मंगलवार, 31 दिसंबर 2019

राष्ट्र धर्म रक्षक हिन्दू वीर शिरोमणि गोकुल सिंह

राष्ट्र धर्म रक्षक हिन्दू वीर शिरोमणि गोकुल सिंह


वीर गोकुल सिंह एक साधारण सनातन क्षत्रीय जाट परिवार में पैदा हुए थे। उन्हें बचपन से ही शस्त्र अस्त्र की विद्या सिखाई गयी। वेदों व शास्त्रों का ज्ञान दिया गया था।

उन्होंने इस्लाम मजहब व इस्लामिक पिशाच औरँगेजेब के अत्याचारों के बारे में बचपन से ही सुना था इसलिए उन्होंने युवावस्था में ही क्रांतिकारियों की सेना तैयार करनी शुरू कर दी थी।
वीर गोकुल सिंह ने तिलपत में अपनी गढ़ी स्थापित की और मथुरा व ब्रिज के अन्य हिस्सों में भी अपने छोटे छोटे किले बना लिया। उसके बाद वे पूरे उत्तर भारत में घूमे।हिन्दुओं को इस्लाम व औरंगजेब के अत्याचारों के खिलाफ जाग्रत किया।

उनका भाषण इतना तेजस्वी था कि हिन्दू माताओं ने अपने बेटो को गोकुल सिंह के अभियान के लिए समर्पित कर दिया था।

उन्होंने हिन्दू युवकों के हाथों में हथियार दिए व 20000 युवकों की सेना तैयार की।
वे औरंगजेब के विरूद्ध योजनाबद्ध सशस्त्र क्रांति करने वाले पहले वीर यौद्धा थे। उन्होंने हिन्दू किसानों को औरंगजेब के खिलाफ असहयोग नीति अपनाने को कहा व उनके एक आह्वान पर किसानों ने लगान बन्द कर दिया व बाकी हिन्दुओं ने जजिया कर देना बंद कर दिया।
उन्होंने मंदिरों, गुरूकुलों, महिलाओं, किसानों की रक्षा की। धर्म व देश की भक्ति उनकी रग रग में बसी हुई थी।

उन्होंने इस्लामी राक्षस औरंगजेब के सबसे कट्टर अब्दुन्नबी खान का वध किया व हिन्दू युवाओ के मन से मुगलिया कर्मचारियों का खौफ निकाला। उन्होंने औरँगेजेब के सेनापतियों को हरा दिया।


इसके बाद हर जगह मुगलिया सरकार के कर्मचारियों को मार भगाना शुरू हुआ। औरंगजेब की सत्ता हिल गयी पूरे उत्तर भारत में हिन्दू क्रांति की लहर दौड़ पड़ी।

औरंगजेब ने उसे सन्धि का प्रस्ताव भेजा व जागीर का लालच दिया। लेकिन गोकुल सिंह ने साफ मना कर दिया और उस पर तंज कसते हुए कहा कि जो धर्म के पथ से हट जाए व असली यौद्धा नहीं होता।और तुझे हिन्दुओ पर इतनी ही दया है तो अपनी बेटी किसी हिन्दू को ब्याह दे।
बिना किसी राजा महाराजा के सहयोग से एक छोटे से किसान के बेटे गोकुल सिंह ने यह सब कर दिखाया।

अंत में जो औरंगजेब बड़े बड़े राजा महाराजाओं से लड़ने नहीं आता था उसे एक साधारण युवक से लड़ने आना पड़ा।
उसने पूरी ताकत गोकुल सिंह के आन्दोलन को दबाने में लगा दी।
औरंगजेब और गोकुल के बीच तिलपत में सीधा युद्ध शुरू हो गया।

गोकुल सिंह अंतिम युद्ध 6 दिनों तक लड़ते रहे । हजारो हिन्दू बलिदान हुए। औरँगेजेब की शाही तोपो के आगे तलवारों से लड़ते रहे। आखिर तोपो के आगे बंदूक तलवार कब तक चलती अंत में औरँगेजेब का पलड़ा भारी होने लगा।हार देखकर माताओं ने अपनी बेटी के सीने में खंजर उतार दिया। पतियों ने पत्नियों के सीने में गोली उतार दी व रण में कूद पड़े थे।
इस तरह जौहर करके वीरांगनाओं ने अपना स्वाभिमान बचाया।

गोकुल सिंह व उनकी सेना ने हार देखकर मैदान नहीं त्यागा। हजारो युवा रण में बलिदान हो गए। बाकियो को औरंगजेब ने बंदी बना लिया।
औरंगजेब से अंतिम तिलपत युद्ध 6 दिन तक लगातार चला। गोकुल व उनके साथियों को बंदी बनाकर आगरा दरबार में ले जाया गया।

गोकुल सिंह व उनके चाचा उदय सिंह पर इस्लाम स्वीकारने के लिए दबाव बनाया गया। लेकिन उन्होंने आंखों में आंखे डालकर कहा कि जो तू कर रहा है यही इस्लाम है तो इसे धर्म कहना पाप है और हिन्दू धर्म उनके शरीर के कतरे कतरे में बसा हुआ है।

यदि गोकुल सिंह इस्लाम स्वीकार लेते तो उस दिन उनके हजारो वीर सैनिक व उत्तर भारत के हजारो हिन्दू अपना धर्म त्याग देते। गोकुल सिंह यह जानते थे उन्होंने अपने प्राणों की तनिक भी चिंता न की और अपने धर्म के स्वाभिमान को नहीं झुकने दिया।

