शुक्रवार, 20 मई 2016

वेदों में विज्ञान

सनातन धर्मी हिन्दू वेदों को मान्यता देते हैं और वेदों में विज्ञान बताया गया है । केवल सौ वर्षों में पृथ्वी को नष्टप्राय बनाने के मार्ग पर लानेवाले आधुनिक विज्ञान की अपेक्षा, अत्यंत प्रगतिशील एवं एक भी समाज विघातक शोध न करने वाला प्राचीन ‘वेद विज्ञान’ था ।

पूर्वकाल के शोधकर्ता सनातनी ऋषियों की बुद्धि की विशालता देखकर आज के वैज्ञानिकों को अत्यंत आश्चर्य होता है । पाश्चात्त्य वैज्ञानिकों की न्यूनता सिद्ध करने वाला शोध सहस्रों वर्ष पूर्व ही करनेवाले सनातनी हिन्दू ऋषि-मुनि ही खरे वैज्ञानिक शोधकर्ता हैं ।

गुरुत्वाकर्षण का गूढ उजागर करने वाले भास्कराचार्य जी ने अपने ‘सिद्धांत शिरोमणि’ ग्रंथ में गुरुत्वाकर्षण के विषय में लिखा है कि, ‘पृथ्वी अपने आकाश का पदार्थ स्व-शक्ति से अपनी ओर खींच लेती हैं । इस कारण आकाश का पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है’ । इससे सिद्ध होता है कि, उन्होंने गुरुत्वाकर्षण का शोध न्यूटन से ५०० वर्ष पूर्व लगाया ।

परमाणुशास्त्र के जनक आचार्य कणाद अणु शास्त्रज्ञ जॉन डाल्टन के २५०० वर्ष पूर्व आचार्य कणाद जी ने बताया कि, ‘द्रव्य के परमाणु होते हैं । ’विख्यात इतिहासज्ञ टी.एन्. कोलेबु्रक जी ने कहा है कि, ‘अणुशास्त्र में आचार्य कणाद तथा अन्य भारतीय शास्त्रज्ञ युरोपीय शास्त्रज्ञों की तुलना में विश्वविख्यात थे ।’

कर्करोग प्रतिबंधित करनेवाला पतंजली ऋषि का योगशास्त्र ‘पतंजली ऋषि द्वारा २१५० वर्ष पूर्व बताया ‘योगशास्त्र’, कर्करोग जैसी दुर्धर व्याधि पर सुपरिणामकारक उपचार है । योगसाधना से कर्करोग प्रतिबंधित होता है ।’ - भारत शासन के ‘अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्था’के (‘एम्स’के) ५ वर्षों के शोध का निष्कर्ष है !

औषधि-निर्मिति के पितामह : आचार्य चरक ई.स. १०० से २०० वर्ष पूर्व काल के आयुर्वेद विशेषज्ञ चरकाचार्यजी । ‘चरकसंहिता’ प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथ के निर्माणकर्ता चरकजी को ‘त्वचा चिकित्सक’ भी कहते हैं । आचार्य चरक ने शरीर शास्त्र, गर्भ शास्त्र, रक्ताभिसरण शास्त्र, औषधि शास्त्र इत्यादिके विषयमें अगाध शोध किया था ।

मधुमेह, क्षयरोग, हृदयविकार आदि दुर्धर रोगों के निदान एवं औषधोपचार विषयक अमूल्य ज्ञानके किवाड उन्होंने अखिल जगत के लिए खोल दिए । चरकाचार्य जी एवं सुश्रुताचार्य जी ने ई.स. पूर्व ५००० में लिखे गए अर्थव वेद से ज्ञान प्राप्त करके ३ खंड में आयुर्वेद पर प्रबंध लिखे ।

