बुधवार, 24 जून 2020

परमात्मा के मुख्य और निज नाम ओ३म् की महिमा




*परमात्मा के मुख्य और निज नाम "ओ३म्" की महिमा-*
वेद, उपनिषद्, ब्राह्मण ग्रंथ, महाभारत गीता, योगदर्शन, मनुस्मृति में एक "ओंकार का ही स्मरण और जप" करने का उपदेश दिया गया है। ओ३म् का जाप स्मरण शक्ति को तीव्र करता है,इसलिए वेदाध्ययन में मन्त्रों के आदि तथा अन्त में "ओ३म् "शब्द का प्रयोग किया जाता है।
*ओ३म् क्रतो स्मर ।।-(यजु० ४०/१५)* "हे कर्मशील ! 'ओ३म् का स्मरण कर।"
*ओ३म् प्रतिष्ठ ।।-(यजु० २/१३)* " ओ३म्' में विश्वास-आस्था रख !"
*ओ३म् खं ब्रह्म*-(यजु० ४०/१७) अर्थात् "मैं आकाश की तरह सर्वत्र व्यापक और महान् हूं मेरा नाम ओम् है।"
*ओम् स परि अगात् शुक्रं अकायम् अवर्णं अस्नाविरम्- यजुर्वेद ४०.०८* आत्मा में विराजमान इस परमात्मा को धीर पुरुष परा विद्या से साक्षात्कार किया करते हैं;क्योंकि यह ओ३म् इन्द्रियातीत है।वह नित्य, विभु, सर्वव्यापक, सूक्ष्म,अव्य तथा सब प्राणियों का कारण है। वह गोत्र, वंश, आंख, कान,हाथ,पांव से रहित है। वह संसार की बीज शक्ति है।वह अशरीर है।वह नाड़ी आदि बन्धनों से जकड़ा नहीं है।वह मलरहित है। पाप उसको बांध नहीं सकते।कोई स्थान उससे रिक्त नहीं। उसका कोई उत्पादक नहीं है। वह सवयं अपना स्वामी है।उसने अपनी सनातन प्रजाओं के लिए पदार्थों का ठीक ठीक रीति से विधान बनाया है।
*प्रश्नोपनिषद् में*:-पिप्पलाद ऋषि सत्यकाम को कहते हैं- हे सत्यकाम ! ओंकार जो सचमुच पर और अपर ब्रह्म है (अर्थात्) उसकी प्राप्ति का साधन है जो उपासक उस सर्वव्यापक परमेश्वर का ओ३म् शब्द द्वारा ध्यान करता है,वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।जो कृपासिन्धु,परमात्मा,अजर अमर अविनाशी सर्वश्रेष्ठ है,उस सर्वज्ञ अन्तर्यामी परमात्मा को सर्वसाधारण ओंकार के द्वारा प्राप्त होते हैं।
*कठोपनिषद -* सभी वेद जिस परमपद का बारंबार प्रतिपादन करते हैं सभी तप जिस पद का लक्ष्य करते हैं , जिसकी इच्छा से ब्रह्मचर्य का पालन होता है - उस परमपद को संक्षेप में "ओ३म्" कहा जा रहा है । अर्थात् यह अक्षर ही ब्रह्म तथा परब्रह्म है । क्षर अर्थात् नाशवान तथा अक्षर या शाश्वत सनातन ) ओंकार ही परब्रह्म प्राप्ति का श्रेष्ठ आलंबन है। इसके अवलंबन से महान ब्रह्म लोक की प्राप्ति होती है ।
*माण्डूक्योपनिषद्*:-ओंकार धनुष है,आत्मा तीर है और ब्रह्म उसका लक्ष्य कहलाता है।इसको अप्रमत्त(पूरा सावधान) पुरुष ही बींध सकता है,जब वह तीर के समान तन्मय हो जाता है।
*श्वेताश्वतर उपनिषद्*:-अपने देह को अरनी(नीचे की लकड़ी) बनाकर ओ३म् को ऊपर की अरनी बनाओ और ध्यान रुपी रगड़ के अभ्यास से अपने इष्टदेव परमात्मा के दर्शन कर लो।जैसे छिपी हुई अग्नि के रगड़ से दर्शन होते हैं वैसे ही "ओ३म्" द्वारा इस देह में आत्मा का दर्शन किया जा सकता है।