इसके बाद औरंगजेब ने 1 जनवरी 1670 को गोकुल सिंह व उनके चाचा के शरीर के टुकड़े टुकड़े करवा दिए। उनके साथियों व करीबियों का भी यही हाल हुआ। वहां देखने वाले हर इंसान के मुख से हे राम की ध्वनि निकल रही थी।लेकिन बलिदान होने वाले वीरों का सिर गर्व से तना हुआ था व उनके चित पर प्रसन्नता ही दिखाई दे रही थी।
उनके मासूम छोटे छोटे बच्चों की भी इस्लामिक पिशाच औरँगेजेब ने निर्मम तरीके से हत्या करवा दी थी।

इस बलिदान के बाद हिंदूओ में साहस भर गया उन्होंने औरंगजेब के अत्याचारों के विरुद्ध क्रांति शुरू कर दी। उसके बाद अनेकों यौद्धाओं ने इस्लामिक पिशाचों के विरूद्ध समय समय और क्रांति की। गोकुल सिंह का बलिदान इस्लामिक सत्ता के खात्मे में मील का पत्थर साबित हुआ।
ऐसे महान यौद्धा के बलिदान दिवस पर कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से भारत स्वाभिमान दल उन्हें कोटि कोटि नमन करता हैं।


आगरा स्थित फुब्बारा चौक 1 जनवरी 2014 आधुनिक भारतीय इतिहास का पहला कार्यक्रम, जिसमें 1669 की क्रांति के जननायक, राष्ट्र-धर्म रक्षक वीर गोकुल सिंह जी को उनके बलिदान दिवस पर श्रद्धांजलि देकर उनके अधूरे सपनों को पूर्ण करने का संकल्प लेते हुए ठाकुर हरीओम सिंह जी, विश्वजीत सिंह अनंत जी व भाई प्रमोद यादव जी

1 जनवरी "क्रान्ति संकल्प दिवस"

1 जनवरी क्रान्ति संकल्प दिवस 

ईसाई मिशनरीयों के हाथों अपना स्वाभिमान गवाँ चुका हिन्दू समाज अपना इतिहास जाने, और 1 जनवरी को 1669 के स्वतंत्रता समर के जननायक गोकुल सिंह जी व उनके 20 हजार यौद्धाओं की स्मृति में "क्रान्ति संकल्प दिवस" मनाकर अपने पूर्वजों पर गर्व करें।

निवेदक:
विश्वजीत सिंह अनंत
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल


हमारा नवबर्ष #चैत्रशुक्लपक्षप्रतिपदा से प्रारम्भ होता हैं, 1 जनवरी को हम धर्मरक्षक वीर गोकुल सिंह जी व उनके साथियों के बलिदान को क्रान्ति संकल्प दिवस के रूप में स्मरण करते हैं ~~~~~~~~~~


 महाआश्चर्य! भारतवासी,1 जनवरी को देश की स्वतंत्रता के लिए बलिदान होने वाले अमर वीरगोकुलसिंह को भूल गए..!!! पर गुलाम बनाने वाले अंगेजों का नववर्ष याद है.. 1669 की क्रान्ति के जननायक, परतंत्र भारत में असहयोग आन्दोलन के जन्मदाता, राष्ट्रधर्म रक्षक वीर गोकुल सिंह जी और उनके सात हजार क्रान्तिकारी साथियों के बलिदान दिवस पर (1जनवरी 1670) उनको शत-शत नमन। कैसे वीर थे वो अलबेले, कैसी अमर है उनकी कहानी। धर्मरक्षक वीर गोकुल सिंह जी की, आओ याद करें बलिदान।। 


सन् 1666 के समय में इस्लामिक राक्षस औरंगजेब के अत्याचारों से हिन्दू जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। मंदिरों को तोड़ा जा रहा था, हिन्दूस्त्रियों की इज्जत लूटकर उन्हें मुस्लिम बनाया जा रहा था। औरंगजेब और उसके सैनिक पागल हाथी की तरह हिन्दू जनता को मथते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे। हिंदुओं को दबाने के लिए इस्लामिक पिशाच औरंगजेब ने अब्दुन्नवी नामक एक कट्टर मुसलमान को मथुरा का फौजदार नियुक्त किया।

अब्दुन्नवी के सैनिकों का एक दस्ता मथुरा जनपद में चारों ओर लगान वसूली करने निकला। सिनसिनी गाँव के सरदार गोकुल सिंह के आह्वान पर किसानों ने लगान देने से इंकार कर दिया, परतन्त्र भारत के इतिहास में वह पहला असहयोग आन्दोलनथा । दिल्ली के सिंहासन के नाक तले समरवीर धर्मपरायण हिन्दू वीर योद्धा गोकुल सिंह और उनकी किसान सेना ने आतताई औरंगजेब को हिंदुत्व की ताकत का एहसास दिलाया।

मई 1669 में अब्दुन्नवी ने सिहोरा गाँव पर हमला किया। उस समय वीर गोकुल सिंह गाँव में ही थे। भयंकर युद्ध हुआ लेकिन इस्लामी शैतान अब्दुन्नवी और उसकी सेना सिहोरा के वीर हिन्दुओं के सामने टिक ना पाई और सारे इस्लामिक पिशाच गाजर-मूली की तरह काट दिए गए। गोकुल सिंह की सेना में जाट, राजपूत, गुर्जर, यादव, मीणा इत्यादि सभी जातियों के हिन्दू थे। इस विजय ने मृतप्राय हिन्दू समाज में नए प्राण फूँक दिए थे।






