रविवार, 30 अक्टूबर 2016

दीपावली पर एक दिया ऐसा भी हो

एक दिया ऐसा भी हो,
जो भीतर तक प्रकाश करे,

एक दिया मुर्दा जीवन में,
फिर आकर कुछ श्वास भरे,

एक दिया सादा हो इतना,
जैसे सरल साधु का जीवन,

एक दिया इतना सुन्दर हो,
जैसे देवों का उपवन,

एक दिया जो भेद मिटाये,
क्या तेरा -क्या मेरा है,

एक दिया जो याद दिलाये,
हर रात के बाद सवेरा है,

एक दिया उनकी खातिर हो,
जिनके घर में दिया नहीं ,

एक दिया उन बेचारों का,
जिनको घर ही दिया नहीं,

एक दिया सीमा के रक्षक,
अपने वीर जवानों का,

एक दिया मानवता – रक्षक,
चंद बचे इंसानों का !

एक दिया विश्वास दे उनको ,
जिनकी हिम्मत टूट गयी ,

एक दिया उस राह में भी हो ,
जो कल पीछे छूट गयी

एक दिया जो अंधकार का ,
जड़ के साथ विनाश करे ,

एक दिया ऐसा भी हो ,
जो भीतर तक प्रकाश करें।

दीपक की पवित्र ज्योति आपको और आपके परिवार को हमेशा आलोकित करती रहे🙌       

उत्तर से उन्नति,
दक्षिण से दायित्व ,
पूर्व से प्रतिष्ठा,
पश्चिम से प्रारब्ध,
नैऋत्य से नैतिकता
वावव्य से वैभव,
ईशान से एश्वर्य
आकाश से आमदनी,
पाताल से पूँजी
दसों दिशाओ से शान्ति सुख समुद्धि सफलता प्राप्त हो ऐसी शुभकामनाएँ..! 🙏 🌟🌟
आपको प्रकाशोत्सव*
*“दीपावली ” की*
*हार्दिक -शुभकामनाएँ*

*॥शुभम् भवतु॥*

⚡विश्वजीत सिंह अनंत✨
सनातन संस्कृति संघ/भारत स्वाभिमान दल💫
8126396457
जय मां भारती,सियावर रामचन्द्र की जय🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ

ध्येयनिष्ठ जीवन ही जग के कंटकपथ पर चल पाता
दिखने में लगता लघु दीपक चीर अंधकार को दूर भगाता
लघु दीपों की मंद दीप्ति में ध्येय मार्ग पर बढ़ते जाना
मंगलमय हो दीप पर्व अपनी केवल है बस यही कामना
💥💥🔥🔥💥💥
दीपोत्सव आपके जीवन को सुख, समृद्धि, सुख-शांति, सौहार्द एवं अपार खुशियों की रोशनी से जग-मग करें
आप और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ....
जय श्री राम जी
🚩🚩🚩🚩🚩
विश्वजीत सिंह अनंत
सनातन संस्कृति संघ/भारत स्वाभिमान दल
8126396457
🕉🕉🕉🕉

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016

जातिवाद का षड़यंत्र

--जातिवाद का षड्यंत्र--
===============
अवश्य पढ़िये, मुस्लिमों व ईसाईयों के भारतीय दलालों के जातिवादी षड़यन्त्र की सच्चाईयाँ
और विवश कर दीजिये इन जहरीले व देशद्रोही जातिवादी, अम्बेडकरवादी, वामपंथी, मुस्लिम, ईसाई व सेक्युलर कीड़े को निर्वस्त्र व घोर अपमानित होकर गली- गली भागने व पिटने के लिए और सत्य का प्रचार कर इनकी झूठ, फरेब, गद्दारी व मक्कारी की दुकानें एकदम से गधे के सींग की तरह भारतभूमि से गायब कर दीजिये।
36 पेज की यह पुस्तक केवल 2MB की हैं, आप हमें 08126396457 पर व्हाट्सएप्प सन्देश भेजकर पीडीएफ पुस्तक प्राप्त कर सकते हैं।
नोट:- जिन मित्रों का मोबाइल पीडीएफ को सर्पोर्ट करता हो, केवल वो ही सन्देश भेजें।
🚩सनातन संस्कृति संघ🚩
🙏🏻भारत स्वाभिमान दल🙏🏻

