ब्राह्मण का पुत्र विद्या प्राप्ति में असफल रह जाए तो शूद्र बन जाता हैऔर अधर्म/पाप कर्म धारण कर राक्षस बन जाता है | इसी तरह शूद्र या दस्यु का पुत्र भी विद्या प्राप्ति के उपरांत ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य वर्ण को प्राप्त कर सकता है | यह सम्पूर्ण व्यवस्था विशुद्ध रूप से गुणवत्ता पर आधारित है | जिस प्रकार शिक्षा पूरी करने के बाद आज उपाधियाँ दी जाती हैं उसी प्रकार वैदिक व्यवस्था में यज्ञोपवित्र दिया जाता था | प्रत्येक वर्ण के लिए निर्धारित कर्तव्यकर्म का पालन व निर्वहन न करने पर यज्ञोपवित्र वापस लेने का भी प्रावधान था | कर्मो अनुसार चारो वर्णों के अलग अलग यज्ञोपवित्र थे ।
@ वैदिक इतिहास में वर्ण परिवर्तन के अनेक प्रमाण उपस्थित हैं, जैसे –
(*) ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे | परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की | ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है |
(*) ऐलूष ऋषि दासी पुत्र थे | जुआरी और हीन चरित्र भी थे | परन्तु बाद में उन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके गुणों को धारण करअनेक अविष्कार किये |ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन किया | (ऐतरेय ब्राह्मण २.१९)
(*) सत्यकाम जाबाल गणिका (वेश्या) के पुत्र थे परन्तु वे कर्मो से ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए |
(*) राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र हो गए थे, प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.१.१४)
अगर उत्तर रामायण की मिथ्या कथा के अनुसार शूद्रों के लिए तपस्या करना मना होता तो पृषध ये कैसे कर पाए?
(*) राजा नेदिष्ट के पुत्र नाभाग वैश्य हुए | पुनः इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.१.१३)
(*) धृष्ट नाभाग के पुत्र थे परन्तु ब्राह्मण हुए और उनके पुत्र ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.२.२)
(*) आगे उन्हींके वंश में पुनः कुछ ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण ४.२.२)
(*) भागवत के अनुसार राजपुत्र अग्निवेश्य ब्राह्मण हुए |
(*) विष्णुपुराण और भागवत के अनुसार रथोतर क्षत्रिय से ब्राह्मण बने |
(*) हारित क्षत्रियपुत्र से ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण ४.३.५)
(*) क्षत्रियकुल में जन्में शौनक ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.८.१) वायु, विष्णु और हरिवंश पुराण कहते हैं कि शौनक ऋषि के पुत्र कर्म भेद से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण के हुए| इसी प्रकार गृत्समद, गृत्समति और वीतहव्य के उदाहरण हैं |
(*) मातंग ऋषि चांडालपुत्र से ब्राह्मण बने |
(*) ब्राह्मण ऋषि पुलस्त्य का पौत्र रावण अपने कर्मों से राक्षस बना |
(*) राजा रघु का पुत्र प्रवृद्ध राक्षस हुआ |
(*)राक्षस में से वाल्मीकि जी राम नाम भक्ति से वेदांत को पार कर ब्राह्मण हुए तुलसी दास जी इन्ही का पुनर्जन्म माने जाते है
(*) त्रिशंकु राजा होते हुए भी कर्मों से चांडाल बन गए थे |
(*) विश्वामित्र के पुत्रों ने शूद्र वर्ण अपनाया | विश्वामित्र स्वयं क्षत्रिय थे परन्तु बाद उन्होंने ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया |
(*) विदुर दासी पुत्र थे | तथापि वे ब्राह्मण हुए और उन्होंने हस्तिनापुर साम्राज्य का मंत्री पद सुशोभित किया | धार्मिकों में विदुर नीति प्रचलित है कृष्ण ने स्वयं प्रमाणित किया ।
