शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

महान गणितज्ञ, खगोलशास्त्री, वैज्ञानिक आर्यभट्ट

दुनिया को शून्य की समझ देने वाले महान गणितज्ञ, खगोलशास्त्री, वैज्ञानिक आर्यभट्ट का जन्म सन् 476 में भारत के कुसुमपुरा (पाटलिपुत्र) नामक स्थान में हुआ था।
आर्यभट्‍ट प्राचीन भारत के प्रसिद्ध खगोलशास्त्री और गणितज्ञ थे। उनके कार्य आज भी विद्वानों को प्रेरणा देते हैं। वह उन पहले व्यक्तियों में से थे जिन्होंने बीजगणित (एलजेबरा) का प्रयोग किया।
आर्यभट्ट को दुनिया के सबसे बड़े, नवप्रवर्तनशील विचारक और इतिहास के महान अंशदाता के रूप में माना जाता है। उन्होंने खगोल विद्या (ज्योतिष), गणितीय प्रभुता और समस्याओं को एक नया आयाम प्रदान किया।
आर्यभट (४७६-५५० ईस्वी) प्राचीन भारत के एक महान ज्योतिषविद् और गणितज्ञ थे। इन्होंने 'आर्यभटीय ग्रंथ' की रचना की जिसमें ज्योतिषशास्त्र के अनेक सिद्धांतों का प्रतिपादन है।
इसके चार खंड हैं – गीतिकापाद,गणितपाद,काल क्रियापाद, और गोलपाद।
गोलपाद खगोलशास्त्र (ज्योतिष) से सम्बन्धित है और इसमें ५० श्लोक हैं। इसके नवें और दसवें श्लोक में यह समझाया गया है कि पृथ्वी सूरज के चारो तरफ घूमती है। इसी ग्रंथ में इन्होंने अपना जन्मस्थान कुसुमपुर और जन्मकाल शक संवत् 398 लिखा है। बिहार में वर्तमान पटना का प्राचीन नाम कुसुमपुर था।
उन्होंने नालन्दा में शिक्षा पाई थी। गणना (केलकूलेशन) विभाग में उन्हों ने खगोल शास्त्र खण्ड में मौलिक खोज की। जीवा (का्र्डस)की लम्बाई निकालने के लिये अर्ध-जीवा का प्रयोग किया जब कि यूनानी गणितिज्ञ्य पूर्ण-जीवा का ही प्रयोग करते थे।
आर्य भट्ट ने ‘पाई ’ की माप 3.1416 तक निकाली।
सौरमंडल के संबंध में आर्यभट का क्रांतिकारी ज्ञान विकसित होने में गणित का योगदान जीवंत था।
पाइ का मान, पृथ्वी का घेरा /62832 मील/ और सौर वर्ष की लम्बाई, आधुनिक गणना से 12 मिनट से कम अंतर और उनके द्वारा की गईं कुछ गणनायें थीं जो शुद्ध मान के काफी निकट थीं।
किसी वृत्त के व्यास तथा उसकी परिधि के (घेरे के) प्रमाण को आजकल पाई कहा जाता है।
पहले इसके लिए माप १० (दस का वर्ग मूल) ऐसा अंदाजा लगाया गया। एक संख्या को उसी से गुणा करने पर आने वाले गुणनफल की प्रथम संख्या वर्गमूल बनती है। जैसे- २ x २ = ४ अत: २ ही ४ का वर्ग मूल है। लेकिन १० का सही मूल्य बताना यद्यपि कठिन है,पर हिसाब की दृष्टि से अति निकट का मूल्य जान लेना जरूरी था।
इसे आर्यभट्ट ऐसे कहते हैं-
चतुरधिकम्‌ शतमष्टगुणम्‌ द्वाषष्ठिस्तथा सहस्राणाम्‌
अयुतद्वयनिष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाह:॥
(आर्य भट्टीय-१०)
अर्थात्‌ एक वृत्त का व्यास यदि २०००० हो,