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016

अधर्म और अन्याय को देखकर भी प्रतिकार न करना पाप हैं

योगेश्वर प्रभु श्रीकृष्ण ने सिर्फ दुर्योधन और दुशासन जैसे अपराधियों का ही नहीं बल्कि भीष्म और द्रोणाचार्य जैसे महात्माओं के भी वध का आदेश अर्जुन को दिया था ....
सिर्फ इसलिए क्योंकि अधर्म फैला रहे दुर्योधन को रोकने के लिए इन दोनों महात्माओं ने अपने जीवन में कभी एक भी प्रयास नहीं किया और सर झुका कर सारा पाप देखते रहे ....
ठीक इसी प्रकार आज भारत माँ को खून से नहलाता मुसलमान , उलेमा, मौलाना, मुफ़्ती , इमाम निश्चित रूप से मृत्युदण्ड के भागी हैं ,,
पर प्रभु श्री कृष्ण के सिद्धांतों से इस हिन्दू नरसंहार पर चुप बैठ कर अपना पेट और बैंक दोनों भर रहे अनगिनत ढोंगी, पाखण्डी, कुकर्मी, स्वार्थी मठाधीश, धर्माचार्य, महामंडलेश्वर, जगतगुरु , महंथ भी भीष्म और द्रोण की तरह वध के पात्र हैं ।।
क्योंकि अधर्म और अन्याय को देखकर भी उत्तरदायी मनुष्य यदि मौन है तो वो भी उस अन्याय और अधर्म के लिए उतना ही दोषी है जितना कि विधर्मी स्वयं।।।।

बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

विष्णु कौन हैं ?

इस चित्रण में विष्णु को एक इंसान के रूप बनाया गया था, या भारतीय प्राचीन ऋषियों द्वारा मानव जाति के लिए इस परम निरपेक्ष चेतना को समझने के लिए यह चित्र नियोजित किया गया था, । हम इस चित्रण के प्रत्येक पहलू का विश्लेषण करते हैं:

1. विष्णु लीलाधर हैं - सत् (विष्णु -परम निरपेक्ष चेतना) स्वयं को चित् (शिव - कूटस्थ चेतना ) और आनंद (ब्रम्हा - ब्रम्ह चेतना) में विभाजित करता है, अतः विष्णु और शिव दोनो ही पारब्रम्ह हैं, परन्तु अन्तर इतना ही है कि वह सत् जो ब्रम्ह (ॐ) में निहित होते हुए भी असलंग्न है कूटस्थ कहलाता है और जो ब्रम्ह की परिधि में नही है, परम कहलाता है। सच तो यह है कि सर्वस्व भेदरहित चैतन्य है। सत् ही लीला का जनक है इसलिए पुराणों में विष्णु को लीलाधर का नाम भी मिला है।
2. विष्णु के दो हाथ आगे एवं दो पीछे - अर्थात परम चेतना द्वारा सम्पन्न द्वंदरूपी कार्य (सृष्टि) प्राकट्य (सामने) और अप्राकट्य (पीछे) भी हैं। यानि अपरा एवं परा प्रकृति।
3.  विष्णु – अर्थात सर्वव्यापी।
4.विष्णु का नीला वर्ण - अर्थात ब्रम्ह तत्व को धारण करना। इसलिए सनातन धर्म में भगवान का वर्ण नीला या श्यामल दिखाते हैं। नीले, स्याही और बैंगनी रंग की आवृत्तियां इद्रंधनुष में सूक्ष्मतर होती हैं। अतः इनको देवत्व दर्शाने में प्रयोग करते हैं। जीव के भ्रूमध्य में जब नीली ज्योति का दर्शन होने लगता है तो वह सच्चिदानंद के द्वार पर पहुँच जाता है यानि आनंदमय स्वरूप को प्राप्त होता है।
5. विष्णु का हाथ के सहारे नेत्र मूंदे लेटना - अर्थात परमेश्वर की चेतना ही लीला रचती है। वह चेतना कभी सोती नही है अपितु सदैव जागरुक रहती है।. समस्त दृश्रयम् और अदृश्रयम्, परम निराकार चेतना की ही अभिव्यक्ति है, जो हर साकार रुपी सक्षम अणु में व्याप्त है।
6. विष्णु का अनन्त या शेषनाग की कुडंलिनी पर लेटना - अर्थात परमेश्वर की चेतना में निहित माया ही अनन्त लीला है एवं उसके ऊपर ही चेतना का वास है। उस परम निराकार चेतना की सृष्टिकल्प-अभिव्यक्ति के अंत में, शेष रहती है मात्र सुप्तावस्थित मायाशक्ति, जो भावी सृष्टिकल्प के प्रतिपादन हेतु, अभिन्न चेतनारूपी कुंडलित स्थितज शक्ति होती है।