इसके बाद पाँच माह तक भयंकर युद्ध होते रहे । मुगलों की सभी तैयारियां और चुने हुए सेनापति प्रभावहीन और असफल सिद्ध हुए । क्या सैनिक और क्या सेनापति सभी के ऊपर गोकुलसिंह का वीरता और युद्ध संचालन का आतंक बैठ गया। अंत में सितंबर मास मेंबिल्कुल निराश होकरशिकनखाँ ने गोकुलसिंह के पास संधिप्रस्ताव भेजा । गोकुल सिंह ने औरंगेजब का प्रस्ताव अस्वीकार करते हुए कहा कि औरंगजेब कौन होता है हमें माफ करने वालामाफी तो उसे हम हिन्दुओं से मांगनी चाहिए उसने अकारण ही हिन्दू धर्म का बहुत अपमान किया है।

अब औरंगजेब 28 नवम्बर 1669 को दिल्ली से चलकर खुद मथुरा आया गोकुल सिंह से लड़ने के लिए। औरंगजेब ने मथुरा में अपनी छावनी बनाई और अपने सेनापति होशयार खाँ को एक मजबूत एवं विशाल सेना के साथ युद्ध के लिए भेजा। आगरा शहर का फौजदार होशयार खाँ 1669 सितंबर के अंतिम सप्ताह में अपनी-अपनी सेनाओं के साथ आ पहुंचे । यह विशाल सेना चारों ओर से गोकुलसिंह को घेरा लगाते हुए आगे बढ़ने लगी ।






गोकुलसिंह के विरुद्ध किया गया यह अभियानउन आक्रमणों से विशाल स्तर का थाजो बड़े-बड़े राज्यों और वहां के राजाओं के विरुद्ध होते आए थे। इस वीर के पास न तो बड़े-बड़े दुर्ग थेन अरावली की पहाड़ियाँ और न ही महाराष्ट्र जैसा विविधतापूर्ण भौगोलिक प्रदेश । इन अलाभकारी स्थितियों के बावजूदउन्होंने जिस धैर्य और रण-चातुर्य के साथएक शक्तिशाली साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति का सामना करकेबराबरी के परिणाम प्राप्त किएवह सब अभूतपूर्व है।

औरंगजेब की तोपो,धर्नुधरोंहाथियों से सुसज्जित तीन लाख की विशाल सेना और गोकुल सिंह की किसानों की 20000 हजार की सेना में भयंकर युद्ध छिड़ गया। चार दिन तक भयंकर युद्ध चलता रहा और गोकुल सिंह की छोटी सी अवैतनिक सेना अपने बेढंगे व घरेलू हथियारों के बल पर ही अत्याधुनिक हथियारों से सुसज्जित और प्रशिक्षित मुगल सेना पर भारी पड़ रही थी। भारत के इतिहास में ऐसे युद्ध कम हुए हैं जहाँ कई प्रकार से बाधित और कमजोर पक्षइतने शांत निश्चय और अडिग धैर्य के साथ लड़ा हो । हल्दी घाटी के युद्ध का निर्णय कुछ ही घंटों में हो गया था। पानीपत के तीनों युद्ध एक-एक दिन में ही समाप्त हो गए थेपरन्तु वीरवर गोकुलसिंह का युद्ध तीसरे दिन भी चला । 
इस लड़ाई में सिर्फ पुरुषों ने ही नही बल्कि उनकी स्त्रियों ने भी पराक्रम दिखाया। चार दिन के युद्ध के बाद जब गोकुल की सेना युद्ध जीतती हुई प्रतीत हो रही थी तभी हसन अली खान के नेतृत्व में एक नई विशाल मुगलिया टुकड़ी आ गई और इस टुकड़ी के आते ही गोकुल की सेना हारने लगी। युद्ध में अपनी सेना को हारता देख हजारों नारियाँ जौहर की पवित्र अग्नि में खाक हो गई। गोकुल सिंह और उनके ताऊ उदय सिंह को सात हजार साथियों सहित बंदी बनाकर आगरा में औरंगजेब के सामने पेश किया गया। 






औरंगजेब ने कहा जान की खैर चाहते हो तो इस्लाम कबूल कर लो और रसूल के बताए रास्ते पर चलो। बोलो क्या इरादा है इस्लाम या मौत? अधिसंख्य धर्म-परायण हिन्दुओं ने एक सुर में कहा – “औरंगजेब, अगर तेरे खुदा और रसूल मोहम्मद का रास्ता वही है जिस पर तू चल रहा है तो धिक्कार है तुझे और तेरे रसूल को, हमें तेरे रास्ते पर नहीं चलना l” इतना सुनते ही औरंगजेब के संकेत से गोकुल सिंह की बलशाली भुजा पर जल्लाद का बरछा चला। गोकुल सिंह ने एक नजर अपने भुजाविहीन रक्तरंजित कंधे पर डाली और फिर बड़े ही घमण्ड के साथ जल्लाद की ओर देखा और कहा दूसरा वार करो। दूसरा बरछा चलते ही वहाँ खड़ी जनता आंर्तनाद कर उठी और फिर गोकुल सिंह के शरीर के एक-एक जोड़ काटे गए। गोकुल सिंह का सिर जब कटकर धरती माता की गोद में गिरा तो मथुरा में केशवराय जी का मंदिर भी भरभराकर गिर गया। यही हाल उदयसिंह और बाकि साथियों का भी किया गया। उनके एक साथी माडुसिंह जाट की जीवित ही चमड़ी उधेड़ दी, उनके छोटे- छोटे बच्चों को जबरन मुसलमान बना दिया गया। 




