आज गीता के ज्ञान के केवल दो ही श्लोक सबको याद है-----
1. आत्मा अजर है, अमर है ….
2. कर्म कर… फल की चिंता मत कर
बस…. हो गया पूरा गीता का ज्ञान, हो गया जीवन सफल
भगवान् श्री कृष्ण ने ही एक और उपदेश दिया था कि “हे पार्थ! जब शत्रु सामने खडा हो, जो घातक अस्त्रों – शस्त्रों के साथ हो, उससे दया कि आशा नहीं करनी चाहिए,
इससे पहले कि वो तुम पर आक्रमण करे और कोई घातक प्रहार करे … आगे बढ़ कर उसका संहार करो l ”
धर्म रक्षा हेतु समय समय पर शस्त्र उठाने की शिक्षा भी भगवान श्री कृष्ण ने ही दी l
पर मानवता की बात करने वाले नकली आचार्यों संतों के सामने भोली जनता को यह ज्ञान समझ में नहीं आते …पृथ्वीराज को परास्त कर बन्दी बनाने वाले गोरी को भी चंद्र वरदायी की बात समझ नहीं आई।
श्री कृष्ण ने अर्जुन को कहा ” नीच व्यक्तियों को संकट के समय ही धर्म की याद आती है l
द्रौपदी का चीर हरण करते हुए,
जुए के कपटी खेल के समय,
द्रौपदी को भरी सभा में अपनी जांघ पर बैठने का आदेश देते समय,
भीम को सर्प दंश करवाते समय,
बारह वर्ष के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास के बाद लौटे पांडवों को उनका राज्य वापिस न करते समय,
16 वर्ष की आयु के अकेले अभिमन्यु को अनेक महारथियों द्वारा घेरकर उसे मृत्यु मुख में डालते समय …. तुम्हारा धर्म कहाँ गया था ?
श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा “पार्थ, देखते क्या हो, चलाओ बाण l इस व्यक्ति को धर्म की चर्चा करने का कोई अधिकार नहीं है ”सनातन इतिहास साक्षी है की समस्त शूरवीरों ने ऐसा ही किया है l
॥भारत माता की जय ॥
- विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल
सनातन संस्कृति संघ का सहयोगी संगठन
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