वीरांगनाओं ने अपना स्वाभिमान बचाया।

गोकुल सिंह व उनकी सेना ने हार देखकर मैदान नहीं त्यागा। हजारो युवा रण में बलिदान हो गए। बाकियो को औरंगजेब ने बंदी बना लिया।
औरंगजेब से अंतिम तिलपत युद्ध 6 दिन तक लगातार चला। गोकुल व उनके साथियों को बंदी बनाकर आगरा दरबार में ले जाया गया।

गोकुल सिंह व उनके चाचा उदय सिंह पर इस्लाम स्वीकारने के लिए दबाव बनाया गया। लेकिन उन्होंने आंखों में आंखे डालकर कहा कि जो तू कर रहा है यही इस्लाम है तो इसे धर्म कहना पाप है और हिन्दू धर्म उनके शरीर के कतरे कतरे में बसा हुआ है।

यदि गोकुल सिंह इस्लाम स्वीकार लेते तो उस दिन उनके हजारो वीर सैनिक व उत्तर भारत के हजारो हिन्दू अपना धर्म त्याग देते। गोकुल सिंह यह जानते थे उन्होंने अपने प्राणों की तनिक भी चिंता न की और अपने धर्म के स्वाभिमान को नहीं झुकने दिया।

इसके बाद औरंगजेब ने 1 जनवरी 1670 को गोकुल सिंह व उनके चाचा के शरीर के टुकड़े टुकड़े करवा दिए। उनके साथियों व करीबियों का भी यही हाल हुआ। वहां देखने वाले हर इंसान के मुख से हे राम की ध्वनि निकल रही थी।लेकिन बलिदान होने वाले वीरों का सिर गर्व से तना हुआ था व उनके चित पर प्रसन्नता ही दिखाई दे रही थी।
उनके मासूम छोटे छोटे बच्चों की भी इस्लामिक पिशाच औरँगेजेब ने निर्मम तरीके से हत्या करवा दी थी।

इस बलिदान के बाद हिंदूओ में साहस भर गया उन्होंने औरंगजेब के अत्याचारों के विरुद्ध क्रांति शुरू कर दी। उसके बाद अनेकों यौद्धाओं ने इस्लामिक पिशाचों के विरूद्ध समय समय और क्रांति की। गोकुल सिंह का बलिदान इस्लामिक सत्ता के खात्मे में मील का पत्थर साबित हुआ।
ऐसे महान यौद्धा के बलिदान दिवस पर कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से भारत स्वाभिमान दल उन्हें कोटि कोटि नमन करता हैं।


आगरा स्थित फुब्बारा चौक 1 जनवरी 2014 आधुनिक भारतीय इतिहास का पहला कार्यक्रम, जिसमें 1669 की क्रांति के जननायक, राष्ट्र-धर्म रक्षक वीर गोकुल सिंह जी को उनके बलिदान दिवस पर श्रद्धांजलि देकर उनके अधूरे सपनों को पूर्ण करने का संकल्प लेते हुए ठाकुर हरीओम सिंह जी, विश्वजीत सिंह अनंत जी व भाई प्रमोद यादव जी

1 जनवरी "क्रान्ति संकल्प दिवस"

1 जनवरी क्रान्ति संकल्प दिवस 

ईसाई मिशनरीयों के हाथों अपना स्वाभिमान गवाँ चुका हिन्दू समाज अपना इतिहास जाने, और 1 जनवरी को 1669 के स्वतंत्रता समर के जननायक गोकुल सिंह जी व उनके 20 हजार यौद्धाओं की स्मृति में "क्रान्ति संकल्प दिवस" मनाकर अपने पूर्वजों पर गर्व करें।

निवेदक:
विश्वजीत सिंह अनंत
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल


हमारा नवबर्ष #चैत्रशुक्लपक्षप्रतिपदा से प्रारम्भ होता हैं, 1 जनवरी को हम धर्मरक्षक वीर गोकुल सिंह जी व उनके साथियों के बलिदान को क्रान्ति संकल्प दिवस के रूप में स्मरण करते हैं ~~~~~~~~~~


