शनिवार, 8 अक्टूबर 2016

बुद्ध नास्तिक व वेद निन्दक ??

बौद्धों, नवबौद्धों व असुरों के कुप्रचार के कारण अधिकतर भारतीय लोग यह समझने लगे हैं कि सिद्धार्त गौतम यानि महात्मा बुद्ध वेद निंदक थे व् उन्होंने अपना ही अलग मत स्थापित किया .जिसे बौद्ध मत कहते हैं
आज आप सच्चाई जानिये की उनके क्या विचार थे सनातन धर्म को लेकर और उनके मृत्यु पीछे उनके अनुयायिओं ने इसे एक नास्तिक मत बना कर खूब प्रचलित किया
क्योकि व्यक्ति को नास्तिक बनाना आसान है परंतु वेद मार्ग पर लाना अत्यन कठिन है
और मेरे नवीन बौद्ध भाईयों के तो क्या कहने वे असल में बौद्ध नहीं वे अपना अलग ही नवीन मत चालु किये बैठे हैं जिसे हम लोग अम्बेडकरवाद कहते हैं । इनमे से अधिकतर लोगों ने सुत्त निपात विनय निपात धम्मपद आदि कुछ नहीं पढ़ा बस हिंदुओं की दुर्दशा देख कर उनकी आलोचना की है ।
1.आइये देखे बुद्ध अर्थात सिद्धार्त गौतम के क्या विचार थे आर्य पर :-
न तेन अरयो होति तेन पाड़ानि हिंसति
हिंसा सब पाड़ानम अरियोती पोचति
धम्मपद - संख्या 270
सब प्राणिओ की हिंसा करने वाला आर्य नहीं होता है जो प्राणिओ से अहिंसा का भाव रखता है वही आर्य होता है
2.सनातन धर्म पर :-
नही वीरेड वीराडी सम्मन वीड़ कदाचन
अवीरेड़ तू सम्मन्ति एस्स धम्मो सनातनो
अर्थात : वैर से वैर कभी समाप्त नहीं होता, वैर को समाप्त करने के लिए अवैर का सहारा लिया जाता है, यह जो मैं कह रहा हूँ वही सनातन धर्म है
3.वेदों पर :-
१.तथागत नाम अहम , तिन वेदानाम पारगु
अर्थात : मेरा नाम तथागत है मैं तीन वेदों में पारंगत हूँ।
विद्वचा वैदेही समिच्च धम्मम
न उच्चवुच्चम गच्छति भूरी पज्जो
-सुत्त निपात (३२२-४५८ सभी वेदों पर)
अर्थात : वेदों को पढ़ा हुआ विद्वान्, कभी धर्म मार्ग से विचलित नहीं होता
२.वेदों में यज्ञ पर-
अग्गिहूत्त मुखा यज्ञा, सावित्री छन्दसो मुखम
अग्निहोत्र यज्ञ का मुख है, सावित्री(गायत्री) मन्त्र छंदो का मुख है
३.न वेद गुदड़ेया न मुतिया न उसानम एती नही तन्मयो सो न कमला नेति सुतेन नयो अलूपनेतो शून्वेषनुसु -सुत्त निपात
अर्थात : वेद को जानने वाला सांसारिक दृष्टि और असत्य विचार आदि से कभी अहंकार को प्राप्त नहीं होता, किसी प्रकार कर्म में लिप्त नही होता, किसी प्रकार भ्रम में नही पड़ता
4.जातिवाद :
न जच्चा वसलो होती, न जच्चा होती ब्राह्मणों
कमना वसलो होती, कमना होती ब्राह्मणों
जन्म से कोई शूद्र नहीं होता , जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता कर्म से ही शूद्र होते हैं , कर्म से ही ब्राह्मण होते हैं ।
5."सर्वे भवन्तु सुखिनः" का पाली में अनुवाद बुद्ध द्वारा
सभ्भे संता सुखी भवन्तु
सभे भवन्तु च खेननो
सभ्भे भद्राणि पश्यन्तु
मा गच्छि दुःख माग मा
बौद्धों के मुख्य मन्त्र पाली भाषा में अनुवाद
6.ॐ मड़ी पद्मेंहूम
अर्थात एक ईश्वर ही सच्चिदानन्द है।

सनातन संस्कृति संघ (रजि.)

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