🙏🏽 *॥ॐ॥* 👏🏽
जिस बातों का शाश्वत महत्व हो वही _*सनातन*_ कही गई है, _जैसे सत्य सनातन है, ईश्वर ही सत्य है, आत्मा ही सत्य है, मोक्ष ही सत्य है और इस *सत्य के मार्ग को बताने वाला धर्म ही सनातन धर्म भी सत्य है।*_
वह सत्य जो _*अनादि काल*_ से चला आ रहा है और जिसका कभी भी अंत नहीं होगा वह ही _सनातन या शाश्वत_ है, जिनका न प्रारंभ है और जिनका न अंत है उस सत्य को ही *सनातन* कहते हैं, यही _सनातन धर्म_ का सत्य है।
*वैदिक या हिंदू धर्म* को इसलिए _सनातन धर्म_ कहा जाता है, क्योंकि यही एकमात्र धर्म है जो ईश्वर, आत्मा और मोक्ष को तत्व और ध्यान से जानने का मार्ग बताता है, मोक्ष का कांसेप्ट इसी धर्म की देन है।
_*एकनिष्ठता, ध्यान, मौन और तप सहित यम-नियम के अभ्यास और जागरण का मोक्ष मार्ग है! अन्य कोई मोक्ष का मार्ग नहीं है, मोक्ष से ही आत्मज्ञान और ईश्वर का ज्ञान होता है, यही सनातन धर्म का सत्य है।*_
सनातन धर्म के मूल तत्व _सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा, दान, जप, तप, यम-नियम आदि_ हैं जिनका शाश्वत महत्व है, अन्य प्रमुख धर्मों के उदय के पूर्व वेदों में इन सिद्धान्तों को प्रतिपादित कर दिया गया था।
*॥ॐ॥* _*असतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योर्तिगमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय॥*_
_वृहदारण्य उपनिषद_
अर्थात हे ईश्वर मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो।
_जो लोग उस परम तत्व परब्रह्म परमेश्वर को नहीं मानते-जानते हैं वे असत्य में गिरते हैं, असत्य से मृत्युकाल में अनंत अंधकार में पड़ते हैं, उनके जीवन की गाथा भ्रम और भटकाव की ही गाथा सिद्ध होती है।_
वे कभी अमृत्व को प्राप्त नहीं होते, _मृत्यु आए इससे पहले ही सनातन धर्म के सत्य मार्ग पर आ जाने में ही भलाई है, अन्यथा अनंत योनियों में भटकने के बाद प्रलयकाल के अंधकार में पड़े रहना पड़ता है।_
*॥ॐ॥* _*पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥*_
_ईश उपनिषद_
*सत्य* दो धातुओं से मिलकर बना है सत् और तत्, सत का अर्थ यह और तत का अर्थ वह, दोनों ही सत्य है, अहं ब्रह्मास्मी और तत्वमसि, अर्थात मैं ही ब्रह्म हूँ और तुम ही ब्रह्म हो, यह संपूर्ण जगत ब्रह्ममय है, ब्रह्म पूर्ण है, यह जगत् भी पूर्ण है।
पूर्ण जगत् की उत्पत्ति पूर्ण ब्रह्म से हुई है, पूर्ण ब्रह्म से पूर्ण जगत् की उत्पत्ति होने पर भी ब्रह्म की पूर्णता में कोई न्यूनता नहीं आती, वह शेष रूप में भी पूर्ण ही रहता है, _यही सनातन सत्य है।_
_जो तत्व सदा, सर्वदा, निर्लेप, निरंजन, निर्विकार और सदैव स्वरूप में स्थित रहता है उसे *सनातन या शाश्वत सत्य* कहते हैं, वेदों का ब्रह्म और गीता का स्थितप्रज्ञ ही शाश्वत सत्य है, जड़, प्राण, मन, आत्मा और ब्रह्म शाश्वत सत्य की श्रेणी में आते हैं, सृष्टि व ईश्वर (ब्रह्म) अनादि, अनंत, सनातन और सर्वविभु हैं।_