 महाआश्चर्य! भारतवासी,1 जनवरी को देश की स्वतंत्रता के लिए बलिदान होने वाले अमर वीरगोकुलसिंह को भूल गए..!!! पर गुलाम बनाने वाले अंगेजों का नववर्ष याद है.. 1669 की क्रान्ति के जननायक, परतंत्र भारत में असहयोग आन्दोलन के जन्मदाता, राष्ट्रधर्म रक्षक वीर गोकुल सिंह जी और उनके सात हजार क्रान्तिकारी साथियों के बलिदान दिवस पर (1जनवरी 1670) उनको शत-शत नमन। कैसे वीर थे वो अलबेले, कैसी अमर है उनकी कहानी। धर्मरक्षक वीर गोकुल सिंह जी की, आओ याद करें बलिदान।। 


सन् 1666 के समय में इस्लामिक राक्षस औरंगजेब के अत्याचारों से हिन्दू जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। मंदिरों को तोड़ा जा रहा था, हिन्दूस्त्रियों की इज्जत लूटकर उन्हें मुस्लिम बनाया जा रहा था। औरंगजेब और उसके सैनिक पागल हाथी की तरह हिन्दू जनता को मथते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे। हिंदुओं को दबाने के लिए इस्लामिक पिशाच औरंगजेब ने अब्दुन्नवी नामक एक कट्टर मुसलमान को मथुरा का फौजदार नियुक्त किया।

अब्दुन्नवी के सैनिकों का एक दस्ता मथुरा जनपद में चारों ओर लगान वसूली करने निकला। सिनसिनी गाँव के सरदार गोकुल सिंह के आह्वान पर किसानों ने लगान देने से इंकार कर दिया, परतन्त्र भारत के इतिहास में वह पहला असहयोग आन्दोलनथा । दिल्ली के सिंहासन के नाक तले समरवीर धर्मपरायण हिन्दू वीर योद्धा गोकुल सिंह और उनकी किसान सेना ने आतताई औरंगजेब को हिंदुत्व की ताकत का एहसास दिलाया।

मई 1669 में अब्दुन्नवी ने सिहोरा गाँव पर हमला किया। उस समय वीर गोकुल सिंह गाँव में ही थे। भयंकर युद्ध हुआ लेकिन इस्लामी शैतान अब्दुन्नवी और उसकी सेना सिहोरा के वीर हिन्दुओं के सामने टिक ना पाई और सारे इस्लामिक पिशाच गाजर-मूली की तरह काट दिए गए। गोकुल सिंह की सेना में जाट, राजपूत, गुर्जर, यादव, मीणा इत्यादि सभी जातियों के हिन्दू थे। इस विजय ने मृतप्राय हिन्दू समाज में नए प्राण फूँक दिए थे।






इसके बाद पाँच माह तक भयंकर युद्ध होते रहे । मुगलों की सभी तैयारियां और चुने हुए सेनापति प्रभावहीन और असफल सिद्ध हुए । क्या सैनिक और क्या सेनापति सभी के ऊपर गोकुलसिंह का वीरता और युद्ध संचालन का आतंक बैठ गया। अंत में सितंबर मास मेंबिल्कुल निराश होकरशिकनखाँ ने गोकुलसिंह के पास संधिप्रस्ताव भेजा । गोकुल सिंह ने औरंगेजब का प्रस्ताव अस्वीकार करते हुए कहा कि औरंगजेब कौन होता है हमें माफ करने वालामाफी तो उसे हम हिन्दुओं से मांगनी चाहिए उसने अकारण ही हिन्दू धर्म का बहुत अपमान किया है।

अब औरंगजेब 28 नवम्बर 1669 को दिल्ली से चलकर खुद मथुरा आया गोकुल सिंह से लड़ने के लिए। औरंगजेब ने मथुरा में अपनी छावनी बनाई और अपने सेनापति होशयार खाँ को एक मजबूत एवं विशाल सेना के साथ युद्ध के लिए भेजा। आगरा शहर का फौजदार होशयार खाँ 1669 सितंबर के अंतिम सप्ताह में अपनी-अपनी सेनाओं के साथ आ पहुंचे । यह विशाल सेना चारों ओर से गोकुलसिंह को घेरा लगाते हुए आगे बढ़ने लगी ।