*छान्दोग्योपनिषद्*:-छान्दोग्योपनिषद् का भी जो सामवेद के महाब्राह्मण का एक भाग है,यही कथन है कि- "वह साधक जब उसे ब्रह्मलोक को जाना होता है,जिसे उसने उपासना द्वारा जाना है, ओ३म् पर ध्यान जमाता हुआ वहां जाता है" अतः प्रत्येक व्यक्ति को उचित है कि उस अविनाशी स्तुत्य "ओ३म्" नामक ब्रह्म की उपासना करे।
*तैत्तिरीयोपनिषद्*:-ओ३म् ब्रह्म का नाम है। ओ३म् ही सार वस्तु है।यज्ञ में इसी को सुनते सुनाते हैं। सामवेदी ओ३म् को ही पाते हैं। ऋग्वेदी भी इसी ओ३म् की ही स्तुति करते हैं। यजुर्वेदी अध्वर्यु भी अपने प्रत्येक वचन में ओंकार का ही बखान करते हैं।ब्रह्मा नामक ऋत्विक् ओंकार द्वारा ही आज्ञा देता है।अग्निहोत्र के लिए ओंकार के द्वारा ही आज्ञा दी जाती है।ब्रह्मवादी ओ३म् के द्वारा ही ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
*महर्षि पतञ्जलि योगदर्शन-1/27* "ओ३म्" को ही प्रणव कहा गया है ।इसके विधि पूर्वक जप से सभी अभीष्ट सिद्धिया प्राप्त होती हैं तथा चारों पुरुषार्थ संपन्न किया जाता है ।
*योगी याज्ञवल्क्य*:- जो ब्रह्म दिखाई नहीं देता और जो मन के द्वारा अनुभव नहीं होता,जिसका अस्तित्व सिद्ध है,केवल मनन द्वारा ही पहचाना जाता है।उसी का ओंकार नाम है।उसी के नाम पर आहुति देने से वह प्रसन्न होता है।
*महाभारत में -* महर्षि वेदव्यास कहते हैं कि जिज्ञासु वेद पढ़ते हुए और ओ३म् का जप करते हुए योग में मग्न और योग समाधि में भी ओ३म् का ध्यान करें। इस जप और योग के द्वारा ही परमात्मा का ज्ञान होता है।
*गीता-८.१३*:- हे अर्जुन ! जो मनुष्य इस एकाक्षर ब्रह्म 'ओ३म्' को कहते हुए और उसके द्वारा अन्त समय ब्रह्म को याद करते हुए इस शरीर को त्याग देते हैं,वह परमगति को प्राप्त होते हैं। ओ३म् तत् सत् इन तीनों पदों से ब्रह्म का निरुपण होता है,अतः ब्रह्मवादियों के यज्ञ,दान,तप आदि समस्त शुभ कर्मों का आरम्भ ओ३म् से होता है।
*यजुर्वेद का शतपथ ब्राह्मण*:- सर्वव्यापक सर्वज्ञ सर्वान्तर्यामी सर्वरक्षक 'ओ३म्' ब्रह्म सबसे महान् है।यह सबसे बड़ा है।सबसे प्राचीन तथा सनातन है.वही सबका प्राणदाता है।ओंकार शब्द ही वेदस्वरुप है।इसी ओ३म् के द्वारा समस्त ज्ञेय (जानने योग्य) पदार्थ जाने जा सकते हैं।
*सामवेद का ताण्डय् महाब्राह्मण*:-जो कोई यथार्थ रुप से ओंकार को नहीं जानता वह वेद के आश्रित नहीं रहता अर्थात् धर्म के अधीन न रहकर संसार में अधर्म तथा उपद्रव फैलाने वाला हो जाता है,परन्तु जो ओंकार को इस प्रकार से जानता है वह वेद के आश्रित रहकर संसार का उपकार करता है। इसी ब्राह्मण में अलंकार रुप से ओ३म् की महिमा का वर्णन करते हुए यह दर्शाया है कि किस प्रकार ओ३म् के आश्रय में आने और उसके द्वारा ब्रह्म को जानने से दैनिक देवासुर संग्राम में मनुष्य को विजय तथा सफलता प्राप्त होती है।