ये एक जनवरी 1670 का दिन था। ऐसे अप्रतिम वीर का कोई भी इतिहास नही पढ़ाया गया और न ही कहीं कोई सम्मान दिया गया। न ही उनके नाम पर न कोई विश्वविद्यालय है और न कोई केन्द्रीय या राजकीय परियोजना। कितना एहसान फरामोश, कृतघ्न है हिंदू समाज!! कैसे वीर हुए इस धरा पर,जिन्होंने धर्म के लिए प्राण न्यौछावर कर दिये पर इस्लाम नही अपनाया। गोकुलसिंह सिर्फ #जाटों के लिए शहीद नहीं हुए थे न उनका राज्य ही किसी ने छीन लिया था, न कोई पेंशन बंद कर दी थी, बल्कि उनके सामने तो अपूर्व शक्तिशाली मुगल-सत्ता, दीनतापूर्वक, सन्धि करने की तमन्ना लेकर गिड़-गिड़ाई थी। शर्म आती है हमें कि हम ऐसे अप्रतिम वीर को कागज के ऊपर भी सम्मान नहीं दे सके। शाही इतिहासकारों ने उनका उल्लेख तक नही किया। केवल जाट पुरूष ही नही बल्कि उनकी वीरांगनायें भी अपनी ऐतिहासिक दृढ़ता और पारंपरिक शौर्य के साथ उन सेनाओं का सामना करती रही। दुर्भाग्य की बात है कि भारत की इन वीरांगनाओं और सच्चे सपूतों का कोई उल्लेख शाही टुकड़ों पर पलने वाले तथाकथित इतिहासकारों ने नहीं किया। जागो भारतवासियों!!! भारत स्वाभिमान दल वीर गोकुल सिंह व उनके अमर बलिदानी साथियों को कोटि-कोटि नमन करता हैं।



रविवार, 8 सितंबर 2019

भारत स्वाभिमान दल संक्षिप्त परिचय


भारत स्वाभिमान दल संक्षिप्त परिचय


भारतवर्ष एक ऐसा देश है जो कभी सोने का शेर था ।

हर व्यक्ति आनन्दित, हर परिवार संपन्न, सबके पास अपने काम और सब कामो में व्यस्त, सर्वोच्च स्तर का चरित्र, बौद्धिक स्तर पर भारत का कोई मुकाबला नहीं था, उच्च स्तरीय गुरुकुल शिक्षा पद्धति, आयुर्वेदिक और शल्य चिकित्सा, तकनीकि विज्ञान और खोज में सबसे आगे, सबसे पहले अंतरिक्ष विज्ञान का ज्ञाता, संस्कार और परम्परा में पूरे विश्व का गुरु और सिरमौर कहलाने वाला भारतवर्ष आज वासना, नशा, भ्रष्टाचार और व्याभिचार और आलस्य में डूबा हुआ है।

हर तरफ चोरी, दुश्मनी, हत्या, बलात्कार, धरना प्रदर्शन, मुफ्तखोरी, दलाली, घूसखोरी और अपराध अपने चरम पर है।

कोई संतुष्ट नहीं, सबके अंदर असुरक्षा की भावना घर कर चुकी है, कुछ भी निश्चित नहीं लगता।

जो समाज का नेतृत्व करते है, जिनके इशारे मात्र पर कुछ बदल सकता है, वो स्वाभिमान जागरण, विकास और राष्ट्रीय एकता के स्थान पर, विनाश और साम्प्रदायिक तुष्टिकरण कर विखण्डन की बात करते है, अपने राजनैतिक हित के लिए हमेशा धर्म के आधार पर भेदभाव करते है, जाति और सम्प्रदाय की बातो में उलझाकर, उकसाकर लड़वाया करते है, और वोट की राजनीति करते है, उनके लिए हम वोट बैंक के अलावा और कुछ नहीं।

जो विकास और जानकारी के स्रोत है, जो जन जन तक जानकारी पहुचाने के माध्यम है, वो अश्लीलता परोसकर विदेशी कम्पनियो का व्यापार बढ़ाकर, कमीशन के रूप में पैसा बटोर रहे है, भारत के नागरिकों को संविधानिक रूप से साम्प्रदायिक आधार पर बांटने वाले कानून लागू कर दिये गये है।

जिनके हाथ में देश का भविष्य है, जो पीढ़ियों का निर्माण करते है, जो अपने द्वारा बच्चों को चरित्र, व्यवहार, सामाजिक और भविष्य निर्माण की कला सिखाते है, उनको कानूनों में बांधकर अपंग बना दिया, और थोप दी विदेशी शिक्षा व्यवस्था।

आज सब व्यवस्थाओं में घुन लग गया है, न कुछ स्पष्ट है और न ही सापेक्ष, अपनी मूल प्रकृति को भूलकर दूसरो की व्यवस्था और गंदे संस्कारो से प्रभावित होकर हम विनाश की अंधी दौड़ में शामिल हो गए है जिसका अंजाम शायद एक दिन सीरिया जैसा हो सकता है।