गोकुलसिंह के विरुद्ध किया गया यह अभियानउन आक्रमणों से विशाल स्तर का थाजो बड़े-बड़े राज्यों और वहां के राजाओं के विरुद्ध होते आए थे। इस वीर के पास न तो बड़े-बड़े दुर्ग थेन अरावली की पहाड़ियाँ और न ही महाराष्ट्र जैसा विविधतापूर्ण भौगोलिक प्रदेश । इन अलाभकारी स्थितियों के बावजूदउन्होंने जिस धैर्य और रण-चातुर्य के साथएक शक्तिशाली साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति का सामना करकेबराबरी के परिणाम प्राप्त किएवह सब अभूतपूर्व है।

औरंगजेब की तोपो,धर्नुधरोंहाथियों से सुसज्जित तीन लाख की विशाल सेना और गोकुल सिंह की किसानों की 20000 हजार की सेना में भयंकर युद्ध छिड़ गया। चार दिन तक भयंकर युद्ध चलता रहा और गोकुल सिंह की छोटी सी अवैतनिक सेना अपने बेढंगे व घरेलू हथियारों के बल पर ही अत्याधुनिक हथियारों से सुसज्जित और प्रशिक्षित मुगल सेना पर भारी पड़ रही थी। भारत के इतिहास में ऐसे युद्ध कम हुए हैं जहाँ कई प्रकार से बाधित और कमजोर पक्षइतने शांत निश्चय और अडिग धैर्य के साथ लड़ा हो । हल्दी घाटी के युद्ध का निर्णय कुछ ही घंटों में हो गया था। पानीपत के तीनों युद्ध एक-एक दिन में ही समाप्त हो गए थेपरन्तु वीरवर गोकुलसिंह का युद्ध तीसरे दिन भी चला । 
इस लड़ाई में सिर्फ पुरुषों ने ही नही बल्कि उनकी स्त्रियों ने भी पराक्रम दिखाया। चार दिन के युद्ध के बाद जब गोकुल की सेना युद्ध जीतती हुई प्रतीत हो रही थी तभी हसन अली खान के नेतृत्व में एक नई विशाल मुगलिया टुकड़ी आ गई और इस टुकड़ी के आते ही गोकुल की सेना हारने लगी। युद्ध में अपनी सेना को हारता देख हजारों नारियाँ जौहर की पवित्र अग्नि में खाक हो गई। गोकुल सिंह और उनके ताऊ उदय सिंह को सात हजार साथियों सहित बंदी बनाकर आगरा में औरंगजेब के सामने पेश किया गया। 






औरंगजेब ने कहा जान की खैर चाहते हो तो इस्लाम कबूल कर लो और रसूल के बताए रास्ते पर चलो। बोलो क्या इरादा है इस्लाम या मौत? अधिसंख्य धर्म-परायण हिन्दुओं ने एक सुर में कहा – “औरंगजेब, अगर तेरे खुदा और रसूल मोहम्मद का रास्ता वही है जिस पर तू चल रहा है तो धिक्कार है तुझे और तेरे रसूल को, हमें तेरे रास्ते पर नहीं चलना l” इतना सुनते ही औरंगजेब के संकेत से गोकुल सिंह की बलशाली भुजा पर जल्लाद का बरछा चला। गोकुल सिंह ने एक नजर अपने भुजाविहीन रक्तरंजित कंधे पर डाली और फिर बड़े ही घमण्ड के साथ जल्लाद की ओर देखा और कहा दूसरा वार करो। दूसरा बरछा चलते ही वहाँ खड़ी जनता आंर्तनाद कर उठी और फिर गोकुल सिंह के शरीर के एक-एक जोड़ काटे गए। गोकुल सिंह का सिर जब कटकर धरती माता की गोद में गिरा तो मथुरा में केशवराय जी का मंदिर भी भरभराकर गिर गया। यही हाल उदयसिंह और बाकि साथियों का भी किया गया। उनके एक साथी माडुसिंह जाट की जीवित ही चमड़ी उधेड़ दी, उनके छोटे- छोटे बच्चों को जबरन मुसलमान बना दिया गया। 