7. शेषनाग का सहस्त्रमुखी फन विष्णु के ऊपर - सृष्टिकल्प के आरम्भ में सहस्त्रमुखी (अनंतरूपी) माया पुनः चैतन्यावस्था में आकर विष्णु का आवरण बन जाती है।
8. विष्णु का वाहन गरुड़ पक्षी - गरुड़ सर्पों (माया के अनन्तरूप) का विनाशक एवं पक्षीराज माना जाता है। परम निराकार चेतना गरुड़ पर विराजमान होती है, अर्थात जो व्यक्ति मायाजनित अज्ञान का नाश कर, उसके ऊपर ऊँची स्थायी उड़ान भरना सीख जाता है, परम चेतना उसपर सवार रहती है।
9. विष्णु अर्धनारीश्वर नही हैं - अर्थात परम निरपेक्ष चेतना का अविभाजित सत् एवं अव्यक्त मूर्तरूप।
10. विष्णु के अवतार होना - अर्थात परम निरपेक्ष और निराकार चेतना साकार रूप में  अवतरित होती है। वह परमेश्वर दोनों, निराकार और साकार है।
11. विष्णु की पत्नी लक्ष्मी - अर्थात चैतन्यता का “स्थिर भाव” जो सृष्टि का पालनकर्ता है और सृष्टि का यथोचित् “पालना” है।
12. विष्णु का क्षीरसागर के मध्य वैकुंठ में वास करना - परम चेतना से उद्भूत होती है माया और उससे उद्भूत होता है परम ज्योतिर्मय सागर या एैसा समझे कि ज्योतिर्मय सागर ही माया का मूलतः आधार है; प्रकाश ही हर पदार्थ का मूल है।, जिस पर माया प्रकट होती है; और परम एकल चेतना सबके मध्य में, यानि सबकी जनक है। वैकुंठ यानि मन, बुद्धि और अहम् के परे, अचिन्त्य “विषय-विकार रहित” अवस्था।
13. विष्णु के पीछे वाले हाथों में पंचजन्य शंख और सुदर्शन चक्र - अर्थात पंचप्राण,पंचतन्मंत्र  एवं पंचमहाभूत और सुदर्शन चक्र अर्थात सृष्टिचक्र का आनंद स्वरूप। विष्णु के आगे वाले हाथों में गदा और कमल - अर्थात शक्ति और नित्यशुद्ध-आत्मा।
14. विष्णु के दो कर्णफूल - द्वंद से ही चेतना की प्रकृति सुशोभित है।
15. विष्णु के गले में बनफूलों की माला और कौस्तुभ - प्रकृति ही चेतना को सुशोभित करती है एवं कौस्तुभ यानि हमारी हर शुद्ध इच्छा परम चेतना के हृदय में वास करती है और उसका पूर्ण होना सुनिश्चित है।
16. विष्णु के सतांन नही - अर्थात चित् और आनंद, सत् से उत्पन्न नही होते हैं, अपितु सत् के विभाज्य स्वरूप हैं।

