सोमवार, 18 अप्रैल 2016

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट में करेगा शायरा बानो केस का विरोध

If Muslim personal Law Board tries to oppose High court decision and put pressure on govt we must oppose this move of of barbaric law at all level.
तलाक-तलाक-तलाक
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मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट में करेगा शायरा बानो केस का विरोध
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा शायरा बानो मामले में विरोधी पक्ष बनने का फैसले लेने के बाद एक बार फिर शाह बानो केस जैसी स्थिति बन गई है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने फैसला लिया है कि वह तीन बार तलाक कहकर तलाक लिए जाने की इस इस्लामिक कुप्रथा में किसी भी तरह के बदलाव या छेड़छाड़ का सुप्रीम कोर्ट में विरोध करेगा। इससे पहले 80 के दशक में शाह बानो केस ने देश में काफी हलचल मचाई थी। उस समय भी इस मामले को लेकर समान नागरिक संहिता की पृष्ठभूमि में लंबी बहस छिड़ गई थी। 1985 में इंदौर शहर में रहने वाली 62 साल की तलाकशुदा मुस्लिम महिला शाह बानो ने सुप्रीम कोर्ट में एक केस किया था। शाह बानो ने अपने पति पर केस कर तालक के बाद गुजारा भत्ता दिए जाने की मांग की थी। अदालत ने शाह बानो के पक्ष में निर्णय सुनाया था। राजीव गांधी के नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने गांधीवाद की मानवता विरोधी साम्प्रदायिक तुष्टिकरण की कुनीतियों पर चलते हुए इस्लामिक रुढ़िवादिता और मुस्लिम कट्टरपंथियों के दबाव में आकर मुस्लिम महिला (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन डिवोर्स) अधिनियम 1986 पास कर दिया। इस अधिनियम के द्वारा सुप्रीम कोर्ट का शाह बानो के पक्ष में सुनाया गया फैसला निरस्त हो गया। इस अधिनियम ने निराश्रित और लाचार मुस्लिम महिलाओं से भी तलाक के बाद गुजारा भत्ता पाने का अधिकार छीन लिया। शनिवार को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने केंद्र सरकार द्वारा इस केस में दखलंदाजी करने की किसी भी कोशिश का विरोध करने का फैसला लिया। बोर्ड ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में किसी भी तरह से दखल दिए जाने के प्रयासों को विफल करने का भी निश्चय किया है। मौजूदा मामले में उत्तराखंड की शायरा बानो ने तीन बार तलाक कहकर तलाक लिए जाने की इस्लामिक प्रथा को असंवैधानिक घोषित करने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। अदालत ने पिछले महीने इस याचिका को स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही अदालत ने स्वत: संज्ञान लेते हुए मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की जरूरतों पर गौर करने का भी फैसला लिया। अब मुस्लिम पर्सनल बोर्ड ने इस केस में विरोधी पक्ष बनने का फैसला किया है।
क्या मुस्लिम महिलाओं के तलाक, मस्जिदों में प्रवेश, बुर्खा प्रथा, घरेलू हिंसा, उत्पीड़न, और समाज में समान अधिकारों के लिए बुद्धिजीवीयों व मीडिया को आवाज नहीं उठानी चाहिए? क्या माननीय न्यायालय को अब इन मुद्दों में हस्तक्षेप कर न्याय नहीं करना चाहिए?
समय आ गया है पंथनिरपेक्ष भारत में अवैध रूप से चल रहे मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर सख्त कार्यवाही करने का, शरीयत कानून को अवैध घोषित कर इस्लाम के ठेकेदार उलेमाओं और मोलवियों की मनमानी बन्द करवाने का !!
-विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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वन्दे मातरम्

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