ये एक जनवरी 1670 का दिन था। ऐसे अप्रतिम वीर का कोई भी इतिहास नही पढ़ाया गया और न ही कहीं कोई सम्मान दिया गया। न ही उनके नाम पर न कोई विश्वविद्यालय है और न कोई केन्द्रीय या राजकीय परियोजना। कितना एहसान फरामोश, कृतघ्न है हिंदू समाज!! कैसे वीर हुए इस धरा पर,जिन्होंने धर्म के लिए प्राण न्यौछावर कर दिये पर इस्लाम नही अपनाया। गोकुलसिंह सिर्फ #जाटों के लिए शहीद नहीं हुए थे न उनका राज्य ही किसी ने छीन लिया था, न कोई पेंशन बंद कर दी थी, बल्कि उनके सामने तो अपूर्व शक्तिशाली मुगल-सत्ता, दीनतापूर्वक, सन्धि करने की तमन्ना लेकर गिड़-गिड़ाई थी। शर्म आती है हमें कि हम ऐसे अप्रतिम वीर को कागज के ऊपर भी सम्मान नहीं दे सके। शाही इतिहासकारों ने उनका उल्लेख तक नही किया। केवल जाट पुरूष ही नही बल्कि उनकी वीरांगनायें भी अपनी ऐतिहासिक दृढ़ता और पारंपरिक शौर्य के साथ उन सेनाओं का सामना करती रही। दुर्भाग्य की बात है कि भारत की इन वीरांगनाओं और सच्चे सपूतों का कोई उल्लेख शाही टुकड़ों पर पलने वाले तथाकथित इतिहासकारों ने नहीं किया। जागो भारतवासियों!!! भारत स्वाभिमान दल वीर गोकुल सिंह व उनके अमर बलिदानी साथियों को कोटि-कोटि नमन करता हैं।



रविवार, 8 सितंबर 2019

भारत स्वाभिमान दल संक्षिप्त परिचय


भारत स्वाभिमान दल संक्षिप्त परिचय


भारतवर्ष एक ऐसा देश है जो कभी सोने का शेर था ।

हर व्यक्ति आनन्दित, हर परिवार संपन्न, सबके पास अपने काम और सब कामो में व्यस्त, सर्वोच्च स्तर का चरित्र, बौद्धिक स्तर पर भारत का कोई मुकाबला नहीं था, उच्च स्तरीय गुरुकुल शिक्षा पद्धति, आयुर्वेदिक और शल्य चिकित्सा, तकनीकि विज्ञान और खोज में सबसे आगे, सबसे पहले अंतरिक्ष विज्ञान का ज्ञाता, संस्कार और परम्परा में पूरे विश्व का गुरु और सिरमौर कहलाने वाला भारतवर्ष आज वासना, नशा, भ्रष्टाचार और व्याभिचार और आलस्य में डूबा हुआ है।

हर तरफ चोरी, दुश्मनी, हत्या, बलात्कार, धरना प्रदर्शन, मुफ्तखोरी, दलाली, घूसखोरी और अपराध अपने चरम पर है।

कोई संतुष्ट नहीं, सबके अंदर असुरक्षा की भावना घर कर चुकी है, कुछ भी निश्चित नहीं लगता।

जो समाज का नेतृत्व करते है, जिनके इशारे मात्र पर कुछ बदल सकता है, वो स्वाभिमान जागरण, विकास और राष्ट्रीय एकता के स्थान पर, विनाश और साम्प्रदायिक तुष्टिकरण कर विखण्डन की बात करते है, अपने राजनैतिक हित के लिए हमेशा धर्म के आधार पर भेदभाव करते है, जाति और सम्प्रदाय की बातो में उलझाकर, उकसाकर लड़वाया करते है, और वोट की राजनीति करते है, उनके लिए हम वोट बैंक के अलावा और कुछ नहीं।