तो उसकी परिधि ६२२३२ होगी।
परिधि - ६२८३२
व्यास - २००००
आर्यभट्ट इस मान को एकदम शुद्ध नहीं परन्तु आसन्न यानी निकट है, ऐसा कहते हैं।
इससे ज्ञात होता है कि वे सत्य के कितने आग्रही थे।
इन गणनाओं के समय आर्यभट को कुछ ऐसे गणितीय प्रश्न हल करने पड़े जिन्हें बीजगणित और त्रिकोणमिति में भी पहले कभी नहीं किया गया था।
वर्गमूल निकालने के मौलिक सिद्धान्त बनाये तथा मध्यवर्ती समीकरण (अर्थमेटिक सीरीज इन्टरमीडियेट ईक्येशनस) ‘अ ज – ब व बराबर ख’ और साईन
तालिकाओं (साईन टेबलस) का निर्माण भी किया।
आर्य भट्ट ने त्रिभुज का तथा आयाताकार का क्षेत्रफल निकालने की विधि का अविष्कार किया।
यह सूत्र इस प्रकार है-
त्रिभुजस्य फलशरीरं समदल कोटी भुजार्धासंवर्ग:।
त्रिभुज का क्षेत्रफल उसके लम्ब तथा लम्ब के आधार वाली भुजा के आधे के गुणनफल के बराबर होता है।
उन्हों ने ऐक सूत्र में वृत की परिधि (त्याज्ञ्य) मापने की विधि भी दर्शायी जो चार दशमलव अंकों तक सही है।
सुलभ सूत्र में रेखा गणितानुसार वेदियां बनाने का विस्तरित वर्णन है जो आयत, वर्ग, चतुर्भुज, वृत, अण्डाकार (ओवल)आकार की बनायी जा सकतीं
थी तथा उन का क्षेत्रफल और आकार वाँच्छित तरीके से अदला बदला जा सकता था।
आर्यभट के लिखे तीन ग्रंथों की जानकारी आज भी उपलब्ध है। दशगीतिका, आर्यभटीय और तंत्र।
लेकिन जानकारों के अनुसार उन्होने और एक ग्रंथ लिखा था-
'आर्यभट्ट सिद्धांत'।
इस समय उसके केवल ३४ श्लोक ही उपलब्ध हैं।
उनके इस ग्रंथ का सातवे शतक में व्यापक उपयोग होता था।
लेकिन इतने उपयोगी ग्रंथ भी बौद्ध, मस्लिम आदि क्रुर साम्प्रदायिक लोगों द्वारा जलाकर नष्ट कर दिये गये ।
उन्होंने 'आर्यभटिया' नामक गणित की पुस्तक को कविता के रूप में लिखा। यह उस समय की बहुचर्चित पुस्तक है। इस पुस्तक का अधिकतम कार्य खगोलशास्त्र और गोलीय त्रिकोणमिति से संबंध रखता है। इस पुस्तक में अंकगणित, बीजगणित और त्रिकोणमिति के 33 नियम भी दिए गए हैं।
इस पुस्तक में में वर्गमूल,घनमूल,सामानान्तर श्रेणी तथा विभिन्न प्रकार के समीकरणों का वर्णन है। उन्होंने अपने आर्यभट्टीय नामक ग्रन्थ में कुल ३ पृष्ठों के समा सकने वाले ३३ श्लोकों में गणितविषयक सिद्धान्त तथा ५ पृष्ठों में ७५ श्लोकों में खगोल-विज्ञान विषयक सिद्धान्त तथा इसके लिये यन्त्रों का भी निरूपण किया। आर्यभट्ट ने अपने इस छोटे से ग्रन्थ में अपने से पूर्ववर्ती तथा पाश्चात्यवर्ती देश के तथा विदेश के सिद्धान्तों के लिये भी क्रान्तिकारी अवधारणाएँ उपस्थित की।
उनकी प्रमुख कृति, आर्यभटीय , गणित और खगोल विज्ञान का एक संग्रह है,जिसे भारतीय गणितीय साहित्य में बड़े पैमाने पर उद्धत किया गया है,और जो आधुनिक समय में भी अस्तित्व में है.