जड़ पाँच तत्व से दृश्यमान है! आकाश, वायु, जल, अग्नि और पृथ्वी, यह सभी शाश्वत सत्य की श्रेणी में आते हैं, यह अपना रूप बदलते रहते हैं किंतु समाप्त नहीं होते, प्राण की भी अपनी अवस्थाएँ हैं! प्राण, अपान, समान और यम।
उसी तरह आत्मा की अवस्थाएँ हैं! जाग्रत, स्वप्न, सुसुप्ति और तुर्या, ज्ञानी लोग ब्रह्म को निर्गुण और सगुण कहते हैं, उक्त सारे भेद तब तक विद्यमान रहते हैं जब तक कि आत्मा मोक्ष प्राप्त न कर ले, यही _*सनातन धर्म*_ का सत्य है।
ब्रह्म महाआकाश है तो आत्मा घटाकाश, आत्मा का मोक्ष परायण हो जाना ही ब्रह्म में लीन हो जाना है इसीलिए कहते हैं कि ब्रह्म सत्य है जगत मिथ्या यही _सनातन सत्य_ है, और इस शाश्वत सत्य को जानने या मानने वाला ही *सनातनी* कहलाता है।
_*हिन्दू*_ एक अप्रभंश शब्द है, हिंदुत्व या _हिंदू धर्म को प्राचीनकाल में सनातन धर्म कहा जाता था,_ एक हजार वर्ष पूर्व हिंदू शब्द का प्रचलन नहीं था, _ऋग्वेद में कई बार *सप्त सिंधु* का उल्लेख मिलता है।_
सिंधु शब्द का अर्थ नदी या जलराशि होता है इसी आधार पर एक नदी का नाम सिंधु नदी रखा गया, जो लद्दाख और पाक से बहती है, _भाषाविदों का मानना है कि हिंद-आर्य भाषाओं की 'स' ध्वनि ईरानी भाषाओं की 'ह' ध्वनि में बदल जाती है, आज भी भारत के कई इलाकों में 'स' को 'ह' उच्चारित किया जाता है।_
_इसलिए *सप्त सिंधु* अवेस्तन भाषा (पारसियों की भाषा) में जाकर *हप्त हिंदू* में परिवर्तित हो गया। इसी कारण ईरानियों ने सिंधु नदी के पूर्व में रहने वालों को *हिंदू* नाम दिया, किंतु पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लोगों को आज भी *सिंधू या सिंधी* कहा जाता है।_
_ईरानी अर्थात पारस्य देश के पारसियों की धर्म पुस्तक 'अवेस्ता' में 'हिन्दू' और 'आर्य' शब्द का उल्लेख मिलता है,_ दूसरी ओर अन्य इतिहासकारों का मानना है कि चीनी यात्री हुएनसांग के समय में हिंदू शब्द की उत्पत्ति इंदु से हुई थी, इंदु शब्द चंद्रमा का पर्यायवाची है, भारतीय ज्योतिषीय गणना का आधार चंद्रमास ही है, अत: चीन के लोग भारतीयों को 'इन्तु' या 'हिंदू' कहने लगे।
आर्य समाज के लोग इसे आर्य धर्म कहते हैं, जबकि आर्य किसी जाति या धर्म का नाम न होकर इसका अर्थ सिर्फ श्रेष्ठ ही माना जाता है, अर्थात जो मन, वचन और कर्म से श्रेष्ठ है वही *आर्य* है।
_बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य का अर्थ चार श्रेष्ठ सत्य ही होता है, *बुद्ध कहते हैं* कि उक्त श्रेष्ठ व शाश्वत सत्य को जानकर आष्टांगिक मार्ग का अनुसरण करना ही 'एस *धम्मो सनातनो*' अर्थात यही है सनातन धर्म।_
इस प्रकार आर्य धर्म का अर्थ श्रेष्ठ समाज का धर्म ही होता है, प्राचीन भारत को आर्यावर्त भी कहा जाता था जिसका तात्पर्य श्रेष्ठ जनों के निवास की भूमि था।