क्या आप चाहते हो कि आप के बच्चे जिन्हें आप अपनी जान से ज्यादा प्यार करते हो, ऐसे माहौल में जिए, ऐसी व्यवस्थाये विनाशकारी है इनको बदलना होगा।

ऐसे में देश के जागरूक युवाओ और बुद्धिजीवी लोगो ने मिलकर, अपने देश के स्वर्णिम इतिहास का अध्ययन कर क्रांतिकारी, योगियो और संतो के जीवन से प्रेरणा लेकर "भारत स्वाभिमान दल" संगठन की स्थापना की है, और उन सिद्धांतो पर कार्य करने का निर्णय लिया जिन पर चलकर यह देश खुशहाल, संपन्न, शक्तिशाली, संस्कारवान और विश्वगुरु था। आइये मिलकर संस्कारित, खुशहाल, समृद्ध, दिव्य और तेजस्वी भारत का निर्माण करे।

सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के लिए संगठित होना अति आवश्यक है।

भारत स्वाभिमान दल देश के हर उम्र के विचारशील, प्रगतिशील और राष्ट्रभक्तों का इस महान कार्य में सहयोग के लिए आवाहन करता है।




सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के लिए भारत स्वाभिमान दल की ग्यारह सूत्री कार्य योजना:-

1. वर्तमान में चल रही समस्त गलत नीतियों व भ्रष्ट व्यवस्थाओं का राष्ट्र हित में पूर्ण परिवर्तन कराना। भ्रष्टाचार, बलात्कार, दहेज हत्या, गौहत्या, आतंकवाद व मिलावट करने वालों के विरूद्ध मृत्युदण्ड का कानून बनवाकर सम्पूर्ण भारतीयों को सुरक्षा प्रदान करवाना। शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून, अर्थ व कृषि व्यवस्था का पूर्ण भारतीयकरण व स्वदेशीकरण करना।

2. साम्प्रदायिक आधार पर भेदभाव करने वाले कानूनों को निरस्त कर समान नागरिक संहिता लागू करना।

वर्तमान भारतीय संविधान जाति व धर्म के आधार पर भारतीय नागरिकों में भेदभाव करता हैं, यह संविधान धर्म के आधार पर किसी नागरिक को सामान्य, तो किसी नागरिक को विशेषाधिकार देता हैं। इस संविधानिक साम्प्रदायिक भेदभाव के चलते देश में जातीय व साम्प्रदायिक तनाव बढ़ रहा हैं, जो राष्ट्रीय एकता व अखण्डता के लिए घातक हैं, और कालांतर में गृहयुद्ध का कारण भी बन सकता हैं।

राष्ट्र हित में साम्प्रदायिक आधार पर भारतीय नागरिकों में भेदभाव करने वाले कानूनों को निरस्त कर समान नागरिक संहिता लागू की जाए। देश में समानता का अधिकार लागू किया जाना चाहिए।

3. जातिवाद को असंवैधानिक घोषित करना, सरकारी महत्व के अभिलेख विद्यार्थी पंजीकरण, मूल निवास, जॉब पंजीकरण आदि परिपत्रों में जाति लिखने को प्रतिबंधित करना।

4. नौकरी हेतु किसी भी प्रकार के आरक्षण को अवैध घोषित कर उस पर प्रतिबंध लगाना, केवल शिक्षा हेतु आर्थिक आधार पर गरीब विद्यार्थियों को सहायता दी जाए, नौकरी उन्हें उनकी योग्यता के आधार पर मिले।

5. भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना, काले धन को वापस मंगाना, भ्रष्टाचारियों की संपत्ति को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करना व भ्रष्टाचारियों को कठोर दंड का प्रावधान करना।

6. केन्द्रीय गौवंश मंत्रालय बनाकर स्वदेशी गौवंश को प्रोत्साहन की नीति बनाना। केन्द्रीय योजना बनाकर जिला स्तर पर एक एक लाख गौवंश की क्षमता वाली गौशालाएँ बनवाना, उनमें बेसहारा गाय, बैल व सांडों को रखकर गौवंश आधारित उद्योगों की शुरूआत कराना, गैस, बिजली, खाद, औषधि आदि गौवंश से उत्पन्न कर विदेशी मुद्रा बचाना, तथा गाँवों में गौवंश आधारित संयंत्र स्थापित करने के लिए गौवंश पालक किसानों को सबसिडी देने का प्रावधान करना, ग्रामीण भारतीयों को आत्मनिर्भर बनाना।

7. सभी धर्मों के भारतीय नागरिकों के लिए अधिकतम तीन संतान उत्पन्न करने का कठोर जनसंख्या कानून बनाना, इस कानून की अवमानना करने वाले को सभी सरकारी सुविधाओं से वंचित कराना।

8. विद्यालयों में चरित्र निर्माण, व्यवसायिक शिक्षा व सैन्य शिक्षा अनिवार्य करना। तथ्यों के आलोक में भारतीय इतिहास का पुनर्लेखन कराना तथा ताजमहल, लालकिला आदि प्राचीन भवनों के वास्तविक निर्माताओं को श्रेय देकर भारत का सुप्त स्वाभिमान जगाना। काल गणना के लिए युगाब्ध को अपनाकर राष्ट्रीय पंचांग के रूप में लागू करना। केन्द्रिय परीक्षाओं में अंग्रेजी प्रश्नपत्र की अनिवार्यता समाप्त करना तथा संस्कृत, हिन्दी व क्षेत्रिय भाषाओं को वैकल्पिक आधार प्रदान करना।

