शनिवार, 28 मई 2016

महाराज जटायु की वंशावली

धर्मात्मा महाराज जटायु कोई पक्षी गिद्ध नहीं - क्षत्रिय वर्ण के मनुष्य थे

ऋषि मरीचि कुलोत्त्पन्न - ऋषि ताक्षर्य कश्यप

और महाराज दक्ष कुलोत्त्पन्न - विनीता

ताक्षर्य कश्यप और विनीता के दो पुत्र -

गरुड़ और अरुण

अरुण के दो पुत्र हुए -

सम्पात्ति और जटायु

इन सभी महापुरषो का विवरण धीरे धीरे प्रस्तुत किया जायेगा - फिलहाल आज हम चर्चा करेंगे -

धर्मात्मा महाराज जटायु के बारे में -

महाराज जटायु - ऋषि ताक्षर्य कश्यप और विनीता के पुत्र थे, आप गृध्रराज भी कहे जाते हैं, क्योंकि गृध्र एक पर्वत क्षेत्र है - जिसकी आकृति एक गिद्ध की चोंच जैसी है - इनका राज्य - अवध (अयोध्या और मिथिला) के बीच का हिस्सा था - जो एक पहाड़ी क्षेत्र था। ऐसा में कोई भ्रान्ति वश नहीं लिख रहा हु - ना ही मेरी कोई कपोल कल्पना है - आप रामायण में रावण और जटायु का संवाद पढ़े तो स्पष्ट दीखता है - देखिये -

रावण को अपना परिचय देते हुए जटायु ने कहा -

मैं गृध कूट का भूतपूर्व राजा हूँ और मेरा नाम जटायु हैं

सन्दर्भ - अरण्यक 50/4 (जटायुः नाम नाम्ना अहम् गृध्र राजो महाबलः | 50/4)

क्योंकि उस समय में आश्रम व्यवस्था की मान्यता थी जिसकी वजह से समाज और देश व्यवस्थित थे - आज ये वयवस्था चरमरा गयी है जिसके कारण ही देश पतन की और अग्रसर है - खैर - उस समय धर्मात्मा जटायु वानप्रस्थ आश्रम में होंगे - तभी वे अपने राज्य को युवा हाथो में सौंप देश और समाज की व्यवस्था में लग गए - इसका महत्वपूर्ण परिणाम था की माता सीता को रावण से बचाने के लिए अपनी प्राणो की भी बाजी लगा दी -

कुछ लोग धर्मात्मा जटायु को - एक पक्षी - या फिर बहुत बड़ा शरीर वाला गिद्ध समझते हैं - ऐसे लोग केवल वो पढ़ते हैं जिससे उन्हें अपना मनोरथ सिद्ध करना हो - जो सत्य और न्याय से परिपूर्ण हो वो पढ़ना नहीं चाहते - क्योंकि यदि पक्षपात और दुराग्रह त्याग कर - सत्य अन्वेषी बने तो सब कुछ साफ़ और स्पष्ट है की वे एक मनुष्य ही थे - देखिये

1. जैसे की ऊपर वंशावली दी गयी है - धर्मात्मा जटायु - ऋषि मरीचि के कुल में उत्पन्न ताक्षर्य कश्यप ऋषि और महाराज दक्ष के कुल में उत्पन्न विनीता के पुत्र थे - तो भाई क्या एक मनुष्य के गिद्ध संतान उत्पन्न हो सकती है ?

2. प्रभु राम ने धर्मात्मा जटायु को अरण्य काण्ड में "गृध्राज जटायु" अनेक बार बोला है क्योंकि वो उन्हें जान गए थे की वो गृध्र प्रदेश नरेश जटायु हैं।

3. जटायु राज को इसी सर्ग में श्री राम ने द्विज कहकर सम्बोधित किया - जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए ही उपयोग होता है -

