1 जनवरी क्रान्ति संकल्प दिवस
ईसाई मिशनरीयों के हाथों अपना स्वाभिमान गवाँ चुका हिन्दू समाज अपना इतिहास जाने, और 1 जनवरी को 1669 के स्वतंत्रता समर के जननायक गोकुल सिंह जी व उनके 20 हजार यौद्धाओं की स्मृति में "क्रान्ति संकल्प दिवस" मनाकर अपने पूर्वजों पर गर्व करें।
निवेदक:
विश्वजीत सिंह अनंत
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल
विश्वजीत सिंह अनंत
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल
हमारा नवबर्ष #चैत्रशुक्लपक्षप्रतिपदा
से प्रारम्भ होता हैं, 1 जनवरी को हम धर्मरक्षक वीर गोकुल सिंह जी व उनके साथियों
के बलिदान को क्रान्ति संकल्प दिवस के रूप में स्मरण करते हैं ~~~~~~~~~~
सन् 1666 के समय में इस्लामिक राक्षस औरंगजेब के अत्याचारों
से हिन्दू जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। मंदिरों को तोड़ा जा रहा था,
हिन्दूस्त्रियों की इज्जत
लूटकर उन्हें मुस्लिम बनाया जा रहा था। औरंगजेब और उसके सैनिक पागल हाथी की तरह
हिन्दू जनता को मथते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे। हिंदुओं को दबाने के लिए इस्लामिक
पिशाच औरंगजेब ने अब्दुन्नवी नामक एक कट्टर मुसलमान को मथुरा का फौजदार नियुक्त
किया।
अब्दुन्नवी के सैनिकों का एक दस्ता मथुरा जनपद में चारों ओर
लगान वसूली करने निकला। सिनसिनी गाँव के सरदार गोकुल सिंह के आह्वान पर किसानों ने
लगान देने से इंकार कर दिया, परतन्त्र भारत के इतिहास
में वह “पहला असहयोग आन्दोलन” था । दिल्ली के सिंहासन
के नाक तले समरवीर धर्मपरायण हिन्दू वीर योद्धा गोकुल सिंह और उनकी किसान सेना ने
आतताई औरंगजेब को हिंदुत्व की ताकत का एहसास दिलाया।
मई 1669 में अब्दुन्नवी ने सिहोरा गाँव पर हमला किया। उस
समय वीर गोकुल सिंह गाँव में ही थे। भयंकर युद्ध हुआ लेकिन इस्लामी शैतान
अब्दुन्नवी और उसकी सेना सिहोरा के वीर हिन्दुओं के सामने टिक ना पाई और सारे
इस्लामिक पिशाच गाजर-मूली की तरह काट दिए गए। गोकुल सिंह की सेना में जाट,
राजपूत,
गुर्जर,
यादव,
मीणा इत्यादि सभी जातियों
के हिन्दू थे। इस विजय ने मृतप्राय हिन्दू समाज में नए प्राण फूँक दिए थे।
इसके बाद पाँच माह तक भयंकर युद्ध होते रहे । मुगलों की सभी तैयारियां और चुने हुए सेनापति प्रभावहीन और असफल सिद्ध हुए । क्या सैनिक और क्या सेनापति सभी के ऊपर गोकुलसिंह का वीरता और युद्ध संचालन का आतंक बैठ गया। अंत में सितंबर मास में, बिल्कुल निराश होकर, शिकनखाँ ने गोकुलसिंह के पास संधिप्रस्ताव भेजा । गोकुल सिंह ने औरंगेजब का प्रस्ताव अस्वीकार करते हुए कहा कि “औरंगजेब कौन होता है हमें माफ करने वाला, माफी तो उसे हम हिन्दुओं से मांगनी चाहिए उसने अकारण ही हिन्दू धर्म का बहुत अपमान किया है।
अब औरंगजेब 28 नवम्बर 1669 को दिल्ली से चलकर खुद मथुरा आया गोकुल सिंह से लड़ने के लिए। औरंगजेब ने मथुरा में अपनी छावनी बनाई और अपने सेनापति होशयार खाँ को एक मजबूत एवं विशाल सेना के साथ युद्ध के लिए भेजा। आगरा शहर का फौजदार होशयार खाँ 1669 सितंबर के अंतिम सप्ताह में अपनी-अपनी सेनाओं के साथ आ पहुंचे । यह विशाल सेना चारों ओर से गोकुलसिंह को घेरा लगाते हुए आगे बढ़ने लगी ।
गोकुलसिंह के विरुद्ध किया गया यह अभियान, उन आक्रमणों से विशाल स्तर का था, जो बड़े-बड़े राज्यों और वहां के राजाओं के विरुद्ध होते आए थे। इस वीर के पास न तो बड़े-बड़े दुर्ग थे, न अरावली की पहाड़ियाँ और न ही महाराष्ट्र जैसा विविधतापूर्ण भौगोलिक प्रदेश । इन अलाभकारी स्थितियों के बावजूद, उन्होंने जिस धैर्य और रण-चातुर्य के साथ, एक शक्तिशाली साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति का सामना करके, बराबरी के परिणाम प्राप्त किए, वह सब अभूतपूर्व है।
