*भारत के नये संविधान की संकल्पना*
स्वाभिमान दल द्वारा
भारतीय सिद्धांतों पर संकलित किये जा रहे भारत के नए संविधान का महत्वपूर्ण भाग *जन्मसिद्ध अधिकार*
भाग - ३
जन्मसिद्ध अधिकार
अनुच्छेद ३.१ :- इस भाग में सरकार का अर्थ केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार या कोई जनपद पंचायत या जनपद प्राधिकरण या नगर पालिका या खण्ड विकास पंचायत या न्याय पंचायत या कोई ग्राम प्राधिकरण या समिति जो उपरोक्त में से किसी के द्वारा गठित की गयी हो, इस भाग में प्रदत्त जन्मसिद्ध अधिकार का हरण या उसे किसी भी तरह नियंत्रित करने के लिए कोई विधि पारित नहीं कर सकती। ऐसी कोई भी विधि निर्थक और अवैध मानी जायेगी।
अनुच्छेद ३.२ :- अस्पृश्यता का अंत - "अस्पृश्यता" का अंत किया जाता हैं। और उसका किसी भी रूप में आचरण निसिद्ध किया जाता हैं। "अस्पृश्यता" से उपजी किसी निर्योगता को लागू करना अपराध होगा, जो विधि के अनुसार दण्डनीय होगा।
अनुच्छेद ३.४ :- बाल विवाह का अंत - 16 वर्ष से कम आयु की बालिका व 18 वर्ष से कम आयु के बालक का विवाह करना अपराध होगा, जो विधि के अनुसार दण्डनीय होगा।
अनुच्छेद ३.५ :- समगोत्रीय विवाह का अंत - समान गोत्र में विवाह का अंत किया जाता हैं। यह भारत की संस्कृति व वैज्ञानिक अवधारणाओं के विरूद्ध हैं। समगोत्र में विवाह करना अपराध होगा, जो विधि के अनुसार अवैध होगा।
अनुच्छेद ३.६ :- बहुविवाह का अंत - बहुविवाह का अंत किया जाता हैं। एक पुरूष एक स्त्री से और एक स्त्री एक पुरूष से ही विवाह कर सकती है। एक से अधिक विवाह करना अपराध होगा, जो विधि के अनुसार दण्डनीय होगा। निम्नलिखित स्थितियों में दूसरा विवाह किया जा सकता हैं :-
१. वैद्यकीय परिक्षण में पुरूष के सक्षमसिद्ध होने के पश्चात भी पत्नी 25 वर्ष की आयु तक माँ न बन सके तो पुरूष दूसरा विवाह कर सकता हैं।
२. पुरूष के नपुँसक होने पर स्त्री पहले पति का त्याग कर दूसरा विवाह कर सकती हैं।
३. युद्ध की विभिषिका में पुरूषों के अधिक मात्रा में मारे जाने से जनसंख्या अनुपात बिगडने पर बहुविवाह किया जा सकता हैं।
अनुच्छेद ३.७ :- अवैध संबंधों का अंत - अवैध संबंधों का अंत किया जाता हैं। पुरूष का स्त्री से और स्त्री का पुरूष से किसी भी तरह से अवैध संबंध बनाना अपराध होगा, जो विधि के अनुसार दण्डनीय होगा।
अनुच्छेद ३.८ :- जातियों का अंत - जातियों का अंत किया जाता हैं। और शासकीय, प्रशासकीय या सामाजिक रूप में जातीय आधार पर किसी के साथ भेदभाव करना अपराध होगा, जो विधि के अनुसार दण्डनीय होगा।
अनुच्छेद ३.९ :- उपाधियों का अंत - (१) राज्य, सेना, विद्या या संस्कृति संबंधी सम्मान के अतिरिक्त कोई उपाधि प्रदान नहीं करेगा।
(२) भारत का कोई नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि राष्ट्राध्यक्ष की सहमती के बिना स्वीकार नहीं करेगा।