आर्यभटीय के गणितीय भाग में अंकगणित, बीजगणित, सरल त्रिकोणमिति और गोलीय त्रिकोणमिति शामिल हैं. इसमे निरंतर भिन्न (कॅंटीन्यूड फ़्रेक्शन्स), द्विघात समीकरण (क्वड्रेटिक इक्वेशंस), घात श्रृंखला के योग(सम्स ऑफ पावर सीरीज़)
और जीवाओं की एक तालिका (टेबल ऑफ साइंस) शामिल हैं ।
आर्य-सिद्धांत, खगोलीय गणनाओं पर एक कार्य है जो अब लुप्त हो चुका है,इसकी जानकारी हमें आर्यभट्ट के समकालीन वराहमिहिर के लेखनों से प्राप्त होती है,साथ ही साथ बाद के गणितज्ञों और टिप्पणीकारों के द्वारा भी मिलती है जिनमें शामिल हैं (ब्रह्मगुप्त
और भास्कर)I.
ऐसा प्रतीत होता है कि ये कार्य पुराने सूर्य सिद्धांत पर आधारित है, और आर्यभटीय के सूर्योदय की अपेक्षा इसमें मध्यरात्रि-दिवस-गणना का उपयोग किया गया है. इसमे अनेक खगोलीय उपकरणों का वर्णन
शामिल है, जैसे कि नोमोन(शंकु-यन्त्र ), एक परछाई यन्त्र (छाया-यन्त्र ), संभवतः कोण मापी उपकरण, अर्धवृत्ताकार और वृत्ताकार (धनुर-यन्त्र / चक्र-यन्त्र ), एक बेलनाकार छड़ी यस्ती-यन्त्र,एक छत्र-आकर का उपकरण जिसे छत्र- यन्त्र कहा गया है,और कम से कम दो प्रकार की जल घड़ियाँ- धनुषाकार और बेलनाकार।
एक तीसरा ग्रन्थ जो अरबी अनुवाद के रूप में अस्तित्व में है, अल न्त्फ़ या अल नन्फ़ है,आर्यभट्ट के एक अनुवाद के रूप में दावा प्रस्तुत करता है,परन्तु इसका संस्कृत नाम अज्ञात है. संभवतः ९ वी सदी के अभिलेखन में, यह फारसी विद्वान और भारतीय इतिहासकार अबू रेहान अल-बिरूनी द्वारा उल्लेखित किया गया है।
उन्होंने यह भी उचित ढंग से सिद्ध किया था कि चंद्रमा और अन्य ग्रह सूर्य प्रकाश के परावर्तन से प्रकाशित होते थे। उन्होंने सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण से संबंधित सभी अंधविश्वासों और पौराणिक मान्यताओं को नकारते हुए इन घटनाओं की उचित व्याख्या की थी।
आर्यभट्ट ने कहा कि राहु केतु के कारण नहीं अपितु पृथ्वी व चंद्र की छाया के कारण ग्रहण होता है।
अर्थात्‌ पृथ्वी की बड़ी छाया जब चन्द्रमा पर पड़ती है तो चन्द्र ग्रहण होता है। इसी प्रकार चन्द्र जब पृथ्वी और सूर्य के बीच आता है तो सूर्यग्रहण होता है।
विभिन्न ग्रहों की दूरी- आर्यभट्ट ने सूर्य से विविध ग्रहों की दूरी के बारे में बताया है। वह आजकल के माप से मिलता-जुलता है।
आजकल पृथ्वी से सूर्य की दूरी (15 करोड़ किलोमीटर) है।
इसे AU ( Astronomical unit) कहा जाता है।
इस अनुपात के आधार पर निम्न सूची बनती है।
ग्रह आर्यभट्ट का मान वर्तमान मान
बुध ०.३७५ एयू ०.३८७ एयू
शुक्र ०.७२५ एयू ०.७२३ एयू
मंगल १.५३८ एयू १.५२३ एयू
गुरु ५.१६ एयू ५.२० एयू
शनि ९.४१ एयू ९.५४ एयू