(*). वेदों में ‘शूद्र’ शब्द लगभग बीस बार आया है | कहीं भी उसका अपमानजनक अर्थों में प्रयोग नहीं हुआ है | और वेदों में किसी भी स्थान पर शूद्र के जन्म से अछूत होने ,उन्हें वेदाध्ययन से वंचित रखने, अन्य वर्णों से उनका महत्व कम होने या उन्हें यज्ञादि से अलग रखने का उल्लेख नहीं है |
(*) कस्यप ऋषि को ब्राह्मण माना जाता है किन्तु उनके एक स्त्री अदिति से गुणों वाले देवता कहलाए और दूसरी स्त्री दिति से अवगुणों वाले पुत्र असुर कहलाए। कश्यप के पुत्र देवता में सूर्य उषा की संतान का वंश श्री राम वाला सूर्य वंश कहलाया जो की राज काज कार्य करने से क्षत्रिय कहलाए । अन्य स्त्रियों से पुत्र अलग अलग गुण कारण अलग अलग वर्ण के कहलाए । जबकि पिता ब्रह्म कर्म वाला ब्राह्मण है जिनसे पैदा तो मनुष्य हुए किन्तु गुणों के कारण वर्ण व अगली गति प्राप्त हुई ।
(*)वेदों में अति परिश्रमी कठिन कार्य करने वाले को शूद्र कहा है (“तपसे शूद्रम”-यजु .३०.५), और इसीलिए पुरुष सूक्त शूद्र को सम्पूर्ण मानव समाज का आधार स्तंभ कहता है |
(*) सुन्दर कांड में हनुमान जी स्वयं को सबसे हिन् एक जानवर बन्दर बताते है और कहते है की जिस वानर का सुबह मुह देखना भी लोग पसंद नहीं करते थे वो आज राम भक्ति कारण पूज्य हुए है आज हनुमान प्रभु राम की भक्ति कारण लगभग हर ब्राह्मण के पूजा घर में है ।
सुनहु विभीषण प्रभु कई रीती । करहि सदा सेवक पर प्रीती ।।
कहहु कवन मैं परम कुलीन । कपि चंचल सबहि बिधि हिना ।।
प्रात लेइ जो नाम हमारा । तेहि दिन ताहि न मिले आहारा ।।
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर ।
किन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर ।।7।।
(*) पहली बार जब राम से क्ष्त्रिय सूर्यवंश के किन्तु नीच समझे जाने वाले वानर के घर जन्मे हनुमान जी मिले तो वे हनुमान जी उस वक्त विप्र रूप को धारण किये थे ब्राह्मण का भेष बदल कर रहते थे । तब किसी ब्राह्मण को आपत्ति नही हुई कारण हनुमान जी ने योग्यता ज्ञान प्राप्त कर लीया।
(*) जनेऊ संस्कार पर यज्ञ , माता पिता, देवी देवताओ, अग्नि, परमात्मा को वचन होते है उन्हें सत्य सिद्ध करके दिखाना पड़ता है तब ब्रह्मऋषि तत्व प्राप्त होता है । मज़बूरी संकट में क्षमा है किन्तु मन में इच्छा कर संध्या हीन हो या मॉस, मदिरा या पर स्त्री गमन कर स्त्रियों के धर्म और उनके यज्ञ को दिए वचनो को भंग करे वो ब्राह्मण नहीं रहता ।
ब्राह्मण पर धर्म की रक्षा का मुख्य दायित्व है धर्म व यज्ञो के वचनो को निर्वाह करवाना है और खुद ही धर्म को , विवाह आदि दुसरो के यज्ञो के वचनो , यज्ञोंके प्रण को भंग करे कराए तो क्या वह ब्राह्मण रहा ? नहीं , वह असुर प्रवति हो गई ।
पर स्त्री गमन वाला, मदिरा पान, सदा शास्त्र ब्रह्म चिंतन विहीन कभी ब्राह्मण नहीं है, जब तक पश्चाताप में न तपे ।
(*) ऐसे कई उदाहरण है जिनमे जन्मना ब्राह्मण के घर में उसके दादा जो एक श्रेष्ठ पंडित कहलाते थे । कई लोगो के पूजा पाठ करवाए मुक्ति के मन्त्र जपते मुक्ति की पूजा करवाते, गंगा में बहाए गए फिर भी वे खुद मुक्ति को न जा सके और पितरो में आज भी बोला करते है , क्यों ? कई भूतो प्रेतों व् जन्मों को गए , क्यों? क्या उनके जजमानों की मुक्ति करा पाएंगे ? कारन पुत्रो में मोह कारण सत्य स्वीकार नहीं करना था । सभी वर्ण सत्य स्वीकारे और पश्चाताप में अन्य की गलती सुधारे तभी भला है । खुद को भगवान को धोखे देते देते म्रत्यु बाद धोखा खा गए कर्मो की गति बड़ी है ।
इतना बड़ा पंडित कहलाने पर भी मुक्ति नहीं हुई क्यों ? मुक्ति के बजाय अगले जन्म से पहले पितरो में क्यों चले गए ? सोचा और सुधारना चाहा कभी ?