*अथर्ववेद का गोपथ ब्राह्मण* :- गोपथ ब्राह्मण में ओ३म् की महिमा विशेष ध्यान देने योग्य है। यथा श्लोक (गो० 1/22) जिसके अर्थ इस प्रकार हैं- जो ब्रह्मोपासक इस अक्षर 'ओम्' की जिस किसी कामना पूर्ति की इच्छा से तीन रात्रि उपवास रखकर तेज-प्रधान पूर्व दिशा की ओर मुख करके, कुशासन पर बैठकर सहस्र बार जाप करता है उसके सब शुभ मनोरथ सिद्ध होते हैं।इस कथन में जप करने के विधान का उपदेश भी किया गया है आजकल प्रायः सभी जिज्ञासु जप करने की विधि जानना चाहते हैं,उनके लिए यह सुगम विधि है।
*मनुस्मृति (अध्याय १२, श्लोक- १२२,१२३)-* जो सबको शिक्षा देने हारा, सूक्ष्म से सूक्ष्म, स्वप्रकाशस्वरूप, समाधिस्थ, वृध्दि से जानने योग्य है, उसको परम पुरूष अर्थात परमात्मा जानना चाहिए। और स्वप्रकाश होने से "अग्नि" , विज्ञानस्वरूप होने से "मनु", और सबका पालन करने से "प्रजापति", और परमैश्वर्यवान होने से "इंद्र", सबका जीवनमूल होने से "प्राण" और निरंतर व्यापक होने से परमेश्वर का नाम "ब्रह्मा" है ।
*गोपथ ब्राह्मण में ओ३म् की महिमा यथा श्लोक (गो० 1/22)* जिसके अर्थ इस प्रकार हैं, कि जो ब्रह्मोपासक इस अक्षर 'ओम्' की जिस किसी कामना पूर्ति की इच्छा से तीन रात्रि उपवास रखकर तेज-प्रधान पूर्व दिशा की ओर मुख करके, कुशासन पर बैठकर सहस्र बार जाप करता है उसके सब शुभ मनोरथ सिद्ध होते हैं ।
*प्रश्नोपनिषद में ओंकार की महिमा*:- एक समय शिवि के पुत्र सत्यकाम ने पिप्पलाद ऋषि से पूछा-हे भगवन् । मनुष्यो़ में वह व्यक्ति जो प्राण के अन्त तक ओंकार का ध्यान करता है,उसकी क्या गति होती है?पिप्पलाद ऋषि ने उत्तर दिया कि जो उपासक उस सर्वव्यापक परमेश्वर का 'ओ३म्' शब्द द्वारा ध्यान करता है,वह ब्रह्म को प्राप्त करता है।उस सर्वज्ञ अन्तर्यामी परमात्मा को सर्वसाधारण ओंकार के द्वारा प्राप्त होते हैं। जो साधक त्रिमात्र ओम् का ध्यान करे,वह तेज में सूर्यलोक से सम्पन्न हो जाता है।
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ब्रह्माण्ड में ओ३म् शब्द की महिमा है। विपत्ति में,मृत्यु में,ध्यान के अन्तिम क्षणों में बस ओ३म् ही शेष रह जाता है,शेष सब मन्त्र, ज्ञान-विज्ञान धूमिल हो जाता है।पौराणिकों की मूर्तियों व मन्दिरों के ऊपर ओ३म्, आरती में ओ३म्, नवजात शिशु के मुख में ओ३म्, सब स्थानों में ओ३म् ही ओ३म् है।
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*य ईं चिकेत गुहा भवन्तमा यः ससाद धारामृतस्य। वि ये चृतन्त्यृता सपन्त आदिद्वसूनि प्र ववाचास्मै॥*
।। ऋग्वेद १-६७-४।।
जो मनुष्य हृदय की गुहा में स्थित परमेश्वर ओम् को जानते हैं, जो अपने आपको उसे समर्पित करते हैं, जो सत्य मार्ग का अनुसरण करते हैं, जो उस प्रभु का दिव्य प्रकाश पाने के लिए उससे अपने आप को संयुक्त करते हैं...उन्हें परमेश्वर जीवन के चरम लक्ष्य मुक्ति को पाने के लिए मार्गदर्शन करते हैं ।