(३) कोई व्यक्ति जो भारत का नागरिक नहीं हैं, राज्य के अधीन लाभ या विश्वास के किसी पद को धारण करते हुये किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि राष्ट्राध्यक्ष की सहमति के बिना स्वीकार नहीं करेगा।
(४) राज्य के अधीन या विश्वास का पद धारण करने वाला कोई व्यक्ति किसी विदेशी राज्य से या उसके अधीन किसी रूप में कोई भेंट, उपाधि या पद राष्ट्राध्यक्ष की सहमति के बिना स्वीकार नहीं करेगा।
अनुच्छेद ३.१० :- गौवंश हत्या का पूर्ण अंत - गौवंश की हत्या को पूर्णत: प्रतिबंधित किया जाता है।
(१) गौवंश अर्थात गाय, बैल, बछडा- बछिया व सांड की हत्या को मानव हत्या के समान अपराध मानते हुए मृत्युदण्ड अथवा कठोरतम दण्ड दिया जायेगा।
(२) गौवंश तस्करों से गौवंश के रक्षार्थ हुए संघर्ष में यदि गौभक्तों/गौरक्षकों के हाथों गौवंश तस्कर मारे जाते हैं, अथवा उनके संसाधन वाहन इत्यादि नष्ट हो जाते हैं, तो गौभक्तों/गौवंश रक्षकों को किसी भी तरह से प्रताडित/दण्डित नहीं किया जायेगा और उन पर कोई अभियोग भी नहीं लगाया जागेगा।
अनुच्छेद ३.११ :- शासन, भारत के क्षेत्र में किसी भी भारतीय को विधि के समक्ष समता के अधिकार से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। प्रत्येक व्यक्ति को कुल, वंश, लिंग, भाषा या जन्मस्थान के आधार पर बिना भेद भाव प्रत्येक अधिकार और स्वतंत्रता प्राप्त होगी।
अनुच्छेद ३.१२ :- प्रत्येक मनुष्य को उसकी गरिमा के साथ व स्वतंत्र रूप से जीवन यापन करने का जन्मसिद्ध अधिकार हैं। अत: कोई भी किसी प्रकार की यातना, क्रुरता या अमानवीयता करने वाला विधि अनुसार दण्ड का भागी होगा।
अनुच्छेद ३.१३ :- प्रत्येक मनुष्य को देश के अन्दर रहने, बसने, व व्यापार करने का अधिकार हैं, तथा कहीं भी जाने की निर्द्वन्द स्वतंत्रता हैं। यद्यपि शासन सैन्य व सामरिक महत्व के क्षेत्रों में जन साधारण का प्रवेश वर्जित कर सकती हैं।
अनुच्छेद ३.१४ :- प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन, स्वतंत्रता तथा अपने परिवार जनों की सुरक्षा अक्षुण्ण रखने का जन्मसिद्ध अधिकार हैं। और हर किसी को अपने जीवन, स्वतंत्रता व सुरक्षा को अक्षुण्ण रखने के लिए शासकीय हस्तक्षेप के बिना किसी भी प्रकार के पारंपारिक शस्त्रों (भाला, धनुष- बाण, फरसा, त्रिशुल, कृपाण आदि) के स्वामित्व व उसके धारण करने का अधिकार होगा। आग्नेय अस्त्र (बंदुक, राइफल, रिवाल्वर, माऊजर आदि) शासन की स्वीकृति लेकर रखा जा सकेगें।
अनुच्छेद ३.१५ :- प्रत्येक व्यक्ति को अपनी संपत्ति के स्वामित्व का अधिकार हैं। कोई भी अपनी संपत्ति से मनमाने ढंग से वंचित नहीं किया जायेगा। यद्यपि शासन विषमता दूर करने के लिए अधिकतम् सीमा का निराधारण कर सकती हैं।