9. स्वदेशी उत्पादनों को प्रोत्साहित करना। आयुर्वेद को राष्ट्रीय चिकित्सा पद्धति घोषित करना।

10. उन्नत कृषि एवं पशुपालन को प्रोत्साहित करना तथा राष्ट्रीय किसान आयोग का पुनर्गठन करना।

11. बेरोजगारी, गरीबी, भूख, अभाव व अशिक्षा से मुक्त स्वस्थ, समृद्ध, संस्कारवान व शक्तिशाली भारत का पुनर्निर्माण करना और भारत को विश्व की महाशक्ति तथा विश्वगुरू के रूप में पुन: प्रतिष्ठित करना।

राष्ट्र हित व धर्म हित में धरातल पर कार्य करने की इच्छा रखने वाले राष्ट्रभक्तों का भारत स्वाभिमान दल में हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन हैं ।

भारत स्वाभिमान दल से जुड़ने के लिए हमारे सूचना केंद्र पर संपर्क करें 8535004500

वन्दे मातरम्
भारत माता की जय

गुरुवार, 25 जुलाई 2019

धर्मराज्यम् परिचय



धर्म क्या हैं ?
महर्षि कणाद के शब्दों में जिस ज्ञान आदि साधनों को अपनाने से हमारी भौतिक विज्ञान व आध्यात्मिक उन्नति एक समान हो, उसे धर्म कहते  हैं। जो मत विज्ञान की कसौटी पर खरे नहीं उतरते, वे धर्म भी नहीं हैं।

यतो धर्म: ततो जय:
(जहाँ धर्म है वहाँ विजय हैं।)

 "धर्म सर्वोपरि है" यह एक सार्वभौमिक सत्य है। जहाँ धर्म है वहाँ एक राष्ट्र है, जहां धर्म नहीं है वहाँ कोई राष्ट्र नहीं होता। यदि होता है तो सिर्फ धोखा, कलह, अनेकों वाद-परिवाद (जातिवाद, सम्प्रदायवाद, नक्सलवाद आदि) अत्याचार, अपराध, पाखंड, दंगे, फसाद और युद्ध।

राष्ट्र की पहचान हैं- सामाजिक एकता, सामाजिक समरसता, समान शैक्षणिक, समान आर्थिक, समान सामाजिक व समान मानवीय मूल्यों की मजबूत स्थिति। जो बिना धर्म के अनुपालन के किसी भी प्रकार संभव नहीं हैं।

अब बात करते है उस राष्ट्र की जिसके पक्षधर वह लोग है जिनके लिये धर्म का राष्ट्रीय स्तर पर होना अनिवार्य नहीं हैं। इसका सीधा अर्थ है कि वह नहीं चाहते कि समाज में एकता हो, समरसता हो, समान शिक्षा हो, समान सामाजिक अधिकार हों। वह सब प्रकार से उन कारणों को अविष्कृत कर लेगें जो समाज को नष्ट-भ्रष्ट करने में सक्षम हों। इन लोंगों का राष्ट्रवादी प्रेम मात्र एक दिखावे से अधिक कुछ भी नहीं होता। सदैव दुखपूर्ण स्थितियों को बनाये रखना व घड़याली आंसू बहाते रहना,  देशभक्ति की आढ़ में अपने छदम् स्वार्थों की पूर्ति करते रहना ही एक मात्र लक्ष्य होता है।

यदि राष्ट्र आगे है और धर्म पिछे है तो अर्थ सीधा है कि कोई ओर छिपा हुआ सम्प्रदाय चोरी-चोरी पैर पसार रहा है। मुख्य राष्ट्र को चोर राष्ट्र निगल रहा है।

अत: स्पष्ट है कि राष्ट्र की रक्षा धर्म की रक्षा से होती है न कि इंकलाब-जिन्दाबाद के नारों से। यदि राष्ट्र रक्षा करना चाहतें हैं तो धर्म की रक्षा करो। धर्म की रक्षा से तात्पर्य मूलभूत धर्मग्रंथ (पवित्र वेद, उपनिषद, गीता) की रक्षा से अर्थात् पढ़ने पढ़ाने प्रसार प्रचार व सम्प्रदायिक लोगों को सनातन हिन्दू धर्म में दीक्षित करने से ही संभव है।

धर्म ही सर्वोच्च है। बिना धर्म के राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती। बिना धर्म के किसी राष्ट्र का अस्तित्व नहीं होता। कोई भी राष्ट्र बिना धर्म के जीवित नहीं रह सकता। देश तो बनते बिगड़ते रहते है पर राष्ट्र का निर्माण धर्म ही करता है। धर्म राष्ट्र की धुरी है राष्ट्र की आत्मा है, प्राण है। बिना धर्म के राष्ट्र मृत प्राय है।

उदाहरण हमारे सामने है- भारत कभी ईरान तक था, आर्यावर्त भी कभी विस्तृत भूभाग तक था, ईरान से इंडोनेशिया और मॉरिशस से मास्को तक आर्यावर्त था, पर धर्म सिकुड़ता गया राष्ट्र बंटता गया। जहाँ धर्म रहा वो भाग आज भारत का भाग है। जहाँ धर्म लुप्त जैसे कश्मीर व् पूर्वोत्तर भारत, उस भाग के भारत से अलग होने के षड्यंत्र चलते रहते है। अर्थात धर्म व संस्कृति के कारण भारत का अस्तित्व है।