(*) अलग अलग जातियो में आपस में विवाह होते थे कई उदाहरण शाश्त्रो में भरे पड़े है । सबसे बड़ा उदाहरण क्षत्रिय श्री कृष्ण ने जनजातीय स्त्री से विवाह किया है । वो ही भेद नहीं कर रहे तो तुम क्यों ?
मुसलमानो के आक्रमण के वक्त धर्म की रक्षा और सुलभ पहचान के लिये शंकराचार्य ने जन्म आधार पर वर्ण और अंत:जातीय विवाह के लिए सभी हिन्दुओ को आग्रह किया था । तब जन्म आधार पर जातियो में मानने लगे ताकि मुस्लिमो के आक्रमण पर एक दूजे को पहचान में दिक्कत न हो । जनेऊ, और शिखा सभी हिन्दू रखते थे किन्तु इन्हें बचाव कारण न रखने पर सुगम पहचान लिए जाती में बाटे थे ।
आदि की स्त्रोत व शास्त्र लिखने बाद उनमे उनकी गलती कमी सुधारने गुरु शंकरा चार्य को मार्ग में एक चंडालनि अपने पति का शव गोद में लिए विलाप करती दिखी और शंकरा चार्य तरफ चीख रही थी। कुछ अजीब लगा तो सत्य जानने वे मार्ग में ध्यान समाधी लगा के बैठ गए पाया की वो चांडालनी पार्वती शक्ति थी हाथो में शिव शव बने पड़े थे । समझ गए शक्ति बिना शिव नहीं ये शक्ति दुर्गा शुद्र रूप में भी कही आ शक्ति है ।
जो यदि सारे हिन्दू एक होते तो मूसलमान घुस नहीं पाते ।
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(*)भुत काल में कॉन्डम न होने कारण किसी वैश्या के किसी जन्मना ब्राह्मण की संतान पैदा हुई तो क्या बाप का ज्ञात न होने कारण व ब्राह्मण की संतान जन्म आधार पर ब्राह्मण नहीं रही ? जन्म के आधार पर ऐसे कई अज्ञात ब्राह्मण है जो जन्म से ब्राह्मण होने पर भी ब्राह्मण नहीं कहलाते क्यों ?
जो ब्राह्मण लालच, मोह, डर आदी अधर्मी तत्वों कारण मुस्लिम हो गए और उनके संतान होने लगी वो जन्म आधार पर ब्राह्मण है या नहीं ? अब वो जन्मना ब्राह्मण धारण कर्म गुण नियमो कारण ब्राह्मण नहीं, राक्षस है मुस्लमान है ।
लंका में मेघ्नाद अक्षयकुमार आदि की संतान ब्राह्मण हुई या राक्षस और लंका में घूमती रावण , मेग्नाद की नाजायज संताने क्या हुई ? ब्राह्मण नहीं, राक्षस हुई । रावण ने अपने कृत्यो से पिता की तरह ब्रह्म ऋषि होने(क्रोध जिसका ख़त्म हो गया सब जिव में ब्रह्म देखे वह ब्रह्म ऋषि) अब अवगुणों कारण अधिकार खो दिया था । ब्राह्मण से ननिहाल वालो के गुणों कारण राक्षस जात का कहलाने लगा । उसकी सन्ताने ब्राह्मण न हो राक्षस हुई ।
किसी ब्राह्मण स्त्री ने मज़बूरी में या रंगरवली में पर पुरुष पर वर्ण से समागम किया और उसके पुत्र हुआ अब उसका वंश जन्मना ब्राह्मण के घर चल रहा है अब वो पैदा होने वाले ब्राह्मण हुए या नहीं ? कड़वा सत्य की ऐसे कुछ जन्मना ब्राह्मण ऐसे भी ब्राह्मण है ।
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(*) जन्मना ब्राह्मण कहते है की हमारी उत्त्पति ब्रह्मा से हुई है इस लिए ब्राह्मण है । वास्तविकता यह है की हर जीव की उत्त्पत्ति सृष्टी की उत्त्पति ब्रह्मा से ही हुई है । तब तो सब ही ब्राह्मण हुए । सब ही ब्रह्म के अंश है ।
(*)कुछ घमंडी मोहि लालची जन्मना ब्राह्मणों द्वारा असली मनु स्मृति से छेद छाड़ की गई है । ताकि उनकी वंश की दुकान चलती रहे चाहे धर्म के भट्टे बोल जाए । चीन के पुरातन यात्री अनुसार वास्तविक मनु स्मृति में 600 श्लोक थे और आज की मनु स्मृति में 2400 श्लोक कैसे हो गए किसने खुरापात की ।
(*)जन्मना ब्राह्मण कहते है की गायत्री की उपासना अन्य नहीं कर सकता गायत्री हमारी माता है उनके लिए गायत्री मन्त्र के प्रथम द्रष्टा विश्वामित्र हुए जो की पीढ़ी दर पीढ़ी राज काज करने वाले क्षत्रिय थे । गायत्री के प्रथम उपासक जग जननी माँ के पुत्र तो वो भी ब्राह्मण हुए ।