शल्यकर्म में निपुण महर्षि सुश्रुत ६०० वर्ष ईसापूर्व विश्व के पहले शल्य चिकित्सक (सर्जन) महर्षि सुश्रुत शल्य चिकित्सा के पूर्व अपने उपकरण उबाल लेते थे । आधुनिक विज्ञान ने इसका शोध केवल ४०० वर्ष पूर्व किया ! महर्षि सुश्रुत सहित अन्य आयुर्वेदाचार्य त्वचारोपण शल्य चिकित्सा के साथ ही मोतियाबिंद, पथरी, अस्थि भंग इत्यादि के संदर्भ में क्लिष्ट शल्यकर्म करने में निपुण थे । इस प्रकारके शल्यकर्मों का ज्ञान पश्चिमी देशों ने अभी के कुछ वर्षों में विकसित किया है ! महर्षि सुश्रुत द्वारा लिखित ‘सुश्रुत संहिता' ग्रंथमें शल्य चिकित्सा के विषय में विभिन्न पहलू विस्तृत रूप से विशद किए हैं । उसमें चाकू, सुईयां, चिमटे आदि १२५ से भी अधिक शल्यचिकित्सा हेतु आवश्यक उपकरणों के नाम तथा ३०० प्रकार के शल्यकर्मों का ज्ञान बताया है ।

नागार्जुन ७वीं शताब्दी के आरंभ के रसायन शास्त्र के जनक हैं । इनका पारंगत वैज्ञानिक कार्य अविस्मरणीय है । विशेष रूप से सोने धातु पर शोध किया एवं पारे पर उनका संशोधन कार्य अतुलनीय था । उन्होंने पारे पर संपूर्ण अध्ययन कर सतत १२ वर्ष तक संशोधन किया । पश्चिमी देशों में नागार्जुन के पश्चात जो भी प्रयोग हुए उनका मूलभूत आधार नागार्जुन के सिद्धांत के अनुसार ही रखा गया |

बौद्धायन २५०० वर्ष पूर्व (५०० इ.स.पूर्व) ‘पायथागोरस सिद्धांत’ की खोज करने वाले भारतीय त्रिकोणमितितज्ञ । अनुमानतः २५०० वर्षपूर्व भारतीय त्रिकोणमितिवितज्ञों ने त्रिकोणमितिशास्त्र में महत्त्वपूर्ण शोध किया । विविध आकार-प्रकार की यज्ञवेदियां बनाने की त्रिकोणमितिय रचना-पद्धति बौद्धयन ने खोज निकाली । दो समकोण समभुज चौकोन के क्षेत्रफलों का योग करनेपर जो संख्या आएगी उतने क्षेत्रफल का ‘समकोण’ समभुज चौकोन बनाना और उस आकृति का उसके क्षेत्रफल के समान के वृत्तमें परिवर्तन करना, इस प्रकार के अनेक कठिन प्रश्नों को बौद्धायन ने सुलझाया |

ऋषि भारद्वाज राइट बंधुओं से २५०० वर्ष पूर्व वायुयान की खोज करने वाले भारद्वाज ऋषि ! आचार्य भारद्वाज जी ने ६०० वर्ष ई.स. पूर्व विमान शास्त्र के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण संशोधन किया । एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर उडान भरने वाले, एक विश्वसे दूसरे विश्व उडान भरने वाले वायुयान की खोज, साथ ही वायुयान को अदृश्य कर देना इस प्रकार का विचार पश्चिमी शोधकर्ता भी नहीं कर सकते । यह खोज आचार्य भारद्वाज जी ने कर दिखाया । पश्चिमी वैज्ञानिकों को महत्वहीन सिद्ध करने वाले खोज, हमारे ऋषि-मुनियों ने सहस्त्रों वर्ष पूर्व ही कर दिखाया था । वे ही सच्चे शोधकर्ता हैं ।

गर्ग मुनि कौरव-पांडव काल में तारों के जगत के विशेषज्ञ गर्गमुनि जी ने नक्षत्रों की खोज की । गर्गमुनि जी ने श्रीकृष्ण एवं अर्जुन के जीवन के संदर्भ में जो कुछ भी बताया वह शत प्रतिशत सत्य सिद्ध हुआ । कौरव-पांडवों का भारतीय युद्ध मानव संहारक रहा, क्योंकि युद्ध के प्रथम पक्ष में तिथि क्षय होनेके तेरहवें दिन अमावस थी । इसके द्वितीय पक्ष में भी तिथि क्षय थी । पूर्णिमा चौदहवें दिन पड गई एवं उसी दिन चंद्रग्रहण था, यही घोषणा गर्ग मुनि जी ने भी की थी । ।।
जयतु संस्कृतम् ।
जयतु भारतम् ।।

- विश्वजीत सिंह अनन्त

राष्ट्रीय अध्यक्ष

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वन्दे मातरम्

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