तथाकथित जातिवादी व्यवस्था की आड़ में सनातन हिंदू धर्म को तोड़ने का कुचक्र बढ़ा है। सैकड़ों वर्ष की गुलामी के काल में जातिवाद इतना नहीं था जितना की आजादी के इन 70 वर्षों में देखने को मिलता है। इसके पीछे कारण भी है। एक अंग्रेज लेखक ने सही कहा था कि जिन लोगों के हाथों में आप सत्ता सौंप रहे हैं, वे मात्र 30-40 साल में सब कुछ चौपट करके रख देंगे। आज हालत यही है। खैर, हम आपको बताना चाहते हैं कि किस तरह ‘रंग’ बन गया जातिवाद का ‘जहर’।
पहले हम सुर और असुर, फिर वैष्णव और शैव में बदल गए। फिर ब्राह्मण और शूद्र में बदल कर धर्म का नाश कर दिया। इस दौरान लोगों ने अपने अपने वंश चलाएं। फिर ये वंश समाज में बदल गए। उक्त सभी का धर्म से कोई लेना देना नहीं है। वेदों में जहां धर्म की बातें हैं वहीं उक्त काल की सामाजिक व्यवस्था का उल्लेख भी है। धर्म ने नहीं अपने हितों की रक्षा के लिए राजा और पुरोहितों ने बदला समाज। जैसा कि आज के राजनीतिज्ञ और तथाकथित स्वयंभू संत कर रहे हैं।
जहां तक सवाल जाति का है तो जातियों के प्रकार अलग होते थे जिनका सनातन धर्म से कोई लेना-देना नहीं था। जातियां होती थी द्रविड़, मंगोल, शक, हूण, कुशाण आदि। आर्य जाति नहीं थी बल्कि उन लोगों का समूह था जो सामुदायिक और कबीलाई संस्कृति से निकलकर सभ्य होने के प्रत्येक उपक्रम में शामिल थे और जो सिर्फ वेद पर ही कायम थे। लेकिन यह भी सच है कि उस काल में लोग खुद को आर्य नहीं कहते थे। वे अपने नाम के आगे आर्य नहीं लगाते थे।
वे सभी यदु, कुरु, पुरु, द्रहु, आनव, अत्रि, कश्यप, भृगु, मारीच, स्वायंभुव, अंगिरस, भारद्वाज, गौतम, अगस्त्य, विश्वकर्मा, वशिष्ठ, गर्ग, वैवस्वत आदि हजारों हिमालय पुत्रों की संतानें हैं। उल्लेखनी है कि उक्त काल के ऋषियों के नाम के आगे वर्तमान में लिखे जाने वाले पंडित, चतुर्वेदी, त्रिपाठी, सिंह, राव, गुप्ता, नंबूदरी, दास आदि जैसे जातिसूचक शब्द नहीं होते थे।
- विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल
सनातन संस्कृति संघ का सहयोगी संगठन
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
मित्रों आप यहाँ पर आये है तो कुछ न कुछ कह कर जाए । आवश्यक नहीं कि आप हमारा समर्थन ही करे , हमारी कमियों को बताये , अपनी शिकायत दर्ज कराएँ । टिप्पणी में कुछ भी हो सकता हैं, बस गाली को छोडकर । आप अपने स्वतंत्र निश्पक्ष विचार टिप्पणी में देने के लिए सादर आमन्त्रित है ।