ॐ जय जगदीश हरे

श्रीमद् भगवद्गीता को पढें ,समझें और जीवन सवारें

कहते हैं जो पुस्तक जितनी ज्ञान से भरी होती है उसके विषय में लोगों की उतनी ही अलग अलग धारणाएं होती हैं. लोग उसकी उतनी ही अधिक आलोचना करते हैं. यह सब उसके विस्तार का प्रतीक है. यह प्रतीक है कि अधिक लोग इसे पढ रहे हैं, अधिक लोगों तक इसकी बातें फैल रही हैं .
श्री मद् भगवद् गीता के विषय में भी यही बात है .कभी बौद्ध मत के अनुयायियों ने इसका विरोध किया तो कभी इस्लाम के मानने वालों ने कहा कृष्ण तेरी गीता जलानी पडेगी या आजकल रुस में ईसाई मत के मानने वाले समय समय पर यह बात कहते हैं कि श्रीमद् भगवद् गीता के पठन -पाठन पर रोक लगनी चाहिये .वहां के लोग इसे आतंकी साहित्य के रुप मे देखते हैं . कहते हैं कि यह तो युद्ध का उन्माद पैदा करने वाला साहित्य है .
परंतु वास्तविकता तो यह है कि योगेश्वर श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को युद्ध भूमि में दिया गया यह ज्ञान ,वास्तव में सभी मनुष्यों के लिय, सम्पूर्ण मानव समाज के लिये, उनके जीवन यापन का व्यावहारिक ज्ञान है. योगेश्वर श्री कृष्ण के द्वारा बताई गई बातें यदि हम अपने जीवन में अपना लें तो व्यक्तिगत जीवन सुधर जायेगा .समाज से स्वार्थपूर्ण बुराइयां दूर हो जाऐंगी और सारा संसार विश्व- बन्धुत्व की भावना से भर जाएगा ,क्योकि श्री मद् भगवद् गीता में योगेश्वर श्री कृष्ण ने अपनी शक्ति का प्रयोग सर्वभूतहितेरता की भावना से करने का उपदेश दिया है.
अन्य मतावलंबी श्री कृष्ण की इस निष्काम भावना से सब की भलाई करने की बात से अपने को असुरक्षित अनुभव करने लगते हैं क्योकि उनकी अलगाव वादी दुकानें इससे बंद हो जाएंगी .
.ऐसे लोगों की दुकानें तो मत मतान्तरों के द्वारा मनुष्य जाति को बांटने में और आपसी युद्ध कराने में लगी रहती हैं . भलाई की भवना से लोगों में सहिष्णुता आजाएगी और उन अलगाव वादियों को हाथ पर हाथ धरे बैठना होगा, इसलिए वे लोगों को उकसाते हैं और सच्चे ज्ञान से दूर रखने की कोशिश करते हैं .
बौद्धमतावलंबियों का विचार
एक बार ऐसे ही चर्चा चल रही थी .एक बौद्ध मतावलंबी ने कहा श्री कृष्ण तो स्वयं वेदों के विरुद्ध थे, वे आपके आदर्श पुरुष कैसे हो सकते हैं उन्होंने गीता के द्वितीय अध्याय का यह श्लोक उदाहरण के रुप में कहा .....
त्रैगुण्यविषया हि वेदा ,निस्त्रैगुण्यो भव अर्जुन
निर्द्वन्द्वो,नित्यसत्वस्थो ,निर्योगक्षेम,आत्मवान् .
और कहा कि वेद तो त्रिगुणी प्रकृति के विषय को स्पष्ट करते हैं.श्रीकृष्ण वेदों के इस विषय से अर्जुन को ऊपर उठने के लिए कहते हैं .इस तरह वे वेदों का खंडन कर रहे हैं वेद कहते हैं मनुष्य को यज्ञ करना चाहिए ,यज्ञ करा कर धन वैभव ,राज्य.सुख,पुत्रादि की प्राप्ति होती है. श्रीकृष्ण कहते हैं कि तुम इस सब को छोड दो .
यह ठीक है कि श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि तुम वेदों के ज्ञान से ऊपर उठ कर व्यवहार करो संसार के मोह को त्यागो . इस समय तुम युद्धभूमि को छोडकर संन्यास की बात नहीं सोचो .आज तुम्हें द्वन्द्वों से ऊपर उठ कर सोचना होगा .लाभ-हानि,जीवन-मरण,सुख-दुख की चिंता से अलग हट कर कर्तव्य-कर्म करना होगा. तुम आत्मवान् बनो .आत्मा की नित्यता को पहचानो .न तुम अपने संबंधियों को मार रहे हो न ही यह सत्य है कि यदि तुम इन्हें न मारकर संन्यास ले लोगे तो ये कभी नहीं मरेंगे, अमर हो जाएंगे .बल्कि संन्यास की बात करके तुम कायर कहलाओगे .इस समय तुम आत्मवान् बनो.स्थितप्रज्ञ होकर कर्तव्य कर्म करो .राजधर्म निभाओ .