कॉपरनिकस का जिस दिन जन्म हुआ था यूरोप में,उससे ठीक एक हज़ार साल पहले एक भारतीय वैज्ञानिक "श्री आर्यभट्ट जी" ने पृथ्वी और सूर्य की दूरी बिलकुल ठीक ठीक बता दी थी और जितनी दूरी
आर्यभट्ट जी ने बताई थी उसमे कॉपरनिकस एक इंच भी इधर उधर नही कर पाया। वही दूरी आज अमेरिका और यूरोप में मानी जाती है।
आर्यभट्ट ने कहा 'स्थानं स्थानं दसा गुणम्' अर्थात् दस गुना करने के लिये (उसके) आगे (शून्य) रखो। और शायद यही संख्या के दशमलव सिद्धांत का उद्गम रहा होगा।
आर्यभट्ट द्वारारचित गणितीय खगोलशास्त्र ग्रंथ 'आर्यभट्टीय' के संख्या प्रणाली में शून्य तथा उसके लिये विशिष्ट संकेत सम्मिलित था (इसी कारण से उन्हें संख्याओं को शब्दों में प्रदर्शित करने के अवसर मिला)।
जो हम देखते हैं वह सदा वैसा ही सत्य नहीं होता।
एक बड़ा वृत्त खींचें,फिर उसकी परिधि के सौवें भाग को देखें,वह सीधी रेखा में दिखाई देगा। पर वास्तव में वह वैसी नहीं होता, वक्र होता है। इसी प्रकार विशाल पृथ्वी के गोले के छोटे भाग को हम देखते हैं, वह सपाट नजर आता है।
वास्तव में पृथ्वी गोल है।
समो यत: स्यात्परिधे: शतांश:
पृथ्वी च पृथ्वी नितरां तनीयान्।
नरश्च तत्पृष्ठगतस्य कुत्स्ना
समेव तस्य प्रतिभात्यत: सा॥ १३ ॥
सिद्धांत शिरोमणी गोलाध्याय-भुवनकोश
पृथ्वी स्थिर नहीं है:-पश्चिम में १५वीं सदी में गैलीलियों के समय तक धारणा रही कि पृथ्वी स्थिर है तथा सूर्य उसका चक्कर लगाता है,
परन्तु आज से १५०० वर्ष पहले हुए आर्यभट्ट, भूमि अपने अक्ष पर घूमती है, इसका विवरण निम्न प्रकार से देते हैं-
अनुलोमगतिनौंस्थ: पश्यत्यचलम्वि लोमंग यद्वत्।
अचलानि भानि तद्वत् सम पश्चिमगानि लंकायाम्॥
आर्यभट्टीय गोलपाद-९
अर्थात्‌ नाव में यात्रा करने वाला जिस प्रकार किनारे पर स्थिर रहने वाली चट्टान, पेड़ इत्यादि को विरुद्ध दिशा में भागते देखता है,उसी प्रकार अचल नक्षत्र लंका में सीधे पूर्व से पश्चिम की ओर सरकते देखे जा सकते हैं।
इसी प्रकार पृथुदक्‌ स्वामी, जिन्होंने व्रह्मगुप्त के व्रह्मस्फुट सिद्धान्त पर भाष्य लिखा है,आर्यभट्ट की एक आर्या का उल्लेख किया है-
भ पंजर: स्थिरो भू रेवावृत्यावृत्य प्राति दैविसिकौ।
उदयास्तमयौ संपादयति नक्षत्रग्रहाणाम्‌॥
अर्थात्‌ तारा मंडल स्थिर है और पृथ्वी अपनी दैनिक घूमने की गति से नक्षत्रों तथा ग्रहों का उदय और अस्त करती है।
अपने ग्रंथ आर्यभट्टीय में आर्यभट्ट ने दशगीतिका नामक प्रकरण में स्पष्ट लिखा-
प्राणे नैतिकलांभू: अर्थात्‌ एक प्राण समय में पृथ्वी एक
कला घूमती है (एक दिन में २१६०० प्राण होते हैं)
सूर्योदय-सूर्यास्त-भूमि गोलाकार होने के कारण विविध नगरों में रेखांतर होने के कारण अलग-अलग स्थानों में अलग-अलग समय पर सूर्योदय व सूर्यास्त होते हैं।
