शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

योगः कर्मसु कौशलम्

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भगवान श्रीकृष्ण, श्रीमद्भगवत गीता जी में कहते हैं की:-
📕📗📘नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥📖
📖📕'तू शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म कर क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर-निर्वाह भी नहीं सिध्द होगा।'
📖📕श्रीमद्भगवत गीता जी निष्काम कर्मों के द्वारा मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताती है।
📖📕जिस प्रकार कमल के पत्ते जल में रहते हुए भी जल को अपने ऊपर नहीं आने देते, ऐसे ही निष्काम कर्मयोगी संसार में रहते हुए भी कर्मों के बंधन तथा मोह में लिप्त नहीं होते।
📕📖श्रीमद्भगवत गीता जी संसार को कर्मशील व पुरुषार्थी होने का संदेश देती है और स्वार्थ, लोभ, आल्सय से ऊपर उठकर निष्काम व परोपकार के कर्मों की भावना जागृत करती है।
📕📖श्रीमद्भगवत गीता हम सभी को श्रेष्ठ कर्म करते हुए इहलोक तथा परलोक दोनों के लिए उन्नति करने के लिए प्रेरणा देती है।
📕📖गीता कह रही है:- 🍂' योगः कर्मसु कौशलम्'🍃
📘📗📕अर्थात् :- "जो भी कर्म करो, उसको पूर्णता, निपुणता, सुन्दरता और कुशलता से करो।
📕📖हे मनुष्यो, वर्तमान जीवन और जगत् को कर्मों की सुगंध से भरते चलो, कर्त्तव्य व दायित्व को ईमानदारी व कुशलता से निभाओ।"
📕📖जो इस तरह से जीवन को जीता है, गीता के अनुसार वह इस जीवन व जगत् को सफल कर लेता है और उसका अगला जन्म भी सुधर जाता है।
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वन्दे मातरम्

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