सोमवार, 27 अप्रैल 2020

वैशाख शुक्ल पंचमी आदिगुरू शंकराचार्य जी की जयंती



 

श्रुति स्मृति पुराणानां आलयं करुणालयम् ।
नमामि भगवद्पाद शंकरं लोकशंकरम् ।।
********वैशाख शुक्ल पंचमी *********
******आदिगुरू शंकराचार्य जी********
********** की जयंती पर ************
*******उन्हें कोटिशः नमन *************

आज से लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व कलियुग प्रारम्भ हुआ , तब से लेकर आज तक सनातन हिन्दू समाज के सामने अनेक विकट परिस्थितियाँ आई हैं ...सब संकटों को पार करके भी अगर हमारी चिरंतर धारा निरंतर बह रही है तो इसके पीछे अनेक महापुरुषों की तपस्या है ....हिन्दू समाज को अपने धर्म की सनातन परम्परा के लिए अगर किसी के प्रति सर्वाधिक कृतज्ञ होना चाहिए तो वो हैं ****आदिगुरू शंकराचार्य****


...... कलियुग के प्रारम्भ में धर्म का पतन आरम्भ हुआ ...अनेक मत पंथों ने जन्म लिया, जिसके कारण वैदिक परम्पराएं भी लुप्त होने लगी .... हिन्दू धर्म की लौ मद्धिम पड़ने लगी ....ऐसे में लगभग २५०० वर्ष पूर्व ..सुदूर दक्षिण में केरल के एक छोटे से ग्राम ......कालडी ...से १२ वर्ष का बालक शंकर वैदिक अद्वैत ज्ञान की ज्योति लिए घर से निकला ...पूरे भारत भर में घूम घूम कर नास्तिक पन्थो को परास्त किया सनातन वैदिक हिन्दू धर्म की पताका दिग्दिगांत में फहरा दी....

....उनकी अद्भुत रचनाएं और कार्य देख कर एक बार विश्वास करना असंभव लगता है की कोई मनुष्य इतनी छोटी आयु में इतना सब कर सकता है ...देश के चार कोनो में चार मठों की स्थापना ....,, चार पीठों पर चार शंकराचार्यों की परम्परा स्थापित करके हर पीठ के माध्यम से एक एक वेद और अलग अलग तीर्थों की मर्यादा सुरक्षित करना ..........बोद्ध आदि अन्य नास्तिक पंथों को परास्त करना ....... पञ्च देवों की पूजा की परम्परा स्थापित करना .....महान अद्वैत मत के ज्ञान को प्रगट करना ..ऐसे कार्य हैं जिनके लिए हजारों जन्म भी कम हैं .........आदि शंकर की जन्म जयंती पर अपने ह्रदय के उच्चतम भावों से हम उनके चरणों में अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं *********

भारतीय संस्कृति के विकास में आद्य शंकराचार्य का विशेष योगदान रहा है। आचार्य शंकर का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी को स्वीकार किया जाता है। शंकर दिग्विजय, शंकरविजयविलास, शंकरजय आदि ग्रन्थों में उनके जीवन से सम्बन्धित तथ्य उद्घाटित होते हैं। दक्षिण भारत के केरल राज्य (तत्कालीन मालाबारप्रांत) में आद्य शंकराचार्य जी का जन्म हुआ था। उनके पिता शिव गुरु तैत्तिरीय शाखा के यजुर्वेदी ब्राह्मण थे। 


आठ वर्ष की अवस्था में गोविन्दपाद के शिष्यत्व को ग्रहण कर संन्यासी हो जाना, पुन: वाराणसी से होते हुए बद्रिकाश्रम तक की पैदल यात्रा करना, सोलह वर्ष की अवस्था में बद्रीकाश्रम पहुंच कर ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखना, सम्पूर्ण भारत वर्ष में भ्रमण कर अद्वैत वेदान्त का प्रचार करना, दरभंगा में जाकर मण्डनमिश्र से शास्त्रार्थ कर वेदान्त की दीक्षा देना तथा मण्डन मिश्र को संन्यास धारण कराना, भारतवर्ष में प्रचलित तत्कालीन कुरीतियों को दूर कर समभावदर्शी धर्म की स्थापना करना, ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदारण्यकऔर छान्दोग्योपनिषद् पर भाष्य लिखना भारत वर्ष में राष्ट्रीय एकता अखण्डता तथा सांस्कृतिक अखण्डता की स्थापना करना उनके अलौकिक व्यक्तित्व का परिचायक है। 