विज्ञान जब प्रत्येक वस्तु, विचार और तत्व का मूल्यांकन करता है तो इस प्रक्रिया में धर्म के अनेक विश्वास और सिद्धांत धराशायी हो जाते हैं, विज्ञान भी सनातन सत्य को पकड़ने में अभी तक कामयाब नहीं हुआ है किंतु वेदांत में उल्लेखित जिस सनातन सत्य की महिमा का वर्णन किया गया है विज्ञान धीरे-धीरे उससे सहमत होता नजर आ रहा है।
हमारे ऋषि-मुनियों ने ध्यान और मोक्ष की गहरी अवस्था में ब्रह्म, ब्रह्मांड और आत्मा के रहस्य को जानकर उसे स्पष्ट तौर पर व्यक्त किया था, वेदों में ही सर्वप्रथम ब्रह्म और ब्रह्मांड के रहस्य पर से पर्दा हटाकर 'मोक्ष' की धारणा को प्रतिपादित कर उसके महत्व को समझाया गया था, मोक्ष के बगैर आत्मा की कोई गति नहीं इसीलिए ऋषियों ने मोक्ष के मार्ग को ही सनातन मार्ग माना है।
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में मोक्ष अंतिम लक्ष्य है, यम, नियम, अभ्यास और जागरण से ही मोक्ष मार्ग पुष्ट होता है, जन्म और मृत्यु मिथ्या है, जगत भ्रमपूर्ण है, ब्रह्म और मोक्ष ही सत्य है, मोक्ष से ही ब्रह्म हुआ जा सकता है।
इसके अलावा स्वयं के अस्तित्व को कायम करने का कोई उपाय नहीं, _ब्रह्म के प्रति ही समर्पित रहने वाले को *ब्राह्मण* और ब्रह्म को जानने वाले को *ब्रह्मर्षि* और ब्रह्म को जानकर ब्रह्ममय हो जाने वाले को ही *ब्रह्मलीन* कहते हैं।_
सनातन धर्म के सत्य को जन्म देने वाले अलग-अलग काल में अनेक ऋषि हुए हैं, उक्त ऋषियों को *द्रष्टा (seer)* कहा जाता है, अर्थात जिन्होंने सत्य को जैसा देखा, वैसा कहा, इसीलिए सभी ऋषियों की बातों में एकरूपता है।
जो उक्त ऋषियों की बातों को नहीं समझ पाते वही उसमें भेद करते हैं, भेद भाषाओं में होता है, अनुवादकों में होता है, संस्कृतियों में होता है, परम्पराओं में होता है, सिद्धांतों में होता है, लेकिन सत्य में नहीं।
वेद कहते हैं ईश्वर अजन्मा है, उसे जन्म लेने की आवश्यकता नहीं, उसने कभी जन्म नहीं लिया और वह कभी जन्म नहीं लेगा, ईश्वर तो एक ही है लेकिन देवी-देवता या भगवान अनेक हैं, उस एक को छोड़कर उक्त अनेक के आधार पर नियम, पूजा, तीर्थ आदि कर्मकांड को सनातन धर्म का अंग नहीं माना जाता। यही _*सनातन सत्य*_ है।
आज *५ जून* को पूरे विश्व में _*पर्यावरण दिवस*_ मनाते हैं, पृथ्वी के सभी प्राणी एक-दूसरे पर निर्भर है तथा विश्व का प्रत्येक पदार्थ एक-दूसरे से प्रभावित होता है, इसलिए और भी आवश्यक हो जाता है कि प्रकृति की इन सभी वस्तुओं के बीच आवश्यक संतुलन को बनाये रखा जाये।
इस २१वीं सदी में जिस प्रकार से हम औद्योगिक विकास और भौतिक समृद्धि की और बढे चले जा रहे है, वह पर्यावरण संतुलन को समाप्त करता जा रहा है, _अतः जो मेरी पोस्ट को पढ रहा है उन्हे आज के दिन १० पेड लगाने का संकल्प लेना है।_
_*आप सभी का मंगल हो!*_
*॥ॐ॥*
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