उनके ब्रह्मऋषि होने की कमी ब्रह्मऋषि बशिष्ठ जी ने पूरी की । क्षत्रिय विश्वा मित्र को ब्रह्म ऋषि होने में मदद कर ब्रह्म ऋषि वशिष्ठ ने सच्चा ब्रह्मऋषि होने का परिचय दिया ।
जिसने अंदर से गायत्री को अपनी माँ अनुभव कर लिया मन कर्म वचन से उसके ज्ञान कर्म को समर्पित हो गया वो ब्राह्मण ही है । जिसने पाप कर्मो से गायत्री का अपमान किया इसके सिद्धान्तों को जीवन में नहीं अपनाया वो ब्राह्मण नहीं रहा ।
(*)योग वशिष्ठ अनुसार वशिष्ठ जी राम को बताते हैं की स्वयं अप्सरा मेनका के पुत्र थे जो माँ के अवगुणों को त्याग कर अब ब्रह्म कर्म व ब्रह्मज्ञान कारण ब्राह्मण और उससे भी उच्च ब्रहम् ऋषि कहलाये । वशिष्ठ व विश्वामित्र जी दोनों रघुवंश के श्री राम के गुरु कहलाए ।
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(*) जिस समय मारवाड़ मेवाड़ के ब्राह्मण खाने के मोह में फसे थे ठगी में लगे थे । उस समय चमार जाती के गुरु रविदास ने ब्रह्म ज्ञान व भक्ति कर के मीरा के गुरु हुए मीरा बाई में धर्म भक्ति प्रेम जगा कर मीराबाई को भगवान तक मिलवा दिए । ऐसे मीरा के गुरु को सनातन परम पद परमात्मा न मिले हो ही नहीं सकता ।
जाती समाज में सिमित रहने बजाय कर्म गुणों ज्ञान से श्रेष्ठता व वर्ण जाने ।
(*)भगवद् गीता में कृष्ण कहते है उसी ब्राह्मण को दान दे जो ब्रह्म कर्म , जनेऊ अनुरूप वचन पालन संध्या, वेद् धर्म शाश्त्र अध्ययन में हो । यज्ञो को दिए वचन धर्म को भंग न करे धर्म कि रक्षा करे। गीता अध्याय 18 में दान बारे में है जैसे फिर देखो हिन्दू धर्म कैसे सुदृढ़ होता है ।
सिद्ध गौरख नाथ जी के योग मार्ग ( जिसमे किसी भी वर्ण से सत्य भाव से सिद्ध नाथ योगी हो सके ) ने जिन कबीर दास जी को आत्म समर्पण किया वे कबीर दास जी कहते है की "जात न पूछो साधु की..पूछ लीजिये ज्ञान..."
स्वरूपानन्द और धर्म गुरुओं को संदेश
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गीत में भगवान् श्री कृष्ण प्रतिज्ञा अनुसार और राम के जन्म उद्देश्य अनुसार नारायण कहते है की ब्राह्मण व धर्म की रक्षा मैं करता हु किन्तु सत्य में ब्राह्मण कौन कहलाता है ? और सत्य धर्म क्या है ? ये तो पता करो ।
स्वयं में गुरु कृपा से चारो वर्णों को देखता हु । आत्म तत्व से सनातनी हूँ । नियम कर्म से हिन्दू हूँ ।
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-विश्वजीत सिंह अनन्त@ वैदिक इतिहास में वर्ण परिवर्तन के अनेक प्रमाण उपस्थित हैं, जैसे –
(*) ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे | परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की | ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है |
(*) ऐलूष ऋषि दासी पुत्र थे | जुआरी और हीन चरित्र भी थे | परन्तु बाद में उन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके गुणों को धारण करअनेक अविष्कार किये |ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन किया | (ऐतरेय ब्राह्मण २.१९)
(*) सत्यकाम जाबाल गणिका (वेश्या) के पुत्र थे परन्तु वे कर्मो से ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए |
(*) राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र हो गए थे, प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.१.१४)
अगर उत्तर रामायण की मिथ्या कथा के अनुसार शूद्रों के लिए तपस्या करना मना होता तो पृषध ये कैसे कर पाए?