इसे आर्यभट्ट ने ज्ञात कर लिया था, वे लिखते हैं-
उदयो यो लंकायां सोस्तमय: सवितुरेव सिद्धपुरे।
मध्याह्नो यवकोट्यां रोमक विषयेऽर्धरात्र: स्यात्॥
(आर्यभट्टीय गोलपाद-१३)
अर्थात्‌ जब लंका में सूर्योदय होता है तब सिद्धपुर में सूर्यास्त हो जाता है। यवकोटि में मध्याह्न तथा रोमक प्रदेश में अर्धरात्रि होती है।
प्राचीन काल से भारतीय गणितज्ञों की विशेष रूचि की एक समस्या रही है उन समीकरणोंके पूर्णांक समाधान ज्ञात करना जो ax + b = cy स्वरुप में होती है, एक विषय जिसे डायोफैंटाइन समीकरण के रूप में
जाना जाता है.यहाँ है आर्यभटीय पर भास्कर की व्याख्या से एक उदाहरण::
वह संख्या ज्ञात करो जिसे ८ से विभाजित करने पर शेषफल के रूप में ५ बचता है,९ से विभाजित करने पर शेषफल के रूप में ४ बचता है, ७ से विभाजित करने पर शेषफल के रूप में १ बचता है.
अर्थात, बताएं N= 8x+ 5 = 9y +4 = 7z +1. इससे N के लिए सबसे छोटा मान ८५ निकलता है.सामान्य तौर पर, डायोफैंटाइन समीकरण कठिनता के लिए बदनाम थे.
इस तरह के समीकरणों की व्यापक रूप से चर्चा प्राचीन वैदिक ग्रन्थ सुल्ब सूत्र में है,
जिसके अधिक प्राचीन भाग ८०० ई.पु. तक पुराने हो सकते हैं. ऐसी समस्याओं के हल के लिए आर्यभट्ट की विधि को कुट्टक विधि कहा गया है.
kuṭṭaka कूटटक का अर्थ है पीसना,अर्थात छोटे छोटे टुकडों में तोड़ना, और इस विधिमें छोटी संख्याओं के रूप में मूल खंडों को लिखने के लिए एक पुनरावर्ती कलनविधि का समावेश था.आज यह कलनविधि,६२१
इसवी पश्चात में भास्कर की व्याख्या के अनुसार,पहले क्रम के डायोफैंटाइन समीकरणों को हल करने के लिए मानक पद्धति है, और इसे अक्सर आर्यभट्ट एल्गोरिद्म के रूप में जाना जाता है. डायोफैंटाइन समीकरणों का इस्तेमाल क्रिप्टोलौजी में होता है.
बीजगणित--
आर्यभटीय में आर्यभट्ट ने वर्गों और घनों की श्रृंखला के सुरुचिपूर्ण परिणाम प्रदान किये हैं.
1^2 + 2^2 + ...... + n^2 = {n(n + 1)(2n + 1) \over 6}
और
1^3 + 2^3 + .... + n^3 = (1 + 2 +....+ n)^2
आर्यभट्‍ट ने गणित और खगोलशास्त्र में और भी बहुत से कार्य किए।
ये महाराजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के दरबार के माने हुए विद्वानों में से एक थे। इस महान पुरुष की मृत्यु ईसवी सन् ५५० में हुई।
भारत के प्रथम कृत्रिम उपग्रह का नाम आर्यभट्‍ट रखा गया था। ३६० किलो का यह उपग्रह अप्रैल १९७५ में छोड़ा गया था।
विश्व को शून्य की समझ देने वाले ऐसे महान पुरुष को कृतज्ञ राष्ट्र का शत् शत् नमन,,कोटि कोटि वंदन~~~~~~~^~~~~~~~
जयति पुण्य सनातन संस्कृति,
जयति पुण्य भूमि भारत,
-विश्वजीत सिंह अनन्त
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