देश सर्वोपरी नहीं है। देश मात्र एक भौगोलिक सीमा हैं, जहां रहने वाले लोग अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए कुछ भी कर सकते हैं। स्वतंत्रता समर के दौरान राष्ट्रभक्त क्रांतिकारियों पर गोली चलाने वाले सैनिक भी देशभक्त थे। आज भी अलगाववादी व देशद्रोही नेताओं की सुरक्षा करने वाले पुलिस के जवान देशभक्त हैं, पर वे राष्ट्रभक्त नहीं हैं, क्योंकि उन्हें सनातन धर्म की शिक्षा प्राप्त नहीं हैं। वह स्थान हमारे लिये हमारा राष्ट्र नहीं है जहां हम अपने धर्म को सुरक्षित व प्रसारित नहीं कर सकते हैं।

यहूदियो का राज्य था इजराइल जहाँ से उन्हें ईसाइयो ने मार कर भगा दिया। रोमनों ने भी उन पर अत्याचार किये। फिर इस्लाम आया और उसने भी यहूदियो पर अत्याचार किये पर उन्होंने सब कुछ खोकर केवल धर्म बचाये रखा। यहूदियों ने धर्म की रक्षा करके स्वयं को बचाये रखा और इजराइल की स्थापना की। उनका धर्म न बचता तो देश भी न बचता। इसलिए धर्म सर्वोपरी है। धर्म ही राष्ट्र का निर्माण करता है न की राष्ट्र धर्म का। सनातन धर्म जब तक है यह भारत वेदिक ज्ञान के प्रकाश में लीन रहने वाला राष्ट्र रहेगा। ये राष्ट्र किसी राजा सम्राट के नाम से नहीं बल्कि ऋषियो मुनियो द्वारा पालित पोषित वैदिक ज्ञान में लीन रहने वाले देश के स्वभाविक नाम पर रखा गया है।

उदयाचल से अस्ताचल तक भारत से अलग किये गए समस्त देशों का धर्म, सम्प्रदाय, सामाजिक,  राजनीतिक और भौगोलिक इतिहास यही कहता है कि

धर्म सर्वोपरि है न की देश।
देशभक्त नहीं धर्मभक्त बने।
जिसका जैसा धर्म उसका वैसा देश॥
कोई भी राष्ट्र तब तक पराजित नही होता जब तक वह अपने धर्म की रक्षा कर पाता हैं।
धर्म बढाओं, राष्ट्र बचाओं...!!
सनातन धर्म की प्रतिष्ठा धर्म और विद्या के केंद्रों के द्वारा ही होगी ।

जब मुसलमान और ईसाई अपने मज़हब के अनुसार आचरण कर भारत में सभी दायित्वों पर कार्यरत रह सकते हैं तो हिंदू बनकर अपना दायित्व निभाने से आपको किसने रोका है। सनातन धर्म को सर्वोपरि महत्व दीजिए। गर्व से कहिए आप सनातन वैदिक हिन्दू हैं। छोड़िए लज्जा, आत्मसात कीजिए अपनी गौरवशाली परंपरा को। धर्म शून्य मत रहिए। धर्म का ज्ञान प्राप्त कीजिए दूसरों को प्रेरित कीजिए।

अपने धर्म को संवैधानिक संरक्षण दिलाने के लिए न्यायसम्मत आवाज उठाइए। यह भारत नहीं इंडिया हैं। यहां तुम्हारे पक्ष में कुछ भी नहीं है हिंदुओं। प्रार्थना से कुछ उपलब्ध नहीं होगा, छीनना पड़ेगा।

वर्तमान में यह भूभाग जिसे जिसे शासन इंडिया कहता हैं, सनातन सिद्धान्तों वाले तन्त्र व्यवस्था से शासित नहीं हो रहा हैं। बल्कि हमारे सनातन धर्म संस्कृति के घोर शत्रु मलेक्षों के तन्त्र से हम सनातनी हिन्दू शासित हो रहे हैं, जो हमारे पराधीन होने का स्पष्ट परिचायक है। यही व्यवस्था धीरे धीरे हम हिन्दुओं के मूल धर्म, संस्कृति,  इत्यादि का दीमक की तरह शमूल नाश कर देगी।

देशभक्त नहीं, राष्ट्रभक्त बनों

देश कहते है किसी शासक के द्वारा शासित होने वाले भूभाग को, जबकि राष्ट्र कहते हैं संस्कृति द्वारा शाषित होने वाले भूभाग को। हम राष्ट्रभक्त लोग देश की भक्ति हम तभी कर सकते हैं जब हमारे देश में सनातन वैदिक मानवता का सिद्धान्त लागू हो न कि म्लेक्षों के सिद्धान्त लागू होने पर देश की भक्ति करेंगे। जैसा कि आज है।

यदि आज हम राष्ट्र भक्ति से अधिक महत्व देश भक्ति को देगे तो इस सनातन धर्म विरोधी इंडियन व्यवस्था की भक्ति करेंगे, हिन्दूद्रोही न्यायाधीशों के भेदभावपूर्ण निर्णयों की भक्ति करेंगे, नौकरशाही की भक्ति करेंगे, सनातनी हिन्दुओं के राष्ट्र को खोखला कर सनातन धर्म को समाप्त करने का प्रयास करने वाले नेताओं की भक्ति करेंगे, जैसा कि आज हो भी रहा हैं किसी को सिद्धान्तो से मतलब नहीं, बस नेताओं की चाटुकारिता को ही परम कर्तव्य मान लिए हैं।

