रविवार, 25 सितंबर 2016

इस्लाम एक सीमाविहीन राष्ट्र है।

एक वाक्य जिसे ‘जानने’ के पश्चात व्यर्थ के तर्कजाल में उलझने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
एक वाक्य जिसे ‘जानने’ के पश्चात दसियो पृष्ठ लम्बे वामी कामी लेख बेहूदगी लगते हैं।
एक वाक्य जिसे ‘जानना’ किसी भी देश के हर जागृत नागरिक के लिये आवश्यक है।
एक वाक्य जिसे ‘जानना’ विश्व बन्धुत्व की ओर प्रथम पग है।
एक वाक्य जिसकी समझ ही अंतत: सभ्यता को बचा पायेगी।
(वह वाक्य इस उद्धरण के अंत में आयेगा।)
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1919 के खिलाफत आन्दोलन में बहुत से मुस्लिम नौजवान हमारे देश से हिजरत करने चले गये थे। उनमें से कुछ रूस पहुँचे। उन्हों ने वहाँ 1920 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी बनाई। वे ‘मुस्लिम बन्धुत्त्व’ (Pan Islamism) के सामंती सिद्धांत से प्रभावित थे और इक़बाल के इस कथन के अनुसार “मुसलिम हैं हम, वतन है सारा जहाँ हमारा” इस्लाम को ही राष्ट्र मानते थे, जिसकी कोई भौगोलिक सीमायें नहीं हैं। उन्हों ने कम्युनिज्म का अर्थ भी यही समझा यानि ‘मुस्लिम बन्धुत्त्व’ ही उनके लिये कम्युनिज्म बन गया। परिणाम यह कि अंतर्राष्ट्रीयता को भौगोलिक सीमाओं से परे और मार्क्सवाद को राष्ट्रवाद का विरोधी मान लेने की धारणा तब से चली आ रही है। जो अपने को राष्ट्रवादी माने वह निम्न पूँजीवादी संकीर्ण भावना का शिकार है और उसे अपने को कम्युनिस्ट कहने का अधिकार नहीं है।
जब नींव ही ग़लत पड़ गई तो इमारत सही कैसे बनती? मार्क्सवाद को राष्ट्रीय विशेषताओं से जोड़ने और उसे निश्चित राष्ट्रीय रूप प्रदान करने का सवाल ही पैदा नहीं होता।
- ‘तिलक से आज तक’, हंसराज रहबर
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“इस्लाम एक सीमाविहीन राष्ट्र है।
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अब शब्दकोष में infestation और swarming के अर्थ देखिये तो!

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