मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

मनु स्मृति और इस्लामिक शरियत कानून

मनु स्मृति पर काफी विवाद होता है, जबकि आज मनु स्मृति नामक कोई भी कानून हिन्दुओ पर लागू नहीं होता, और ना ही मनु स्मृति में लिखित कानून के अनुसार हिन्दुओं को अपराधिक, सजाये दी जाती है न मनु स्मृति में लिखित रीती के अनुसार हिन्दू अपना जीवन यापन व्यतीत करते है? जबकि 99% हिन्दुओ को तो ये भी नहीं पता है मनु स्मृति, और धर्मग्रन्थ में क्या अंतर है तब भी व्यर्थ बहस होती है मनु स्मृति पर जिस कानून की पुस्तक को बंद हुए सैकड़ो वर्ष हो चुके है, कुछ राजनीतिक कारणों की वजह से राजनेता उसे प्रचारित किये हुए है, वो भी विकृत रूप में |
वही दूसरी तरफ भारत के दुसरे मुख्य समुदाय मुस्लिम पर कोई बात करना नहीं चाहता है, जो 2016 में आज भी 1400 साल पुराने कबिलाई कानून को ढो रहा है, जिसको शरियत कहते है, "शरियत" के कारण से आज भारतीय मुस्लिम समाज इतना पिछड़ा हुआ है शायद इस समाज से ज्यादा पिछड़ापन कोई और समुदाय झेलता हो, फिर भी तथाकथित बुद्धिजीवी "शरियतवाद" पर बहस करना पसंद नहीं करते है, उन मुद्दों पर बहस करते है जिनका समाज में दूर दूर तक कुछ नामोनिशान ना हो जैसे "मनुवाद" किस मनुवाद की बात करते है तथाकथित बुद्धिजीवी? किधर है मनुवाद?? जबकि शरियतवाद को तो संविधानिक मान्यता तक दिलवा दी गई है, इन कालनेमियों के द्वारा, जिस "शरियतवाद" की वजह से मुस्लिम समाज की औरतो को मर मर कर जीवन व्यतीत करना पड़ रहा है, उन छोटी छोटी बच्चियों को तडपना पड़ रहा है जिनको शरियत के नाम पर मोबाईल, पत्र से तलाक देकर सडको पर छोड़ दिया जाता है  मरने को और उन बच्चियों की कोई सुनवाई नहीं, क्यूंकि उन बच्चियों का फैसला शरियतवाद (मुस्लिम पर्सनल ला) करेगा, क्या इस देश के दूसरे सबसे बड़े समुदाय को अधिकार नहीं के वह अपनी इच्छा से भारतीय कानून के अनुसार जीवन व्यतीत कर सके?? कब छुटकारा मिलेगा हमे इस शरियतवाद से?? कब हमारी बच्चियाँ लोकतान्त्रिक कानून के तहत तलाक और निकाह कर सकेगी?? कब मुस्लिम अपनी मर्जी से लोकतान्त्रिक तरीके से कानूनों में बदलाव करवा सकेगे?? कब मिलेगी मुस्लिमों को "शरियतवाद" से आजादी??जबकि मुस्लिम समाज 99% शरियावाद के हिसाब से चलता है जिसको वह सुन्नत कहते है।
मनुस्मृति पर गला फाड़कर चिल्लाने वालो को कभी इस्लाम के शरियत के बारे में भी बात करनी चाहिए।

-विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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वन्दे मातरम्

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