अनुच्छेद ३.१६ :- प्रत्येक किसान को, जो अपनी पैतृक कृषि योग्य भूमि का स्वामी हैं। या उसको पैतृक कृषि योग्य भूमि की आय द्वारा क्रय की गयी कृषि भूमि का स्वामित्व का जन्मसिद्ध अधिकार होगा। कोई शासन उस कृषक की स्वैच्छिक स्वीकृति के बिना उसकी कृषि योग्य भूमि का अधिग्रहण नहीं कर सकेगी। शासन केवल सामरिक व राष्ट्रीय महत्व के कार्यो हेतु उस कृषि भूमि के मूल्य से चार गुणा अधिक मूल्य देकर कृषक से उस भूमि को ले सकती हैं।
अनुच्छेद ३.१७ :- सभी नागरिकों को शान्ति पूर्वक और निरायुद्ध सम्मेलन का, संगम या संघ बनाने का अधिकार होगा। किसी को किसी संघ या परिषद् आदि में जुडने के लिए विवश नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद ३.१८ :- प्रत्येक नागरिक को वैचारिक स्वतंत्रता, अन्त:करण, धर्म व पूजा की स्वतंत्रता का अधिकार होगा। इस अधिकार का अर्थ यहीं नहीं होगा कि सांसारिक लालच या पारलौकिक भय के द्वारा मतांतरण करवाया जाये। लालच व भय द्वारा मतांतरण कराना दण्डनीय अपराध होगा।
अनुच्छेद ३.१९ :- प्रत्येक नागरिक को तथ्यों के आधार पर मत की वैचारिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होगी। इसमें किसी प्रकार के हस्तक्षेप के बिना मत (विचार) को धारण करने की स्वतंत्रता व किसी भी माध्यम से सूचना व विचारों की खोज, अनुसंधान व आदान प्रदान की स्वतंत्रता अन्तर्निहित हैं। इसका यह अर्थ नहीं है कि इस अधिकार का उपयोग जानते समझते हुयें गलत सूचनाओं के आधार पर लोगों को भ्रमित करने के लिए या किसी अनुचित व छलपूर्ण उद्देश्य के लिए किया जाये।
अनुच्छेद ३.२० :- प्रत्येक नागरिक को भारत की संस्कृति के प्रति निष्ठावान रहना अनिवार्य होगा। "वाल्मीकि रामायण" व "गीता" राष्ट्रीय ग्रंथ व भगवान श्रीराम व भगवान श्रीकृष्ण राष्ट्र के प्रेरणा पुरूष होगे, उनका अपमान राष्ट्र का अपमान माना जायेगा, जो दण्डनीय होगा। वाल्मिकी रामायण का शम्बूक वध प्रसंग व पुराणों के कृष्ण प्रसंग प्रक्षिप्त व अप्रमाणित हैं, यह प्रसंग भारतीय समाज की एकता को तोडने के लिए विदेशी आक्रांताओं द्वारा ग्रंथों में मिलाये गये हैं, इनका प्रचार- प्रसार विधि द्वारा अमान्य हैं।
अनुच्छेद ३.२१ :- प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता पूर्वक निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से देश की सरकार में भाग लेने का अधिकार हैं।
अनुच्छेद ३.२२ :- राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति को 'लोक सेवा' तक पहुँचने का समान अधिकार हैं।
अनुच्छेद ३.२३ :- जन इच्छा ही शासकीय सत्ता का आधार होगी, जोकि ज्वलंत व विशिष्ट विषयों पर, समय- समय पर किये गये प्रमाणित जनमत संग्रह द्वारा अभिव्यक्त होगी, जो समान सार्वदेशिक मतदान से होगा व यह गुप्त मतदान या उसके समतुल्य मत संग्रह विधि के आधार पर होगा।
अनुच्छेद ३.२४ :- किसी भी व्यक्ति की व्यैक्तिक गोपनीयता, परिवार, गृह या किसी भी प्रकार के पत्रकार व संवादिता पर मनमाना हस्तक्षेप नहीं होगा, न ही किसी की प्रतिष्ठा व सम्मान पर किसी भी प्रकार का अभिक्रमण किया जायेगा। प्रत्येक व्यक्ति को इस प्रकार के हस्तक्षेप या अभिक्रमण के विरूद्ध वैधानिक सुरक्षा प्राप्त हैं।