जो विकास और जानकारी के स्रोत है, जो जन जन तक जानकारी पहुचाने के माध्यम है, वो अश्लीलता परोसकर विदेशी कम्पनियो का व्यापार बढ़ाकर, कमीशन के रूप में पैसा बटोर रहे है, भारत के नागरिकों को संविधानिक रूप से साम्प्रदायिक आधार पर बांटने वाले कानून लागू कर दिये गये है।

जिनके हाथ में देश का भविष्य है, जो पीढ़ियों का निर्माण करते है, जो अपने द्वारा बच्चों को चरित्र, व्यवहार, सामाजिक और भविष्य निर्माण की कला सिखाते है, उनको कानूनों में बांधकर अपंग बना दिया, और थोप दी विदेशी शिक्षा व्यवस्था।

आज सब व्यवस्थाओं में घुन लग गया है, न कुछ स्पष्ट है और न ही सापेक्ष, अपनी मूल प्रकृति को भूलकर दूसरो की व्यवस्था और गंदे संस्कारो से प्रभावित होकर हम विनाश की अंधी दौड़ में शामिल हो गए है जिसका अंजाम शायद एक दिन सीरिया जैसा हो सकता है।

क्या आप चाहते हो कि आप के बच्चे जिन्हें आप अपनी जान से ज्यादा प्यार करते हो, ऐसे माहौल में जिए, ऐसी व्यवस्थाये विनाशकारी है इनको बदलना होगा।

ऐसे में देश के जागरूक युवाओ और बुद्धिजीवी लोगो ने मिलकर, अपने देश के स्वर्णिम इतिहास का अध्ययन कर क्रांतिकारी, योगियो और संतो के जीवन से प्रेरणा लेकर "भारत स्वाभिमान दल" संगठन की स्थापना की है, और उन सिद्धांतो पर कार्य करने का निर्णय लिया जिन पर चलकर यह देश खुशहाल, संपन्न, शक्तिशाली, संस्कारवान और विश्वगुरु था। आइये मिलकर संस्कारित, खुशहाल, समृद्ध, दिव्य और तेजस्वी भारत का निर्माण करे।

सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के लिए संगठित होना अति आवश्यक है।

भारत स्वाभिमान दल देश के हर उम्र के विचारशील, प्रगतिशील और राष्ट्रभक्तों का इस महान कार्य में सहयोग के लिए आवाहन करता है।




सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के लिए भारत स्वाभिमान दल की ग्यारह सूत्री कार्य योजना:-

1. वर्तमान में चल रही समस्त गलत नीतियों व भ्रष्ट व्यवस्थाओं का राष्ट्र हित में पूर्ण परिवर्तन कराना। भ्रष्टाचार, बलात्कार, दहेज हत्या, गौहत्या, आतंकवाद व मिलावट करने वालों के विरूद्ध मृत्युदण्ड का कानून बनवाकर सम्पूर्ण भारतीयों को सुरक्षा प्रदान करवाना। शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून, अर्थ व कृषि व्यवस्था का पूर्ण भारतीयकरण व स्वदेशीकरण करना।

2. साम्प्रदायिक आधार पर भेदभाव करने वाले कानूनों को निरस्त कर समान नागरिक संहिता लागू करना।

वर्तमान भारतीय संविधान जाति व धर्म के आधार पर भारतीय नागरिकों में भेदभाव करता हैं, यह संविधान धर्म के आधार पर किसी नागरिक को सामान्य, तो किसी नागरिक को विशेषाधिकार देता हैं। इस संविधानिक साम्प्रदायिक भेदभाव के चलते देश में जातीय व साम्प्रदायिक तनाव बढ़ रहा हैं, जो राष्ट्रीय एकता व अखण्डता के लिए घातक हैं, और कालांतर में गृहयुद्ध का कारण भी बन सकता हैं।

