मित्रों, हमने हिन्दू संगठनों द्वारा रामध्यान (रजमान) के अवसर पर रोजा इफ्तार को लेकर एक पोस्ट लिखी थी, जिसपर काफी लोग अनावश्यक तर्क दे रहे है, उन सभी के लिए इतिहास का एक दृष्टांत प्रस्तुत है :
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भगवान् कृष्ण के सखा भीष्म पितामह ने भी जब दुर्योधन का अन्न खाया तो धर्म से विमुख हो गए और द्रौपदी की रक्षा के लिए उद्यत नहीं हो सके. परिणाम स्वरुप शर शैय्या पर सोना पड़ा. भीष्म पितामह के आगे हम लोग किस गिनती में हैं? जब हम लोग किसी रामद्रोही, बाबर समर्थक, गोमांसभक्षक के घर का अन्न (और मांस) चाव से खाते हैं तो हम भी सेक्युलर बन जाते हैं और उनकी ही भाषा बोलने लगते हैं और अपने भविष्य के लिए जाने कौन कौन सी शय्या तैयार करते रहते हैं. अस्तु,
जो मन हो सो खाइए, क्योंकि भविष्य है आपका !!
विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल
भारत के परमवैभव हेतु समर्पित। राष्ट्रीय अध्यक्ष - राष्ट्रीय सनातन पार्टी
सोमवार, 4 जुलाई 2016
क्या हिन्दुओं द्वारा रोजा इफ्तार करना उचित है ?
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