सोमवार, 6 जून 2016

क्या स्त्रियों को गायत्री मन्त्र व वेद का अधिकार नहीं ?

गायत्री मन्त्र का स्त्रियों को अधिकार है या नहीं? यह कोई स्वतन्त्र प्रश्र नहीं है। अलग से कहीं ऐसा विधि- निषेध नहीं कि स्त्रियाँ गायत्री जपें या न जपें। यह प्रश्न इसलिये उठता है- यह कहा जाता है कि स्त्रियों को वेद का अधिकार नही है। चुकी गायत्री भी वेद मन्त्र है, इसलिये अन्य मन्त्रों की भाँति उसके उच्चारण का भी अधिकार नहीं होना चाहिये।
स्त्रियों को वेदाधिकारी न होने का निषेध वेदों में नहीं है। वेदों में तो ऐसे कितने ही मन्त्र हैं, जो स्त्रियों द्वारा उच्चारण होते हैं। उन मन्त्रों में स्त्री- लिङ्गं की क्रियाएँ हैं, जिनसे स्पष्ट हो जाता है कि स्त्रियों द्वारा ही प्रयोग होने के लिये हैं। देखिये—
उदसौ सूर्यो अगाद् उदयं मामको भग:।
अहं तद्विद् वला पतिमभ्यसाक्षि विषासहि:।
अहं केतुरहं मूर्धाहमुग्रा विवाचनी,
ममेदनु क्रतुं पति: सेहानाया उपाचरेत्॥
मम पुत्रा: शत्रुहणोऽथो मे दुहिता विराट्
उताहमस्मि संजया पत्यौ मे श्लोक उत्तम:॥ —ऋग्वेद १०। १५९ ।। १- ३
अर्थात्- सूर्योदय के साथ मेरा सौभाग्य बढ़े। मैं पतिदेव को प्राप्त करूँ। विरोधियों को पराजित करने वाली और सहनशील बनूँ। मैं वेद से तेजस्विनी प्रभावशाली वक्ता बनूँ। पतिदेव मेरी इच्छा, ज्ञान व कर्म के अनुकूल कार्य करें। मेरे पुत्र भीतरी व बाहरी शत्रुओं को नष्ट करें। मेरी पुत्री अपने सद्गुणों के कारण प्रकाशवती हो। मैं अपने कार्यों से पतिदेव के उज्ज्वल यश को बढ़ाऊँ।
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनादितो मुक्षीय मामुत:॥ —यजुर्वेद ३। ६०
अर्थात्- हम कुमारियाँ उत्तम पतियों को प्राप्त कराने वाले परमात्मा का स्मरण करती हुई यज्ञ करती हैं, जो हमें इस पितृकुल से छुड़ा दे, किन्तु पति कुल से कभी वियोग न कराये।
आशासाना सौमनसं प्रजां सौभाग्यं रयिम्।
पत्युरनुव्रता भूत्वा सन्नह्यस्वामृतायकम्॥ —अथर्व० १४। १। ४२
वधू कहती है कि मैं यज्ञादि शुभ अनुष्ठानों के लिए शुभ वस्त्र पहनती हूँ। सौभाग्य, आनन्द, धन तथा सन्तान की कामना करती हुई मैं सदा प्रसन्न रहूँगी।
वेदोऽसि वित्तिरसि वेदसे त्वा वेदो मे विन्द विदेय।
घृतवन्तं कुलायिनं रायस्पोषँ सहस्रिणम् ।।
वेदो वाजं ददातु मे वेदो वीरं ददातु मे। —काठक संहिता ५/४/२३- २४
अर्थात्- आप वेद हैं, सब श्रेष्ठ गुणों और ऐश्वर्यों को प्राप्त कराने वाले ज्ञान- लाभ के लिये आपको भली प्रकार प्राप्त करूँ। वेद मुझे तेजस्वी, कुल को उत्तम बनाने वाला, ऐश्वर्य को बढ़ाने वाला ज्ञान दें। वेद मुझे वीर, श्रेष्ठ सन्तान दें।
विवाह के समय वर- वधू दोनों सम्मिलित रूप से मन्त्र उच्चारण करते हैं—
समञ्जन्तु विश्वे देवा: समापो हृदयानि नौ।
सं मातरिश्वा सं धाता समुदेष्टरी दधातु नौ॥ —ऋग्वेद १०। ८५। ४७
अर्थात् सब विद्वान् लोग यह जान लें कि हम दोनों के हृदय जल की तरह परस्पर प्रेमपूर्वक मिले रहेंगे। विश्वनियन्ता परमात्मा तथा विदुषी देवियाँ हम दोनों के प्रेम को स्थिर बनाने में सहायता करें।
स्त्री के मुख से वेदमन्त्रों के उच्चारण के लिए असंख्यों प्रमाण भरे पड़े हैं। शतपथ ब्राह्मण १४। १। ४। १६ में, यजुर्वेद के ३७। २० मन्त्र ‘त्वष्टमन्तस्त्वा सपेम’ इस मन्त्र को पत्नी द्वारा उच्चारण करने का विधान है। शतपथ के १। ९। २। २३ में स्त्रियों द्वारा यजुर्वेद के २। २१ मन्त्रों के उच्चारण का आदेश है। तैत्तिरीय संहिता के १। १। १० ‘सुप्रजसस्त्वा वयं’ आदि मन्ज्ञत्रों को स्त्र द्वारा बुलवाने का आदेश है। आश्वलायन गृह्य सूत्र १। १। ९ के ‘पाणिग्रहणादि गृह्य....’ में भी इसी प्रकार यजमान की अनुपस्थिति में उसकी पत्नी, पुत्र अथवा कन्या को यज्ञ करने का आदेश है। काठक गृह्य सूत्र ३। १। ३० एवं २७। ३ में स्त्रियों के लिए वेदाध्ययन, मन्त्रोच्चारण एवं वैदिक कर्मकाण्ड करने का प्रतिपादन है। लौगाक्षी गृह्म सूत्र की २५वीं कण्डिका में भी ऐसे प्रमाण मौजूद हैं।