राष्ट्र हित में साम्प्रदायिक आधार पर भारतीय नागरिकों में भेदभाव करने वाले कानूनों को निरस्त कर समान नागरिक संहिता लागू की जाए। देश में समानता का अधिकार लागू किया जाना चाहिए।

3. जातिवाद को असंवैधानिक घोषित करना, सरकारी महत्व के अभिलेख विद्यार्थी पंजीकरण, मूल निवास, जॉब पंजीकरण आदि परिपत्रों में जाति लिखने को प्रतिबंधित करना।

4. नौकरी हेतु किसी भी प्रकार के आरक्षण को अवैध घोषित कर उस पर प्रतिबंध लगाना, केवल शिक्षा हेतु आर्थिक आधार पर गरीब विद्यार्थियों को सहायता दी जाए, नौकरी उन्हें उनकी योग्यता के आधार पर मिले।

5. भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना, काले धन को वापस मंगाना, भ्रष्टाचारियों की संपत्ति को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करना व भ्रष्टाचारियों को कठोर दंड का प्रावधान करना।

6. केन्द्रीय गौवंश मंत्रालय बनाकर स्वदेशी गौवंश को प्रोत्साहन की नीति बनाना। केन्द्रीय योजना बनाकर जिला स्तर पर एक एक लाख गौवंश की क्षमता वाली गौशालाएँ बनवाना, उनमें बेसहारा गाय, बैल व सांडों को रखकर गौवंश आधारित उद्योगों की शुरूआत कराना, गैस, बिजली, खाद, औषधि आदि गौवंश से उत्पन्न कर विदेशी मुद्रा बचाना, तथा गाँवों में गौवंश आधारित संयंत्र स्थापित करने के लिए गौवंश पालक किसानों को सबसिडी देने का प्रावधान करना, ग्रामीण भारतीयों को आत्मनिर्भर बनाना।

7. सभी धर्मों के भारतीय नागरिकों के लिए अधिकतम तीन संतान उत्पन्न करने का कठोर जनसंख्या कानून बनाना, इस कानून की अवमानना करने वाले को सभी सरकारी सुविधाओं से वंचित कराना।

8. विद्यालयों में चरित्र निर्माण, व्यवसायिक शिक्षा व सैन्य शिक्षा अनिवार्य करना। तथ्यों के आलोक में भारतीय इतिहास का पुनर्लेखन कराना तथा ताजमहल, लालकिला आदि प्राचीन भवनों के वास्तविक निर्माताओं को श्रेय देकर भारत का सुप्त स्वाभिमान जगाना। काल गणना के लिए युगाब्ध को अपनाकर राष्ट्रीय पंचांग के रूप में लागू करना। केन्द्रिय परीक्षाओं में अंग्रेजी प्रश्नपत्र की अनिवार्यता समाप्त करना तथा संस्कृत, हिन्दी व क्षेत्रिय भाषाओं को वैकल्पिक आधार प्रदान करना।

9. स्वदेशी उत्पादनों को प्रोत्साहित करना। आयुर्वेद को राष्ट्रीय चिकित्सा पद्धति घोषित करना।

10. उन्नत कृषि एवं पशुपालन को प्रोत्साहित करना तथा राष्ट्रीय किसान आयोग का पुनर्गठन करना।

11. बेरोजगारी, गरीबी, भूख, अभाव व अशिक्षा से मुक्त स्वस्थ, समृद्ध, संस्कारवान व शक्तिशाली भारत का पुनर्निर्माण करना और भारत को विश्व की महाशक्ति तथा विश्वगुरू के रूप में पुन: प्रतिष्ठित करना।

राष्ट्र हित व धर्म हित में धरातल पर कार्य करने की इच्छा रखने वाले राष्ट्रभक्तों का भारत स्वाभिमान दल में हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन हैं ।

भारत स्वाभिमान दल से जुड़ने के लिए हमारे सूचना केंद्र पर संपर्क करें 8535004500

वन्दे मातरम्
भारत माता की जय