(*) राजा नेदिष्ट के पुत्र नाभाग वैश्य हुए | पुनः इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.१.१३)
(*) धृष्ट नाभाग के पुत्र थे परन्तु ब्राह्मण हुए और उनके पुत्र ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.२.२)
(*) आगे उन्हींके वंश में पुनः कुछ ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण ४.२.२)
(*) भागवत के अनुसार राजपुत्र अग्निवेश्य ब्राह्मण हुए |
(*) विष्णुपुराण और भागवत के अनुसार रथोतर क्षत्रिय से ब्राह्मण बने |
(*) हारित क्षत्रियपुत्र से ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण ४.३.५)
(*) क्षत्रियकुल में जन्में शौनक ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.८.१) वायु, विष्णु और हरिवंश पुराण कहते हैं कि शौनक ऋषि के पुत्र कर्म भेद से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण के हुए| इसी प्रकार गृत्समद, गृत्समति और वीतहव्य के उदाहरण हैं |
(*) मातंग ऋषि चांडालपुत्र से ब्राह्मण बने |
(*) ब्राह्मण ऋषि पुलस्त्य का पौत्र रावण अपने कर्मों से राक्षस बना |
(*) राजा रघु का पुत्र प्रवृद्ध राक्षस हुआ |
(*)राक्षस में से वाल्मीकि जी राम नाम भक्ति से वेदांत को पार कर ब्राह्मण हुए तुलसी दास जी इन्ही का पुनर्जन्म माने जाते है
(*) त्रिशंकु राजा होते हुए भी कर्मों से चांडाल बन गए थे |
(*) विश्वामित्र के पुत्रों ने शूद्र वर्ण अपनाया | विश्वामित्र स्वयं क्षत्रिय थे परन्तु बाद उन्होंने ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया |
(*) विदुर दासी पुत्र थे | तथापि वे ब्राह्मण हुए और उन्होंने हस्तिनापुर साम्राज्य का मंत्री पद सुशोभित किया | धार्मिकों में विदुर नीति प्रचलित है कृष्ण ने स्वयं प्रमाणित किया ।
(*). वेदों में ‘शूद्र’ शब्द लगभग बीस बार आया है | कहीं भी उसका अपमानजनक अर्थों में प्रयोग नहीं हुआ है | और वेदों में किसी भी स्थान पर शूद्र के जन्म से अछूत होने ,उन्हें वेदाध्ययन से वंचित रखने, अन्य वर्णों से उनका महत्व कम होने या उन्हें यज्ञादि से अलग रखने का उल्लेख नहीं है |
(*) कस्यप ऋषि को ब्राह्मण माना जाता है किन्तु उनके एक स्त्री अदिति से गुणों वाले देवता कहलाए और दूसरी स्त्री दिति से अवगुणों वाले पुत्र असुर कहलाए। कश्यप के पुत्र देवता में सूर्य उषा की संतान का वंश श्री राम वाला सूर्य वंश कहलाया जो की राज काज कार्य करने से क्षत्रिय कहलाए । अन्य स्त्रियों से पुत्र अलग अलग गुण कारण अलग अलग वर्ण के कहलाए । जबकि पिता ब्रह्म कर्म वाला ब्राह्मण है जिनसे पैदा तो मनुष्य हुए किन्तु गुणों के कारण वर्ण व अगली गति प्राप्त हुई ।
(*)वेदों में अति परिश्रमी कठिन कार्य करने वाले को शूद्र कहा है (“तपसे शूद्रम”-यजु .३०.५), और इसीलिए पुरुष सूक्त शूद्र को सम्पूर्ण मानव समाज का आधार स्तंभ कहता है |