अनुच्छेद ३.२५ :- किसी को भी मनमाने ढंग से बंदी, निरूद्ध या निष्काशित नहीं किया जायेगा।
अनुच्छेद ३.२६ :- निरूद्ध किये गये किसी भी व्यक्ति को यथाशीघ्र उसको निरूद्ध करने का कारण बताये बिना बंदी नहीं बनाया जा सकेगा और न ही उसको उसको अपनी इच्छानुरूप किसी भी विधिवेत्ता के परामर्श लेने से वंचित नहीं किया जायेगा।
अनुच्छेद ३.२७ :- निरूद्ध व बंदी बनाये गये प्रत्येक व्यक्ति को निकटतम् दण्डाधिकारी के स्थान से दण्डाधिकारी के न्यायालय तक की यात्रा के समय को छोडकर १२ घण्टों के अन्दर प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा। और दण्डाधिकारी के आदेश के बिना किसी भी व्यक्ति को उपरोक्त अवधि से अधिक समय तक निरूद्ध नहीं किया जायेगा। देशद्रोह के आरोपी पर यह अनुच्छेद अमान्य होगा।
अनुच्छेद ३.२८ :- प्रत्येक व्यक्ति को भारत की सांस्कृतिक जीवनचर्या में स्वतंत्रता पूर्वक भाग लेने का, सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने का, इसकी कलाओं का आनंद उठाने का व इसकी वैज्ञानिक उपलब्धियों में भाग लेने का तथा इसके लाभों के उपभोग का अधिकार हैं।
अनुच्छेद ३.२९ :- प्रत्येक व्यक्ति को किसी प्रकार के शासकीय हस्तक्षेप के बिना स्वतंत्र चुनाव का, व्यपार, उद्योग, उत्पादन, भण्डारण, रोजगार, न्याय संगत व अनुकूल कार्य परिस्थितियों का अधिकार हैं।
अनुच्छेद ३.३० :- कार्य करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उचित व अनुकूल पारिश्रमिक पाने का अधिकार हैं। जिससे वह अपनी व अपने परिवार का मानव गरिमा के योग्य जीवन अस्तित्व सुरक्षित कर सकें।
अनुच्छेद ३.३१ :- संविधान द्वारा प्रदत्त जन्मसिद्ध अधिकारों के उल्लंघन होने पर प्रत्येक व्यक्ति को क्षेत्रीय स्तर पर प्रभावी व सक्षम न्याय पालिका (व्यवस्था) द्वारा प्रभावी समाधान या प्रतिकार प्राप्त करने का अधिकार होगा।
अनुच्छेद ३.३२ :- किसी भी निहित स्वार्थ की सिद्धि के लिए जन्मसिद्ध अधिकारों का दुरूपयोग नहीं किया जा सकेगा।
*सामर्थ्य में अभिवृद्धि होने पर वैधानिक तरीके से इंडियन संविधान के स्थान पर भारतीय संविधान प्रतिस्थापित किया जायेगा।*
सृष्टि संवत् व विक्रम संवत् भी उसी समय के लिखे जायेगे, जिस समय यह संविधान भारत के नागरिको पर लागू होगा।
स्मरणीय:- *यदि आप लोग सच में इंडिया को भारत बनाना चाहते हैं, इंडियन संविधान के स्थान पर भारतीय संविधान लागू कराना चाहते हैं, तो केवल समर्थन न करें, भारत स्वाभिमान दल की औपचारिक सदस्यता प्राप्त करें तथा तन- मन- धन से भारत स्वाभिमान दल को सशक्त बनायें। भारत स्वाभिमान दल सशक्त बनेगा तो इंडिया भारत बनेगा।*
- विश्वजीत सिंह अनंत
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल
वन्दे मातरम्
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