4. जटायु राज को श्री राम इसी सर्ग में अपने पिता दशरथ का मित्र बताते हैं।

5. जिस समय रावण सीता का अपहरण कर उसे ले जा रहा था तब जटायु को देख कर सीता ने कहाँ – हे आर्य जटायु ! यह पापी राक्षसपति रावण मुझे अनाथ की भान्ति उठाये ले जा रहा हैं । (सन्दर्भ-अरण्यक 49/38) - यहाँ भी जटायु महाराज को द्विज सम्बोधन है - और यहाँ द्विज किसी भी प्रकार से पक्षी के लिए नहीं हो सकता - क्योंकि रावण को अपना परिचय देते हुए - जटायु महाराज अपने को - गृध्र प्रदेश का भूतपूर्व राजा बता रहे हैं।

6. जटायु राज का इसी सर्ग के बाद अगले सर्ग में दाह संस्कार स्वयं श्री राम ने किया - कुछ लोग ध्यान पूर्वक पढ़ लेवे - क्योंकि बहुत से हिन्दू भाइयो के मन में विचार आता है की जटायु - एक बहुत विशाल - पर्वत तुल्य - और बृहद पक्षी (गिद्ध) थे - तो भाई मुझे केवल इतना बताओ -

यदि जटायु महाराज इतने ही विशाल गिद्ध थे - तो बाल्मीकि रामायण के अरण्यकाण्ड सर्ग 68 में - प्रभु श्री राम बाल्मीकि के शव को अपनी गोद में रखते हुए बड़े प्रेम से लक्ष्मण को कहते हैं - लक्ष्मण इनका दाह संस्कार हम करेंगे - प्रबंध करो - तब चिता पर जटायु महाराज को चिता पर लेटाकर - उनका दाह संस्कार प्रभु राम ने किया। तो बताओ भाई श्री राम इतने पर्वत तुल्य गिद्ध शरीर - को कैसे उठा कर चिता पर रखकर - दाह किया होगा ?

कुछ भाई अरण्य काण्ड के सर्ग ६७ का एक श्लोक प्रस्तुत करके कहते हैं की - श्री राम ने भी जटायु को गिद्ध ही समझा था - क्योंकि उन्होंने कहा की

"ये पर्वत के किंग्रे के तुल्य ने ही वैदेही सीता खा ली है, इसमें कोई संदेह नहीं।"

यहाँ पर्वत के किंग्रे तुल्य का सही अर्थ ना जानकार व्यर्थ ही आक्षेप करते हैं - पर्वत के किंग्रे तुल्य अर्थ बड़ा डील वाला - यानी औसत शरीर से बड़ा - और यहाँ वैदेही सीता खा ली है से तात्पर्य है की - उस वन में अनेक "जंगली - असभ्य - राक्षस प्रवर्ति के लोग निवास करते थे जो मांसभक्षी थे - इसलिए प्रभु राम ने ऐसी सम्भावना व्यक्त की। भाई कृपया समझ कर पढ़िए -

यदि पर्वत के किंग्रे तुल्य का अर्थ इतना ही बड़ा होगा - तो बताओ कैसे इतने बड़े भरी भरकम शरीर को प्रभु राम ने उठाकर चिता पर रखा होगा ? कैसे अपनी गोद में उस धर्मात्मा जटायु के सर को रखकर लक्ष्मण से वार्ता की होगी ?

इसी दाह संस्कार के बाद प्रभु राम ने - महाराज जटायु के लिए उदककर्म भी संपन्न किया था।

अब जहाँ तक हिन्दुओ को भी पता होगा - ये उदककर्म - मनुष्यो द्वारा - मनुष्यो के लिए ही किया जाता है - अब यदि फिर भी कोई धर्मात्मा जटायु को गिद्ध समझे - तो ये उसकी मूरखता ही सिद्ध होगी।

कृपया अपने महापुरषो के सत्य स्वरुप को जानिये - उनके बल, पराक्रम, शौर्य और वीरता को व्यर्थ ना करे। उनके पुरषार्थ का मजाक न बनाये। उन्हें पशु पक्षी तुल्य जानकार बताकर - समझकर - उनके चरित्र का मजाक ना स्वयं बनाये न किसी को बनाने ही दे।

- विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल
सनातन संस्कृति संघ का सहयोगी संगठन

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