(*) सुन्दर कांड में हनुमान जी स्वयं को सबसे हिन् एक जानवर बन्दर बताते है और कहते है की जिस वानर का सुबह मुह देखना भी लोग पसंद नहीं करते थे वो आज राम भक्ति कारण पूज्य हुए है आज हनुमान प्रभु राम की भक्ति कारण लगभग हर ब्राह्मण के पूजा घर में है ।
सुनहु विभीषण प्रभु कई रीती । करहि सदा सेवक पर प्रीती ।।
कहहु कवन मैं परम कुलीन । कपि चंचल सबहि बिधि हिना ।।
प्रात लेइ जो नाम हमारा । तेहि दिन ताहि न मिले आहारा ।।
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर ।
किन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर ।।7।।
(*) पहली बार जब राम से क्ष्त्रिय सूर्यवंश के किन्तु नीच समझे जाने वाले वानर के घर जन्मे हनुमान जी मिले तो वे हनुमान जी उस वक्त विप्र रूप को धारण किये थे ब्राह्मण का भेष बदल कर रहते थे । तब किसी ब्राह्मण को आपत्ति नही हुई कारण हनुमान जी ने योग्यता ज्ञान प्राप्त कर लीया।
(*) जनेऊ संस्कार पर यज्ञ , माता पिता, देवी देवताओ, अग्नि, परमात्मा को वचन होते है उन्हें सत्य सिद्ध करके दिखाना पड़ता है तब ब्रह्मऋषि तत्व प्राप्त होता है । मज़बूरी संकट में क्षमा है किन्तु मन में इच्छा कर संध्या हीन हो या मॉस, मदिरा या पर स्त्री गमन कर स्त्रियों के धर्म और उनके यज्ञ को दिए वचनो को भंग करे वो ब्राह्मण नहीं रहता ।
ब्राह्मण पर धर्म की रक्षा का मुख्य दायित्व है धर्म व यज्ञो के वचनो को निर्वाह करवाना है और खुद ही धर्म को , विवाह आदि दुसरो के यज्ञो के वचनो , यज्ञोंके प्रण को भंग करे कराए तो क्या वह ब्राह्मण रहा ? नहीं , वह असुर प्रवति हो गई ।
पर स्त्री गमन वाला, मदिरा पान, सदा शास्त्र ब्रह्म चिंतन विहीन कभी ब्राह्मण नहीं है, जब तक पश्चाताप में न तपे ।
(*) ऐसे कई उदाहरण है जिनमे जन्मना ब्राह्मण के घर में उसके दादा जो एक श्रेष्ठ पंडित कहलाते थे । कई लोगो के पूजा पाठ करवाए मुक्ति के मन्त्र जपते मुक्ति की पूजा करवाते, गंगा में बहाए गए फिर भी वे खुद मुक्ति को न जा सके और पितरो में आज भी बोला करते है , क्यों ? कई भूतो प्रेतों व् जन्मों को गए , क्यों? क्या उनके जजमानों की मुक्ति करा पाएंगे ? कारन पुत्रो में मोह कारण सत्य स्वीकार नहीं करना था । सभी वर्ण सत्य स्वीकारे और पश्चाताप में अन्य की गलती सुधारे तभी भला है । खुद को भगवान को धोखे देते देते म्रत्यु बाद धोखा खा गए कर्मो की गति बड़ी है ।
इतना बड़ा पंडित कहलाने पर भी मुक्ति नहीं हुई क्यों ? मुक्ति के बजाय अगले जन्म से पहले पितरो में क्यों चले गए ? सोचा और सुधारना चाहा कभी ?
(*) अलग अलग जातियो में आपस में विवाह होते थे कई उदाहरण शाश्त्रो में भरे पड़े है । सबसे बड़ा उदाहरण क्षत्रिय श्री कृष्ण ने जनजातीय स्त्री से विवाह किया है । वो ही भेद नहीं कर रहे तो तुम क्यों ?