आज भी राजनीति में हमें इस राजधर्म की आवश्यकता है. भाई भतीजा वाद छोड कर हमें सत्य के मार्ग पर चलना है तभी देश सुधरेगा ,उन्नति करेगा .
आइए,हम फिर अपने मुख्य विषय की ओर लौटें ,यह
विचार करें .गीता का पठन.पाठन युद्ध उन्माद जगाता है या कर्तव्य-पथ पर चलने की प्रेरणा देता है.
हम सभी यह नियम जानते हैं कि अच्छी फसल के लिए हमें खेत के खरपतवार को जलाना होता है यह एक प्राकृतिक नियम है .समाज में सुधारलाने के लिए भी हमें बुरे विचारों को नष्ट करना होता है . वेद मंत्र भी इसी की पुष्टि करता है –
ओ3म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव
यद् भद्रं तन्न आसुव
श्री कृष्ण ने गीता में युद्ध के उन्माद को नहीं जगाया है .वे तो शान्ति पूर्वक कौरवों से राज्य का बंटवारा कराना चाहते थे और इसीलिए अंतिम उपाय के रुप में वे शान्तिदूत बन कर हस्तिनापुर गए भी थे किन्तु दुर्योधन ने जब यह कहा कि युद्ध के बिना वह सुई की नोंक के बराबर भी भूमि नहीं देगा. पाण्डवों को तब युद्ध करना आवश्यक हो गया था. ऐसे समय में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया था कि जय पराजय की चिन्ता छोड कर दृढ निश्चय के साथ युद्ध करो . कर्तव्य कर्म का पालन करते हुए यदि युद्ध में विजयी हुए तो पृथ्वी पर राज्य करोगे, यदि युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए तो स्वर्ग का राज्य मिलेगा .इसलिए पूर्ण निश्चय के साथ कर्तव्य का पालन करो
किन्तु युद्ध करने से पहले योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने मन के भावों को संतुलित करने की सीख देते हैं और समझाते हैं कि संतुलित रह कर ही हम जीवन की समस्याओं को सुलझा सकते हैं. खान –पान में, सोने-जागने में और हमारे सभी कामों में पूर्ण संतुलन होना चाहिए .हमें लोभ-मोह ,या काम -क्रोध को वश में रखना चाहिए. इस तरह वे बार-बार अर्जुन का उत्साह-वर्धन करते थे.
यह अवश्य है कि उन्होने कुरुक्षेत्र में हुए इस युद्ध को धर्म युद्ध कहा ,और अर्जुन को युद्ध के प्रति आशावान बनाया .अंत में यह भी कहा कि
सर्व धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज
अहं त्वा सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच
अर्थात् सब धर्मों को छोड कर तू मेरी शरण में आ जा मैं तुझे सब पापों से मुक्त करा दूंगा ,शोक मत कर ,किन्तु यहां धर्म शब्द मत-मतान्तरो के लिये नहीं है .संस्कृत में धर्म शब्द वस्तु की पहचान करानेवाला शब्द है. जैसे अग्नि का धर्म है गर्माहट.यहां योगेश्वर श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि तुम यह समझ लो कि तुम केवल शरीर ही नहीं हो ,तुम आत्मा हो जो व्यापक है और जिसका कभी भी नाश नहीं होगा .तुम अपने अविनाशी रुप को समझ कर धर्मयुद्ध करो क्योंकि यही तुम्हारा कर्तव्य है .तुम राजा हो और समाज से बुराई को उखाड फेंकना तुम्हारा धर्म भी है और तुम्हारा कर्म भी .
यह बात अर्जुन को समझ आ गई.हमें भीसमझना चाहिए .हमारे जीवन में भी इसतरह की कुरुक्षेत्र जैसी परिस्थितियां आ ही जाती हैं .हम जानें कि श्री मद् भगवद्गीता का प्रथम शब्द है धर्म और अंतिम शब्द है मम .अर्थात् यह मेरा धर्म है.हमें अत्मवान् बनना है यह आत्मरूप ही हमारी पहचान है. हम अपने स्वार्थ से ऊपर उठें .जैसे आत्मा सर्व व्यापक है हम भी सर्वव्यापक बनें, सब की भलाई के लिए काम करें.

सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

आयुर्वेदिक दोहे

∥ आयुर्वेदिक दोहे ∥
१Ⓜदही मथें माखन मिले, केसर संग मिलाय,
होठों पर लेपित करें, रंग गुलाबी आय..
२Ⓜबहती यदि जो नाक हो, बहुत बुरा हो हाल,
यूकेलिप्टिस तेल लें, सूंघें डाल रुमाल..
३Ⓜअजवाइन को पीसिये , गाढ़ा लेप लगाय,
चर्म रोग सब दूर हो, तन कंचन बन जाय..
४Ⓜअजवाइन को पीस लें , नीबू संग मिलाय,
फोड़ा-फुंसी दूर हों, सभी बला टल जाय..
५Ⓜअजवाइन-गुड़ खाइए, तभी बने कुछ काम,
पित्त रोग में लाभ हो, पायेंगे आराम..
६Ⓜठण्ड लगे जब आपको, सर्दी से बेहाल,
नीबू मधु के साथ में, अदरक पियें उबाल..
७Ⓜअदरक का रस लीजिए. मधु लेवें समभाग,
नियमित सेवन जब करें, सर्दी जाए भाग..
८Ⓜरोटी मक्के की भली, खा लें यदि भरपूर,
बेहतर लीवर आपका, टी.बी भी हो दूर..
९Ⓜगाजर रस संग आँवला, बीस औ चालिस ग्राम,
रक्तचाप हिरदय सही, पायें सब आराम..
१०Ⓜशहद आंवला जूस हो, मिश्री सब दस ग्राम,
बीस ग्राम घी साथ में, यौवन स्थिर काम..
११Ⓜचिंतित होता क्यों भला, देख बुढ़ापा रोय,
चौलाई पालक भली, यौवन स्थिर होय..
१२Ⓜयलाल टमाटर लीजिए, खीरा सहित सनेह,
जूस करेला साथ हो, दूर रहे मधुमेह..
१३Ⓜप्रातः संध्या पीजिए, खाली पेट सनेह,
जामुन-गुठली पीसिये, नहीं रहे मधुमेह..
१४Ⓜसात पत्र लें नीम के, खाली पेट चबाय, दूर करे मधुमेह को, सब कुछ मन को भाय..
१५Ⓜसात फूल ले लीजिए, सुन्दर सदाबहार,
दूर करे मधुमेह को, जीवन में हो प्यार..
१६Ⓜतुलसीदल दस लीजिए, उठकर प्रातःकाल,
सेहत सुधरे आपकी, तन-मन मालामाल..
१७Ⓜथोड़ा सा गुड़ लीजिए, दूर रहें सब रोग,
अधिक कभी मत खाइए, चाहे मोहनभोग.
१८Ⓜअजवाइन और हींग लें, लहसुन तेल पकाय,
मालिश जोड़ों की करें, दर्द दूर हो जाय..
१९Ⓜऐलोवेरा-आँवला, करे खून में वृद्धि,
उदर व्याधियाँ दूर हों,जीवन में हो सिद्धि..
२०Ⓜदस्त अगर आने लगें, चिंतित दीखे माथ,
दालचीनि का पाउडर, लें पानी के साथ..
२१Ⓜमुँह में बदबू हो अगर, दालचीनि मुख डाल,
बने सुगन्धित मुख, महक, दूर होय तत्काल..
२२Ⓜकंचन काया को कभी, पित्त अगर दे कष्ट,
घृतकुमारि संग आँवला, करे उसे भी नष्ट..
२३Ⓜबीस मिली रस आँवला, पांच ग्राम मधु संग,
सुबह शाम में चाटिये, बढ़े ज्योति सब दंग..
२४Ⓜबीस मिली रस आँवला, हल्दी हो एक ग्राम,
सर्दी कफ तकलीफ में, फ़ौरन हो आराम..
२५Ⓜनीबू बेसन जल शहद, मिश्रित लेप लगाय,
चेहरा सुन्दर तब बने, बेहतर यही उपाय..
२६.Ⓜमधु का सेवन जो करे, सुख पावेगा सोय,
कंठ सुरीला साथ में, वाणी मधुरिम होय.
२७.Ⓜपीता थोड़ी छाछ जो, भोजन करके रोज,
नहीं जरूरत वैद्य की, चेहरे पर हो ओज..
२८Ⓜठण्ड अगर लग जाय जो नहीं बने कुछ काम, नियमित पी लें गुनगुना, पानी दे आराम..
२९Ⓜकफ से पीड़ित हो अगर, खाँसी बहुत सताय,
अजवाइन की भाप लें, कफ तब बाहर आय..
३०Ⓜअजवाइन लें छाछ संग, मात्रा पाँच गिराम, कीट पेट के नष्ट हों, जल्दी हो आराम..
३१Ⓜछाछ हींग सेंधा नमक, दूर करे सब रोग,
जीरा उसमें डालकर, पियें सदा यह भोग..।
☝कृपया इस मैसेज को अपने 10 परिजनो और अपने मित्रगणो को अवगत कराए...

