बीकानेर के संग्रहालय में लगी यह तस्वीर देश के
सभी शहरों के चौराहों पर लगवाई जानी चाहिए, ताकि कामुक जिहादी अकबर को महान घोषित करने वाले और समझने वालों की आँखें खुल सकें, भारत वीरों ओर योद्धाओं की धरती है।
यहां के वीर- वीरांगनाओं का वीरता और शौर्य से बहुत पुराना रिश्ता रहा है। इतिहास आज भी ऐसे वीरों और वीरांगनाओं की कहानी कहता है जिनके त्याग और बलिदान ने इस धरा की शान बढ़ाई।
ऐसी ही एक इतिहासिक कहानी में एक वीरांगना किरण देवी का जिक्र आता है। उन्होंने इस्लामिक साम्राज्यवादी अकबर को झुकने के लिए विवश कर दिया था। अकबर ने किरण देवी से प्राणों की भीख मांगी थी।
इस इतिहास का संबंध नौरोज मेले से है। यह मेला अकबर आयोजित करता था। अकबर इतना बड़ा कामुक था कि नौरोज के मेले में जिसमें केवल स्त्रियां ही भाग लेती थी, वे ही दुकाने लगाती और वे ही खरीदारी करती थी, पुरूषों का प्रवेश निषिद्ध था | अकबर इस मेले में वेश बदलकर जाता था और सुंदर बालाओं व महिलाओं को अपनी कामवासना पूर्ती के लिए उठवा लेता था। एक दिन पृथ्वीराज राठौर की स्त्री किरण देवी भी उस मेले में शामिल हुई थी और उसने बड़े साहस व वीरता के साथ अपने सतीत्व की रक्षा की थी | छद्म स्त्री वेश धारण करके उस मेले में घूम रहे व्याभिचारी अकबर की नजर किरण देवी पर पड़ी । उनकी सुन्दरता से प्रभावित होकर अकबर किसी भी तरह उन्हें हासिल करना चाहता था।
उसने अपने गुप्तचरों से उसका पता मालूम करने को कहा। गुप्तचरों ने बताया कि वह मेवाड़ के महाराणा प्रताप सिंह के छोटे भाई शक्ति सिंह की बेटी है। उसका विवाह बीकानेर के पृथ्वीराज राठौड़ से हुआ है।
अकबर ने अपनी सेविकाओं के माध्यम से किरण देवी को मेले से अलग कर दिया और वे उन्हें महल में ले गयी। वहां जाकर किरण देवी ने अपने सामने अकबर को पाया, उसे अकबर के पैशाचिक लक्ष्य का पता चला। यह देखकर किरण देवी को क्रोध आ गया। जिस कालीन पर अकबर खड़ा था, उसने वह खींचा और अकबर धराशायी हो गया।
किरण देवी हथियार चलाने और आत्मरक्षा में भी पारंगत थी। वह अकबर की छाती पर बैठ गई और कटारी निकालकर उसकी गर्दन पर रखते हुए बोली- खबरदार अगर इस प्रकार का तुने दु:साहस किया, जीवित रहना है तो शपथ ले कि आज के बाद कभी किसी स्त्री के साथ में ऐसा व्यवहार नहीं करेंगा, या फिर मरने को तैयार हो जा, बोल अकबर तेरी अन्तिम इच्छा क्या है?
बाजी इतनी जल्दी पलट जाएगी, इसका अंदाजा कामुक जिहादी अकबर को भी नहीं था। वह प्राण रक्षा हेतु देवी किरण से क्षमा मांगने लगा, बोला- बहन किरण, तुम यकीनन दुर्गा हो। मुझे क्षमा करो। मैं कसम खाकर कहता हूं कि अब कभी नौरोज मेला नहीं लगाऊंगा और न कभी किसी महिला के बारे में ऐसी सोच रखूंगा।
अकबर को काफी खरी-खोटी सुनाने के बाद वीरांगना किरण देवी ने उसे क्षमा कर दिया और चेतावनी देकर वापस अपने महल में आ गई। कहा जाता है कि अकबर ने फिर कभी नौरोज मेला नहीं लगाया। इस घटना का चित्रण
राजस्थान के कई कवियों ने किया है।
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