मुसलमानो के आक्रमण के वक्त धर्म की रक्षा और सुलभ पहचान के लिये शंकराचार्य ने जन्म आधार पर वर्ण और अंत:जातीय विवाह के लिए सभी हिन्दुओ को आग्रह किया था । तब जन्म आधार पर जातियो में मानने लगे ताकि मुस्लिमो के आक्रमण पर एक दूजे को पहचान में दिक्कत न हो । जनेऊ, और शिखा सभी हिन्दू रखते थे किन्तु इन्हें बचाव कारण न रखने पर सुगम पहचान लिए जाती में बाटे थे ।
आदि की स्त्रोत व शास्त्र लिखने बाद उनमे उनकी गलती कमी सुधारने गुरु शंकरा चार्य को मार्ग में एक चंडालनि अपने पति का शव गोद में लिए विलाप करती दिखी और शंकरा चार्य तरफ चीख रही थी। कुछ अजीब लगा तो सत्य जानने वे मार्ग में ध्यान समाधी लगा के बैठ गए पाया की वो चांडालनी पार्वती शक्ति थी हाथो में शिव शव बने पड़े थे । समझ गए शक्ति बिना शिव नहीं ये शक्ति दुर्गा शुद्र रूप में भी कही आ शक्ति है ।
जो यदि सारे हिन्दू एक होते तो मूसलमान घुस नहीं पाते ।
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(*)भुत काल में कॉन्डम न होने कारण किसी वैश्या के किसी जन्मना ब्राह्मण की संतान पैदा हुई तो क्या बाप का ज्ञात न होने कारण व ब्राह्मण की संतान जन्म आधार पर ब्राह्मण नहीं रही ? जन्म के आधार पर ऐसे कई अज्ञात ब्राह्मण है जो जन्म से ब्राह्मण होने पर भी ब्राह्मण नहीं कहलाते क्यों ?
जो ब्राह्मण लालच, मोह, डर आदी अधर्मी तत्वों कारण मुस्लिम हो गए और उनके संतान होने लगी वो जन्म आधार पर ब्राह्मण है या नहीं ? अब वो जन्मना ब्राह्मण धारण कर्म गुण नियमो कारण ब्राह्मण नहीं, राक्षस है मुस्लमान है ।
लंका में मेघ्नाद अक्षयकुमार आदि की संतान ब्राह्मण हुई या राक्षस और लंका में घूमती रावण , मेग्नाद की नाजायज संताने क्या हुई ? ब्राह्मण नहीं, राक्षस हुई । रावण ने अपने कृत्यो से पिता की तरह ब्रह्म ऋषि होने(क्रोध जिसका ख़त्म हो गया सब जिव में ब्रह्म देखे वह ब्रह्म ऋषि) अब अवगुणों कारण अधिकार खो दिया था । ब्राह्मण से ननिहाल वालो के गुणों कारण राक्षस जात का कहलाने लगा । उसकी सन्ताने ब्राह्मण न हो राक्षस हुई ।
किसी ब्राह्मण स्त्री ने मज़बूरी में या रंगरवली में पर पुरुष पर वर्ण से समागम किया और उसके पुत्र हुआ अब उसका वंश जन्मना ब्राह्मण के घर चल रहा है अब वो पैदा होने वाले ब्राह्मण हुए या नहीं ? कड़वा सत्य की ऐसे कुछ जन्मना ब्राह्मण ऐसे भी ब्राह्मण है ।
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(*) जन्मना ब्राह्मण कहते है की हमारी उत्त्पति ब्रह्मा से हुई है इस लिए ब्राह्मण है । वास्तविकता यह है की हर जीव की उत्त्पत्ति सृष्टी की उत्त्पति ब्रह्मा से ही हुई है । तब तो सब ही ब्राह्मण हुए । सब ही ब्रह्म के अंश है ।
(*)कुछ घमंडी मोहि लालची जन्मना ब्राह्मणों द्वारा असली मनु स्मृति से छेद छाड़ की गई है । ताकि उनकी वंश की दुकान चलती रहे चाहे धर्म के भट्टे बोल जाए । चीन के पुरातन यात्री अनुसार वास्तविक मनु स्मृति में 600 श्लोक थे और आज की मनु स्मृति में 2400 श्लोक कैसे हो गए किसने खुरापात की ।
(*)जन्मना ब्राह्मण कहते है की गायत्री की उपासना अन्य नहीं कर सकता गायत्री हमारी माता है उनके लिए गायत्री मन्त्र के प्रथम द्रष्टा विश्वामित्र हुए जो की पीढ़ी दर पीढ़ी राज काज करने वाले क्षत्रिय थे । गायत्री के प्रथम उपासक जग जननी माँ के पुत्र तो वो भी ब्राह्मण हुए ।