पारस्कर गृह्म सूत्र १। ५। १,२ के अनुसार विवाह के समय कन्या लाजाहोम के मन्त्रों को स्वयं पढ़ती हैं। सूर्य दर्शन के समय भी वह यजुर्वेद के ३६। २४ मन्त्र ‘तच्चक्षुर्देवहितं’ को स्वयं ही उच्चारण करती है। विवाह के समय ‘समञ्जन’ करते समय वर- वधू दोनों साथ- साथ ‘अथैनौ समञ्जयत: .....’ इस ऋग्वेद १०। ८५। ४७ के मन्त्र को पढ़ते हैं।
ताण्ड्य ब्राह्मण ५। ६। ८ में युद्ध में स्त्रियों को वीणा लेकर सामवेद के मन्त्रों का गान करने का आदेश है तथा ५। ६। १५ में स्त्रियों के कलश उठाकर वेद- मन्त्रों का गान करते हुए परिक्रमा करने का विधान है।
ऐतरेय ५। ५। २९ में कुमारी गन्धर्व गृहीता का उपाख्यान है, जिसमें कन्या के यज्ञ एवं वेदाधिकार का स्पष्टीकरण हुआ है।
कात्यायन श्रौत सूत्र १। १। ७, ४। १। २२ तथा २०। ६। १२ आदि में ऐसे स्पष्ट आदेश हैं कि अमुक वेद- मन्त्रों का उच्चारण स्त्री करे। लाट्यायन श्रौत सूत्र में पत्नी द्वारा सस्वर सामवेद के मन्त्रों के गायन का विधान है। शांखायन श्रौत सूत्र के १। १२। १३ में तथा आश्वलायन श्रौत सूत्र १। ११। १ में इसी प्रकार के वेद- मन्त्रोच्चारण के आदेश हैं। मन्त्र ब्राह्मण के १। २। ३ में कन्या द्वारा वेद- मन्त्र के उच्चारण की आज्ञा है। नीचे कुछ मन्त्रों में वधू को वेदपरायण होने के लिये कितना अच्छा आदेश दिया है—
ब्रह्मपरं युज्यतां ब्रह्म पूर्वं ब्रह्मन्ततो मध्यतो ब्रह्म सर्वत:।
अनाव्याधां देव पुरां प्रपद्य शिवा स्योना पतिलोके विराज॥ —अथर्व० १४। १। ६४
हे वधू ! तुम्हारे आगे, पीछे, मध्य तथा अन्त में सर्वत्र वेद विषयक ज्ञान रहे। वेद ज्ञान को प्राप्त करके तदनुसार तुम अपना जीवन बनाओ। मंगलमयी, सुखदायिनी एवं स्वस्थ होकर पति के घर में विराजमान और अपने सद्गुणों से प्रकाशवान् हो।
कुलायिनी घृतवती पुरन्धि: स्योने सीद सदने पृथिव्या:। अभित्वा रुद्रा वसवो गृणन्त्विमा। ब्रह्म पीपिहि सौभगायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिहत्वा। —यजुर्वेद १४। २
हे स्त्री! तुम कुलवती घृत आदि पौष्टिक पदार्थों का उचित उपयोग करने वाली, तेजस्विनी, बुद्धिमती, सत्कर्म करने वाली होकर सुखपूर्वक रहो। तुम ऐसी गुणवती और विदुषी बनो कि रुद्र और वसु भी तुम्हारी प्रशंसा करें। सौभाग्य की प्राप्ति के लिये इन वेदमन्त्रों के अमृत का बार- बार भली प्रकार पान करो। विद्वान् तुम्हें शिक्षा देकर इस प्रकार की उच्च स्थिति पर प्रतिष्ठित कराएँ।
यह सर्वविदित है कि यज्ञ, बिना वेदमन्त्रों के नहीं होता और यज्ञ में पति- पत्नी दोनों का सम्मिलित रहना आवश्यक है। रामचन्द्र जी ने सीता जी की अनुपस्थिति में सोने की प्रतिमा रखकर यज्ञ किया था। ब्रह्माजी को भी सावित्री की अनुपस्थिति में द्वितीय पत्नी का वरण करना पड़ा था, क्योंकि यज्ञ की पूर्ति के लिये पत्नी की उपस्थिति आवश्यक है। जब स्त्री यज्ञ करती है, तो उसे वेदाधिकार न होने की बात किस प्रकार कही जा सकती है? देखिये—
अ यज्ञो वा एष योऽपत्नीक:। —तैत्तिरीय सं० २। २। २। ६
अर्थात् बिना पत्नी के यज्ञ नहीं होता है।
अथो अर्धो वा एष आत्मन: यत् पत्नी।
—तैत्तिरीय सं० ३। ३। ३। ५
अर्थात्- पत्नी पति की अर्धांगिनी है, अत: उसके बिना यज्ञ अपूर्ण है।

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