जबकि राष्ट्र की भक्ति करने से तात्पर्य है कि धर्म सत्ता की भक्ति करना अर्थात अपने सनातन धर्म, सनातन संस्कृति और परम्पराओं के प्रति निष्ठावान होकर पूर्ण समर्पित रहना। हम मनुष्य हैं अतः हमारा परम कर्तव्य है कि हम उसी के सिद्धान्तों को माने जिसने हमें उत्पन्न किया है, न कि किसी मनुष्य के कल्पना से उपजे हुए नियम या सिद्धान्तो को माने।

किन्ही इंडियन न्यायाधीश ने यह कह दिया कि हिंदू कोई धर्म  नहीं, जीवन शैली है और कई नेता लोग तथा अन्य संगठन भी इसी में लटक गए। वह कोई न्यायिक निर्णय नहीँ था क्योंकि हिन्दू धर्म है या नहीं, यह विषय न्यायालय के समक्ष कभी गया ही नहीं था और वस्तुतः सर्वोच्च न्यायालय को इस विषय में निर्णय का कोई अधिकार संविधान के अंतर्गत प्राप्त ही नहीं है। यह सुप्रीम कोर्ट का विषय है ही नहीं।

वस्तुतः यह कहना कि हिंदू धर्म कोई धर्म नहीं है केवल जीवन शैली है, यह महापाप है। क्योंकि विश्व में सर्वत्र धर्म ही मानव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है और अभी के जो नेशन स्टेट हैं, उन सबका सर्वोपरि लक्ष्य अपने नेशन स्टेट के बहुसंख्यकों के रिलिजन को राज्य की सुरक्षा देना और विधि तथा न्याय एवं शिक्षा का निर्धारण उसी रिलिजन के आधार पर करना है ।।यह नेशन स्टेट का विश्व भर में सर्वोपरि कार्य है सिवाय कम्युनिस्ट राज्योंके।

अतः जैसे ही कोई यह कहता है कि हिंदू धर्म नहीं है ,जीवन शैली है ,वैसे ही वह समस्त हिंदू धर्म और हिंदू समाज को, हिंदू राष्ट्र को उस स्वाभाविक अधिकार से वंचित कर देता है। जो विश्व में प्रत्येक समाज और प्रत्येक धर्म को प्राप्त है। हम इस स्वाभाविक अधिकार से वंचित हो जाते हैं जोकि विश्वभर में प्रत्येक समाज के नेशन स्टेट के मुख्य समाज को प्राप्त है। जबकि उसी समय इस्लाम ईसाइयत आदि सबको रिलीजन के वे सभी अधिकार भारत में भी प्राप्त है। उन्हें अल्पसंख्यक होने के नाते उनके रिलिजन को विशेष संरक्षण प्राप्त है। इस प्रकार हिंदू धर्म को धर्म नहीं मानना, केवल जीवन शैली कह देना महापाप है और हिंदुओं के साथ बहुत बड़ी धोखाधड़ी तथा जालसाजी है और हिंदू धर्म को नष्ट कर डालने का भयंकर कुचक्र है।

ईसाईं, बौद्ध व मुस्लिम मिशनरी के हाथों बिके हुये कुछ छद्म हिन्दुत्ववादी संगठन सनातन हिन्दू धर्म के मूल स्वरूप व महापुरुषों को नष्ट करके उसके जगह पर एक कृतिम सिद्धान्तों व राक्षसी लोगों को सनातन हिन्दू समाज में स्थापित कर रहे है और वो इसमे काफी हद तक सफल भी हो गए हैं। उनके द्वारा इस राष्ट्र के मूल धर्म, संस्कृति को नष्ट करने का कोई प्रयास नहीं छोड़ा गया और आज भी जारी है। पर अब ऐसा नहीं होगा। अब सच्चे सनातनियों को निराश होने की आवश्यकता नहीं हैं।

राष्ट्रभक्त हिन्दुओं का संगठन धर्मराज्यम् अब समाज में जाकर लोगों को असली धर्म बताएगा। अब इस राष्ट्र के प्रत्येक क्षेत्र में शुद्ध सनातन धर्म को केंद्र में रख कर कार्य किये जाएंगे। चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो चाहे, राजनीति का क्षेत्र हो, चाहे सूचनातंत्र का क्षेत्र हो या अन्य चाहे कोई भी क्षेत्र हो सभी क्षेत्रों में अब शुद्ध रूप से सनातन वैदिक हिन्दू धर्म को जानने व मानने वाले लोग ही आगे आएंगे और इन कालनेमियों का सम्पूर्ण विनाश कर देंगे। जो लोग धर्म को जानते हैं और जिनकी दृष्टि इस भौतिक संसार और हाड़ मास के नष्ट हो जाने वाले निज देह पर नही है बल्कि ईश्वर पर है वो अवश्य एकजुट हो कर इस भटके हुए मानव जाति को राह दिखाएंगे।

धर्मराज्यम् से जुड़ने के लिए हमारे सूचना केंद्र पर संपर्क करें 8535004500
||जो बोले सो अभय, सनातन धर्म की जय ||