हम आर्य हैं, हमें आर्य ही रहने दो

आर्यो का आर्यत्व

विचित्र लीला है परमात्मा की!
सनातन हिन्दू समाज के बहुसंख्यक कुपमण्डूको को धर्म शिक्षा देकर उनकी पॉपलीला को दूर करके सनातन वैदिक हिन्दू समाज को एक करना चाहते है, तो वे लोग हमें आर्य समाजी कहने लगते हैं, क्योंकि हम जात- पात के अधर्म को स्वीकार नहीं करते और न ही जन्म के आधार पर किसी को श्रेष्ठ अथवा निम्न समझते है। दूसरी ओर आर्य समाजी लोग हमें जबरन आर्य समाजी बनाने पर तुले रहते हैं, जब कि हम किसी समाज के एकांकी बंधन को स्वीकार नहीं करते। विवशतावश हमें उनसे कहना पडता है कि श्रीमान जी हम आर्य तो है, आर्य समाजी नहीं ।
बस इतना कहते ही विवाद खडा हो जाता है, लोग कहने लगते है कि आप आर्य समाजी नहीं तो आर्य कैसे हुए, फलाना,, ढिमका,,.....!!
अरे मेरे विद्वान भाईयों ! जितना रस ओ३म् के जप ध्यान में आता हैं, उतना ही रस हमें राम नाम में भी आता हैं।
जितनी एकाग्रता तन्म्य होकर यज्ञ करने में होती हैं, उतनी ही तन्म्यता हमें पाषाण प्रस्तर की प्रतिमा में ईश्वर को निहारते होती हैं।
जितने समर्पण से अग्नि अपने अन्दर आहुत सामग्री को भस्म कर डालती हैं, उतने ही समर्पण से हम उस पाषाण प्रतिमा को उखाडकर उससे धर्म रक्षा हेतु शस्त्र का काम भी लेना जानते हैं।
जितना आनन्द संध्या करते हुए मिलता हैं, उतना ही आनन्द हमें हरि नाम के संकिर्तन में भी मिलता हैं।
हम आर्य है तो स्वतन्त्र हैं, आर्य समाजी बन गये तो हिन्दू के नाम से भी चिढना पडेगा, जैसा हमारे बहुसंख्यक आर्य समाजी भाई करते हैं, बात बेबात हिन्दू- आर्य का विवाद खडा कर देते हैं।
आर्य समाजी होगे तो ईश्वर को निराकार मानना ही पडेगा, भले ही ईश्वर की अनूभुति न हुई हो, जबकि आर्य होने में ऐसा कुछ भी नहीं हैं, क्योंकि आर्य उस विराट सत्ता को साकार- निराकार की एक परिधि विशेष में नहीं बांध सकता। पता नहीं उस विराट परमपिता का, अस्तित्व का, किसे कब और कहा किस रूप में अनुभव घट जाये।

हम आर्य हैं, हमें आर्य ही रहने दो, पौराणिक तथा आर्य समाज के चक्कर से हमें मुक्त ही रहने दों।

ओ३म् नमस्ते
जय श्री राम
जो बोले सो अभय सनातन धर्म की जय

-विश्वजीत सिंह अनंत
सनातन संस्कृति संघ/भारत स्वाभिमान दल

संगीत की कोई सरहद नहीं होती.....

संगीत की कोई सरहद नहीं होती.....
न कला की ... न कलाकार की........ न मोहब्बत की.....
तो फिर कौन सी सरहद बचाने के चक्कर में मर रहे वो बावरे भी........
अरे भई.....
ए सी से ताप नियन्त्रित चिकनी नक़्क़ाशी वाली चार दिवारी से थोड़ी न दिख जायेगी सरहद......
पीओके वाली लाइन पर जाके एक दिन बस तैनात हो जाओ......
सारी सरहदें दोपहर के घाम की तरह साफ़ हो जायेगीं........
और कला संगीत की महानता वाला सारा नशा भी खटाक से उतर जायेगा....
तब तक आपको कोई अधिकार नहीं सरहद को नकारने का.......
काहे कि हम न तो पंछी हैं न नदिया और न ही पवन के झोंके.................
#सलमान_खान_योगी_आदित्य_नाथ_ओम_पुरी
भारत स्वाभिमान दल

मिट्टी के ही दीये जलाएँ,दीपावली पर हर बार

कुम्हारन बैठी सड़क किनारे,लेकर दीये दो-चार।
जाने क्या होगा अबकी,करती मन में विचार।।
याद करके आँख भर आई,पिछली दीवाली त्योहार।
बिक न पाया आधा समान,चढ गया सर पर उधार।।
सोंच रही है अबकी बार,दूँगी सारे कर्ज उतार।
सजा रही है, सारे दीये करीने से बार बार।।
पास से गुजरते लोगों को देखे कातर निहार।
बीत जाए न अबकी दीवाली जैसा पिछली बार।।
नम्र निवेदन मित्रों जनों से,करता हुँ मैँ मनुहार।
मिट्टी के ही दीये जलाएँ,दीवाली पर अबकी बार।।
निवेदक: भारत स्वाभिमान दल/सनातन संस्कृति संघ