चार धार्मिक मठों में दक्षिण के श्रृंगेरीशंकराचार्यपीठ, पूर्व (उडीसा) जगन्नाथपुरीमें गोवर्धनपीठ, पश्चिम द्वारिका में शारदामठ तथा बद्रिकाश्रम में ज्योतिर्पीठ भारत की एकात्मकता को आज भी दिग्दर्शित कर रहा है। कुछ लोग श्रृंगेरी को शारदापीठ तथा गुजरात के द्वारिका में मठ को काली मठ कहते र्है। उक्त सभी कार्य को सम्पादित कर 32वर्ष की आयु में मोक्ष प्राप्त करना, अलौकिकता की ही पहचान है। शंकराचार्य के विषय में कहा गया है
अष्टवर्षेचतुर्वेदी, द्वादशेसर्वशास्त्रवित्
षोडशेकृतवान्भाष्यम्द्वात्रिंशेमुनिरभ्यगात्


अर्थात् आठ वर्ष की आयु में चारों वेदों में निष्णात हो गए, बारह वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों में पारंगत, सोलह वर्ष की आयु में शांकरभाष्यतथा बत्तीस वर्ष की आयु में शरीर त्याग दिया। ब्रह्मसूत्र के ऊपर शांकरभाष्यकी रचना कर विश्व को एक सूत्र में बांधने का प्रयास भी शंकराचार्य के द्वारा किया गया है, जो कि सामान्य मानव से सम्भव नहीं है। 

शंकराचार्य के दर्शन में सगुण ब्रह्म तथा निर्गुण ब्रह्म दोनों का हम दर्शन, कर सकते हैं। निर्गुण ब्रह्म उनका निराकार ईश्वर है तथा सगुण ब्रह्म साकार ईश्वर है। जीव अज्ञान व्यष्टि की उपाधि से युक्त है। 'तत्त्‍‌वमसि' तुम ही ब्रह्म हो; 'अहं ब्रह्मास्मि' मै ही ब्रह्म हूं; 'अयामात्मा ब्रह्म' यह आत्मा ही ब्रह्म है; इन बृहदारण्यकोपनिषद् तथा छान्दोग्योपनिषद वाक्यों के द्वारा इस जीवात्मा को निराकार ब्रह्म से अभिन्न स्थापित करने का प्रयत्‍‌न शंकराचार्य जी ने किया है। ब्रह्म को जगत् के उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय का निमित्त कारण बताए हैं। ब्रह्म सत् (त्रिकालाबाधित) नित्य, चैतन्यस्वरूप तथा आनंद स्वरूप है। ऐसा उन्होंने स्वीकार किया है। जीवात्मा को भी सत् स्वरूप, चैतन्य स्वरूप तथा आनंद स्वरूप स्वीकार किया है। जगत् के स्वरूप को बताते हुए कहते हैं कि -

नामरूपाभ्यां व्याकृतस्य अनेककर्तृभोक्तृसंयुक्तस्य प्रतिनियत देशकालनिमित्त 
क्रियाफलाश्रयस्य मनसापि अचिन्त्यरचनारूपस्य जन्मस्थितिभंगंयत:


अर्थात् नाम एवं रूप से व्याकृत, अनेक कत्र्ता, अनेक भोक्ता से संयुक्त, जिसमें देश, काल, निमित्त और क्रियाफल भी नियत हैं। जिस जगत् की सृष्टि को मन से भी कल्पना नहीं कर सकते, उस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति तथा लय जिससे होता है, उसको ब्रह्म कहते है। सम्पूर्ण जगत् के जीवों को ब्रह्म के रूप में स्वीकार करना, तथा तर्क आदि के द्वारा उसके सिद्ध कर देना, आदि शंकराचार्य की विशेषता रही है। इस प्रकार शंकराचार्य के व्यक्तित्व तथा कृतित्वके मूल्यांकन से हम कह सकते है कि राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का कार्य शंकराचार्य जी ने सर्वतोभावेनकिया था। भारतीय संस्कृति के विस्तार में भी इनका अमूल्य योगदान रहा है।


जगद्गुरू आदिशंकराचार्य जी को भारत स्वाभिमान दल कोटि कोटि नमन करता हैं।