जीव मानता है कि मै दूसरों की रक्षा करता हूँ किन्तु जीव भी तो काल का ग्रास बनता है तो वह क्या रक्षा करेगा ? रक्षक तो प्रभू ही है , कर्त्ता धर्त्ता भी प्रभू ही है , पालक संहारक सभी श्रीहरि ही हैं । हम घर में रहें या वन में रक्षक तो श्रीहरि ही हैँ,भागवत मेँ व्यास जी ने लिखा है -
"पथि च्युतं तिष्ठति दिष्टरक्षितं गृहे स्थितं तद्विहितं विनश्यति । जीवत्यनाथोऽपि तदीक्षितो वने गृहेऽपि गुप्तोऽस्य हतो न जीवति ।।
यदि परमेश्वर की कृपा हो तो अनाथ हो या वनवासी हो तो भी वह जीवित रहता है और ईश्वर द्वारा मारा गया जीव घर मेँ सुरक्षित होने पर भी जीवित नही रहता , मरता ही है । जीवमात्र का रक्षक पिता तो ईश्वर ही है ->
" जागो राखे साइयां ,मार सके न कोय ।
बाल न बाँका कर सके , चाहे जग वैरी होय ।।"
-चैतन्य शिव (विश्वजीत सिंह अनंत)
सनातन संस्कृति संघ/भारत स्वाभिमान दल
भारत के परमवैभव हेतु समर्पित। राष्ट्रीय अध्यक्ष - राष्ट्रीय सनातन पार्टी
मंगलवार, 8 नवंबर 2016
जागो राखे साइयां ,मार सके न कोय
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