जीवन निर्माण ☀
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♦ एक थका-माँदा शिल्पकार लम्बी यात्रा के बाद किसी छायादार वृक्ष के नीचे विश्राम के लिये बैठ गया । अचानक उसे अपने सामने एक पत्थर का टुकड़ा पड़ा दिखाई दिया । उस शिल्पकार ने उस सुन्दर पत्थर के टुकड़े को उठा लिया । साथ रखे थैले से छैनी-हथौड़ी निकाली और उसे तराशने की ग़रज़ से जैसे ही पहली चोट की, पत्थर जोर से चिल्ला पड़ा - “अरे, मुझे मत मारो ।”
♦ शिल्पकार ने उस पत्थर को छोड़ दिया और पास ही पड़ा अपनी पसन्द का एक अन्य पत्थर का टुकड़ा उठाया और उसे छैनी-हथौड़ी से तराशने लगा । वह पत्थर का टुकड़ा चुपचाप वार सहता गया और देखते ही देखते उस पत्थर के टुकड़े में से एक सुन्दर भगवान नटराज शिव की प्रतिमा उभर आयी । उस प्रतिमा को वहीं पेड़ के नीचे रखकर वह शिल्पकार अपनी राह पकड़ आगे चला गया ।
♦ कुछ वर्षों बाद वो शिल्पकार फिर उसी रास्ते से गुजरा तो देखा कि उसकी बनाई उस मूर्ती की पूजा-अर्चना हो रही है और जिस पत्थर के टुकड़े को उसने उसके रोने चिल्लाने पर फैंक दिया था, लोग उसके सिर पर नारियल फोड़कर मूर्ती पर चढ़ा रहे हैं ।
♦ यह छोटी-सी कहानी हमें बताती है कि -- "जीवन में कुछ बनने के लिए जो व्यक्ति शुरु में अपने जीवन के शिल्पकार (माता-पिता और गुरुजनों) का सत्कार करते हुए, उनके द्वारा नेक इरादे से दिए गए क्षणिक कष्ट झेल लेता है तो इस तरह जो जीवन निर्मित होता है, बाद में समाज और देश ही नहीं, बल्कि पूरा विश्व युगों तक उसका सत्कार करता है और जो जीवन निर्माण के क्षणिक कष्ट से बचकर भागना चाहते हैं, वे बाद में जीवन भर कष्ट झेलते हैं ।
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♦ एक थका-माँदा शिल्पकार लम्बी यात्रा के बाद किसी छायादार वृक्ष के नीचे विश्राम के लिये बैठ गया । अचानक उसे अपने सामने एक पत्थर का टुकड़ा पड़ा दिखाई दिया । उस शिल्पकार ने उस सुन्दर पत्थर के टुकड़े को उठा लिया । साथ रखे थैले से छैनी-हथौड़ी निकाली और उसे तराशने की ग़रज़ से जैसे ही पहली चोट की, पत्थर जोर से चिल्ला पड़ा - “अरे, मुझे मत मारो ।”
♦ शिल्पकार ने उस पत्थर को छोड़ दिया और पास ही पड़ा अपनी पसन्द का एक अन्य पत्थर का टुकड़ा उठाया और उसे छैनी-हथौड़ी से तराशने लगा । वह पत्थर का टुकड़ा चुपचाप वार सहता गया और देखते ही देखते उस पत्थर के टुकड़े में से एक सुन्दर भगवान नटराज शिव की प्रतिमा उभर आयी । उस प्रतिमा को वहीं पेड़ के नीचे रखकर वह शिल्पकार अपनी राह पकड़ आगे चला गया ।
♦ कुछ वर्षों बाद वो शिल्पकार फिर उसी रास्ते से गुजरा तो देखा कि उसकी बनाई उस मूर्ती की पूजा-अर्चना हो रही है और जिस पत्थर के टुकड़े को उसने उसके रोने चिल्लाने पर फैंक दिया था, लोग उसके सिर पर नारियल फोड़कर मूर्ती पर चढ़ा रहे हैं ।
♦ यह छोटी-सी कहानी हमें बताती है कि -- "जीवन में कुछ बनने के लिए जो व्यक्ति शुरु में अपने जीवन के शिल्पकार (माता-पिता और गुरुजनों) का सत्कार करते हुए, उनके द्वारा नेक इरादे से दिए गए क्षणिक कष्ट झेल लेता है तो इस तरह जो जीवन निर्मित होता है, बाद में समाज और देश ही नहीं, बल्कि पूरा विश्व युगों तक उसका सत्कार करता है और जो जीवन निर्माण के क्षणिक कष्ट से बचकर भागना चाहते हैं, वे बाद में जीवन भर कष्ट झेलते हैं ।
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल
सनातन संस्कृति संघ का सहयोगी संगठन
स्वदेशी स्वाभिमान, राष्ट्र- धर्म, संस्कृति की रक्षा व सम्वर्धन, गौ आधारित अर्थव्यवस्था एवं गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था की पुनर्स्थापना के लिए सनातन संस्कृति संघ के सदस्य बने |
🚩भारत स्वाभिमान दल, स्वस्थ, समृद्ध, शक्तिशाली एवं संस्कारवान भारत के पुनर्निर्माण के लिए तथा देश के अमर बलिदानियों के सपनों को पूरा करने के लिए भारत स्वाभिमान दल से जुड़े |
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वन्दे मातरम्
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