आर्यो का आर्यत्व
विचित्र लीला है परमात्मा की!
सनातन हिन्दू समाज के बहुसंख्यक कुपमण्डूको को धर्म शिक्षा देकर उनकी पॉपलीला को दूर करके सनातन वैदिक हिन्दू समाज को एक करना चाहते है, तो वे लोग हमें आर्य समाजी कहने लगते हैं, क्योंकि हम जात- पात के अधर्म को स्वीकार नहीं करते और न ही जन्म के आधार पर किसी को श्रेष्ठ अथवा निम्न समझते है। दूसरी ओर आर्य समाजी लोग हमें जबरन आर्य समाजी बनाने पर तुले रहते हैं, जब कि हम किसी समाज के एकांकी बंधन को स्वीकार नहीं करते। विवशतावश हमें उनसे कहना पडता है कि श्रीमान जी हम आर्य तो है, आर्य समाजी नहीं ।
बस इतना कहते ही विवाद खडा हो जाता है, लोग कहने लगते है कि आप आर्य समाजी नहीं तो आर्य कैसे हुए, फलाना,, ढिमका,,.....!!
अरे मेरे विद्वान भाईयों ! जितना रस ओ३म् के जप ध्यान में आता हैं, उतना ही रस हमें राम नाम में भी आता हैं।
जितनी एकाग्रता तन्म्य होकर यज्ञ करने में होती हैं, उतनी ही तन्म्यता हमें पाषाण प्रस्तर की प्रतिमा में ईश्वर को निहारते होती हैं।
जितने समर्पण से अग्नि अपने अन्दर आहुत सामग्री को भस्म कर डालती हैं, उतने ही समर्पण से हम उस पाषाण प्रतिमा को उखाडकर उससे धर्म रक्षा हेतु शस्त्र का काम भी लेना जानते हैं।
जितना आनन्द संध्या करते हुए मिलता हैं, उतना ही आनन्द हमें हरि नाम के संकिर्तन में भी मिलता हैं।
हम आर्य है तो स्वतन्त्र हैं, आर्य समाजी बन गये तो हिन्दू के नाम से भी चिढना पडेगा, जैसा हमारे बहुसंख्यक आर्य समाजी भाई करते हैं, बात बेबात हिन्दू- आर्य का विवाद खडा कर देते हैं।
आर्य समाजी होगे तो ईश्वर को निराकार मानना ही पडेगा, भले ही ईश्वर की अनूभुति न हुई हो, जबकि आर्य होने में ऐसा कुछ भी नहीं हैं, क्योंकि आर्य उस विराट सत्ता को साकार- निराकार की एक परिधि विशेष में नहीं बांध सकता। पता नहीं उस विराट परमपिता का, अस्तित्व का, किसे कब और कहा किस रूप में अनुभव घट जाये।
हम आर्य हैं, हमें आर्य ही रहने दो, पौराणिक तथा आर्य समाज के चक्कर से हमें मुक्त ही रहने दों।
ओ३म् नमस्ते
जय श्री राम
जो बोले सो अभय सनातन धर्म की जय
-विश्वजीत सिंह अनंत
सनातन संस्कृति संघ/भारत स्वाभिमान दल
Bahut acha post
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