उनके ब्रह्मऋषि होने की कमी ब्रह्मऋषि बशिष्ठ जी ने पूरी की । क्षत्रिय विश्वा मित्र को ब्रह्म ऋषि होने में मदद कर ब्रह्म ऋषि वशिष्ठ ने सच्चा ब्रह्मऋषि होने का परिचय दिया ।
जिसने अंदर से गायत्री को अपनी माँ अनुभव कर लिया मन कर्म वचन से उसके ज्ञान कर्म को समर्पित हो गया वो ब्राह्मण ही है । जिसने पाप कर्मो से गायत्री का अपमान किया इसके सिद्धान्तों को जीवन में नहीं अपनाया वो ब्राह्मण नहीं रहा ।
(*)योग वशिष्ठ अनुसार वशिष्ठ जी राम को बताते हैं की स्वयं अप्सरा मेनका के पुत्र थे जो माँ के अवगुणों को त्याग कर अब ब्रह्म कर्म व ब्रह्मज्ञान कारण ब्राह्मण और उससे भी उच्च ब्रहम् ऋषि कहलाये । वशिष्ठ व विश्वामित्र जी दोनों रघुवंश के श्री राम के गुरु कहलाए ।
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(*) जिस समय मारवाड़ मेवाड़ के ब्राह्मण खाने के मोह में फसे थे ठगी में लगे थे । उस समय चमार जाती के गुरु रविदास ने ब्रह्म ज्ञान व भक्ति कर के मीरा के गुरु हुए मीरा बाई में धर्म भक्ति प्रेम जगा कर मीराबाई को भगवान तक मिलवा दिए । ऐसे मीरा के गुरु को सनातन परम पद परमात्मा न मिले हो ही नहीं सकता ।
जाती समाज में सिमित रहने बजाय कर्म गुणों ज्ञान से श्रेष्ठता व वर्ण जाने ।
(*)भगवद् गीता में कृष्ण कहते है उसी ब्राह्मण को दान दे जो ब्रह्म कर्म , जनेऊ अनुरूप वचन पालन संध्या, वेद् धर्म शाश्त्र अध्ययन में हो । यज्ञो को दिए वचन धर्म को भंग न करे धर्म कि रक्षा करे। गीता अध्याय 18 में दान बारे में है जैसे फिर देखो हिन्दू धर्म कैसे सुदृढ़ होता है ।
सिद्ध गौरख नाथ जी के योग मार्ग ( जिसमे किसी भी वर्ण से सत्य भाव से सिद्ध नाथ योगी हो सके ) ने जिन कबीर दास जी को आत्म समर्पण किया वे कबीर दास जी कहते है की "जात न पूछो साधु की..पूछ लीजिये ज्ञान..."
स्वरूपानन्द और धर्म गुरुओं को संदेश
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गीत में भगवान् श्री कृष्ण प्रतिज्ञा अनुसार और राम के जन्म उद्देश्य अनुसार नारायण कहते है की ब्राह्मण व धर्म की रक्षा मैं करता हु किन्तु सत्य में ब्राह्मण कौन कहलाता है ? और सत्य धर्म क्या है ? ये तो पता करो ।
स्वयं में गुरु कृपा से चारो वर्णों को देखता हु । आत्म तत्व से सनातनी हूँ । नियम कर्म से हिन्दू हूँ ।
भारत को विश्व गुरु सिद्ध होने ये पोस्ट शेयर अवश्य करे
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल
सनातन संस्कृति संघ का सहयोगी संगठन
🚩सनातन संस्कृति संघ ट्रस्ट, सनातन धर्म- संस्कृति व स्वदेशी के प्रचार- प्रसार के लिए कार्यरत संगठन |
स्वदेशी स्वाभिमान, राष्ट्र- धर्म, संस्कृति की रक्षा व सम्वर्धन, गौ आधारित अर्थव्यवस्था एवं गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था की पुनर्स्थापना के लिए सनातन संस्कृति संघ के सदस्य बने |
🚩भारत स्वाभिमान दल, स्वस्थ, समृद्ध, शक्तिशाली एवं संस्कारवान भारत के पुनर्निर्माण के लिए तथा देश के अमर बलिदानियों के सपनों को पूरा करने के लिए भारत स्वाभिमान दल से जुड़े |
भारत स्वाभिमान दल के बारे में अधिक जानने के लिए तथा सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन, राजनैतिक शुचिता व राष्ट्र- धर्म रक्षा के आन्दोलन में तन मन धन से सक्रिय भूमिका निभाने के लिए भारत स्वाभिमान दल की वेबसाइट पर जाये
http://www.bharatswabhimandal.org/member.php
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वन्दे मातरम्
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