औरंगजेब की तोपो,धर्नुधरों, हाथियों से सुसज्जित तीन लाख की विशाल सेना और गोकुल सिंह की किसानों की 20000 हजार की सेना में भयंकर युद्ध छिड़ गया। चार दिन तक भयंकर युद्ध चलता रहा और गोकुल सिंह की छोटी सी अवैतनिक सेना अपने बेढंगे व घरेलू हथियारों के बल पर ही अत्याधुनिक हथियारों से सुसज्जित और प्रशिक्षित मुगल सेना पर भारी पड़ रही थी। भारत के इतिहास में ऐसे युद्ध कम हुए हैं जहाँ कई प्रकार से बाधित और कमजोर पक्ष, इतने शांत निश्चय और अडिग धैर्य के साथ लड़ा हो । हल्दी घाटी के युद्ध का निर्णय कुछ ही घंटों में हो गया था। पानीपत के तीनों युद्ध एक-एक दिन में ही समाप्त हो गए थे, परन्तु वीरवर गोकुलसिंह का युद्ध तीसरे दिन भी चला ।
इस लड़ाई में सिर्फ पुरुषों ने ही नही बल्कि उनकी स्त्रियों ने भी पराक्रम दिखाया। चार दिन के युद्ध के बाद जब गोकुल की सेना युद्ध जीतती हुई प्रतीत हो रही थी तभी हसन अली खान के नेतृत्व में एक नई विशाल मुगलिया टुकड़ी आ गई और इस टुकड़ी के आते ही गोकुल की सेना हारने लगी। युद्ध में अपनी सेना को हारता देख हजारों नारियाँ जौहर की पवित्र अग्नि में खाक हो गई। गोकुल सिंह और उनके ताऊ उदय सिंह को सात हजार साथियों सहित बंदी बनाकर आगरा में औरंगजेब के सामने पेश किया गया।
औरंगजेब ने कहा “जान की खैर चाहते हो तो
इस्लाम कबूल कर लो और रसूल के बताए रास्ते पर चलो। बोलो क्या इरादा है इस्लाम या
मौत? अधिसंख्य धर्म-परायण हिन्दुओं ने एक सुर में कहा –
“औरंगजेब, अगर तेरे खुदा और रसूल मोहम्मद का रास्ता वही है जिस पर तू
चल रहा है तो धिक्कार है तुझे और तेरे रसूल को, हमें तेरे रास्ते पर नहीं
चलना l” इतना सुनते ही औरंगजेब के संकेत से गोकुल सिंह की बलशाली
भुजा पर जल्लाद का बरछा चला। गोकुल सिंह ने एक नजर अपने भुजाविहीन रक्तरंजित कंधे
पर डाली और फिर बड़े ही घमण्ड के साथ जल्लाद की ओर देखा और कहा दूसरा वार करो।
दूसरा बरछा चलते ही वहाँ खड़ी जनता आंर्तनाद कर उठी और फिर गोकुल सिंह के शरीर के
एक-एक जोड़ काटे गए। गोकुल सिंह का सिर जब कटकर धरती माता की गोद में गिरा तो मथुरा
में केशवराय जी का मंदिर भी भरभराकर गिर गया। यही हाल उदयसिंह और बाकि साथियों का
भी किया गया। उनके एक साथी माडुसिंह जाट की जीवित ही चमड़ी उधेड़ दी,
उनके छोटे- छोटे बच्चों
को जबरन मुसलमान बना दिया गया।
ये एक जनवरी 1670 का दिन था। ऐसे अप्रतिम वीर का कोई भी इतिहास
नही पढ़ाया गया और न ही कहीं कोई सम्मान दिया गया। न ही उनके नाम पर न कोई
विश्वविद्यालय है और न कोई केन्द्रीय या राजकीय परियोजना। कितना एहसान फरामोश,
कृतघ्न है हिंदू समाज!!
कैसे वीर हुए इस धरा पर,जिन्होंने धर्म के लिए
प्राण न्यौछावर कर दिये पर इस्लाम नही अपनाया। गोकुलसिंह सिर्फ #जाटों के लिए शहीद नहीं
हुए थे न उनका राज्य ही किसी ने छीन लिया था, न कोई पेंशन बंद कर दी थी,
बल्कि उनके सामने तो
अपूर्व शक्तिशाली मुगल-सत्ता, दीनतापूर्वक,
सन्धि करने की तमन्ना
लेकर गिड़-गिड़ाई थी। शर्म आती है हमें कि हम ऐसे अप्रतिम वीर को कागज के ऊपर भी
सम्मान नहीं दे सके। शाही इतिहासकारों ने उनका उल्लेख तक नही किया। केवल जाट पुरूष
ही नही बल्कि उनकी वीरांगनायें भी अपनी ऐतिहासिक दृढ़ता और पारंपरिक शौर्य के साथ
उन सेनाओं का सामना करती रही। दुर्भाग्य की बात है कि भारत की इन वीरांगनाओं और
सच्चे सपूतों का कोई उल्लेख शाही टुकड़ों पर पलने वाले तथाकथित इतिहासकारों ने नहीं
किया। जागो भारतवासियों!!! भारत स्वाभिमान दल वीर गोकुल सिंह व उनके अमर बलिदानी साथियों को कोटि-कोटि नमन
करता हैं।





कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
मित्रों आप यहाँ पर आये है तो कुछ न कुछ कह कर जाए । आवश्यक नहीं कि आप हमारा समर्थन ही करे , हमारी कमियों को बताये , अपनी शिकायत दर्ज कराएँ । टिप्पणी में कुछ भी हो सकता हैं, बस गाली को छोडकर । आप अपने स्वतंत्र निश्पक्ष विचार टिप्पणी में देने के लिए सादर आमन्त्रित है ।