बुधवार, 8 जून 2016

मलेशिया में भी उठ रही हैं भारत को हिन्दूराष्ट्र बनाने की मांग

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दुनिया भर के यहूदी यह जान चुके थे कि जिस कौम का अपना घर नहीं होता उसे कोई छत नहीं देता, इसी विचार ने इज्राइल की संकल्पना की। आज संपूर्ण विश्व के हिन्दुओं को भी यही असुरक्षा की भावना घेरे हुए है। हाल ही में ये मांग मलेशिया में उठ रही है।मलेशिया एक बहु धार्मिक समाज है और मलेशिया में प्रमुख धर्म इस्लाम है। २०१० में सरकार की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, यहां के प्रमुख धर्मावलंबियों में मुस्लिम (६१.३%), बौद्ध (१९.८%), ईसाई (९.२%), हिंदू (६.३%) और कन्फ्यूशीवाद, ताओ धर्म और अन्य पारंपरिक चीनी धर्मों (१.३%), शामिल हैं। देश की बहुसंख्यक समुदाय के रूप में सभी मलय मुस्लिम हैं, क्योंकि मलेशियाई कानून के तहत मलय होने के लिए मुस्लिम होना जरूरी है। मलेशिया में धार्मिक आज़ादी की क्या सीमा है, इसका नमूना भी मिल जाता है। मिसाल के तौर पर मस्जिद के पास धार्मिक मामलों के विभाग के एक पोस्टर लगा है कि मलेशिया में सिर्फ़ सुन्नी इस्लाम का पालन किया जा सकता है और शिया इस्लाम के खिलाफ़ 1996 से ही फ़तवा है।

आधिकारिक रूप से इस्लामिक देश होने के बावजूद मलेशिया ये दावा करता है कि वहाँ हर धर्म को मानने की स्वतंत्रता है। परन्तु हाल में ही 7000 हिन्दुओं के मुस्लिम धर्मांतरण के बाद यह बात निकलकर सामने आई कि जबरन सरकारी आईडी कार्डों में उन्हे मुस्लिम दर्शाया गया, ये अतिक्रमण की पहली घटना नहीं है।मलेशिया के पेनांग राज्य में आराकुडा के सेबेरांग पेरई सेंट्रल क्षेत्र के मुथुमारियाम्मन् मंदिर पर कुछ धर्मांधों ने आक्रमण किया । मंदिर के ४ देवताओं की प्रतिमा तोडी गई । पेनांग राज्य के मुख्यमंत्री पी. रामासामी ने बताया कि, इस आक्रमण के पीछे राजनीति है । मलेशिया के इपो शहर में हिन्दू देवताओं की प्रतिमाओं का विध्वंस तथा अनादर करने की घटना घटी ।1957 में अंग्रेजों के उपनिवेश से इस देश को मुक्ति मिल गई तथा अनेक नवस्वतन्त्र देशों की भाँति इस देश को भी एक संविधान मिला और उस संविधान के अनुच्छेद 8 और 11 के अन्तर्गत मलेशिया के निवासियों को क्रमश: समता का अधिकार और धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार मिला। परन्तु संविधान के अनुच्छेद 153 के अन्तर्गत मूल मलय निवासियों को कुछ विशेषाधिकार दिये गये हैं। हालांकि भारतीय नस्ल के प्रति भेदभाव के विषय पर लम्बे समय से आन्दोलन चला रहे भारतीय नस्ल के मलेशिया के नागरिक और अधिवक्ता वेदमूर्ति के अनुसार मूल संविधान में अनुच्छेद 153 की व्यवस्था कुछ मय के लिये की गई थी और संविधान सभा में इस विषय पर भारतीय नस्ल के लोगों से सहमति भी नहीं ली गई थी।

इसी बीच कुछ वर्ष पूर्व घटी एक घटना ने हिन्दू चेतना को और झकझोर दिया जब एवरेस्ट विजेता एक कर्नल को हिन्दू होते हुये भी उसके परिजनों की इच्छा के विपरीत शरियत अदालत के आदेश पर उसे मुस्लिम रीति से दफना दिया गया। इस घटना ने अन्तरराष्ट्रीय परिस्थितियों के साथ मिलकर हिन्दुओं मे इस्लामवादी आधिपत्य का भय विद्यमान कर दिया और इसी चेतना के चलते अनेक वर्षों से भारतीय नस्ल के लोगों के लिये चल रहा प्रयास आन्दोलन बन कर खड़ा हो गया। मलेशियाके दुर्लक्षित अल्पसंख्यक हिंदू समाजकी प्रगति करनेके उद्देश्यसे आमरण अनशन करनेवाले ’हिंदराफ’ हिंदू संगठनके प्रमुख पी. वेदमूर्तिका कहना है कि- " मलेशिया एक मुस्लिम राष्ट्र है । मुस्लिम राष्ट्रमें रहनेवाले अल्पसंख्यक हिंदुओंको मुस्लिम राजनेताओंद्वारा कोई सुविधाएं नहीं मिलती । इसलिए हिंदुओंको अनशन करना पड रहा है ।विश्वमें कहींपर भी हिंदू राष्ट्र नहीं है । हिंदूबहुल भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है । इसके विपरीत विश्वमें अनेक मुस्लिम एवं ईसाई राष्ट्र हैं । अत: विश्वमें कहींपर भी ईसाई एवं मुसलमानोंपर अत्याचार हुआ तो, इन राष्ट्रोंद्वारा दबावतंत्रका उपयोग किया जाता है । हिंदुओंको पूरे विश्वमें न कोई स्थान है, न तो उनका कोई त्राता है । अतः विश्व एवं भारतके हिंदुओंको सिर उठाकर जीनेके लिए अब भारतमें हिंदू राष्ट्रका निर्माण अनिवार्य है । "

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